इस कहानी का अंत नहीं

गहन पीड़ा की उपज – इस कहानी का अंत नहीं

 

जिज्ञासा को जन्म देने वाली बेचैनी मुझे पुस्तक के पन्ने पलटने के लिये मजबूर करती रही, उंगलियों की हरकत जारी रही, रुकी तब, जब सोच शिथिल हुई और ठिठकी, नीचे पहली पंक्ति पर नज़र पड़ते ही…. “एक कागज के टुकड़े से कहानी बनी”….सोचती रही , यह कैसा बेजोड़ जोड़ है। कागज़ के टुकड़े से कहानी बनी का क्या मतलब….. पर जब पढ़ती रही तो लगा कि जो कहानी निरंतर प्रवाहित होने के लिये सक्रिय रहती है और समग्र रूप से जीवन से जुड़ती है , वही शायद कहानी है, वही उसका श्रोत भी।

मानव मन वैसे भी लेखिनी की हर विधा का सर्वश्रेष्ठ प्रतिनिधि होता है, जहाँ भावनात्मक ऊर्जा निरंतर मंथनोपरांत प्रवहमान होती रहती है। कहानी में लेखक अपने रचनात्मक संसार में विलीन हो जाता है, अपने पात्रों के साथ उठता-बैठता है, उन्हीं की तरह सोचता है , सक्रिय रहता है और यहीं आकर कल्पना यथार्थ का रूप धारण करती है। जी हाँ, वह जिज्ञासा को जन्म देनेवाला कहानी संग्रह “इस कहानी का अंत नहीं” है , जिसकी रचनाकार जानी-मानी प्रवासी कथाकार इला प्रसाद हैं जो अपनी ही सोच के तानों-बानॊं से उलझती हुई, प्रसव की गहन पीड़ा को महसूस करते हुए , इस पुस्तक की भूमिका में लिखती हैं- “इस संग्रह की एक- एक कहानी के पीछे , वर्षों की भोगी हुई पीड़ा ,घुटन और विवश क्रोध है, जो मुझे लगातार अन्दर ही अन्दर गलाते रहे हैं।” सोचती हूँ, जिन्दगी की ऐसी कौन सी कशमकश होगी जो ज्वालामुखी की तरह विस्फ़ोटित होने को आतुर है, ऐसा कौन सा तान्डव जीवन में आया होगा जो यह मानव मन मंथन के उपरांत अपने भाव क़लम के माध्यम से काग़ज़ पर उतार लेता है। पढ़ते-पढ़ते यह जाना कि इला जी की कहानियों की भूमिकायें रोजमर्रा जीवन की सच्चाइयों से ओत-प्रोत हैं।
उनकी कहानी “जीत” पढ़ते हुए पाया कि नारी मन का मनोबल रेत के टीले की तरह ढह जाता है। चुनौती देने वाले नौजवान छात्र दुश्मनी निभाने की चुनौती अपनी एक्ज़ामिनर मिसेज़ सिन्हा को देते हैं , तदुपरान्त नारी मन का यंत्रवत, सन्नाटे के घेराव में, अपने आप को अपराधी महसूस करते हुये स्थानीय अख़बार के दफ़्तर में लिखित बयान देना और अगले दिन तक एक ख़बर का बन जाना ज़ाहिर था। शायद नारी मन इसमें भी अपनी जीत देख रहा है , जीत और जीत के नशे का रंग भी कितना निराला है!
इलाजी की और अनेक कहानियाँ आज के वातावरण से जुड़ी हैं- ई मेल , रोड टेस्ट , ग्रीन कार्ड , सेल , कालेज – जिनका अब इस ज़माने में हर पाठक के साथ परिचय जरूरी है। भुमंडलीकरण के साथ तक़नीकी इज़ाफ़ा हुआ है और इंटरनेट के साथ जुड़कर ई मेल तक आ पहुँचे हैं हम। परन्तु इन सब विषयॊं पर एक आम इन्सान के नज़रिये से रोशनी डालना, अपनी विविधता, संकल्पशीलता और प्रस्तुतीकरण को एक सशक्तता प्रदान करना इला जी की खासियत है। “खिड़की” एक ऐसी ही कहानी है, नारी मन की पीड़ा, घुटन और अन्तर्द्वद का दस्तावेज है यह कहानी।
ज़िन्दगी की संकरी पगडंडियों से गुजरते हुये , इलाजी की कहानियों के क़िरदार उन लम्हात से रूबरू कराते हैं, जहाँ ख़ामोशियाँ भी शोर मचाती हैं. शहर के जीवन में अक्सर देखा जाता है कि बेपनाह सुविधाओं के बीच जहाँ कई सुख के साधन, धन दौलत मन चाही मुरादों को पूरा करने में मददगार साबित होते हैं , वही जाने क्यों और कैसे आम आदमी के दिल के किसी कोने में खालीपन का अहसास भर देता है और जब तक वह क़ायम रहता है , इन्सान अनबुझी प्यास लेकर जीवन के सहरा में भटकता है, तड़पता है।
“ग्रीन कार्ड” कहानी में हक़ीक़तों को दर्शाया गया है। परदेस से आनेवाला राजकुमार अपनी पसंदीदा, वतन की लड़की से नाता जोड़कर चला जाता है। कुछ वादे करके , कुछ वीज़ा के हवाले देकर और फ़िर देखते ही देखते दिन, हफ़्ते, महीने और फ़िर साल हाथ से रेत की तरह फ़िसलते चले जाते हैं। रिश्तों की शिला भरभरा जाती है। रिश्ते तो बुने जाते हैं पसीने के तिनकों से, अहसासों के तिनको से, सम्बन्धों की महत्त्व से, तब कहीं जाकर अपनत्व की वो चादर उस रिश्ते को सुख-दुख की धूप-छाँव में, बारिश, आँधी, तूफ़ान में महफ़ूज रखती है। रिश्ते निबाह- निर्वाह की नींव पर मान्यता हासिल करते हैं। भारत और विदेश की समस्याओं से गुज़रती एक नारी की कहानी है “ग्रीन कार्ड” जो चाह्कर भी अपनी नकारात्मक सोच से रिहाई नहीं पा रही। बेहद अपमान जनक स्थितियों के कारण उसके अन्दर का अँधेरा घना होता जा रहा है। उसका अन्तर्द्वद्व इस कहानी में बखूबी चित्रित हुआ है और पाठक उसे अपने रोज़मर्रा के जीवन में महसूस सकता है।
जीवन में कई ऐसे मोड़ आते हैं जो ज़िंदगी को नई माइने बख़्शते हैं. परस्पर दो प्राणियों की मुलाक़ात, उनकी गुफ़्तार और फिर सिलसिले धीरे धीरे यादों को गहरा कर देती हैं. इला जी ने अपनी क़लम के सहारे कई ऐसे पारदर्शी सम्बन्धों की कहानी अपनी स्मृति के गलियारे से मुक्त कर हमारे साथ बाँटी है। ये कहानियाँ कहीं कहीं संस्मरण, कहीं आधुनिकीकरण की दशा और दिशा से हमारा परिचय कराती हुई महसूस होती हैं। उन्हें इस संग्रह के लिये मेरी दिली शुभकामनायें हैं और उम्मीद ही नहीं यक़ीन है कि जीवन से जोड़ते हुये इस कहानी संग्रह को पाठकों का स्वागत और स्वीकृति मिलेगी।
समीक्षकः देवी नागरानी, ९ डी, कार्नर व्यू सोसाइटी, बांद्रा, मुंबई ४०००५०.
कहानी संग्रहः इस कहानी का अंत नहीं, लेखिकाः इला प्रसाद, पन्ने=९६, मूल्य=रु॰ १२५, प्रकाशकः जनवाणी प्रकाशन, विश्वास नगर, दिल्ली ११००३२

रंग बदलता मौसम

         रंग बदलता मौसम  (कहानी)

         साहित्य और समाज का आपस में गहरा संबंध है , जिनको एक दूसरे से अलग नहीं किया जा सकता, क्योंकि साहित्य अपने काल का प्रतिबिंब है. जिस समाज में हम रहते है, उसीका हिस्सा बन जाते हैं. समाज के आसपास की समस्याओं को, विडंबनाओं को कथा या कहानी की विषय वस्तु बनाकर, पात्रों के अनुकूल उनके विचारों को शब्दों शिल्पी की तरह तराश कर मनोभावों को अभिव्यक्त करते हैं.
       जीवन एक प्रेणादायक स्त्रोत्र है, हमेशा बहने वाली नदी की तरह निरंतर, निष्काम, कल-कल बहता हुआ.  अन्चुली भरकर पी लेने से कहाँ प्यास बुझती है? ऐसे ही मानव मन अपनी परिधि के अंदर और बाहर की दुनिया से जुड़ता है तो जीवन की हकीक़तों से परिचित होता है. दुःख-सुख, धूप-छाँव, पारिवारिक संबंध, रिशतों की पहचान,अपने पराये के भ्रम जब गर्दिशों के उत्तार-चढ़ाव की राहों पर जिए गए तजुर्बात बनकर हमारी सोच को रोशन करते हैं तो साफ़-शाफाक़ सोच पुरानी और नयी तस्वीर को ठीक से देख पाती है. यह परिपक्वता तब ही हासिल होती है जब आदमी उन पलों को जीता है, भोगता है.
            ऐसी ही पेच्चीदा पगडण्डी से गुज़रते हुए, मन को टटोलती आस की तितलियाँ जब रंग-बिरंगे पंख पसारे सोच के साथ अनेक दिशाओं में विचरती है तो मनमानी करता बांवला मन कितनी उमीदें बांध बैठता है, उन क्षण भंगुर पलों से जो दूसरे ही पल रेत के टीले की तरह भरभरा जाते हैं. ऐसा ही कुछ कहानी ” रंग बदलता मौसम” के किरदार मनीष के साथ हुआ, जो दोस्ताने को रिशतों की कच्ची पगडण्डी पर बसना चाह रहा था. पर अचानक जब सपनों के महल धराशायी हुआ तो साथ उनके क्या-क्या टूटा,  पंकज समझ नहीं पाया, न कह पाया. बस इतना था कि गाड़ी चलती रही और वह जहाँ खड़ा था वहीँ थम गया . यहाँ औरत के चरित्र को भी उजगार करते हुए ये शब्द ” वो तो बड़े भाई का कोई परिचित है” अपनों को बेगाना बनाने में बड़ी सशक्तता से अपना असर छोड़ गए. स्वार्थ के सिंघासन पर बैठे लोग क्या जाने कि ठेस लगना क्या होता है, चूर चूर होकर बिखरना क्या होता. शायद खिलवाड़ करना उनकी फ़ितरत में शामिल होता है. इस तरह की कहानियों से सामाजिक  प्रवाह में नया मोड़, नई दिशा दर्शाने की क्षमता समाई होती है.
          सुभाष जी की लेखनी की खूबी उनके शब्दों की अभिव्यक्ति से, गुफ़्तार से, ज़ाहिर होती है जहाँ उनके अनकहे तेवर अपने आप को पारदर्शी बना कर ज़ाहिर करते हैं. सँवाद कम पर पुरअसर इस कद्र कि कल्पना और यथार्थ के फासले कम होकर गुम से हो गए हैं. कहानीकार अपने किरदारों के जीवन में इस तरह घुलमिल जाते हैं कि जैसे कोई आप-बीती जग-बीती बन कर प्रवाहित हो रही है. यह कहानी सिम्रतियों और वर्तमान की अनुभूतियों की सुंदर पारदर्शी अभिव्यक्ति है, जिसमें मार्गदर्शकता का संकेत भी शामिल है. मानव के मनोभावों को अभिव्यक्त करने की कलात्मक क्षमता भी कहानी को रुचिकर बना देती है, और पाठक को और आगे क्या होता है, यह जानने की उत्सकता को भी बरक़रार रखती है.

देवी नागरानी

किताब जिन्दगी की

किताब जिन्दगी की –डॉ. कृष्ण कन्हैया

 सोच को शब्दों में बुन कर, विचारों को भावनात्मक अंदाज़ में अभिव्यक्त करना एक सराहनीय रुझान है जो डॉ. कृष्ण कन्हैया की कृति “किताब ज़िन्दगी की ” में मिलता है I जिन्दगी तो हर कोई जीता है, पर उसे करीब से देखना, पहचानना, पहचान के उस अहसास के साथ जीना एक अनुभूति है I  उस जिये गए तजुर्बात को कलम की जुबानी पेश करना लेखक के लिए एक स्वाभाविक प्रक्रिया है — शायद कलम उसकी भावनाओं को जानकार, पहचानकर उसकी अभिवयक्ति के साथ इन्साफ़ करती है क्योंकि वह अंतरमन की खामोशियों की जुबान है I आईये सुनते हैं उन आहटों को कलम की ज़ुबानी..

ज़िन्दगी एक बंद किताब है / जिसे खोलने की कोशिश तब सही है

जब इसके पन्नों को दोनों तरफ से पढ़ा जाये                                                           

डा. कृष्ण कन्हैया, बिहार, भारत से आकर इंगलैंड, यू. के. के निवासी हैं, शिक्षा- एम.बी.बी.एस(आनर्स), अपने पेशे के दौरान ज़िंदगी को करीब से देखते है माना पर उस में बीते हुए पल पल का चिट्ठा अपनी शब्द सश्क्तता से जीवंत होने का आबास दिला जाता है. उनकी ज़ुबानी उनकी तनमयता सुनिये‍..”  कविता-शायरी के साथ-साथ संगीत का शौक विद्यार्थी जीवन

से था जो समय के साथ जिंदगी के जुड़ता चला गया। विदेश आने के        बाद अपनी संस्कृति का गर्व, अपने संस्कार की गरिमा, अपने गाँव की शुद्ध सौंधी ख़ुश्बू और अपनी मात्रभूमि से अनवरत लगाव मेरी अंतर्आत्मा को ज़्यादा उद्वेलित करती थी जिसकी झलक अब मैं अपनी कविताओं में महसूसता हूँ. चलिये उन के साथ सफ़र तय करते हैँ जहाँ आगे इस मर्म को स्पष्ट करते हुये डॉ.कृष्ण कन्हैया लिखते हैं –

जिंदगी एक ग्लास की तरह है /जिसमें उसके कार्यों का पानी भरा है “

आशावादी और निराशावादी सोच की कसौटी को मद्देनज़र रखते हुये उनका प्रगतिशील विचार किस तरह आपने आप को कितनी सरलता से एक जटिल सवाल का हल सामने रख पाया है —

“सच तो यह है कि/यह आधा, अधूरा सपना है

और इसे पूरा करने का संकल्प अपना है/प्रश्न है किः

देखने वाले की मानसिकता क्या है ?

इसे भविष्य में/पूरा देखना, या /पूरा खाली देखना !!

अपने अहसास को जिंदा रखने के प्रयास में ज़िन्दगी के उतर-चढाव को मुंह दिये बिना आगे के पड़ाव तक जाने का सवाल ही नहीं आता. एक दौर गुज़रता है तो राहें दूसरे मोड़ पर आ जाती है और दरगुज़र ज़िन्दगी आपने आगे एक विस्तार लिये हुये बाहें फैलाये रहती है जिसमें समोहित है गम-ख़ुशी, प्यार-नफ़रत के अहसास जो जिन्दगी की दौलत है. पर सफ़र तो सफ़र है, उनके शब्दों में आइये उन्हें टटोलते हैं-

“मेरे आरमान के आंसू /पलकों की कश्ती पर/ आँखों के सागर में /जिन्दगी के संग-संग

निरंतर तैरना चाहते हैं /किनारे तक जीना चाहते हैं” /

हां, अवसर है इस अधिकार को जीने का और लक्ष भी साफ़ है –

“मौत आती है /जब भी लगाती भूख उसे —-

कहाँ भक्ष्य जायेंगे बचकर /उनको तो आना ही आना है”  

दिल की दहलीज़ पर दस्तक देती हर आहट मानव को कहीं न कहीं आपने ही दिल की आप-बीती लगती है .जहाँ ऐसी संभावनाएं बाक़ी है, वहीं कलम की रवानी हर दिल से इन्साफ़ करती रहेगी, चाहे वह दिल किसी अमीर का हो या किसी गरीब का, किसी मजदूर का हो या किसी नेता का.      व्यक्ति समाज का दर्पण होता है और जैसे-जैसे आईने बदलते हैं, अक्स में बदलाव लाज़मी है. मन के मंथन में भावों और विचारों का सुन्दर सामंजस्य देखने- पढ़ने-सुनने को मिलता है. डॉ.कृष्ण कन्हैया जी ने सामजिक विषमताओं, राजनीतिक स्वार्थों, मानव मन की पीड़ा और विसंगतिओं पर करारी चोट करते हुये हर पहलू पर कलम चलायी है. उनमें से कुछ विषयों पर उनकी सुलझी हुई सोच दिल से दिल ताक को सन्देश पहुचाने में कामयाब हुई है…..जिसमें ‘समझौता, ‘पैसा’, ‘एहसान’ और ‘अच्छाई’ जैसे उन्वान शामिल है और उन्हीं में गहरे कहीं उनकी चिंतन-शक्ति और अनुभव की परिपक्वता सर्वत्र झलकती है .’अच्छाई’ में उनकी पारदर्शी विचारशैली, वस्तु व शिल्प अति उत्तम है . उनकी बानगी देखें –

अच्छाई की परिभाषा /दुनिया के मतलबी दौर में /बदलती जा रही है/ क्योंकि इसका प्रयोग लोग

अपनी बेहतरी के लिए करते हैं

‘इस्तेमाल’ नामक रचना में डंके की चोट पर अभिव्यक्त किये उनके विचारों से हम रूबरू होते हैं ,जहाँ लाचारगी को सियासती मोड़ पर खड़ा करते हुये वे कहते हैं-

“भले ही तुम्हारी मजबूरी है /पर औरों के लिए /रोज़गार का जरिया

सियासती दाव-पेंच ,या /अन्तर्राष्ट्रीय विवाद का विषय ”   

इसी कविता के अंतिम चरण में बेबसी की दुर्दशा पर रोशनी डालकर किस खूबसूरत अंदाज़ में अपना विचार अभिव्यक्त करते हैं-

“पर / तुम्हें मिलगा क्या -/ज़िल्लत, बेचारगी, झूठे प्रलोभन

हिकारत और असमंजस से भरी /ज़िन्दगी जीते रहने के सिवा” ?

इंसान का मन अपने अन्दर दोनों भाव लिए हुये है- राम-रावण, गुण के साथ दोष , सच के साथ झूठ, न्याय के साथ अन्याय और उन्हीं से बनती-बिगड़ती विकृत तस्वीरों को, सामान्य प्राणी की दुर्दशा को, घर के भीतर और बाहर सियासती दखल के विवरण को उनकी कलम की नोक अपने-आप को अभिव्यक्त कर पाई है .अपने ही निराले ढंग से-

“लूट, डाका,खून, फिरौती अब /एक फैलता विकसित रोज़गार है

जिसमें रक्षक और भक्षक दोनों /बराबर के हिस्सेदार हैं “

जिन्दगी से जुड़े जटिल सवालात के सुलझे जवाब को अपनी रचना में प्रस्तुत करने में उनकी महारत प्रगतिशील है, पढ़ते पढ़ते कहीं मन भ्रमित हो जाता है कि क्या ऐसा संभव है कि एक प्राणी, एक जीवन के दायरे में इतने सारे अनुभवों के मोड़ से गुज़रता हूआ जाये और अपने जिये गये उस तजुरबे को हंसते खेलते इन कागज़ के कोरे पन्नों पर इस माहिरता से उतारते जायें कि पाठक के सामने एक सजीव चित्र मानो चलने फिरने लगता है‍‍‍….बयाने अंदाज़ निराला है…

जिन्दगी एक दौर है /बैशाखी पर चलने की लाचारी नहीं

न हीं घुटनों के बल/ चलने का नाम है/ क्योंकि —

“जिंदगी की दौड़/ अतीत के खोये कन्धों पर सवार हो कर

या फिर /भविष्य की काल्पनिक उड़ान पर/ जीती नहीं जाती;

उसके लिए तो /वर्तमान की बुलंद बुनियाद चाहिए”   

कितने सशक्त शब्दों में समाज में फैले भ्रष्टाचार, अन्याय, अत्याचार, वाद-विवाद एवं उनकी विसंगतियों को उजागर किया है .सुलझे हुये विचारों से आज-कल और आने वाले कल की तस्वीर की मुक़म्मल नींव रखी है. जिन्दगी का यह स्वरुप एक न्यायात्मक पक्ष प्रकट करता है. ज़िन्दगी आज, कल और आने वाले कल के तत्वों से बुनी जाती है , जहाँ ‘आज’ ‘कल’ का साक्षी था, पर वर्तमान की बुनियाद पर टिके आनेवाले ‘कल’ का कौन साक्षी होगा -यह इतिहास बतलायेगा . ‘घड़ी’ नामक रचना भी इसी सन्दर्भ में पुख़्तगी बख्शती है —  “घड़ी —

समय के लय के साथ सुर मिलाना /हर क्षण वर्तमान से आगे बढ़ जाना

तेरी प्रगति का सूचक है/तूने अपने साये को/ विश्राम के पाये को/अपनी  अतीत की आँखों से

एक प्रतिबिम्ब की शक्ल में /कभी नहीं देखा” — 

जाने-अनजाने में रचनाकार का मन अनछुए पहलुओं को यूँ उजागर करता आ रहा है – सरल व आम बोल-चाल की भाषा में ‘व्यंजन’ नामक काविता को शब्दों में गिरफ़्त करते हुये, एक समां बांधते हुए उनकी मनोभावना की बानगी पढ़ें और महसूस करें  

“बुराई का व्यंजन/ उत्तम, सबसे उत्तम भोजन है /क्यूंकि जायकेदार होने के साथ- साथ

सस्ते दामों पर सर्वत्र उपलब्ध है :

व्यक्ति के व्यभिचार में/ हर घर, हर परिवार में /गाँव में, बाज़ार में / क्या पूरे इस संसार में”

अनेक परिभाषाओं के विस्तार से एक झलक ‘झूठ’ नामक कविता मन पर एक अमिट चित्र अंकित करती चली जाती है, शायद हर इक शख़्स ने इसका ज़ायका कभी न कभी ज़िन्दगी में लिया होगा. कहते हैं सच को गवाहों की ज़रूरत नहीं पार झूठ भी अनेकों बार बाइज़्ज़त रिहा होता है. शब्दों का कलात्मक प्रयोग बहुत ही सुलझे हुए तरीके से पेश किया है..आइये सुनते हैं कृष्ण कन्हैया जी का डंके की चोठ पर किया गया ऐलान……….

झूठ का व्यवहार —/ हत्या का चश्मदीद गवाह सच को सच नहीं बोलता —-

बोल-चल में सत्य की नगण्यता है —

और उसी झूठ की म्हणता मानते हुये स्पष्ट करते हैं –

“सूर्य की ऊष्मा /झूठ से ठंढी पड़ जायेगी /तब झूठ बोलने वाले यह मान कर चलेंगे कि

सच की यही परिभाषा है ”

अपनी सोच को एक शिल्पकार की तरह शब्दों में तराशकर कुछ ऐसे पेश करने में डॉ.कृष्ण कन्हैया कामयाब रहे हैं कि कभी, कहीं सोच को भी ठिठक कर सोचना पड़ जाता है, शायद सोच की भाषा बोलने लगती है, चलने लगती है, कभी तो चीखने लगती है. मन की बस्तियों के विस्तार से कुछ अंश, जो जिन्दगी जी कर आती है , वही अनगिनत अहसास, मनोभाव, उदगार और अनुभव लेखक ने खूब सजाये हैं अपनी जिन्दगी की किताब -“किताब जिंदगी की” में, जो अपने प्रयास से भी हमें अवगत करा रहे हैं कि लिखना मात्र मन व मस्तिषक का ही काम नहीं, पर सधा हुआ मनोबल भी उसमें शामिल हो तो कलम की स्याही और गहरा रंग लाती है… 

“विवेक की स्याही से /उत्साही उँगलियों द्वारा

दानिशमंदी का आकर /बनाने का नाम है” -और प्रमाण भी

“जिन्दगी की किताब” पाठकों से रूबरू होकर अपनी पहचान व उत्तम स्थान पायेगी. इसी शुभकामना के साथ —

देवी नागरानी,

न्यू जर्सी, dnangrani@gmail.com

पुस्तके नाम‍ः किताब ज़िंदगी की, लेखकः डॉ. कृष्ण कन्हैया, पन्नेः 104, मूल्यः Rs.125   

प्रकाशकः अक्षत प्रकाशन ए/१३४ हाऊसिंग कालोनी, मेन रोड, कंकरबाग़, पटना -८०००२०, बिहार ,भारत   

जो कहूँगा सच कहूँगा

डंके की चोट पर सच का ऐलान करती हुई कृति “जो कहूँगा सच कहूँगा”

क़लम अंतरमन की खामोशियों की जुबान है. मन के अथाह सागर में जब सोच की लहरें तहलका मचाती हैं, तो उस शोर की रवानी शेरों में आकार पाने लगती है. लेखन कला एक सफ़र है, जिसकी मंजिल शायद नहीं होती. ता-उम्र सहरा की मृगतृष्णा में लिखते रहना और ज़ियादा लिखने की प्रेरणा के साथ.

क़लम के सिपाही श्री महेश अग्रवाल डंके की चोट पर सच कहने की तौफ़ीक रखते हुए अपने  रचनात्मक आसमान की ओर उड़ते हुए सोच के परिंदों को नया क्षितिज प्रदान करते हैं. उनकी लेखन कला अपने आप में एक सम्पूर्ण परिचय है. “जो कहूँगा सच कहूँगा” में उनकी क़लम  के तेवर अपने तीखेपन के साथ ज़ाहिर हो रहे हैं. देखिये यह बानगी……

कौन सुनता है यहाँ मज़लूम की चीखें

कुर्सियों पर दोस्तों केवल शिलाएं हैं

 

जंगलों में यार आदमख़ोर मत ढूंढो

बस्तियों में आजकल उनकी गुफाएं हैं

काव्यात्मक संसार का विस्तार उनके जीवन के जिए हुए उन अनेक पलों को समेट लेते हैं, जिसमें शामिल रहती है मध्य-वर्गीय मनुष्य की पीड़ा ,   न्याय अन्याय की बदलती परिस्थितियाँ, प्रशासन की जर्जर अवस्था एवं कानून की जटिलता. न्याय व्यवस्था पर कटाक्ष करती हुई उनकी पैनी क़लम के आइये प्रहार पढ़ें—

बिक जाते हैं लोग यहाँ आसानी से

कोठे जैसे लगते थाने वर्षों से

जुर्म, सियासत दोनों मिलकर एक हुए

दोनों के अच्छे याराने वर्षों से

जहाँ शीशमहल के रहने वाले पत्थर से प्रहार करने को हर पल तैयार रहते हैं, जहाँ अदालतें झूठ को पनाह देती है , जहाँ इन्सान इंसानियत का गला घोंटने पर आमद है वहीँ श्री महेश अग्रवाल जी की शायरी हमारी सोच को संचारित करके, बहुत कुछ सोचने के लिए इस कशमकश के दौर में अपने आपसे बाहर आकर अपने आसपास के संघर्षमय जीवन के साथ संधि करना कोई आसान काम नहीं, जहाँ अपने आप से जूझकर-हारकर अनेकों बार ज़मीरों से सुलह करनी पड़ती  है. उसी बेदार्गी से जागृत करती हुई उनकी इस बानगी से चलो रू-ब-रू होते हैं……

हार किसकी और किसकी है फ़तह कुछ सोचिये

जंग है ज्यादा ज़रूरी या सुलह, कुछ सोचिये

मौन है इन्सानियत के क़त्ल पर इन्साफ़ घर

अब कहाँ होगी भला उस पर जिरह, कुछ सोचिये

दे न पाए रोटियाँ, बारूद पर खर्चा करें

या खुदा अब बंद हो ऐसी कलह, कुछ सोचिये

संवेदना धारावाहिक रूप से शब्द-सरिता की तरह प्रवाहित होती जा रही है. महेश जी की रचनाएँ रोज़मर्रा ज़िन्दगी के ताने-बनों से बुनी हुई है. प्रतिभाशाली काव्यात्मक रचना एक संवेदनशील ह्रदय की उपज होती है, जिसमें शामिल है संसार में जिया गया अनुभव, साफ़-सुथरी बोलचाल की भाषा में बात कहने की निपुणता. भवन के अंदर की भव्यता बाहर से दिखाई देती है, जहाँ करीने से सजाई ईंट पर ईंट अपने आप में कुशलता का प्रमाण है. ग़ज़ल लिखने के लिए जो प्रमुखता है वह शब्दों की सजावट और बुनावट से महसूस की जा सकती है. आइये उनकी बानगी की गहराई और गीरआई को महसूस करें—

लोग उगाएं पहले खुशियों का सूरज

फिर लिखें खुशहाल इबारत दुनिया की

मुफ़लिसी दुल्हन न बन पाई कभी

यूं कई सत्तास्वयंवर हो गए

कविता का सूत्र उसकी लघुता में होता है.  सोच की संकरी गली से अहसासों की धड़कनों को शब्द बद्ध करना सागर में गागर समोहित करने का प्रयास श्री महेश जी ने खूब निभाया है. ग़ुरबत की बेबसी और छटपटाहट शब्दों से झलकती हुई दिखाई पड़ रही है. जीवन जीना अपने आप में एक बड़ी कसौटी बनता जा रहा है और उस कसौटी पर पूरा उतरना मुश्किल ज़रूर है, पर असंभव नहीं, मनोबल में अजमिय संचार की ज़रुरत पड़ती है. श्री महेश जी की ग़ज़लें आत्मीयता से गुफ़्तगू करती हुई मानवता के मर्म को छू जाती है. सहज-सरल भाषा में वो कहीं भटके हुए पथिक का मार्गदर्शक बनती है, तो कहीं अविश्वास में विश्वास की स्फूर्ति दर्शाती है. उनकी इस भावना प्रधान अभिव्यक्ति की सच्चाई से आइये परिचित होते है:

रोज़ सपनों की भले ही मौत हो पर

कोशिशों के घर कभी मातम न हो

हक़ ज़बरदस्ती अगर छीना गया हक़दार का

हम क़लम से काम लेंगे दोस्तो तलवार का

सोच भी ठिठक कर कहीं-कहीं सोचने पर आमद हो जाती है. समकालीन  हिंदी ग़ज़ल अपनी संवेदना और शिल्प की चादर ओढ़कर हमसे रू -बी-रू होती है, गुफ़्तार करती है, अपने हर तेवर, हर आक्रोश को अपने सीने में दबाये रखने के बजाय, दबी आग को उगलते हुए आम आदमी की ज़िन्दगी की समस्याओं से खुद को जोड़ती है—

हर तरफ की आंच में सिकते रहे है हम यहाँ १२२

और हम हिमखंड जैसे ही गले हैं दोस्तों

सभ्यता, नेकी, शराफ़तख़ूब रोई है यहाँ

जब कभी भी इन सलीबों पर चढ़ा है आदमी

एक न ख़त्म होने वाले द्वंद्व की तरह अंतरमन में प्रसव-पीड़ा की तरह अंगडाइयां लेता हुआ दर्द जो भोग गया है, सहा गया है, उसकी कटुता,  अलगाव, घुटन प्रदूषित करती ज़हरीली हवाओं की पुरसर झलकी आज के परिवेश में देखी जा रही है और वही इंसान को दुःख की घुटन में जकड़ लेने में सक्षम है. महेश जी की क़लम ने इन सूक्ष्म पहलुओं पर बखूबी शब्दों से निबाह और निर्वाह करते हुए कहा है—

ाव डूबी है यकीनन साहिलों के पास ही

किन्तु साबित कर रहे हैं जुर्म हम मंझधार का

रिश्ते की महत्वता मान्यता से होती है. जहाँ घर है वहीँ रिश्ते बुने जाते है पसीने के तिनकों से, अहसासों के तिनकों से, तब कहीं जाकर वह अपनाइयत की चादर हमें महफूज़ रख पाती है,  हर उस दुःख की धूप से, खौफ़ की परछाइयों से,  दिन के उजाले के घने कोहरे से. जी हाँ! वह है माँ की ममता की छांव जो बरगद का शजर बनकर हर आंच से बचाती है. इसी भाव को शब्द-शिल्पी की नागीनेदारी भावों को ‘सीप में पले मोती” उस मानिंद प्रस्तुत कर पाने में कामयाब रही है इस बानगी में—

प्यार की बाराखड़ी सब लोग बाचेंगे

फूल पर उड़ती हुई कुछ तितिलियाँ तो हो

और अतृप्त मन में तृप्ति प्रदान करती हुई यह पंक्तियाँ एक सचाई है जिसको न किसी ज़मीन की ज़रुरत है, न किसी न्यायाधीश की, न किसी अदालत की. एक मात्र सच जो ज़िन्दगी की नींव भी है और प्रेणादायक स्तोत्र भी , जो यहाँ शब्दों के माध्यम हमारा मार्गदर्शक बन रहा है—

हमें वह पालती है पोसती है दर्द-सह्सह्कर

हमारी ज़िन्दगी को सींचने वाली नहर है माँ

शब्दों की सक्षमता का प्रमाण यह ग़ज़ल-संग्रह अपनी विशालता से मनोभावों को,  उद्गारों को व्यक्त करते हुए मानव मन को दस्तक देने में सफल हुआ है. यह संग्रह पाठकों की दिलों में घर कर पाए और साहित्य जगत में उचित मान-सन्मान से स्थान पाए इसी शुभकामना के साथ.

देवी नागरानी

ग़ज़ल -संग्रह : जो कहूँगा सच कहूँगा  , लेखक : श्री महेश अग्रवाल ,  पन्ने: 96,  मूल्य: रु.150 , प्रकाशक: उत्तरायण प्रकाशन, लखनऊ 226012 .

वक्त के मंज़र

दिल ले दर्पण के अक्स बनेवक्त के मंज़र

अपनी ग़ज़लों के लिए अपनी ज़ुबानी क्या कहूँ
कैक्टस हैं ये सभी या रात रानी क्या कहूँ

डॉ. ब्रह्मजीत गौतम जी के ग़ज़ल संग्रह “वक्त के मंज़र” में जहाँ रचयिता की अनुभूतियां और उनकी खूबियाँ शब्दों से उकेरे हर बिम्ब में साफ़ साफ़ नज़र आईं हैं, साथ में सादगी से अनुभूतियों को अंतस में उतारने की कला का अद्भुत प्रयास पाया जाता है.  किसी ने खूब कहा है ‘कवि और शब्द का अटूट बंधन होता है, कवि के बिना शब्द तो हो सकते हैं, परंतु शब्द बिना कवि नहीं होता. एक हद तक यह सही है, पर दूसरी और कविता केवल शब्दों का समूह नहीं,. कविता शब्द के सहारे अपने भावों को भाषा में अभिव्यक्त करने की कला है. गौतम जी के अशयार इसी कला के हर गुण के ज़ामिन हैं. उनकी कलात्मक अनुभूतियाँ शब्द, शिल्प एवं व्याकरण से गुंथी हुई रचनाएं सुंदर शब्द-कौशल का एक नमूना है. एक हमारे सामने है……
कैक्टस हैं ये सभी या रात रानी क्या कहूं?
गौतम जी की रचनाधर्मिता पग-पग ही मुखर दिखाई पड़ती है और यही उनकी शक्सियत को अनूठी बुलंदी पर पहुंचती है. अपने परिचय में एक कड़ी और जोड़ती इस कड़ी का शब्द-सौन्दर्य और शिल्प देखिये-

गौतम गाँधी हूँ, विनोबा भी नहीं हूँ मैं

मगर महसूस करता हूँ कि कर दूं अब क्षमा उसको

काफ़िये का होश है वज्न से है वास्ता

कह रहे हैं वो ग़ज़ल बेबहर मेरे देश में

शाइरी केवल सोच कि उपज नहीं, वेदना कि गहन अनुभूति के क्षणों में जब रचनाकार शब्द शिल्पी बनकर सोच को एक आकार देकर तराशते हैं तब शायरी बनती है.  और फिर रचनात्मक ऊर्जा की परिधि में जब संवेदना का संचार होता है, तब कहीं अपनी जाकर वह अपनी अंदर की दुनिया को बाहर से जोड़ता है. अपने चिंतन के माध्यम से कवि समाज और सामाजिक सरोकारों के विभिन्न आयाम उजगार करता है. इस संग्रह में कवि ने सामाजिक, राजनैतिक, धार्मिक विडम्बनाओं, विद्रुपताओं, मानवीय संवेदनाओं पर दो पंक्तियों में शब्दों की शिल्पाकृतियों के माध्यम से अपनी जद्दो-जहद को व्यक्त किया है. उनके मनोभावों को इन अद्भुत अश्यार में टटोलिये–

हमने जिसको भी बनाया सारथी इस देश का

है सदा ढाया उन्होंने कहर मेरे देश में

हो चुकी संवेदनाएं शून्य

लाश के ओढे कफ़न हैं हम

मर गया वो मुफ़लिसी में चित्रकार

चित्र जिसके स्वर्ण से मढ़ते रहे

बड़ी सादगी और सरलता से शब्द ‘संवेदना-शून्य” का इस्तेमाल इस मिसरे में हुआ है, बिकुल सहज सहज, यह देखा और महसूस किया जा सकता है. श्री गौतम जी ने ज़िन्दगी के ‘महाभारत’ को लगातार जाना है, लड़ा है.  नए विचारों को नए अंदाज़ में केवल दो पंक्तियों में बांधने का काम,  दरिया को कूजे में समोहित करने जैसा दुष्कर प्रयास वे सुगमता से कर गए हैं. अपनी ग़ज़लों द्वारा वे देश, काल, परिस्थिति, टूटते रिश्तों और जीवन दर्शन को एक दिशा दे पाए हैं,  जो मानसिक उद्वेलन के साथ वैचारिकता की पृष्टभूमि भी तैयार करते हैं. देखिये उनकी इस बानगी में…

वक़्त कि टेडी नज़र के सामने

अच्छेअच्छे सर झुकाकर चल दिए

बेचकर ईमान अपना क़ातिलों के हाथ

बेकसों के आंसुओं पर पल रहे हैं लोग

काव्य की सबसे छोटी कविता ग़ज़ल है, जो संक्षेप्ता में बहुत कुछ कहती है. उसके शब्दों की बुनावट और कसावट पाठक को आकर्षित करती है. गौतम जी की लेखनी में उनका संस्कार, आचरण उनकी पहचान का प्रतीक है. जब वे अपनी बोलचाल की भाषा एवं राष्ट-भाषा हिंदी की बात करते हैं तो उनके तेवर महसूस करने योग्य होते हैं-

हिंदीदिवस पर कीजिये गुणगान हिंदी का

पर बाद में सब भूलकर अंग्रेजी बोलिये

मानव- जीवन से जुड़े अनुभवों, जीवन-मूल्यों में निरंतर होते ह्रास और समाज में व्याप्त कुनीतियों व् कुप्रथाओं को उन्होंने बखूबी अपनी ग़ज़लों की विषयवस्तु बनाकर पेश किया है–

इल्म की है क़द्र रत्ती भर नहीं

काम होते है यहाँ पहचान से

हाथ का मज़हब पंछी देखते

जो भी दाना दे ख़ुशी से खा गये

हिन्दू, मुस्लिम,सिख खड़े देता सबको छाँव

पेड नहीं है मानता मज़हब की प्राचीर

गौतम जी की रचनायें मानव जीवन के इतिवृत को लक्षित करती हैं. डॉ.श्याम दिवाकर के शब्दों में “यहाँ सुख के क्षण भी हैं, दुःख भी है, आंसू भी हैं, हास भी.यहाँ असफलता भी है, गिरकर उठने का साहस भी, और इसी कशमकश के बीच से गुज़ारना है, अँधेरे से रोशनी लानी है.” जहाँ चमन सूखता जा रहा है और मालियों को चिंता नहीं, वहां भी गौतम जी की सकारात्मक सोच प्यार के रिश्ते को मज़बूती प्रदान करती है. उन्हें के शब्दों में आइए सुनते हैं–

प्यार के बूटे खिलेंगे नढ़रतों की शाख़ पर

अपने दुश्मन को नज़र भर देखिये तो प्यार से

शाइर नदीम बाबा का कथन है ” ग़ज़ल एक सहराई पौधे की तरह होती है, जो पानी की कमी के बावजूद अपना विकास जारी रखता है.” इसी विकास की दिशा में गौतम जी से और भी आशाएं सुधी पाठकों और ग़ज़ल के  शायकों को हैं. उनकी क़लम की सशक्तता अपना परिचय खुद देती आ रही है, मैं क्या कहूं?

दर्ज है पृष्ट पर उनकी कहानी क्या कहूं

एक निर्झर झरने जैसे है रवानी क्या कहूं?

दिली मुबारकबाद एवं शुभकामनाओं सहित

प्रस्तुतकर्ता: देवी नागरानी

ग़ज़ल-संग्रह: वक़्त के मंज़र, लेखक: डा॰ ब्रहमजीत गौतम, पन्नेः ७२, मूल्य: रु.100. प्रकाशक: नमन प्रकाशन, नई दिल्ली.

कहानी टोर्नेडो

अपनी खुशबू मन के आँगन में बिखेरती- “ टोर्नेडो “  ( सुधा ओम  ढींगरा)

कहानी कच्ची मिटटी सी होती है जो किरदारों के माध्यम से अपनी खुशबू मन के आँगन में बिखेरती है. सुधा ओम ढींगरा जी की कहानी “टोर्नेडो” भी दो पीढ़ियों की कशमकश को और उनसे जुड़े इक नाज़ुक रिश्ते को शब्दों में बांधकर एक पहलु नई पीढ़ी के सामने सुंदर अदायगी के साथ रख पाई है जो पूरी तरह वक्त की रौ में पाठक को बहा ले जाने में सक्षम  है.

   कहानी में सस्पेंस बरक़रार रखने का प्रयास अच्छा लगा, जहाँ नौजवान क्रिस्टी हर रोज़ एक कहानी घड्ती है, खुद को सुनाती और सो जाती है.  अपने गर्भ में एक सन्देश भी लिए हुए कहानी के क़िरदार संवादों के माध्यम से अपनी बात कहने में सफ़ल रहे हैं. एक क्रिया दूसरी क्रिया की उत्पति का कारण बनती है. पानी की एक लहर जैसे अपनी हलचल से दूसरी को जगा देती है, उसी तरह मानव मन में उठा बवंडर भी अपनी ख़ामोशियों के शोर से सोच में उमंगें पैदा करता है. हलचल का यही उफ़ान उस निशब्दता को भंग करता है जो किरदारों के मन में बर्फ की तरह जमी हुई है. जीवन की परिधी में उस मोड़ से गुज़रते हुए हर युवा जेनरेशन को अपने आप से जोड़ती है इस कहानी की ज़मीन जिसमें कुछ अनकही बातें किरदारों के अंतर्मन के द्वंद्व को, उनके ज्ञान-अज्ञान की सीमाओं से, उनकी समझ-बूझ से भी परिचित कराती है. मन की अवस्था जिसमें सोच की उलझी- उलझी बुनावट है वही नॉर्मल को अब्नार्मल  बना पाने में क्षमतावान दिखाई देती है.

    संस्कार और संस्कृति घर में, आसपास से, वातावरण से हासिल होते हैं. पर कहीं ऐसा भी होता है कि उन संस्कारों की धरोहर को लेकर ही कुछ आत्माएं जन्म लेती हैं- जैसे क्रिस्टी.  नाम, माता- पिता, पालन- पोषण सब विदेशी, पर पाकीज़ सोच का दायरा उसके अपने तन मन में पनपता है, फिर वह चाहे किसी हिन्दू का हो, या क्रिस्टियन का या किसी और जात वर्ण का. वक़्त  और वातावरण का उस से कोई सरोकार नहीं रहता.

       सुधाजी ने इस कहानी को रेत की धरातल पर रखे हुए नाज़ुक रिश्तों के इक कोण को शब्दों में बांधकर एक पहलू नई पीढ़ी के सामने रखा है. विषय में डूब जाने से कहानी के किरदारों के साथ न्याय कर पाने की संभावना बनी रहती है, और कल्पना यथार्थ से घुल मिल जाती है.  किरदारों का जीवन, उनकी भाषा, संवाद शेली, नाजुक सोच की आज़ादी जो पूरी तरह से वक्त की बहती धरा के अनुकूल है अपना परिचय पात्रों के माध्यम से पाने में कामयाब रही है. कई प्रभावशाली बिंब मन की तलवटी पर अपनी छाप छोड़ने में समर्थ व सक्षम रहे हैं सुधा जी की अपनी पैनी समीक्ष्तामक निगाह इस दौर से गुज़रते कई पथिकों की गवाह रही है , जो इस राह से गुज़रे है और यही शिद्दत कलमबंद किये गए अहसासात को एक दिशा बख्शने के लिए काफ़ी हद तक कारगर रही है. कहानी गुज़रे पलों और आाने वाले पलों के बीच की एक कड़ी है जो मार्गदर्शक बनकर राहें रोशन करेगी. 

 देवी नागरानी, न्यू जर्सी, यू. एस. ए. Dec 9, 2009, dnangrani@gmail.com

बिखरे मोती

 वक्त की पाठशाला में एक साधक”-श्री समीर लाल समीर‘  

कलम आम इन्सान की ख़ामोशियों की ज़ुबान बन गई है. कविता लिखना एक स्वभाविक क्रिया है, शायद इसलिये कि हर इन्सान में कहीं न कहीं एक कवि, एक कलाकार, एक चित्रकार और शिल्पकार छुपा हुआ होता है. ऐसे ही रचनात्मक संभावनाओं में जब एक कवि की निशब्द सोच शब्दों का पैरहन पहन कर थिरकती है तो शब्द बोल उठते हैं. यह अहसास हू-ब-हू पाया, जब श्री समीर लाल की रचनात्मक अनुभूति ‘बिखरे मोती’ से रुबरु हुई. उनकी बानगी में ज़िन्दगी के हर अनछुए पहलू को कलम की रवानगी में खूब पेश किया है-

हाथ में लेकर कलम, मैं हाले-दिल कहता गया 

काव्य का निर्झर उमड़ता, आप ही बहता गया.  

यह संदेश उनकी पुस्तक के आखिरी पन्ने पर कलमबद्ध है. ज़िन्दगी की किताब को उधेड़ कर बुनने का उनका आगाज़ भी पठनीय है-

मेरी छत न जाने कहाँ गई 

छांव पाने को मन मचलता है!

इन्सान का दिल भी अजब गहरा सागर है,  जहाँ हर लहर मन के तट पर टकराकर बीते हुए हर पल की आहट सुना जाती है. हर तह के नीचे अंगड़ाइयां लेती हुई पीड़ा को शब्द स्पष्ट रुप में ज़ाहिर कर रहे हैं, जिनमें समोहित है उस छत के नीचे गुजारे बचपन के दिन, वो खुशी के खिलखिलाते पल, वो रुठना, वो मनाना. साथ साथ गुजरे वो क्षण यादों में साए बनकर साथ पनपते हैं. उस अनकही तड़प की वादी से निकल पाना कहाँ इतना आसान होता है , जिनको समीर जी शब्दों में बांधते हुए ‘मां’ नामक रचना में कहते हैं:

वो तेरा मुझको अपनी बाहों मे भरना

माथे पे चुम्बन का टीका वो जड़ना..

ज़िन्दगी में कई यादें आती है, उनमें से कुछ यादें मन के आईने में धुंधली पड़कर मिट जाती हैं और कुछ मन से जुड़ जाती हैं.  पर अपनी जननी से यह अलौकिक नाता, ममता के आंचल की छांव तले बीता हर पल,  तपती राह पर उस शीतलता के अहसास को ढूंढता रहता है. उसी अहसास की अंगड़ाइयों का दर्द समीर जी के रचनाओं का ज़ामिन बना है-

जिन्दगी, जो रंग मिले/ हर रंग से भरता गया,

वक्त की है पाठशाला/ पाठ सब पढ़ता गया…

        इस पुस्तक में अपने अभिमत में हर दिल अज़ीज श्री पंकज सुबीर की पारखी नज़र इन सारगर्भित रचनाओं के गर्भ से एक पोशीदा सच को सामने लाने में सफल हुई है. उनके शब्दों में ‘पीर के पर्वत की हंसी के बादलों से ढंकने की एक कोशिश है और कभी कभी हवा जब इन बादलों को इधर उधर करती है तो पर्वत साफ नज़र आता है.”. माना हुआ सत्य है, ज़िन्दगी कोई फूलों की सेज तो नहीं, अहसासों का गुलदस्ता है जिसमें शामिल है धूप-छांव, गम-खुशी और उतार-चढ़ाव की ढलानें. ज़िन्दगी के इसी झूले में झूलते हुए समीर जी का सफ़र कनाडा  के टोरंटो  से लेकर हिन्दोस्तान के अपने उस घर के आंगन से लेकर हर दिल को टटोलता हुआ वो उस गांव की नुक्कड़ पर फिर यादों के झरोखे से सजीव चित्रकारी पेश कर रहा है अपनी यादगार रचना में ‘मीर की गजल सा’-

सुना है वो पेड़ कट गया है/ उसी शाम माई नहीं रही

अब वहां पेड़ की जगह मॉल बनेगा/ और सड़क पार माई की कोठरी

अब सुलभ शौचालय कहलाती है,

मेरा बचपन खत्म हुआ!

कुछ बूढ़ा सा लग रहा हूँ मैं!!

मीर की गज़ल सा…!

        दर्द की दहलीज़ पर आकर मन थम सा जाता है. इन रचनाओं के अन्दर के मर्म से कौन अनजान है ?  वही राह है, वही पथिक और आगे इन्तजार करती मंजिल भी वही-जानी सी,  पहचानी सी, जिस पर सफ़र करते हुए समीर जी एक साधना के बहाव में पुरअसर शब्दावली में सुनिये क्या कह रहे हैं-

गिनता जाता हूँ मैं अपनी/ आती जाती इन सांसों को

नहीं भूल पाता हूँ फिर भी/ प्यार भरी उन बातों को

लिखता हूँ बस अब लिखने को/ लिखने जैसी बात नहीं है.

        अनगिनत इन्द्रधनुषी पहुलुओं से हमें रुबरु कराते हुए हमें हर मोड़ पर वो रिश्तों की जकड़न, हालात की घुटन, मन की वेदना और तन की कैद में एक छटपटाहट का संकेत भी दे रहे हैं जो रिहाई के लिये मुंतजिर है. मानव मन की संवेदनशीलता, कोमलता और भावनात्मक उदगारों की कथा-व्यथा का एक नया आयाम प्रेषित करते हैं-  ‘मेरा वजूद’ और ‘मौत’ नामक रचनाओं में:

मेरा वजूद एक सूखा दरख़्त / तू मेरा सहारा न ले

मेरे नसीब में तो / एक दिन गिर जाना है

मगर मैं/ तुम्हें गिरते नहीं देख सकता, प्रिये!!

एक अदभुत शैली मन में तरंगे पैदा करती हुई अपने ही शोर में फिर ‘मौत’ की आहट से जाग उठती है-

उस रात नींद में धीमे से आकर/ थामा जो उसने मेरा हाथ…

और हुआ एक अदभुत अहसास/ पहली बार नींद से जागने का…

माना ज़िन्दगी हमें जिस तरह जी पाती है वैसे हम उसे नहीं जी पाते हैं, पर समीर जी के मन का परिंदा अपनी बेबाक उड़ान से किस कदर सरलता से जोश का रंग,  भरता चला जा रहा है. उनकी रचना ‘वियोगी सोच’ की निशब्दता कितने सरल शब्दों की बुनावट में पेश हुई है-

पूर्णिमा की चांदनी जो छत पर चढ़ रही होगी..

खत मेरी ही यादों के तब पढ़ रही होगी…

हकीकत में ये ‘बिखरे मोती’ हमारे बचपन से अब तक की जी हुई जिन्दगी के अनमोम लम्हात है,  जिनको सफ़ल प्रयासों से समीर जी ने एक वजूद प्रदान किया है. ब्लॉग की दुनिया के सम्राट समीर लाल ने गध्य और पध्य पर अपनी कलम आज़माई है. अपने हृदय के मनोभावों को,  अपनी जटिलताओं को  मन के मंथन के उपरांत सरलता से वस्तु व शिल्प के अनोखे अक्स बनाकर अपने गीतों, मुक्त कविता, मुक्तक, क्षणिकाओं और ग़ज़ल स्वरुप पेश कर पाए हैं. उनकी गज़ल का मक्ता परिपक्वता में कुछ कह गया, आइये सुनते हैं….

शब्द मोती से पिरोकर, गीत गढ़ता रह गया

पी मिलन की आस लेकर, रात जगता रह गया.

वक्त की पाठशाला के शागिर्द ‘समीर’ की इबारत, पुख़्तगी से रखा गया यह पहला क़दम…आगे और आगे बढ़ता हुआ साहित्य के विस्तार में अपनी पहचान पा लेगा इसी विश्वास और शुभकामना के साथ….

शब्द मोती के पिरोकर, गीत तुमने जो गढ़ा

मुग्ध हो कर मन मेरा ‘देवी’ उसे पढ़ने लगा

तुम कलम के हो सिपाही, जाना जब मोती चुने

ऐ समीर! इनमें मिलेगी दाद बनकर हर दुआ..

 समीक्षकः देवी नागरानी

न्यू जर्सी, यू. एस. ए.

कृति: बिखरे मोती, लेखक: समीर लाल ‘समीर’, पृष्ठ : १०४, मूल्य: रु २००/,प्रकाशक: शिवना प्रकाशन, पी.सी. लेब, सम्राट कॉम्पलैक्स बेसमेन्ट, बस स्टैंड के सामने, सिहोर, म.प्र. ४६६ ००१

   

चूड़ीवाला और अन्य कहानियाँ

 परिवार और परिवेश का प्रतिबिम्ब चूड़ीवाला और अन्य कहानियाँ

अहलेजमीं से दूर रहने पर उसी दूरी का अहसास, जिये गये पलों की यादें जिनकी इमारतें खट्टेमीठे तजुर्बों से सजाई गयी है, उन बीते पलों की कोख से जन्म लेती है सोच, जो इस नये प्रवासी वातावरण में अपने आप को समोहित करने में जुटी है। यहां की ज़िंदगी, आपाधापी का रवैया, रहनसहन, घर और बाहर की दुनिया की कशमकश ! और कशकश की इस भीड़ में जब इन्सान ख़ुद से भी बात करने का मौका नहीं पाता है तो सोच के अंकुर कलम के सहारे खुद को प्रवाहित करते हैं, प्रकट करते हैं। 

कहानी लिखना एक प्रवाह में बह जाना है। कल्पना के परों पर सवार होकर जब मन परिंदा परवाज़ करता है तो सोच की रफ़्तार अपने मन की कल्पना को इस तरह ख़यालों की रौ में बहा ले जाती है कि कल्पना और यथार्थ का अंतर मिटता चला जाता है। ऐसा कब होता है, कैसे होता है, क्यों होता है कहना नामुमकिन है। लेखक जब ख़ुद अपनी रचना के पात्रों में इस कदर घुलमिल जाता है तो लगता है एक विराट संसार उसके तनमन में संचारित हुआ जाता है और फिर वहां मची हलचल को, उस दहकती दशा को कलम के माध्यम से अभिव्यक्त किये बिना उसे मुक्ति नहीं मिलती.
हर इन्सान के आसपास और अन्तर्मन में एक हलचल होती है। सोचों की भीड़, रिश्तों की भीड़, पाबंदियों की भीड़, सुबह से शाम, शाम से रात, बस दिन ढलता है, सूरज उगता और फिर ढल जाता है और जैसे जैसे मानवमन अपने परिवेश से परिचित होकर घुलता मिलता जाता है तो फिर एक अपनाइयत का दायरा बनने लगता है; मन थाह पाने लगता है।

जी हां ! कुदरत के सभी तत्त्वों के तानेबाने से बुनी हुई ऐसी कहानियां, आधुनिक समाज में बदलते जीवन मूल्यों को रेखांकित करती हुई हमसे रूबरू हो रही है, श्री अमरेन्द कुमार के कहानी संग्रह  चूड़ीवाला और अन्य कहानियांके झरोखों से। अमरेन्द्र जी का परिचय देना सूरज को उंगली दिखाने के बराबर है। संयुक्त राज्य अमेरिका से निकलने वाली त्रैमासिक हिंदी पत्रिकाविश्वा के कुशल सम्पादक रहे हैं. उनकी कहानियों में एक ऐसी दबी चिंगारी पाई जाती है जो पाठक को अपनी आंच की लपेट में लेने से बाज नहीं आती। इस संग्रह में आठ कहानियां है जिनमें मेरी पसंदीदा रहीं मीरा चूड़ीवाला, चिड़िया, एक पत्ता टूटा हुआ, ग्वासी, रेत पर त्रिकोण । मीराअमरेन्द्र जी की एक लम्बी कहानी है। एक तरह से कोई जिया गया वृतांत, जिसमें विस्मृतियों की अनेक गांठें परस्पर खुलती रहती है। इस संग्रह की भूमिका में उनके ही शब्दों में परतें खोलती हुई कलम कह उठती है कहानी मनुष्य की अनुभूत मनोदशाओं का एक पूरा दस्तावेज़ है। यह एक ऐसी दुनिया है जहां सब कुछ अपना है पात्र, परिवेश, परिस्थ्ति, आरम्भ, विकास और परिणति आगे उनका कथन है कि कहानी का अंत कभी नहीं होता, उसमें एक विराम आ जाता है। एक कहानी से अनेक कहानियां निकलती है..” 

सच ही तो है ! उनकी कहानियां अपने जिये अनुभवों का एक लघु धारावाहिक उपन्यासिक प्रयास प्रस्तुत करती है जो शब्दों के सैलाब से अभिव्यक्त होता है जिसमें कहानी का किरदार, अपने आस पास का माहौल, रहन सहन, कथनशैली से जुड़ते हुए भी किताना बेगाना रहता है। एक विडंबनाओं का पूरा सैलाब उमड़ पड़ता है कहानी मीराके दरमियान जिसमें समोहित है आदमी की पीड़ा, तन्हाईयों का आलम, परिस्थितियों से जूझते हुए कहीं घुटने टेक देने की पीड़ा, उसके बाद भी दिल का कोई कोना इन दशाओं और दिशाओं के बावजूद वैसा ही रहता है – “कोरा, अछूता, निरीह, बेबस और कमजोर“.
 
मां नहीं रही..” खबर आई, समय जैसे थम गया, सांस अटक गयी, आंसू निकले और साथ में एक आर्तनादलेखक के पात्र का दर्द इस विवरण में शब्दों के माध्यम से परिपूर्णता से ज़ाहिर हो रहा है। आगे लिखते है सब कुछ लगा जैसे ढहने, बहने, गिरने और चरमराने और मैं उनके बीछ दबता, घुटता, और मिटता चला गया नियति की बख़्शी हुई बेबसी शायद इन्सान की आखिरी पूंजी है। मन परिन्दा सतह से उठकर अपनी जड़ों से दूर हो जाता है, लेकिन क्या वह बन्धन, उस ममता, उस बिछोह के दुख से उपर उठ पाता है ? अतीत की विशाल परछाईयों में कुछ कोमल, कुछ कठोर, कुछ निर्मल, कुछ म्लान, कुछ साफ, कुछ धुंधली सी स्मृतियां, टटोलने पर हर मानव मन के किसी कोने में सुरक्षित पायी जाती है। दर्द के दायरे में जिया गया हर पल किसी न किसी मोड़ पर फिर जीवित हो उठता है । अमरेंद्र जी की क़लम की स्याही कहानी की रौ में कहतीबहती इसी मनोदशा से गुज़रे मीराके जीवन को रेखांकित कर पाई है, जो बचपन, किशोरावस्था से जवानी और फिर उसी उम्र की ढलान से सूर्योदय से सूर्यास्त तक का सफ़र करती है। कहानी में अमरेन्द्र ने अनुरागी मन के बंधन को खूब उभारा है जहां मीरा की सशक्तता सामने ज़िन्दा बनकर आती है वहीं नारी जो संकल्पों के पत्थर जुटाकर, अपनी बिख़री आस्थाओं की नींव पर एक नवीन संसार का निर्माण करती है। मानवीय संबंधों की प्रभावशाली कहानी है मीरा‘ ! उम्र भी क्या चीज है बदलते मौसमों का पुलिन्दा ! शरीर और आत्मा का अथक सफ़र जहाँ हर मोड़ पर एक प्रसंग की परतें खुलती हैं, वहीं दूसरे मोड़ पर एक अन्य कथा को जन्म देती है। जीवन के परिवेश के विविध रंगों के तानेबाने से बुनी ये कहानियां कहीं प्रकृति के समुदाय के प्रभावशाली बिंब सामने दरपेश कर पाती है, कहीं चाहे अनचाहे रिश्तों की संकरी गलियों से हमें अपना अतीत दोहराने पर मजबूर करती है। कहानी चूड़ीवालाएक और ऐसी कहानी है जिसका मर्म दिल को छू लेता है। इसके वृतांत में सलीम चाचानामक चूड़ी बेचनेवाले किरदार का ताउम्र का सफ़र और सरमाया है जो उन्होंने बख़ूबी निभाया है सामने आया है, जिसने बालावस्था से वृद्धावस्था तक हर चौखट की शान को अपनी मानमर्यादा समझा। एक मोड़ पर आकर उन्हें यह अहसास दिलाया जाता है कि घर की बहू बेटियाँ उनकी बेची चीज़ों की खरीदार हैं और वे फ़कत बेचनेवाले। इन्सान के तेवर भी न जाने कब मौसम की तरह बदल जाते हैं ! कभी एक ही चोट काफ़ी होती है बिखराव के लिये। ऐसा ही तूफान उमड़ा सलीम चाचा के मन में और वही उन्हें ले डूबा। परस्पर इन्सानी रिश्तों का मूल्यांकन हुआ जिसमें एक अमानुषता का प्रहार मानवता पर भारी साबित हुआ।
शैली और शिल्प का मिला जुला सरलता से भरा विवरण कहींकहीं अमरेन्द्र जी की कल्पना को यथार्थ के दायरे में लाकर खड़ा करता है एक चलचित्र की तरह उनकी कहानी चिड़ियामें। जिसमें एक मूक गुफ़्तार होती है उस बेज़ुबान चिड़िया और कहानी के मूल किरदार के बीच; जहां एक नया रिश्ता पनपता है। ऐसा महसूस होता है कि स्वयं को सबसे विकसित प्राणी मानने वाले मनुष्य को भी अपने परिवेश से और बहुत कुछ सीखना बाकी है. एक संबंध जो मानव मन को एक साथ कई अहसासात के साथ जोड़ देता है, उस पल के अर्थ में अमरेन्द्र जी की भाषा ज्ञानार्थ को ढूंढ रही है, अपनी अपनी कथा कहते हुए. जो सीमाओं की सीढ़ियाँ पार करते हुए शब्दावली की अनेक धाराओं की तरह निरंतर कलकल बह रहीं हैं, उस चिड़िया के आने और न आने के बीच की समय गति में मानवीय मन की उकीरता, उदासी, तड़प, छटपटाहट शायद कलम की सीमा से भले परे हो, पर मन की परिधि में निश्चित ही क़रीब रही है. कहना, सुनना और सुनाना शायद इसके आगे निरर्थक और निर्मूल हो जाते हैं. रिश्ते में एक अंतहीन व्यथाकथा शब्दों से अभिव्यक्त होकर मन के एक कोने में अमिट छाप बन कर बस जाती है

सशक्त भाषा, पुरसर शैली और क़िरदार की संवाद शक्ति, शब्दों की सरलता इन कहानियों को पठनीय बनाती है. शब्द शिल्प की नागीनेदारी उन्हें और भी जीवंत कर देती है. कहानियों के माध्यम से लेखक अपने ही मन की बंधी हुई गांठें और मानवमन की परतों को भी उधेड़ रहे हैं, उदहारण के लिए कहानी गवासीही लें. ज़मीन से जुडी यादें हरेक शख़्स की यादों के किसी हिस्से पर अधिकार रखती है और इंसान चाहकर भी ख़ुद को उन अधिकारों से वंचित नहीं रख पाता. ऐसी ही नींव पर ख़ड़ी है गवासीएक इमारत जो स्मृतिओं के रेगिस्तान में अब भी टहलती है, बीते हुए कल के आजभी जिसके आँगन में पदचाप किये बिना चले जाते हैं जैसे किसी बुज़र्ग के फैले हुए दामन में, जो अपने परिवार को बिखरने से बचाने के लिए अपने अंत को टाले हुए है इस शैली के प्रवाह पर सोच भी चौंक पड़ती है, ठिठक कर रुक जाती है . मृत्यु तो जैसे आ गयी, लेकिन जीवन ने जैसे आत्मसमर्पण करने से मना कर दिया होहाँ ऐसी ही है गवासीआश्चर्य चकित रूप में ख़ुद से जोड़ने वाली कहानीकहानी कम..वृतांत ज़ियादा.
 

“एक पत्ता टूटा हुआ
काफ़ी हद तक मौसमों के बदलते तेवर दर्शाता हुआ वृतांत लगा, जो हवाओं के थपेड़ों के साथ जूझते हुए सोच की उड़ानों पर सवार होकर घर से दूर,मंजिल तक का सफ़र तय कर पाया है

वो दर बदर, मकाँ बदर, मंजिल बदर हुआ

पत्ता गिरा जो शाख से जुड़ कर न ज़ुड़ सका

कथा में हास्यरस का स्वाद भी ख़ूब है. एक पत्ता अपनेअपने जीवन के हर पहलू का बयाँ कर रहा है, स्नेह के छुहाव का, प्यार की थपथपी का, औरों के पावों तले रौंदे जाने पर चरमराहट का, किताबों की कैद से रिहाई पाने के बाद ठण्ड के अहसास का, बड़ा ही सहज और रोचक प्रस्तुतीकरण है. लेखक की यह ख़ूबी, पाठक को अपने साथ बाँध रखने की, अपने आप में एक मुबारक अस्तित्व्पूर्ण वजूद रखती है. जहाँ उम्र भर का अनुभव पल में सिमट रहा हो, वहीं पलों की गाथा ताउम्र के सफ़र में भी संपूर्ण नहीं होती. रेखांकित की गई विषयवस्तु सजीव, हास्यरस में अलूदा एक पत्ते की आत्माकथा का चित्रण अति प्रभावशाली सिलसिले की तरह चलता रहा.

कहानी रेत का त्रिकोण मानव मन की दशा और दिशा दर्शाती है, बिछड़कर भी जुड़े रहने की संभावना की पेचकाश है . कोई एक सूत्र है जो इंसान को इंसान से जोड़ता है, कोशिशें तो होंगी और होती रहेंगी, पर कब तक? क्या रेत के टीले पर बना भवन हवा के थपेड़ों से खुद को बचा पाया है? क्या रेत को मुट्ठी में कैद रख पाना संभव है? कई सवाल अब भी जवाब की तलाश में भटक रहे हैं, सर फोड़ रहे हैं. मानव मन का प्रवाह अपनी गति से चल रहा है और भाषा का तरल प्रवाह पाठक के मन को मुक्ति नहीं दे रहा है.
रेलचलित मानसनामक कहानी अपने उन्वान का प्रतिबिम्ब है. दुनिया के प्लेटफ़ॉर्म पर खड़ी भीड़ का एक हिस्सा है मानव. सफ़र में इस छोर से उस छोर तक का अनुभव ही ज़िन्दगी को मान्यता प्रदान करती है जो आज के माहौल की आपाधापी में गुज़र जाती है, रूकती नहीं. जो गुज़रती रहे गुज़रने के पहले वही तो ज़िन्दगी है !

अमरेन्द्र जी की कहानियाँ अपनी विषयवस्तु, वर्णनशैली के कारण रोचक और पाठनीय है, कभी कहानियाँ एक दुसरे से जुडी हुई, ज़मीन से, ज़र से, मानवता सेजैसे जीवन की धार में अनुभव रुपी मोती पिरोये गए हैं . प्रकृति के हर एक मौसम का वर्णन प्रभावशाली बिम्ब बनकर सामने आता है. इन कहानियों की एक ख़ूबी यह भी हैवे जहाँ से शुरू होती हैं, वहीँ समाप्त होकर, और फिर वहीँ से प्रारंभ होने का सामर्थ्य भी रखती हैं. इस दिशा में एक कदम आगे और आगे बढ़ते रहे इसी शुभकामना के साथ

समीक्षकः देवी नागरानी

पुस्तकः चूड़ीवाला और अन्य कहानियाँ, लेखक; अमरेन्द्र कुमार, पन्नेः१७४, कीमतः रु॰, प्रकाशकः पेंगुइन बुक्स एंड यत्र बुक्स

धूप से रूठी चांदनी

एक परिपक्व कवि-मन की संवेदना 

       कविता एक तजुर्बा है, एक  ख़्वाब है, एक भाव है | जब दिल के अंतर्मन में मनोभावों का तहलका  मचता है, मन डांवाडोल होता है या ख़ुशी की लहरें अपने बांध को उलांघ जाती है तो कविता बन जाती है | कविता अन्दर से बाहर की ओर बहने वाला निर्झर झरना है |

        कविता शब्दों में अपना आकार पाती है, सोच के तिनके बुनकर, बुनावट और कसावट में अपने आप को प्रकट करती है | रचनात्मक सृष्टि के लिए शब्द बहुत जरुरी है, जिनको करीने  से सजाकर, सवांरकर एक भव्य भवन का निर्माण किया जाता है | दूसरी विशेषता जो कविता को मुखरित करती है वह है शब्दों को जीवंत बनाने की कलात्मक अभिव्यक्ति जो एक रीति का प्रयोग करने पर रचनाकार को कसौटी पर खरा उतारती है | इन्हीं  सभी गुणों की नींव  पर निर्माण करती, अपनी देश-परदेश की  भूली-बिसरी यादों को जीवंत करती, जानी मानी प्रवासी रचनाकार सुधा ओम ढींगरा की सुन्दर और भावनात्मक कविताएँ  ” धूप से रूठी चांदनी ” काव्य संग्रह में हमारे  रूबरू हुई है |

       आज की व्यवसायिक परिस्थितियों में आदमी अपनी उलझनों के दायरे से निकलने के प्रयासों में और गहरे धंसता चला जा रहा है | ऐसे दौर में मनोबल में सकारात्मक संचार कराती उनकी कविता
“मैं दीप बाँटती हूँ” अपने सर्वोत्तम दायित्व से हमें मालामाल करती है—
 “मैं दीप  बाँटती हूँ /  इनमें तेल है मुहब्बत का/
  बाती है प्यार की/ और लौ है प्रेम की /

रौशनी करती है जो हर अंधियारे ह्रदय औ’ मस्तिष्क  को |
निराला जी के शब्दों में “भावनाएं शब्द-रचना द्वारा अपना विशिष्ट अर्थ तथा चित्र द्वारा परिस्पुष्ट होती है | अर्थ शब्दों के द्वारा और शब्द वर्णों द्वारा”
 देखिये इसी कविता की एक कड़ी कैसे भाषा के माध्यम से भावो के रत्नों का प्रकाश भरती जा रही है | उनकी दावे दारी के तेवर देखिये:
  “मैं दीप लेती भी हूँ/ पुराने टूटे-पुटे
   नफरत, ईर्ष्या, द्वेष की दीप
  जिनमें तेल है/ कलह-कलेश का/बाती है बैर-विरोध की
   लौ करती है जिनकी जग- अँधियारा
सुधाजी, एक बहु आयामी रचनाकार के रूप में हिंदी जगत को अपनी रचनात्मक ऊर्जा से परिचित कराती आ रही है | उनके साहित्यिक व्यक्तित्व का विस्तार उनकी कहानियाँ, इंटरव्यू, अनुवादित उपन्यास हर क्षेत्र में अपनी पहचान पा चुका है  और अब ८०  कविताओं का यह संग्रह अपने बहु विध वैशिष्टिय से हमारा ध्यान बरबस आकृष्ट कर रहा है | इनकी रचनाएँ आपाधापी वाले संघर्षों से गुज़रते बीहड़ संसार के बीच एक आत्मीयता का बोध कराती हैं |
      “आज खड़ी हूँ…./ईश्वर और स्वयं की पहचान की ऊहापोह में……”
इनकी कवितात्मक ऊर्जा में आवेग है, एक परिपक्व कवि मन की गहन संवेदना, चिंतात्मक और सामाजिक बोध का जीवंत बोध शब्दों के बीच से झांकता हुआ कह रहा है :
“अब दाग लगे दामन पर जितने, सह लुंगी
दुनिया जो कहे झेलूंगी/ तू जो कहे ….चुप रहूंगी
अपनी  लाश को काँधे पर उठाये/ वीरानों  में
दो काँधे और ढूँढूँगी  / जो उसे मरघट तक पहुंचा दे…….”
      दर्द ही वो है जो मानव-मन  की पीड़ा का मंथन करता है और फिर मंथन का फल  तो सभी को समय के दायरे में रहकर चखना पड़ता है | कौन है जो बच पाया है? कौन है जो ज़ायके से वंचित रहा  है? सुधाजी ने बड़ी संवेदना से समाज में पनपते अमानवीय कोण की प्रबलता को दर्शाया है | जहाँ नारी की पहचान घर की चौखट तक ही रह गई है, अपने जिम्मेदारियों की सांकल से बंधी हुई वह नारी जकड़ी हुई अपने तन की कैद में, घर की कैद में..
    ” दुनिया ने जिसे सिर्फ औरत / और तूने महज़ बच्चों की माँ समझा / “
जिन्दगी की सारी चुनौतीयों से रूबरू कराती सुधाजी की कलम अपनी सशक्तता का परिचय दे रही है | जो कवि अपने शीश-महल में बैठकर काव्य सृजन करते है वे तानाशाहों के अत्याचारों से वाकिफ़ तो है, लेकिन मनुष्य की पीड़ा और वेदना उन्हें द्रवित नहीं करती | धरती पर न जाने कितने लोग कराहते  हैं, कितना लहू बहता रहता है, कितनी साँसों में घुटन भर दी जाती है, ज़ुल्मतों का दहकता हुआ साया जब कवि  मन पर अपनी छाप छोड़ जाता है, तो कलम से निकले शब्द जीवंत हो जाते हैं, खामोशियों से सम्वाद करते हैं,  उन पीड़ाओं का, जिनको तनमन से भोगा ,सहा. जहाँ वेदना कराह उठती है वहीँ उनकी बानगी में हर एहसास धीमे से थपथपाता है, टटोलता है और उलझे हुए प्रश्नों का जवाब तलब करता है:
  “आतंकवादी हमला हो/ या जातिवाद की लड़ाई /
   रूह, वापिस देश अपने भाग जाती है.”
 और फिर कटाक्ष करती शब्दावली का रूप देखिये :
 “तोड़ा था पुजारी ने /मंदिर के भरम को
जब सिक्के लिए हाथ में बेईमान मिल गए”
जीवन सिर्फ जीने और भोगने का नाम नहीं, समझने और समझाने का विषय भी है | इसी काव्य सुधा में उनके उर्वर मस्तिष्क की अभिनव उपज है उनकी अनूठी रचना (जिसको सुनने का मौका मुझे उनके रूबरू ले गया )जिससे उनकी सम्पूर्ण कविताओं की स्तरीयता एवं विलक्ष्णता का अनुभव सहज ही लगाया जा सकता है.”प्रतिविम्ब “में उठाये प्रसंग समाजिक, पारिवारिक —- चिंतन को पारदर्शी बिम्ब बनकर सामने आये..

“मैं  आप का ही प्रतिबिम्ब हूँ.
बलात्कार से पीड़ित कोई बाला हो/ या सवर्णों से पिटा कोई दलित …
मेरा खून उसी तरह खौलता है/ जैसे आप भड़कते थे |”

लेखन कला अपनी पूर्णता तब ही प्रकट कर पाती है जब भाषा या शैली अपने तेवरों के प्रयोग से कल्पना  और यथार्थ का अंतर मिटा दे… अपने परिवेश में जो देखा गया, महसूस किया गया और भोगा गया, उसे विषय-वस्तु बनाकर सुधाजी  अपनी रचनाओं  द्वारा पाठक को अनुभव सागर से जोड़ लेती हैं |  उनकी अनेक रचनाएँ आप बीती से जग बीती तक का सफ़र करती हुई, हद की सरहदों तक को पार करने की कोशिश में कहती है अपनी कविता “शहीद” में
“नेताओ और धर्म के लिए,
इन्सान नहीं
सिर्फ सिपाही शहीद    हुआ.”                                                                                                                                                        

हर रचना अपने धर्म क्षेत्र के दायरे में घूमती है, कहीं छटपटाती है, और कहीं- कहीं मंजिल के पास आते- आते दम तोड़ देती है | ऐसी सशक्त कविताएँ है “बेरुखी, समाज, मुड़ कर देखा, परदेस की धूप, खुश हूँ मैं ,और  देस -परदेस  की व्यथा- गाथा को बहुत सुन्दरता से माँ के नाम चिट्ठी में लिख भेजा सन्देश उनकी जुबानी सुनें :
“परदेस से  चिट्ठी आई,
माँ की आँख भर आई
लिखा था खुश हूँ मैं चिंता न करना
घर के लिया है किश्तों पर/ कार ले ली है किश्तों पर
फर्नीचर ले लिया किश्तों पर / यहाँ तो सब कुछ ख़रीदा जाता है किश्तों पर”

सोच की हर सलवट पीड़ा से भीगी हुई, आँख फिर भी नम नहीं | ऐसी अभिभूत करती हुई रचनाओ के लिए सुधाजी को बधाई एवं शुभ कामनाएँ | शिवना प्रकाशन की कई कृतियों में से यह एक अनूठी कृति अब भारत और विदेश के बीच की पुख्ता कड़ी बनी है श्रेय है शिवना प्रकाशन को, हर प्रयास को जो हर कदम आगे और आगे सफलता की ओर बढ़ रहा है !

देवी नागरानी                                                           

काव्य संग्रह :धूप से रूठी चांदनी, कवित्री :डॉ सुधा ओम ढींगरा
पन्ने :११२ मूल्य :३०० रु 
प्रकाशक :शिवना प्रकाशन,
P.B.Lab,
Samart Complex Basement,
Bus Stand,
Sehore-466001. U.P.

लौ दर्दे-दिल की

लौ दर्दे – दिल की

शब्द सादे भाव गहरे,  काव्य की गरिमा मही,

‘लौ दर्दे दिल की’ संकलित, गजलों में ‘देवी’ ने कही

न कोई आडम्बर कहीं, बस बात कह दी सार की,

है पीर अंतस की कहीं,  पीड़ा कहीं संसार की.

आघात संघातों की पीड़ा, मर्म में उतरीं घनी, उसी आहत पीर से ‘लौ दर्दे-दिल की’ गजलें बनीं .

जीवन-दर्शन को इतनी सहजता और सरलता से कहा जा सकता है, यह ‘देवी’ जी की लेखन शैली से ही जाना. जैसे किसी बच्चे ने कागज़ की नाव इस किनारे डाली हो और वह लहरों को अपनी बात सुनाती हुई उस पार चली गयी हो. कहीं कोई पांडित्य पूर्ण भाषा नहीं पर भाव में पांडित्य पूर्ण संदेशं हैं. क्लिष्ट भावों की क्लिष्टता नहीं तो लगता है, मेरे अपने ही पीर की बात हो रही है और मैं इन पंक्तियों में जीवंत हो जाती हूँ . जब पाठक स्वयं को उस भाव व्यंजना में समाहित कर लेता है, तब ही रचना में प्राण प्रतिष्ठा होती है.

देवी जी के ही शब्दों में —–

करती हैं रश्क झूम के सागर की मस्तियाँ

पतवार बिन भी पार थी कागज की कश्तियाँ .

यह  ‘ दर्दे दिल की लौ’  उजाला बनने को व्याकुल है , सबके दर्द समेट लेने चाहत ही किसी को सबका बनाती है,  परान्तः-सुखाय चिंतन ही तो परमार्थ की ओर वृतियों को ले जाती हैं और शुद्ध चिंतन ही चैतन्य तक जीव को ले जाता है. औरों के दर्द से द्रवित और उन्हें समेट लेने की चाह में ही,’ मालिक है कोई मजदूर कोई, बेफिक्र कोई मजबूर कोई.’ संवेदना कहती है ‘ बहता हुआ देखते है सिर्फ पसीना, देखी है कहाँ किसने गरीबों की उदासी’ . ठंडे चूल्हे रहे थे जिस घर के, उनसे पूछा गया कि पका क्या है’ यह सब पंक्तियाँ देवी जी के अंतस को उजागर करतीं हैं.  वे सारगर्भित  मान्यताओं  की भी पक्षधर है कि व्यक्ति  केवल अपने कर्मों से ही तो उंचा होता है. ‘ भले छोटा हो कद किरदार से इंसान ऊँचा हो, उसी का जिक्र यारों महफ़िलों में आम होता है’ .

जीवन के मूल सिद्धांतों के प्रति गहरी आस्था है, सब इनका पालन क्यों नहीं करते इसकी छटपटाहट है, साथ ही यथार्थ से भी गहरा परिचय रखतीं है तब ही तो लिख दिया 

‘ उसूलों पे चलना जो आसान होता,

जमीरों के सौदे यकीनन ना होते,

कसौटी पे पूरा यहाँ कौन ‘देवी ‘

 जो होते, तो क्यों आइने आज रोते’.

सामाजिक, सांप्रदायिक , न्यायिक  और  राजनैतिक दुर्दशा के प्रति आक्रोश है, धार्मिक मान्यताओं के प्रति उनके उदगार नमन के योग्य हैं.’ वहीँ है शिवाला, वहीँ एक मस्जिद , कहीं सर झुका है, कहीं दिल झुका है.’पुनः है जहॉं मंदिर वहीँ है पास में मस्जिद कोई , साथ ही गूंजी अजाने , शंख भी बजते रहे. न्यायिक व्यवस्था के प्रति आक्रोश है. तिजारत गवाहों की जब तक सलामत क्या इन्साफ कर पायेगी ये अदालत.

भारतीयता,  हिंदी  देश प्रेम, वतन और शहीदों के प्रति रोम-रोम से समर्पित भावनाएं उन्हें प्रणम्य बनाती है.

हमें अपनी हिन्दी जवाँ चाहिए,

सुनाये जो लोरी वो माँ चाहिए.

तिरंगा हमारा हो ऊँचा जहाँ ,

निगाहों में वह आसमाँ चाहिए.

वतन के लिए वह समर्पित जोश और उमंगें हैं कि पढ़ कर रोमांच होने लगता है.

दहशतें रक्शौं है , रोजो शब् यहॉं

कब सुकून पायेंगे मेरे हम वतन.

जान देते जो तिरंगे के लिए

उन शहीदों का तिरंगा है कफ़न.

देवी नागरानी एक प्रबुद्ध व्यक्तित्व है, बुद्ध का अर्थ बोध गम्यता. इस मोड़ पर जब चिंतन वृत्ति आ जाती है तो सब कुछ आडम्बर हीन हो जाता है, भावों को सहजता से व्यक्त करना एक स्वभाव बन जाता है. कितनी सहजता है, ‘ यूँ तो पड़ाव आये गए लाख राह में, खेमे कभी भी  हमने लगाए नहीं कहीं’ . वे मानती हैं कि  अभिमान ठीक नहीं पर स्वाभिमान की पक्षधर हैं, ‘ नफरत से अगर बख्शे कोई, अमृत भी निगलना मुश्किल है , देवी शतरंज है ये दुनिया,  शह उससे पाना मुश्किल है’ ‘

” लौ दर्दे दिल की ” भावनाओं का गहरा समंदर है , अहसासों की लहरें हैं, निश्छल से संवेदित भाव हैं , कागज़ की नाव है और स्नेहिल मन की पतवार है. सतहों को हटा कर मन की तहों तक जाती एक यात्रा है . सादगी से अनुभूतियों को अंतस में उतारने की कला का अद्भुत प्रयास है.

न हिला सके इसे जलजले , न वो बारिशों में ही बह सके.

उसे क्या बुझा सके आधियाँ , ये चरागे दिल है दिया नहीं.

मृदुल कीर्ति,  Atlanta, USA

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