श्री गणेश बिहारी “तर्ज़”

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श्री गणेश बिहारी “तर्ज़” लखनवी साहिब ने ‘चराग़े-दिल’ के लोकार्पण के समय श्रीमती देवी नागरानी जी के इस गज़ल-संग्रह से मुतासिर होकर बड़ी ही ख़ुशबयानी से उनकी शान में एक कत्ता स्वरूप नज़्म तरन्नुम में सुनाई  उसके भाव आप सभी से बाँट रही हूँ …अल्फ़ाज़ हैं:

लफ्ज़ों की ये रानाई मुबारक तुम्हें देवी

रिंदी में पारसाई मुबारक तुम्हें देवी

फिर प्रज्वलित हुआ ‘चराग़े‍-दिल’ देवी

ये जशने रुनुमाई मुबारक तुम्हें देवी.

 अश्कों को तोड़ तोड़ के तुमने लिखी गज़ल

पत्थर के शहर में भी लिखी तुमने गज़ल

कि यूँ डूबकर लिखी के हुई बंदगी गज़ल

गज़लों की आशनाई मुबारक तुम्हें देवी

ये जशने रुनुमाई मुबारक तुम्हें देवी.

 शोलों को तुमने प्यार से शबनम बना दिया

एहसास की उड़ानों को संगम बना दिया

दो अक्षरों के ग्यान का आलम बना दिया

‘महरिष’ की रहनुमाई मुबारक तुम्हें देवी

ये जशने रुनुमाई मुबारक तुम्हें देवी.

श्री गणेश बिहारी “तर्ज़” लखनवी

लोखन्डवाला,  मुँबई।

 

 

शाइर ग़ज़ल तुम्हारी

गजलः 91

लगती है मन को अच्छी, शाइर ग़ज़ल तुम्हारी
आवाज़ है ये दिल की, शाइर ग़ज़ल तुम्हारी.

ये नैन-होंट चुप है, फिर भी सुनी है हमने
उन्वां थी गुफ़्तगू की, शाइर ग़ज़ल तुम्हारी.

ये रात का अँधेरा, तन्हाइयों का आलम
ऐसे में सिर्फ़ साथी, शाइर ग़ज़ल तुम्हारी.

नाचे हैं राधा मोहन, नाचे है सारा गोकुल
मोहक ये कितनी लगती, शाइर ग़ज़ल तुम्हारी.

है ताल दादरा ये, और राग भैरवी है
सँगीत ने सजाई, शाइर ग़ज़ल तुम्हारी.

मन की ये भावनायें, शब्दों में हैं पिरोई
है ये बड़ी रसीली, शाइर ग़ज़ल  तुम्हारी.

अहसास की रवानी, हर एक लफ्ज़ में है
है शान शायरी की, शाइर ग़ज़ल तुम्हारी.

अनजान कोई रिश्ता, दिल में पनप रहा है
धड़कन ये है उसीकी, शाइर ग़ज़ल तुम्हारी.

दो अक्षरों का पाया जो ज्ञान तुमने ‘देवी’
उससे निखर के आई, शायर ग़ज़ल तुम्हारी.

हर दुआ हो गई बेअसर

गज़लः

बददुआओं का है ये असर
हर दुआ हो गई बेअसर.

ज़ख्म अब तक हरे है मिरे
सूख कर रह गए क्यों शजर.

यूं न उलझो किसी से यहां
फितरती शहर का है बशर.

राह तेरी मेरी एक थी
क्यों न बन पाया तू हमसफ़र.
वो मनाने तो आया मुझे
रूठ कर ख़ुद गया है मगर.

चाहती हूं मैं ‘देवी’ तुझे
सच कहूं किस क़दर टूटकर.

है हमसफ़र ग़रीब मेरा, बेवफ़ा नहीं

गज़लः

मिट्टी का मेरा घर अभी पूरा बना नहीं
है हमसफ़र ग़रीब मेरा, बेवफ़ा नहीं.

माना कि मेरे दिल में ज़रा भी दया नहीं
फिर भी किसी के बारे में कुछ भी कहा नहीं.

आंगन में बीज बोए कल, अब पेड़ हैं उगे
हैरत है शाख़ पर कोई पत्ता हरा नहीं.

विशवास कर सको तो करो, वर्ना छोड़ दो
इस दम समय बुरा है मेरा, मैं बुरा नहीं.

अच्छी बुरी हैं फितरतें, टकराव लाज़मी
शतरंज का हूं मोहरा मैं फिर भी चला नहीं.

रस्मों के रिश्ते और हैं, जज़बात के हैं और
मैंने ज़बां से नाम किसी का लिया नहीं.

शादाब इसलिये भी है दिल की मेरी ज़मीं
क्योंकि मेरा ज़मीर है जिंदा, मरा नहीं.

रज़ा रब की पाई

गजलः
नहीं उसने हरगिज रज़ा रब की पाई
न जिसने कभी हक की रोटी कमाई.

रहे खटखटाते जो दर हम दया के
दुआ बनके उजली किरण मिलने आई.

मिली है वहां उसको मंज़िल मुबारक
जहां जिसने हिम्मत की शम्अ जलाई.

खुदी को मिटाकर खुदा को है पाना
हमारी समझ में तो ये बात आई.

रहा जागता जो भी सोते में देवी
मुक़द्दर की देता नहीं वो दुहाई.

वो मुस्काते हैं

देख कर तिरछी निगाहों से वो मुस्काते हैं
जाने क्या बात मगर करने से शरमाते हैं.

मेरी यादों में तो वो रोज चले आते हैं
अपनी आँखों में बसाने से वो कतराते हैं.

दिल के गुलशन में बसाया था जिन्हें कल हमने
आज वो बनके खलिश जख्म दिये जाते हैं.

बेवफा मैं तो नहीं हूं ये उन्हें है मालूम
जाने क्यों फिर भी मुझे दोषी वो ठहराते हैं.

मेरी आवाज़ उन्होंने भी सुनी है, फिर क्यों
सामने मेरे वो आ जाने से करताते हैं.

दिल के दरिया में अभी आग लगी है जैसे
शोले कैसे ये बिना तेल लपक जाते हैं.

रँग दुनियां के कई देखे है देवी लेकिन
प्यार के इँद्रधनुष याद बहुत आते हैं. 118

उस शिकारी से ये पूछो

ग़ज़ल

उस शिकारी से ये पूछो पर क़तरना भी है क्या
पर कटे पंछी बता परवाज़ भरना भी है क्या?

आशियाना ढूंढते हैं, शाख़ से बिछड़े हुए
गिरते उन पत्तों से पूछो, आशियाना भी है क्या?

अब बायाबां ही रहा है उसके बसने के लिए
घर से इक बर्बाद दिल का यूँ उखड़ना भी है क्या?

महफ़िलों में हो गई है शम्अ रौशन, देखिए
पूछो परवानों से उसपर उनका जलना भी है क्या?

वो खड़ी है बाल खोले आईने के सामने
एक बेवा का संवरना और सजना भी है क्या?

पढ़ ना पाए दिल ने जो लिक्खी लबों पर दास्तां
दिल से निकली आह से पूछो कि लिखना भी है क्या?

जब किसी राही को कोई रहनुमां ही लूट ले
इस तरह ‘देवी’ भरोसा उस पे रखना भी है क्या. 117

होंठ हैं सिले अब तो

गजल
शहर अरमानों का जले अब तो
शोले उठते हैं आग से अब तो

जान पहचान किसकी है किससे
हैं नक़ाबों में सब छुपे अब तो

चाँदनी से सजे हैं ख़्वाब मेरे
धूप में जलते देखि ये अब तो

ऐब मेरे गिना दिये जिसने
दोस्त बनकर मिला गले अब तो

मन की कड़वाहटों को पी न सकी
हो रही है घुटन मुझे अब तो

वहशी मँज़र जो देखा आंखों ने
ख़ुद ब ख़ुद होंठ हैं सिले अब तो

देवीदिल के हज़ार टुकड़े हैं
हम हज़रों में बंट गए अब तो. 64

शहर में उज़डी हुई देखी कई हैं बस्तियां

शहर में उज़डी हुई देखी कई हैं बस्तियां
हर तरफ देखे खंडर, देखीं फ़क़त बरबादियां.

कहते हैं बेकान दीवारें भी सुन लेती हैं बात
ग़ौर से सुनकर तो देखो तुम कभी खामोशियां.

पलकें आंखों के लिये बोझिल कभी होती नहीं
किरकिरी महसूस हो तो देख बस परछाइयां.

रश्ते तो विश्वास से पलते हैं दौलत से नहीं
वर्ना क्यों कर टूटते दिल, टूटती क्यों शादियां.

धूप दुख और छाँव सुख का है समुंदर ज़िंदगी
जो मुक़द्दर का सिकंदर वो ही जीते बाज़ियां.

जान पाओगी तुम इस शोर में अपना वजूद
खुद से मिलने पर देवी’, भायेंगी तन्हाइयां. 111

शाइर गज़ल तुम्हारी

गजलः

ये नैनहोंट चुप है, फिर भी सुनी है हमने
उन्वां थी गुफ़्तगू की, शाइर गज़ल तुम्हारी

ये रात का अँधेरा, तन्हाइयों का आलम
ऐसे में सिर्फ साथी, शाइर गज़ल तुम्हारी

नाचे हैं राधा मोहन, नाचे है सारा गोकुल
मोहक ये कितनी लगती, शाइर गज़ल तुम्हारी

है ताल दादरा ये, और राग भैरवी है
सँगीत ने सजाई, शाइर गज़ल तुम्हारी

मन की जो भावनायें, शब्दों में हैं पिरोई
है ये बड़ी रसीली, शाइर गज़ल तुम्हारी

अहसास की रवानी, हर एक लफ्ज़ में है
है शान शायरी की, शाइर गज़ल तुम्हारी

अनजान कोई रिश्ता, दिल में पनप रहा है
धड़कन ये है उसीकी, शाइर गज़ल तुम्हारी

दो अक्षरों का पाया जो ग्यान तुमने देवी
उससे निखर के आई, शायर गजल तुम्हारी

लगती है मन को अच्छी, शाइर गज़ल तुम्हारी
आवाज़ है ये दिल की, शाइर गज़ल तुम्हारी

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