काफ़िये का सिलसिलाः भाग छः

श्री आर. पी. शर्मा ‘महर्षि’
काफ़िये का सिलसिला आगे.

सहारे के लिये तिनका बहुत है
तिमिर में ज्योति की आशा बहुत है.

यदि मतले में यादगार – साज़गार को काफ़िये बनाया जाता है, तो वे इसलिये ग़लत हैं, क्योंकि दोनों में से गार निकाल देने पर याद – साज़ शेष बचते हैं जो तुकांत शब्द नहीं है, किंतु गार के स्थान पर यदि एक जगह बार जोड़ा जाये, तो वे का़फ़िये दोष रहित होंगे, जैसे

गुलिस्तां नें नसीमें – सुबह भी अब शोलाबार आये
ये मौसम मेरे दुश्मन को भी कैसे साज़गार आये.

कहने का मतलब यह है कि –
१. मतले में या तो दोनों काफ़िये विशुद्ध मूल शब्द हों, अथवा
२. एक मूल शब्द हो और दूसरा ऐसा शब्द जिसमें कुछ अंश बढ़ाया गया हो, अथवा
३. दोनों ही काफ़यों से बढ़ाये हुए अंश निकाल देने पर समान तुकांत शब्द ही शेष रहें, अथवा दोनों ही बढ़ाये हुए अंशों वाले काफ़ियों में व्याकरण भेद हो, अथवा
४. दोनों काफ़ियों में बढ़ाए हिए अंश समान अर्थ न दें.
उपयुक्त नियमों के अनुसार, मत्लों में काफ़ियों का रख – रखाव ध्यानपूर्वक देखें और समझें –

अगर ख़ुदा न करे सच ये ख़्वाब हो जाये
तेरी सहर हो, मेरा आफ़ताब हो जाये – दुष्यंत कुमार

जिंदगी भी अजब तमाशा है
जिस तरफ़ देख़िये हताशा है – महर्षि

ज़िन्दगी का ज़िंदगी से वास्ता ज़िंदा रहे
हम रहें जब तक हमारा हौसला ज़िंदा रहे – अशोक अंजुम

शिद्दते-गमींए-अहसास से जल जाऊंगा
बर्फ़ हूं, हाथ लगाया तो पिघल जाऊँगा – मुमताज राशिद

हर इक चहरा इबादत बन गया है
जिसे देखूँ शिकायत बन गया है – इब्राहिम अश्क

न पूछों कि मै क्यों सरे- दार हूँ
मैं सच बोलने का गुनहगार हूँ – महर्षि

बहुत घुटन है कोई सूरते- बयाँ निकले
अगर सदा न उठे कम से कम फुगां निकले – साहिर लुधयानवी

रही है दाद तलब उनकी शोख़ियाँ हमसे
अदा शनास बहुत है मगर कहाँ हमसे – जानिसार अख्तर

ग़ज़ल के नाम से जो कुछ कहा है
मेरी ज़िदादिली का मर्सिया है – सग़ीर मंजर, खंडवा

डाल दे साया अपने आँचल का
नातवां हूँ, कफ़न भी हो हल्का – नासिंख

टिप्पणीः इस मत्तले में एक क़ाफ़िया आँचल है जो स्वंय एक शब्द है, रदीफ़ का इससे अलग है, परंतु काफ़िया हल्का है, जिसमें क़फ़िया हल तथा रदीफ का एक ही शब्द के दो आँश हैं, ऐसी रदीफ़ को तहलीली कहते हैं.

चाह तन – मन को गुनहगार बना देती है
बाग़ के बाग़ को बीमार बना देती है – गोपालदास नीरज

धनक – धनक मेरी पोरों को ख़्वाब कर देगा
वो लम्स मेरे बदन को गुलाब कर देगा – परवीन शाकिर

हम है मताए – कूचे बाज़ार की तरह
उठती है हर निगाह खरीदार की तरह – मजरूह सुल्तानपुरी

अब के हम बिछड़े तो शायद ख़्वाबों में मिले
जिस तरह सूखे हुए फूल किताब में मिले – अहमद फराज़

हर जगह इम्तिहान है फिर भी
ये ग़ज़ल का जहान है फिर भी – इम्तियाज अहमद गाज़ी

मैं जब भी जाऊँ, वो घर को बड़ा सजा के रखे
बदन गुलाब तो दिल मैक़दा बना के रखे – जगदीस चँद्र पाण्डया

टिप्पणीः सजा मूल शब्द है. बना में दीर्घ मात्रा बढाई हुई है. अतः काफिये नियमानुसार निर्दोष हैं.
आगे और –
सिनाद दोष और इक्फा दोष के बारे में

ईता दोष-भाग पाँचवा

एक परिचयःश्री आर. पी. शर्मा ‘महर्षि’

ग़ज़ल के अन्य काफ़िये, मत्ले में नियमानुसार प्रयुक्त काफ़ियों पर आधारित होते हैं. अतः मत्लों में काफ़िये प्रयुक्त करते समय पूरी सावधानी बरतना बहुत आवश्यक है. अन्यथा मत्लों के दोषपुर्ण होने का अंदेशा बना रहता है.

. ईता दोष काम कब शीघ्रता में बनता हैइस तरह और भी बिगड़ता है.उस मतले में बनताबिगड़ताक़ाफ़िये लाये गये हैं, जो दोषपूर्ण है, क्योंकि यदि इन दोनों शब्दों से तानिकाल दिया जाय तो बनबिगड़‘ ( मूल शब्द) शेष रहते हैं, जो समान तुकांत काफ़िये नहीं है, क्योंकि इनके अंतिम अक्षरों और में व्यंजनसाम्य नहीं है.अतः केवल ता बढ़ाने मात्र से ये शब्द समान तुकांत काफ़िये नहीं बन जाते. इसलिए बनताबिगड़ताको मत्ले में लाने से मत्ला दोषपूर्ण हो गया है. मूल शब्दों में से बढ़ाये हुए अंश निकाल देने पर, उनका तुकांत होना आवश्यक है. यदि पहली पंक्ति को इस प्रकार कर दें

काम जल्दी में बन न पाया हैइस तरह और भी बिगड़ता है. इस प्रकार पाया और बिगड़ता के अंत में स्वरसाम्य याता होने से काफ़िये दोषरहित बन जाते हैं और मत्ले के दोष का निराकरण हो जाता है. .

हमारे युग में सुविधाएँ बहुत हैं

समय के पास छलनाएँ बहुत हैं.

डा॰ स्वामी श्यामनंद सरस्वती रौशन

इस मत्ले में सुविधाएँ छलनाएँ का़फ़िये लाये गये हैं. इनमें से बढ़ाया हुआ शब्द एँ ‘ निकाल देने पर सुविधा-छलना शेष रहते हैं, जो दोनों ही समान तुकाँत शब्द हैं, क्योंकि उनमें धा-ना में स्वर-साम्य है. अतः सुविधाएँछलनाएँ दोषरहित क़ाफ़िये हैं.

३.

करें सम्मान हम अपने बड़ों काउठायें लाभ उनके अनुभवों का.यध्यपि बढ़ाये हुए अंश निकाल देने पर ‘बड़’ तथा ‘अनुभव’ शेष रहते हैं, जो समान तुकांत शब्द नहीं है. अतः ‘बड़ों अनुभवों‘ सही क़ाफ़िये हैं. ऐसे क़ाफ़ियों में से बड़ाया हुआ अंश निकाल देने पर एक सार्थक तो दूसरा निर्थक शेष रहना चाहिये. ४.

था अगर शिकवा या गिला मुझसे हाल कोई तो पूछता मुझसे. म.ना नरहरिगिला मूल शब्द है जब कि ‘पूछता ‘ में ‘ता’ का अंश बढ़ाया हुआ है. ‘ ला – ता’ में स्वर साम्य है अतः का़फ़िये नियमानुसार हैं.५.

दोस्त रखते जो राब्ता मुझसेहाल कोई तो पूछता मुझसे. ‘ – इसी प्रकार उपयुक्तमत्ले में डा॰ नलिनी विभा नाज़लीद्वारा एक विशुद्ध मूल उर्दू शब्द राबता को काफ़िया बनाया गया है तथा दूसरे क़ाफ़िया पूछता को, जिसमे ता बढ़ाया हुआ अंश है. अतः मत्ले में ये दोनों ही काफ़िये नियमानुसार लाये गये है.आगे और

ग़ज़ल एक गेय कविता-चौथा भाग

एक परिचयः

श्री आर. पी. शर्मा ‘महर्षि’

ग़ज़ल एक सुकोमल विधा है. वह नफ़ासत पसंद है. हाथ लगाए मैली होती है, उसे स्चच्छता तथा सलीके से स्पर्श करना होता है. ग़ज़ल चूँकि एक गेय कविता है, अतः उसका किसी बहर अथवा छंद में होना अपरिहार्य है. ग़ज़लकार को इसके लिये, यदि रचना बहर में है तो “तख़्ती” का, और अगर छंद में है तो मात्रा गणना का व्यहवारिक ग्यान एवं अभ्यास होना ही पर्याप्त है, जो कोई कठिन कार्य नहीं. अतः इसके लिये ग़ज़लकार को अरूज़ी अथवा छंदशास्त्री बनने की बिलकुल भी आवश्यक्ता नहीं है, इस पुस्तक में ‘तख़्ती ‘ तथा ‘मात्र- गणना’ की विधियों को, उदाहरणों साहित, विस्तार से समझाया गया है. अतः इन विधियों को सीखने के लिये कहीं दूर जाने की ज़रूरत नहीं. निरंतर अभ्यास से इनमें दक्षता प्राप्त की जा सकती है.
बहर अथवा छंद, ग़ज़ल की पहली प्राथमिकता है. “कविता और छंद का संबंध उसी प्रकार का है जिस प्रकार आत्मा और शरीर का. आत्मा की सक्रियता शरीर के द्वारा ही है. इसी प्रकार कविता की प्रभावोत्पादकता भी छंद के द्वारा ही है.”
ग़ज़ल तो एक गेय कविता है, अतः उसमें छँदों की महत्वपूर्ण भूमिका है. बहर अगर ग़ज़ल की जान है तो छंद ग़ज़ल के प्राण. ग़ज़ल का फार्म.(स्वरूप) बहर अथवा छंद बिना निष्प्राण है. यदि उसको जिंदा रखना है तो उसे हर प्रकार स्वस्थ रखना हमारा दायित्य बनता है. ग़ज़ल के बहर और छंद के बारे में इससे ज़्यादा और क्या कहा जा सकता है. अब यह ग़ज़लकारों पर निर्भर करता है कि वे बहर के लिये ‘तख़्ती’ करना अथवा छंद के लिये ‘मात्र-गणना’ सही-सही करना मन लगाकर सीखें और ग़ज़लों में प्राण फूंकें और उन्हें तरोताज़ा बनाये. ‘तख़्ती’ और ‘मात्र-गणना’ की विधियाँ आगे यथास्थान दी जा रही है.

अब ग़ज़ल का फार्म, बाह्य ( बाह्य स्वरूप) कैसा होता है तथा ‘ ज़मीने शे’र’ किसे कहते हैं, काफ़िये क्या होते हैं, रदीफ़ क्या होती है, मत्ला क्या होता है, हुस्ने मत्ला क्या होता है, तथ मक्ता क्या होता है, शेर क्या होता है. हुस्ने मतला क्या होता है, तथा मक्ता क्या है. इन सवालों का स्पष्टीकरण आइये शुरू करते हैः
मान लें हमें निम्नलिखित मिसरे के आधार पर ग़ज़ल लिखने के लिये कहा गया-

‘हाल कोई तो पूछता मुझसे’

वस्तुतः इस पंक्ति के आधार पर हिंदी पत्रिका फनकार, ग्वालियर के अंक फरवरी २००५ में पाठकों द्वारा कही गई कई ग़ज़लें प्रकाशित हुई हैं. जनाब कमरउद्दीन बरतर साहब का यह अभिनव प्रयोग है, जो हर द्रष्टी से साराहनीय है. उपर्युक्त मिसरे में प्रयुक्त काफ़िया (तुकान्त शब्द) पूछता है और उसके पश्चात आने वाली रदीफ़ (जो पूरी ग़ज़ल में अपरिवर्तित ही रहती है) मुझसे है. मिसरे का वज़्न हैः बहरे-ख़फी़फ़ अर्थात फाइलातुन, मफाइलुन, फालुन /फ-इलुन. इस वज़्न के अंत में फालुन और फ-इलुन के आख़िर में एक एक शब्द, आवश्यकतानुसार बढ़ाया जा सकता है. जिस किसी वज़्न में शुरू में फाइलातुन आता है, उसमें एक अक्षर कम करके, फ इ ला तु न भी आवश्यकतानुसार लाया जा सकता है. अतः उपर्युक्त मिसरा-वज़्न /बहर +का़फिया+रदीफ प्रस्तुत करता है, इसी को ज़मीने शे’र कहते हैं

रदीफ़ काफिया को समझाने के लिये मोना हैदराबादी का यह शेर पाठनीय है-

साथ देके रदीफ़ आगे आगे चली
काफ़ियों को लेकर चली है ग़ज़ल.

इस बयाँ को ‘साकार करते हुए ‘हाल कोई तो पूछता मुझसे ‘ के आधार पर फनकार पत्रिका में पाठकों की जी जो ग़ज़लें पेश हुई हैं, उनसे कुछ ग़ज़लें, कुछ अंश साभार यहाँ पेश हैं ताकि ग़ज़ल के फार्म को सरलतापूर्वक समझा जा सके –

१. राज साग़री, खरगोन ( म.प्र.)

खुद पे कैसे हो तब्सिरा मुझसे
दूर रखो ये आईना मुझसे…मतला

उसकी आँखों ने क्या कहा मुझसे
उम्र भर मैं रहा ख़फा़ मुझसे…हुस्ने मतला

खुन के घूँट पीके बैठा हूँ
ज़हर का पूछ ज़ायका मुझसे.

कौन था ‘राज़’, आईना चेहरा
जिसने मुझको मिला दिया मुझसे…मक़्ता
॰॰
२.म. ना. नरहरि, विरार( महाराष्ट्र )

था अगर शिकवा या गिला मुझसे
हाल कोई तो पूछता मुझसे.

जिस्म मिट्टी सा कर दिया मेरा
तोड़कर उसने सिलसिला मुझसे.
॰॰

३. शैलजा नरहरि, विरार ( महाराष्ट्र)

बाद मुड्दत के वो मिला मुझसे
हाल कोई तो पूछता मुझसे.

बाँधने की फिज़ूल कोशिश की
छूटना तय ही था सिरा मुझसे.

रोशनी को फरेब देना था
तीरगी ने लिया पता मुझसे.
॰॰
४. मरियम ग़ज़ला, थाने ( महाराष्ट्र)

इस तरह आज वो मिला मुझसे
हो नहीं जैसे आशना मुझसे.

दे गया धूप की मुझे चादर
ले गया रात की रिदा मुझसे.

कुछ ‘गज़ाला’ मुझे रही रंजिश
कुछ तो उसको भी था गिला मुझसे.
॰॰
५. डा॰ नलिनी विभा नाज़ली, हमीरपुर (हि.प्र)

दोस्त रखते जो राब्ता मुझसे
हाल कोई तो पूछता मुझसे.

मेरी कश्ती डुबि ही दी आख़िर
था खफ़ा मेरा नुख़ुदा मुझसे.

‘नाज़ली’ बनके किस कदर मासूम
पूछता है वो मुद्दआ मुझसे.
॰॰

६.द्विजेन्द्र द्विज, कांगड़ा (हि.प्र)

अब है मेरा मुकाबला मुझसे
मेरा साया तो डर गया मुझसे.

इंतिहा द्विज न जाने क्या होगी
देखी जाए न इब्तिदा मुझसे.
॰॰
७. दा॰ विनय मिश्र, अलवर ( राजस्थान)

रात ने जाने क्या सुना मुझसे
ले गई धूप का पता मुझसे.

जैसे गुल में समाई है खुशबू
वो कहाँ है भला जुदा मुझसे.
॰॰
७. जनाब कमरउद्दीन सा॰ बरतर, गव्लियर( म.प्र.)

अब मुख़ातिब है आईना मुझसे
अब मेरा सामना हुआ मुझसे.

वो जो पत्थर ही मुझको समझेगा
दूर ही दूर जो रहा मुझसे.

पूछने वाले की तरह बरतर
हाल कोई तो पूछता मुझसे.

बकौल अमरजीत सिंह अंबाली के शेर की ज़ुबानी-

मत्ले से मक़्ते तलक की ये मसाफ़त महरबा!
दर्द से रिश्ते में जैसे ग़म पिरोती है ग़ज़ल.

शब्दार्थः मसाफ्त= सफ़र

और आगे…………..अंक ५

आर.पी शर्मा महर्षि को “पिंगलाचार्य” की उपाधि

आर.पी शर्मा महर्षि को “पिंगलाचार्य” की उपाधि

गुफ्तगू (जनवरी-मार्च २००५)में अदबी खबरों के अंतरगत उनके सुपुत्र डा॰ रमाकांत शर्मा द्वारा पेश की गई उपाधि की सूचना काव्य शोध संस्थान द्वारा हिंदी भवन, नई दिल्ली में। मुंबई के प्रख़्यात ग़ज़ल शिल्पकार और ग़ज़लकार श्री आर।पी शर्मा महरिषको माननीय devi-pic-artist-074.jpgश्री विष्णु प्रभाकर और श्री कमलेश्वर के हाथों “पिंगलाचार्य” की उपाधि से विभूषित किया गया। इस अवसर पर उन्हें काव्य शोध संस्थान ने शाल और मनमोहन गोसाई जी की पावन स्मृति में ११००० हजा़र रुपये देकर पुरस्कृत किया गया। समारोह में डा॰ सादिक, डा॰ कमाल सिद्दिकी, शिव कुमार मिश्र तथा मख़मूर सईदी सहित हिंदी और ऊर्दू साहित्य के जाने माने साहित्यकार उपस्थित थे।

ग़ज़ल क्या, कब, क्यों और कैसे?

काफ़िया-शास्त्र जो इस वार्तालाप का अंग भी है, उसपर खास रौशनी डालते हुए श्री आर. पी. शर्मा महरिषकी प्रकाशित किताब “ग़ज़ल-लेखन कला” के शुरूवाती पन्नों (११-१६) में ग़ज़ल के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले विभिन्न प्रश्न मुंबई के जाने माने साहित्यकार, कहानीकार, कवि और ग़ज़लकार श्री म॰ न॰ नरहरि ने साक्षात्कार के दौरान किये और प्रश्नों का क्रम कुछ इस प्रकार था कि ग़ज़ल क्या, कब, क्यों और कैसे पर क्रमबद्ध रूप से विस्तार में गहन चर्चा हुई। पाठकों के लाभ के लिये साक्षात्कार के कुछ हिस्से यहाँ पेश करना चाहती हूँ।

प्रश्न : ग़ज़ल कहाँ और कैसे अस्तित्व में आई?

उत्तर : बादशाहों, अमीर उमरावों आदि की प्रशंसा में लिखे जाने वाले कसीदे का पहले तो फारसीकरण हुआ, तत्पश्चात् ईरान के शायरों में उसकी तशबीब (शृंगारिक भूमिका) को कसीदे से अलग करके उसका नाम ग़ज़ल रखा (ग़ज़ल अर्थात् प्रेयसी से वार्तालाप) ईरान में यह विधा बहुत फूली-फली तथा लोकप्रिय हुई। वस्तुतः भारतवर्ष को यह विधा ईरान की ही देन है।

प्रश्न : अमीर खुसरो को हिंदी का पहला ग़ज़लगो शायर माना जाता है। इस पर आप को क्या कहना है?

उत्तर : अमीर खुसरो ने खिलजी शासनकाल में, उस समय की बोली जाने वाली भाषा में कुछ अरबी-फारसी शब्दों का मिश्रण करके एक नई भाषा विकसित की थी, जिसका नाम उन्होंने हिंदी/ हिंदवी रखा था और इस भाषा में उनके द्वारा कुछ ग़ज़लें भी कही गईं थीं, इसलिये उनको हिंदी भाषा का आविष्कारिक तथा हिंदी का पहला ग़ज़लगो शायर माना जाता है। यह और बात है कि हिंदी के काव्य क्षेत्र में बालस्वरूप राही, शेरजंग गर्ग, सूर्यभानु गुप्त आदि ग़ज़ल लिख रहे थे, परंतु इसे स्थापित करने का श्रेय दुष्यंतकुमार को प्राप्त हुआ है।

प्रश्न : ग़ज़लिया शायरी में क्रमिक विकास में किन शायरों का महत्वपूर्ण योगदान रहा है?

उत्तर : प्रारंभिक दौर के कुछ उल्लेखनीय शायर- आरज़ू, मज़हर, हातिम, नाजी, यकरंग आदि थे। यह दौर ईमामगोई का था। शायर अपने कलाम में ऐसे शब्द लाते थे जो दो अर्थ देते थे -एक पास का और दूसरा दूर का, किंतु शायर की मुराद दूर के अर्थ से होती थी। इस प्रकार शेरों को वर्ग पहेली बना दिया जाता था। संतोष की बात है, विरोध के कारण ईमामगोई अधिक समय तक नहीं चली।

दूसरे दौर में पूर्वार्ध में सौदा, मीर, सोज और दर्द जैसे उस्ताद शायर हुए हैं। इन शायरों में “मीर”सर्वोपरि हैं। उन्हें खुदाये-सुखन कहा जाता है। इसी दौर में उत्तरार्द्ध में मुसहफ़ी इंशा, जुर्रत का नाम उल्लेखनीय हैं। इंशा और जुर्रत की शायरी अवध की विलासिता से प्रभावित है, जब मुगलिया सल्तनत के कमज़ोर होने के कारण, बाहरी आक्रमणों, लूटपाट और नादिरशाही कत्ले- आम से दिल्ली उजड़ती जा रही थी, तो सौदा, मीर, सोज़, मुसहफी और इंशा को, वहाँ संरक्षण न मिलने के कारण लखनऊ जाना पड़ा था जो नवाब आसफुद्दौला के साथ विलासिता मं् डूबा पड़ा था।

तीसरे दौर में पूर्वार्ध में, लखनवी शायरों में नासिख और आतिश के नाम उल्लेखनीय हैं, दोनों ही लखनवी रंग के प्रसिद्ध शायर थे। दूसरी ओर देहलवी शायरों में जौक, मोमिन और मिर्ज़ा ग़ालिब थे। मिर्जा दाग़ और बादशाह जफ़र उस्ताद जौक के शिष्य थे, शेफ़्ता उस्ताद मोमिन के शिष्य तथा हाली मिर्ज़ा ग़ालिब के शिष्य थे। मिर्ज़ा ग़ालिब ने अपनी गज़लिया शायरी में इतना सब कुछ कह दिया था, कि दूसरों के कहने के लिये कुछ बचा ही नहीं। आगे चलकर असगर, फानी, इसरत, सीमाब और जिगर ने इस शून्य को भरने का प्रयास किया। सबसे बड़ा नाम दाग ने कमाया जिनके हज़ार से अधिक शिष्यों में, सर इकबाल, सीमाव अकबरावादी, जिग़र मुरादाबादी जैसे अज़ीम शायर शामिल है। हाली ने इश्किया किस्म की शायरी का जम कर विरोध किया और उसके स्तर में सुधार लाने का आहवान किया।

प्रश्न : देहलवी और लखनवी शायरी में क्या अंतर है? बताएँ।

उत्तर : देहलवी शायरी में प्रेमी का उसके सच्चे प्रेम तथा दुख-दर्द का स्वाभाविक वर्णन होता है, जब कि लखनवी शायरी अवध की उस समय विलासता से प्रभावित रही। अतः उसमें प्रेम को वासना का रूप दे दिया गया तथा शायरी प्रेमिका के इर्द -गिर्द ही घूमती रही। वर्णन में कृत्रिमता एवं उच्छृंखलता से काम लिया गया। अब लखनवी शायरी में सुधार आ गया है। इससे मुग़ल काल में ग़ज़ल की दशा तथा उसके स्तर पर भी समुचित प्रकाश पड़ता है।

प्रश्न : गज़ल की तकनीक ‌एवं उसकी संरचना पर प्रकाश डालने का कष्ट करेंगे?

उत्तर : ग़ज़ल की बाहरी संरचना में छंद-काफ़िया-रदीफ़ का महत्वपूर्ण योगदान हैं। छंद को अथवा बहर, रचना का सही छंदोबद्ध होना ज़रूरी होता है, साथ में छंद-बहर की विशिष्ट लय का निर्वाह भी आवश्यक है। ग़ज़ल की काफ़ियायुक्त प्ररंभिक दो पंक्तियों को “मतला” तथा अंतिम दो पंक्तियों को,जिसमें शायर अपना उपनाम लाता है उसे “मक़्ता” कहते हैं। काफ़िया तुकांत शब्द को कहते हैं। रदीफ़, काफ़ियों के पश्चात आने वाला वह शब्द अथवा वाक्य है, जो ग़ज़ल में बिना किसी परिवर्तन के दोहराया जाता है। चूंकि मतके में प्रयुक्त काफ़ियों पर, ग़ज़ल के अन्य काफ़िये आधारित होते हैं, अतः मतले में सही काफ़िये आयें, यह देखना ज़रूरी है। जैसे –

१. मतले में या तो दोनों काफ़िये विशुद्ध मूल शब्द हों, जैसे-

हर हक़ीक़त में बआंदज़े-तमाशा देखा

खूब देखा तेरे जलवों को मगर क्या देखा।

२. एक विशुद्ध मूल शब्द और दूसरा बढ़ाया हुआ शब्द, जैसे –

जब से उसकी निगाह बदली है

सारी दुनिया नयी-नयी सी है।

३. दोनों ही बढ़ाये हुए अंश निकाल देने पर समान तुकांत शब्द शेष बचें, जैसे –

हो गई है पीर पर्वत-सी पिघलनी चाहिये

इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिये।

४. दोनों बढ़ाये हुए शब्दों में व्याकरण भेद हो, जैसे –

देख मुझ को यूँ न दुश्मनी से

इतनी नफ़रत न कर आदमी से।

५. यदि मतले में ख़फा-वफ़ा जैसे अथवा मन-चमन जैसे काफ़िये लाये जाते हैं तो उस अवस्था में क्रमशः “फ” व्यंजन-साम्य वाले काफ़िये ही पूरी ग़ज़ल में लाये जायें या अपवाद स्वरूप उनकी जगह अन्य व्यंजन भी लाये जा सकते हैं, जैसा कि डा॰ इकबाल अपनी एक ग़ज़ल में लाये हैं, –

फिर चिराग़े-लाल से रौशन हुए कोहो-दमन

मुझको फिर नग्मों पे उकसाने लगा मुर्गे-चमन।

मन की दौलत हाथ आती है तो फिर जाती नहीं

तन की दौलत छाँव है, आता है धन जाता है धन।

इस ग़ज़ल के अन्य काफ़िये है बन, फन, तन आदि। काफ़िया-शास्त्र बड़ा है यहाँ केवल मुख्य-मुख्य बातें ही बताई जा सकती है। सबसे महत्वपूर्ण है ग़ज़ल के अन्तरंग की संरचना, जिसके माध्यम से शायर अपने मनोभाव, उद्‌गार, विचार, अनुभव, दुःख-दर्द तथा अपनी अनुभूतियाँ आदि व्यक्त करता है, अतः अन्तरंग बहुत ही धीर-गंभीर , अर्थपूर्ण तर्कसंगत तथा अंतरमन की गहराई से प्रस्फुटित होने वाला होना चाहिये। अंतरंग को जितना परिष्कृत किया जाए, उतना ही वह प्रभावशाली बनता है। तगज़्जुल, अंदाज़े-बयाँ कुछ ऐसा हो कि शेर की पहली पंक्ति सुनने पर हम दूसरी पंक्ति सुनने को लालायित हो उठें तथा उसे सुनते ही अभिमूत हो जाएँ। यह प्रसंग बहुत बड़ा है अतः इसे यहाँ इतना ही दिया जा सकता है।

प्रश्न : अच्छी ग़ज़ल की विशेषताएँ?

उत्तर : ऊपर ग़ज़ल के अन्तरंग के बारे में जो बातें बताई गई हैं तथा उनके अतिरिक्त ग़ज़ल समसामयिक, जनोपयोगी तथा अपनी धरती और परिवेष से जुड़ी हो, कथ्य एवं शिल्प में सामंजस्य हो, भाषा सरस-सरल हो। पाठकों एवं श्रोताओं में वही भाव सम्प्रेषित हो, जो ग़ज़लकार व्यक्त करना चाहता है, और सबसे बड़ी बात यह कि वह अंतरमन में गहरे उतर जाए, कुछ सोचने को विवश करे, जिसके शेर उदाहरण स्वरूप पेश किये जा सकें तथा जिसके शब्दों के उच्चारण प्रामाणिक हों, बहर में हो अथवा सही छंदोबद्ध हो।

प्रश्न : हिंदी में लिखी जा रही ग़ज़ल के विषय में आपकी क्या राय है?

उत्तर : दुष्यंत कुमार ने हिंदी ग़ज़लों की अच्छी शुरुआत कर गये हैं, उनके बाद से हिंदी में ग़ज़ल- लेखन अबाध रूप से चल रहा है। अच्छी ग़ज़लें सराही भी जा रही हैं, आगे उन पर अधिक निख़ार आएगा, ऐसी अपेक्षा है।

प्रश्न : हिंदी ग़ज़लों में उर्दू शब्दों का प्रयोग किस सीमा तक होनं चाहिये?

उत्तर : जहाँ बात न बनती हो, वहाँ उर्दू शब्द आने से बात बन जाए, तब वहाँ उर्दू शब्द लाना ही चाहिये, परंतु उसके सही उच्चारण के साथ, क्योंकि लबो‍-लहज़ा उर्दू शब्दों के उच्चारण से ही बनता है, इसके लिये उर्दू शब्दों के हलन्त अक्षरों को ध्यान में रखना आवश्यक है।

प्रश्न : आजकल दोहा छंद में ग़ज़ल लिखने का प्रयोग हो रहा है, क्या यह उचित है? यदि हाँ तो क्यों?

उत्तर : आश्चर्य तो इस बात का है कि जब ग़ज़ल को दोहे से प्रेरित बताया जा रहा है तो ग़ज़ल-लेखन में उसका प्रयोग अब इतनी देरी से क्यों किया जा रहा है, पहले क्यों नहीं किया गया? ग़ज़लों को सभी अच्छी बहरें और अच्छे छंद ग्राह्य हैं, बशर्ते कि वो संगीतात्मक हो। दोहा छंद भी अच्छा छंद है और इसकी दोनों पंक्तियाँ तुकांत होने के कारण ग़ज़ल के मतले के अनुरूप भी है। हाँ, ग़ज़ल की स्वतंत्र पंक्तियों को दोहों में किस प्रकार फिट किया जाएगा, यह विचारणीय है।

प्रश्न : क्या ग़ज़लों की कुछ बहरें काव्य-छंदों से समकक्ष हैं? कृपया उदाहरणों सहित बतायें?

उतरः कुछ प्रचलित बहरें ऐसी हैं जो हिंदी वाक्य छंदों के समकक्ष हैं। जैसे-

१. मानव भवन में आर्यजन जिसकी उतारें आरती

बहरे-रजज् /हरिगीतिका

२. हाँ, कमल के फूल पाना चाहते हैं इसलिये

बहरे-रमल /गीतिका

३. कमल बावना के तुम्हें है समर्पित

बहरे-मुतकारिब / भुजंगप्रयात

४. मेघ आकर भी बरसे नहीं

बहरे-मुतदारिक / महालक्ष्मी

५. परिंदे अब भी पर तोले हुए हैं

बहरे-रजज्/सुमेरु

ऐसे ही और भी बहरों के समकक्ष, हिंदी छंदों के उदाहरण दिये जा सकते हैं।

“ग़ज़ल-लेखन कला” – ( दूसरा भाग)

“ग़ज़ल-लेखन कला” के कुछ चुनिंदा अंश प्रस्तुत है श्री आर.पी. शर्मा “महर्षि” की लेखनी से उनके शब्दों में – पृष्ठ १८-२३ से साभार।


prbook-front-2.jpgग़ज़ल कहने के लिये हमें कुशल शिल्पी बनना होता है ताकि हम शब्दों कोmehrish1.jpg तराश कर उन्हें मूर्त रूप दे सकें, उनकी जड़ता में अर्थपूर्ण प्राणों का संचार कर सकें तथा ग़ज़ल के प्रत्येक शेर की दो पंक्तियों (मिसरों) में अपने भावों, उद्‌गारों, अनुभूतियों आदि के उमड़ते हुए सैलाब को मुट्ठी में आकाश, कठौती में गंगा, कूजे में दरिया, बूँद में सागर के समान समेट कर भर सकें। इसके लिये हमें स्वयं को सक्षम तथा लेखनी को सशक्त बनाना होता है। तब जाकर हम में वह सलीका, वह शऊर, वह सलाहियत, वह योग्यता एवं क्षमता उत्पन्न होती है कि हम ऐसे कलात्मक शेर सृजित करने में समर्थ होते हैं जो “लोकोक्ति” बन जाते हैं, और अक्सर मौकों पर हमारी ज़बान पर रवाँ (गतिशील) हो जाते हैं।” जैसेः

मैं जिसे ओढ़ता बिछाता हूँ

वो ग़ज़ल आपको सुनाता हूँ

–दुष्यंत कुमार

कहानी मेरी रूदादे-जहाँ मालूम होती है

जो सुनता है, उसीकी दास्ताँ मालूम होती है

-सीमाब अकबराबादी

इस संबंध में, श्री ज्ञानप्रकाश विवेक, ग़ज़ल के कला पक्ष को विशेष महत्व देते हुए कहते हैं

ग़ज़ल की बुनियादी शर्त उसका शिल्प है। एक अनगढ़ ग़ज़ल एक अनगढ़ पत्थर की तरह होती है। संगतराश जिस प्रकार छेनी ओर हथोड़ी से पत्थर में जीवंतता ला देता है और तराशे गये पत्थर में उसका एहसास, उसकी अनुभूतियाँ और उसकी अभिव्यक्ति छुपी होती है, वो सब सजीव सी लगती हैं। इसी प्रकार ‌क तराशी हुई ग़ज़ल का तराशा हुआ शेर, सिर्फ दो मिसरों का मिलाप नहीं होता, न उक्ति होती है, न सूक्ति, अपितु वह एक आकाश होता है -अनुभूतियों का आकाश! ग़ज़ल का एक-एक शेर कहानी होता है।” हिंदी में ग़ज़ल-दुष्यंत के बाद-एक पड़ताल, आरोह ग़ज़ल अंक से

यूँ तराशा है उनको शिल्पी ने

जान सी पड़ गई शिलाओं में

-देवी

सारा आकाश नाप लेता है

कितनी ऊँची उड़ान है तेरी

-देवी

(ये शेर महरिष जी को बहुत पसंद थे)

शेर को कहने व समझने के बारे में बकौल हज़त मुन्नवर लख़नवी साहब का शेर प्रस्तुत करते हैं –

शेर कहना यूँ तो मोती है मोी पिरोने का अमल

शेर कहने से भी बहतर है समझना शेर का।

इस फ़न के कद्रदान हज़रत अनवर साबरी के लफ्ज़ों में सुनियेः “ग़ज़ल को छोटी छोटी बहरों में ढालना तथा उसमें प्रयुक्त थोड़े से शब्दों में मन की बात कहना और वह भी सहजता से, यह भी एक कमाल की कला है।”

ग़ज़ल विधा को कलात्मक बनाने में सुलझी हुई भाषा का बहुत बड़ा हाथ है। जैसा कि पद्मश्री गोपालदास “नीरज” का कहना हैः “उर्दू शायरी की लोकप्रियता का सबसे बड़ा कारण है भाषा का सही प्रयोग। उर्दू में वाक्यों को तोड़-मरोड़ने बजाय, भाषा को उसके गद्यात्मक अनुशासन के साथ पेश किया जाय तो उसमें रस, अलंकार बरपूत आ जाते हैं”

शायर तो कोई शख़्स भी हो सकता है

फ़नकार मगर बनना बहुत मुश्किल है….बक़ौल डा॰ अल्लामी(रुबाई की अंतिम दो पंक्तियाँ)

अपने नये ग़ज़ल संग्रह चराग़े दिल में देवी नागरानी ग़ज़ल के विषय में क्या कहती हैः

कुछ खुशी की किरणें, कुछ पिघलता दर्द आँख की पोर से बहता हुआ, कुछ शबनमी सी ताज़गी अहसासों में, तो कभी भँवर गुफा की गहराइयों से उठती उस गूँज को सुनने की तड़प मन में जब जाग उठती है तब कला का जन्म होता है। सोच की भाषा बोलने लगती है, चलने लगती है, कभी कभी तो चीखने भी लगती है।यह कविता बस और कुछ नहीं, केवल मन के भाव प्रकट करने का माध्यम है, जिन्हें शब्दों का लिबास पहना कर एक आकृति तैयार करते हैं, वो हमारी सोच की उपज होती है फिर चाहे रुबाई हो या कोई लेख, गीत हो या ग़ज़ल।”

और आगे बढ़ते हुए महरिष जी कहते है ग़ज़ल उर्दू के अतिरिक्त हिंदी, मराठी, गुजराती, पंजाबी, कशमीरी, भोजपुरी, छत्तीसगढ़ी, सिंधी तथा भारत की अन्य कुछ भाषाओं में लिखी जाती है। ज़रा मुलाइजा फरमा‌एँ कि “प्रोत्साहन” त्रैमासिक के प्रधान संपादक श्री जीवतराम सेतपाल अपने सम्पादकीय में ग़ज़ल के बारे में क्या कहते हैः

सुकुमार जूही की कली की भांति, मोंगरे की मदमाती सुगंध लेकर, गुलाबी अंगड़ाई लेती हुई, पदार्पण करने वाली ग़ज़ल, भारतीय वाङ्‌मय की काव्य विधा के उपवन में रात की रानी बन बैठी। अरबी साहित्य से निस्सृत, फ़ारसी भाषा में समादृत, उर्दू में जवान होकर, अपनी तरुणाई की छटा बिखेरने और हिंदी साहित्य के महासागर में सन्तरण करने आ गई है ग़ज़ल। कम शब्दों में गंभीरता पूर्वक बड़ी से बड़ी बात को भी, नियमों में बाँधकर बड़ी सफलता और सहजता से दोहों की भाँति गहराई से कह देने में समर्थ, गेय, अत्याधिक लयात्मक, काव्य विधा का मख़मली अंग है ग़ज़ल।

हरियाणा के श्री निशांतकेतु एक जगह लिखते है- “शायरी एक मखमली चादर जैसी होती है, जिसे शाइर अपनी साँसों से बुनता है, जिस्म और रूह के बीच दिल की धड़कनों से सुनता है।”

प्रो॰ रामचन्द्र के शब्दों में “जब तक ग़ज़लकार अपने शेरों में सामूहिक सच्चाइयों के व्यक्तिगत भोग को आत्मसात कर, प्रस्तुत नहीं करता, तब तक उसके काफ़िये और रदीफ़ चाहे जितने सुंदर क्यों न हो, उसके शेर उसकी ग़ज़ल का सही अस्तित्व खड़ा नहीं कर सकता। ग़ज़लकार के अनुभव जब पाठकों के भागीदार बनते है तब जाकर ग़ज़ल की जान सामने आती है।”

ग़ज़ल के परिचय से वाकिफ़ कराते हुए आगे महरिष जी कहते हैं – “अच्छी ग़ज़ल के प्रत्येक शेर का पहला मिसरा कुछ इस प्रकार कहा जाता है कि श्रोता दूसरे मिसरे को सुनने के लिये उत्कंठित हो जाता है, और उसे सुनते ही चमत्कृत तथा आनन्द विभोर हो उठता है। “ग़ज़ल” के विचार काफ़ियों (तुकांत शब्दों) के इर्द गिर्द घूमते हैं। काफ़िया शेर का चर्मोत्कर्ष है, जिस पर आते ही और निहितार्थ या व्यंगार्थ को समझते ही श्रोता अथवा पाठक चमत्कृत एवं विमुग्ध हो उठते हैं। वास्तविकता यह है कि कथ्य और शिल्प के सुंदर तालमेल से ही एक सही ग़ज़ल जन्म लेती है। “ श्री दीक्षित दनकौरी द्वारा संपादित “ग़जल दुष्यंत के बाद” में लिखे महरिष जी के कुछ अंश है ये। अंत में स्वरचित ग़ज़ल की कुछ पँक्तियाँ प्रस्तुत हैं –

फूल खिले, गुंजार हुई है

एक ग़ज़ल साकार हुई है

झनके है शब्दों के नुपुर

अर्थ-भरी झंकार हुई है।

मन की कोई अनुभूति अचानक

रचना का आधार हुई है

बात कभी शबनम सी “महरिष”

और कभी अंगार हुई है।

(ग़ज़ल लेखन कला से)

कितना सत्य है उनके कहे इस शेर में

वो अल्फ़ाज़ मुँह बोले ढूँढती है

ग़ज़ल ज़िन्दादिल काफिए ढूँढती है।

आगे और तीसरा भाग

अगले भाग में श्री आर. पी. शर्मा महरिष से किये कुछ प्रश्नोत्तर सामने आयेंगे जिसमें ग़ज़ल क्या, कब, क्यों और कैसे लिखी जाती है उसके बारें में जानकारी होगी।

ग़ज़ल क्या, कब, क्यों और कैसे…..

एक परिचय : आर.पी. शर्मा “महर्षि” (भाग – १)

mehrish.jpgश्री आर.पी. शर्मा का जन्म ७ मार्च १९२२ ई को गोंडा में (उ.प्र.) में हुआ। शासकीय सेवा से सेवानिवृत्त श्री शर्मा जी का उपनाम “महरिष” है और आप मुंबई में निवास करते हैं। अपने जीवन-सफर के ८५ वर्ष पूर्ण कर चुके श्री शर्मा जी की साहित्यिक रुचि आज भी निरंतर बनी हुई है। ग़ज़ल रचना के प्रति आप की सिखाने की वृति माननीय है। विचारों में स्फूर्ति व ताज़गी बनी हुई है, जिसका प्रभाव आपकी ग़ज़लों में बखूबी देखा जा सकता है, तथा विचारों की यह ताज़गी आप की रोज़मर्रा की जिंदगी को भी संचालित करती रहती है। ग़ज़ल संसार में वे “पिंगलाचार्य” की उपाधि से सम्मानित हुए हैं, और मुझे फ़क्र है कि आज मैं उन्हें अपना गुरु मानती हूँ, शायद इस श्रद्धा और विश्वास का एक कारण यह भी है कि मैं बिलकुल थोड़े ही समय में बहुत कुछ सीख पाई, जो मुझे इस राह का पथिक होने का अधिकार देता है। गज़ल लेखन कला मेरे विचार में एक सफ़र है जिसकी मंज़िल शायद नहीं होती।

तवील जितना सफ़र ग़ज़ल का/ कठिन है मंज़िल का पाना उतना। देवी

आपकी प्रकाशित पुस्तकें इस प्रकार हैं

१. हिंदी गज़ल संरचना-एक परिचय (सन् १९८४ में मेरे द्वारा इल्मे- अरूज़ – उर्दू छंद-शास्त्र) का सर्व प्रथम हिंदी में रूपांतर,

२. गज़ल-निर्देशिका,

३. गज़ल-विद्या,

४. गज़ल-लेखन कला,

५. व्यहवारिक छंद-शास्त्र (पिंगल और इल्मे- अरूज़ के तुलनात्मक विश्लेषण सहित),

६. नागफनियों ने सजाईं महफिलें (ग़ज़ल-संग्रह),

७. गज़ल और गज़ल की तकनीक।

उनकी आने वाली पुस्तक है “मेरी नज़र में” जिसमें उनके द्वारा लिखी गईँ अनेक प्रस्तावनाएँ, समीक्षाएँ रहेंगी जो उन्होंने अनेक लेखकों, कवियों और ग़ज़लकारों पर लिखीं हैं और वो अनेक पत्रिकाओं में प्रकाशित हुई हैँ। यह संग्रह एक अनुभूति बनके सामने आयेगा, जिसे पढ़ने वालों को जानने का एक सुअवसर मिलेगा कि कैसे महरिष जी सरलता और सादगी से अपनी पारखी नज़र अपनी अमूल्य राय के साथ साथ सुझाव भी देते है।

मेरे पहले गज़ल संग्रह चराग़े दिल के विमोचन के अवसर पर ग़ज़ल के विषय में श्री आर.पी.शर्मा महरिष् इस किताब में छपे अपनी प्रस्तावना स्वरूप लेख देवी दिलकश ज़ुबान है तेरीमें क्या कहते हैं, अब सुनिये महरिष जी की ज़ुबानीः

ग़ज़ल उर्दू साहित्य की एक ऐसी विधा है जिसका जादू आजकल सबको सम्मोहित किए हुए है। ग़ज़ल ने करोड़ों दिलों की धड़कनों को स्वर दिया है। इस विधा में सचमुच ऐसा कुछ है जो आज यह अनगिनत होंठों की थरथराहट और लेखनी की चाहत बन गई है। ग़ज़ल कहने के लिये हमें कुशल शिल्पी बनना होता है, ताकि हम शब्दों को तराश कर उन्हें मूर्त रूप दे सकें, उनकी जड़ता में अर्थपूर्ण प्राणों का संचार कर सकें तथा ग़ज़ल के प्रत्येक शेर की दो पंक्तियाँ या मिसरों में अपने भावों, उद्‌गारों, अनुभूतियों आदि के उमड़ते हुए सैलाब को मुट्ठी में आकाश, कठौती में गंगा, कूजे में दरिया, बूँद में सागर के समान समेट कर भर सकें।”

यहाँ मैं ग़ज़ल के मिज़ाज के बारे में भी कुछ कहना चाहूँगा। ग़ज़ल कोमल भी है और कठोर भी। उसका लहज़ा कभी नर्म तो कभी तीखे तेवर लिये होता है, तो कभी दोनों का मणि कांचन संयोग कुछ और ही लुत्फ़ पैदा कर देता है,

चटपटी है बात लक्षमण – सी मगर/अरथ में रघुवीर- सी गंभीर है

सुनके महरिषयूँ लगा उसका सुख़न/ चाप से अर्जुन के निकला तीर है।

हरियाणा के प्रख़्यात उस्ताद शाइर सत्यप्रकाश शर्मा तफ़्ता ज़ारी‘ (कुरुक्षेत्र) ने तो ग़ज़ल से संबोधित एक अनूठी बात कही है, वे फर्माते है:

सुलूक करती है माँ जैसा मुब्तदी से ग़ज़ल/मगर एक अग्नि-परीक्षा है मुन्तही के लिये।

कहने का मतलब यह कि नवोदतों के लिये तो ग़ज़ल माँ जैसा व्यवहार करती है परन्तु इस विधा में पारंगत व्यक्तियों को भी कभी अग्नि-परीक्षा से गुज़रना पड़ता है।

बात बनाये भी नहीं बनती” जैसी कठिन परिस्थिति इनके सामने उत्पन्न हो जाती है। इस शेर पर मेरी तज़्मीम भी है, –

निसार करती है उस पर ये ममता के कंवल

उसी के फिक्र में रहती है हर घड़ी, हर पल

मसाइल उसके बड़े प्यार से करती है ये हल

सुलूक करती है माँ जैसा मुब्तदी से ग़ज़ल

मगर इक अग्नि-परीक्षा है मुन्तही के लिये।

प्रख्यात शाइर श्री क्रष्ण बिहारी नूरके एक मशहूर शेर :

“चाहे सोने के फ़्रेम में जड़ दो

आईना झूठ बोलता ही नहीं।“

इस शेर पर मैंने अपनी ओर से तीन मिसरे लगाये हैं:

तुम जो चाहो तो ये भी कर देखो

हर तरह इसका इम्तिहां ले लो

लाख लालच दो, लाख फुसुलाओ

चाहे सोने के फ़्रेम में जड़ दो

आईना झूठ बोलता ही नहीं।”

यह तज़्मीन श्री तर्ज़ साहिब को सादर समर्पित है।

अब मैं आपको एक पद्यात्मक रचना सुनाना चाहूँगा, मौके की चीज़ है, समाअत फ़रमाएँ:

आशीर्वाद श्रीमती देवी नागरानी जी को चराग़े‍-दिलके विमोचन के अवसर पर

“किस कदर रौशन है महफ़िल आज की अच्छा लगा

इस चराग़े‍-दिलने की है रौशनी अच्छा लगा।

आप सब प्रबुद्ध जन को है मेरा सादर नमन

आप से इस बज़्म की गरिमा बढ़ी अच्छा लगा।

कष्ट आने का किया मिल जुल के बैठे बज़्म में

भावना देखी जो ये सहयोग की अच्छा लगा।

इस विमोचन के लिये देवी बधाई आपको

आरज़ू ये आपकी पूरी हुई अच्छा लगा।

इक ख़ज़ना मिल गया जज़्बातो-एहसासात का

हम को ये सौग़ात गज़लों की मिली अच्छा लगा।

आपको कहना था जो देवीकहा दिल खोलकर

बात जो कुछ भी कही दिल से कही अच्छा लगा।

भा गया है आपका आसान अंदाज़े-बयां

आपने गज़लों को दी है सादगी अच्छा लगा।

हर तरफ बिखरी हुई है आज तो रंगीनियाँ

रंग बरसाती है गज़लें आपकी अच्छा लगा।

ज़ायका है अपना अपना, अपनी अपनी है मिठास

चख के देखी हर गज़ल की चाशनी अच्छा लगा।

यूँ तो महरिषऔर भी हमने कहीं गज़लें बहुत

ये जो देवीआप की ख़ातिर कही अच्छा लगा।“

क्रमशः —

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