विश्व हिन्दी सेवा सम्मान v “सिंधी कहानियाँ“ का लोकार्पण

दिनांक 15, 16 नवम्बर 2014 लखनऊ में अखिल भारतीय मंचीय कवि पीठ-उत्तर प्रदेश की ओर से आयोजित दो दिवसीय अंतराष्ट्रीय हिन्दी कविता समारोह-2014, विश्वेश्वरैया सभागार, लखनऊ में सम्पन्न हुआ। इन दो दिनों में उदघाटन, लोकार्पण, सम्मान एवं कवि सम्मेलन में देस-विदेस से पधारे कवि-गण, व भारत के अनेक शहरों से जाने माने कविवर, गज़लकार, साहित्यकार, पत्रकार भी उपस्थित रहे।L-Samman दिनांक 15, नवम्बर 2014 विश्व हिन्दी सेवा सम्मान से नवाज़ा गया   सम्माननीय अध्यक्ष श्री राम नाइक-माननीय राज्यपाल जी,  मुख्य अतिथि श्री शिवपाल सिंह यादव- मा॰ मंत्री, उ॰ प्र॰ सरकार, विशिष्ट अतिथि श्री राम नरेश यादव (पूर्व सचिव स ॰ वि॰ प॰ उ॰ प्र॰) सरस्वती शिखर अलंकरण-वरिष्ठ कवि श्री उदय प्रताप सिंह (लखनऊ), का॰ अध्यक्ष, उ॰ प्र॰ हिन्दी संस्थान, डॉ. जया वर्मा (नाटिंगम), मंचासीन अनुभूतियों की उपस्थिती में देवी नागरानी जी को विश्व हिन्दी सेवा सम्मान से नवाजा गया। अटलांटा की विदूषी साहित्यकारा डॉ. मृदुल कीर्ति की ओर से भी यह सम्मान देवी जी ने  विश्वेश्वरैया सभागार में ग्रहण किया।

Sindhi Kahaniyaan-Vimochan दिनांक 16 नवम्बर 2014  देवी नागरानी के कहानी-संग्रह “सिंधी कहानियाँ“ का लोकार्पण इस भव्य साहित्यिक समारोह के दौरान डॉ. देवी नागरानी जे के सिन्धी से हिन्दी में अनूदित कहानी-संग्रह “सिंधी कहानियाँ“ का लोकार्पण श्री माता प्रसाद पाण्डेय, मा॰ अध्यक्ष, उ. प्रदेश, श्रद्धेय श्री केशरी नाथ त्रिपाठी-माननीय राज्यपाल, पश्चिम बंगाल, डॉ. दिनेश शर्मा, महापौर लखनऊ, श्री सुधीर हलवासिया, डॉ. विष्णु सक्सेना, व समिति के संयोजक डॉ. नरेश कत्यायन के हाथों सम्पन्न हुआ।

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सर्वश्रेष्ठ प्रतिनिधि हस्तियों की उपस्थिती में एक अंतराशतीय मुशाइरा भी संपन्न हुआ जिसमें भागीदारी ली -सर्वश्री उदय प्रताप सिंह(लखनऊ), डॉ. दाऊजी गुप्त(लखनऊ), डॉ. बुद्धिनाथ मिश्र (देहारादून), डॉ. नरेश कात्यायन (लखनऊ), डॉ. देवी नागरानी (न्यू जर्सी), डॉ. विष्णु सक्सेना (सिकंदराराऊ), डॉ. हेमराज सुंदर (मरीशस), श्रीमति सविता देवी रघुनाथ (मारिशस), डॉ. गंगाप्रसाद शर्मा (चीन), पवन बाथम (कायमगंज), महावीर प्रसाद नेवटिया (मुंबई),  रेखा गुप्ता(चेन्नई),  डॉ. वेद पकश वटुक (कैलिफोर्निया), डॉ. मंजु मिश्रा, (कैलिफोर्निया), डॉ. शकुंतला बहादुर (कैलिफोर्निया), डॉ. जया वर्मा (नाटिंगम),फारूक सरल (लखीमपुर), प्रो. सुमेर सिंह शैलेश(सतना), डॉ.डंडा लखनवी(लखनऊ ), बनज कुमार बनज(जयपुर), श्री यशवंत सिंह शेखावत, मदनरजा मौर्य(लखनऊ), डॉ. अनिल चौबे (वारणासी), लताश्री( मथुरा), कमलेश शर्मा (इटावा), सुधीर निगम(कानपुर) अंतराष्ट्रीय हिन्दी कवि सम्मेलन में भागीदारी करने वाले कविगण थे डॉ. कमलेश द्विवेदी (कानपुर) ने काव्य पाठ का एवं संचालन का भार दोनों सत्रों में बहुत ही संजीदगी से निभाया। जयहिंद

समकालीन साहित्य की चुनौतियाँ

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समकालीन साहित्य की चुनौतियाँ : एक चर्चा

  • डॉ. गुर्रमकोंडा नीरजा इन चुनौतियों से जुड़े विविध पहलुओं पर विचार करने के लिए गत 30-31 अक्टूबर 2014 को कर्नाटक विश्वविद्यालय (धारवाड़), अयोध्या शोध संस्थान (अयोध्या) और साहित्यिक सांस्कृतिक शोध संस्था (उल्हासनगर) के संयुक्त तत्वावधान में धारवाड में ‘समकालीन हिंदी साहित्य की चुनौतियाँ’ विषयक द्विदिवसीय अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया. उद्घाटन सत्र की मुख्य अतिथि अमेरिका से पधारी देवी नागरानी थीं. विशिष्ट अतिथियों में डॉ. विनय कुमार (हिंदी विभागाध्यक्ष, गया कॉलेज), डॉ. योगेंद्र प्रताप सिंह (निदेशक, अयोध्या शोध संस्थान, अयोध्या), डॉ. प्रदीप कुमार सिंह (सचिव, साहित्यिक सांस्कृतिक शोध संस्था, उल्हासनगर), डॉ. राम आह्लाद चौधरी (पूर्व अध्यक्ष, हिंदी विभाग, कोलकाता), डॉ. प्रभा भट्ट (अध्यक्ष, हिंदी विभाग, कर्नाटक विश्वविद्यालय), डॉ. एस. के. पवार (कर्नाटक विश्वविद्यालय) और डॉ. बी. एम. मद्री (कर्नाटक विश्वविद्यालय) शामिल थे. साहित्य को अंधेरा चीरने वाला प्रकाश बताते हुए डॉ. राम अह्लाद चौधरी ने कहा कि ‘आज प्रतिकूल परिस्थितियों को अनुकूल बनाने की चुनौती साहित्यकारों के समक्ष है. भारतीय साहित्य में इतिहास, दर्शन और परंपरा का संगम होता है. लेकिन आज के साहित्य में यह संगम सिकुड़ता जा रहा है. समाकीलन साहित्य के सामने एक और खतरा है अभिव्यक्ति का खतरा. गंभीरता और जिम्मेदारी पर आज प्रश्न चिह्न लग रहा है क्योंकि सही मायने में साहित्य के अंतर्गत लोकतंत्र का विस्तार नहीं हो रहा है. हाशियाकृत समाजों को केंद्र में लाना भी आज के साहित्य के समक्ष चुनौती का कार्य है. आलोचना के अंतर्गत भी गुटबाजी चल रही है. आलोचना पद्धति के मानदंड को बदलना आवश्यक है. साहित्य का कारपोरेटीकरण हो रहा है. सौंदर्य और प्रेम साहित्य के बुनियाद हैं. साहित्य को प्रवृत्तिमूलक दृष्टिकोण से देखना अनुचित है. जब तक उसके स्रोत तक नहीं पहुँचेंगे तब तक सिर्फ प्रवृत्ति के आगे चक्कर लगाते ही रहेंगे. साहित्य हाथ छुड़ाने का काम नहीं बल्कि हाथ थामने का काम करता है. एक दूसरे को जोड़ने काम करता है.’ डॉ. ऋषभदेव शर्मा (हैदराबाद) ने कहा कि समकालीन कविता की चुनौतियों को यदि समझना हो तो पंकज राग की कविता ‘यह भूमंडल की रात है’ को देखा जा सकता है क्योंकि भूमंडलीकरण/ भूमंडीकरण आज की सबसे बड़ी चुनौती है. उन्होंने कहा कि ‘कविता के समक्ष कुछ शाश्वत चुनौतियाँ हैं – विषय चयन से लेकर भाषा, पठनीयता और संप्रेषण तक. कविता का धर्म मनुष्यता को बचाना है. व्यक्ति को जारूक बनाना है. कवि को अपने समय से दो चार होते हुए चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है. कविता को लोकमंगल, लोक रक्षण की भूमिका निभाने के लिए नए पैतरों को अपनाना होगा.’ उन्होंने इस बात को रेखांकित किया कि ‘आज के समय में पठनीयता की समस्या अर्थात संप्रेषण की समस्या है. यदि कवि लोक से जुड़ने की अपेक्षा लोकप्रियता से जुड़ जाय तो कविता में गंभीरता की क्षति होती है. समाज को टुकड़ों में बांटने वाली कविता नहीं चाहिए जबकि जोड़ने वाली कविता चाहिए. उपदेशों तथा निबंधों का अनुवाद कविता में नहीं करना चाहिए. जीवन की सच्ची अनुभूति की अभिव्यक्ति सरल शब्दों में होना नितांत आवश्यक है.’साहित्य को जीवन प्रतिक्रया मानते हुए डॉ. श्रीराम परिहार (खंडवा) ने कहा कि जीवन की जो भी चुनौतियाँ होंगी वे सभी कविता की चुनौतियाँ होंगी. जयशंकर प्रसाद ने भी कहा था कि काव्य जीवन की संकल्पनात्मक अभिव्यक्ति है. श्रीराम परिहार ने इस बात को रेखांकित किया कि भारत और विदेश में मूलभूत अंतर है. विदेश में संस्कृति, धर्म और दर्शन जीवन के हिस्से हैं. लेकिन भारत में धर्म व्यापक है. संस्कृति, समाज और दर्शन सभी धर्म के हिस्से हैं. जीवन में जो आचरण होता है वह कहीं न कहीं धर्म से जुड़ा हुआ होता है. अतः भारतीय साहित्य और कविता को इस दृष्टि से समझना अनिवार्य है.’ उन्होंने यह पीड़ा व्यक्त की कि हम ऐसे आलोचक पैदा नहीं कर पा रहे हैं जो साहित्य के सभी विधाओं को बराबर आदर दे सकें. उन्होंने इस बात को उदाहरणों से पुष्ट करते हुए कहा कि हमारे आलोचक एक रचना को सिर्फ एकांगी दृष्टि से आंकते रहते हैं. उसको समग्रता में नहीं देखते. बैंकों का राष्ट्रीयकरण, डंकल, पेटेंट आदि ने समाज में नवउदारवादी नीति को आगे बढ़ाया जिसके फलस्वरूप भूमंडलीकरण और बाजारवाद का प्रभाव बढ़ता गया. तीन ‘एम’ – ‘माइंड’, ‘मनी’ और ‘मसल’ पूरी तरह से सभी क्षेत्रों में हावी हो गए. साहित्य भी इनके प्रभाव से अछूता नहीं रहा. उन्होंने यह अपील की कि साहित्य को एकांगी दृष्टि से न देखें. उसको समग्रता में देखें और समझें.

 

  • संगोष्ठी के विभिन्न सत्रों में कविता, नाटक, उपन्यास और कहानी के समक्ष उपस्थित समकालीन चुनौतियों पर तो चर्चा हुई ही, एक सत्र में राम साहित्य की प्रासंगिकता पर भी विचार विमर्श हुआ जिससे यह बात उभरकर आई कि उत्तरआधुनिकता से आगे तरल आधुनिक होते जा रहे समकालीन विश्व में मनुष्यता, मानवीय संबंध और जीवन मूल्य खतरे में हैं और यह ख़तरा साम्राज्यवादी ताकतों तथा मुनाफाखोर बाजार से उपजी उपभोक्तावादी संस्कृति से है. इसका सामना करने के लिए रचनाकारों को यथार्थ का अंकन करने के साथ साथ मनुष्य और मनुष्य को जोड़ने वाले मूल्यों की स्थापना करने वाले साहित्य की रचना करनी होगी. यह बात भी उभरकर सामने आई कि रचनाकार जब तक अपने पाठक से सीधे संवाद स्थापित नहीं करेंगे और सामाजिक कार्यकर्ता की सक्रिय भूमिका में नहीं उभरेंगे तब तक साहित्य की प्रासंगिकता प्रश्नों के घेरे में रहेगी.
  • साहित्य की पठनीयता के संकट की चर्चा करते हुए डॉ. गुर्रमकोंडा नीरजा (हैदराबाद) ने कहा कि मुख्य चुनौती संप्रेषणीयता की चुनौती है. अर्थात काव्यभाषा की समस्या. जनभाषा का स्तर एक है तथा कविता की भाषा का स्तर एक. प्रायः यह माना जाता है कि साहित्यकार बनना हर किसी के बस की बात नहीं है. यह बात कवि और कविता पर भी लागू होती है. कविता लिखना हर किसी के लिए साध्य नहीं है. जिस तरह साहित्यकार को शब्द और भाषिक युक्तियों का चयन सतर्क होकर करना चाहिए उसी प्रकार कविता में भी शब्दों का सार्थक और सतर्क प्रयोग वांछित है. कवि को इस बात का ध्यान रखना आवश्यक है कि उसे किस शब्दावली और भाषा का चयन करना होगा.
  • समकालीन रचनाकार एक ऐसे वातावरण में जी रहा है जहाँ यथार्थ को समग्र रूप में देखने के बजाय टुकड़ों में देखने का प्रचलन है. युगों तक हाशिए पर रहने के लिए विवश विविध समुदाय आज अपनी अस्मिता को रेखांकित कर रहे हैं जिससे विविध विमर्श सामने आए हैं. इस संदर्भ में डॉ. प्रतिभा मुदलियार (मैसूर) ने कहा कि ‘समकालीन हिंदी कविता में मानवाधिकारों से वंचित वर्ग ने अपनी अस्मिता कायम करने के लिए अभिव्यक्ति का शस्त्र अपनाया. हिंदी दलित विमर्श ने एक मुकाम हासिल की है. निर्मला पुतुल, ओमप्रकाश वाल्मीकि, तुलसीराम आदि साहित्यकार अपनी रचनाओं के माध्यम से भोगे हुए यथार्थ को अभिव्यक्त किया है. उनकी रचनाओं में उनकी वैचारिकता को रेखांकित किया जा सकता है. ये रचनाएँ अस्तित्व की लड़ाई की रचनाएँ हैं, विद्रोह और संघर्ष की रचनाएँ हैं. इनमें पीड़ा का रस है. घृणा के स्थान पर प्रेम को स्थापित करना की मुहीम है.’
  • उद्घाटन भाषण में देवी नागरानी ने कहा कि उन्हें भारत और अमेरिका में कोई विशेष अंतर नहीं दीखता क्योंकि जब कोई भारत से विदेश में जाते हैं तो वे सभ्यता, संस्कृति और संस्कार को भी अपने साँसों में बसाकर ले जाते हैं. एक हिंदुस्तानी जहाँ जहाँ खड़ा होता है वहाँ वहाँ एक छोटा सा हिंदुस्तान बसता है. उन्होंने भाषा और संस्कृति के बीच निहित संबंध को रेखांकित करते हुए कहा कि विदेशों में तो ‘हाय, बाय और सी यू लेटर’ की संस्कृति है जबकि हमारे भारत में विनम्रता से अभिवादन करने का रिवाज है. लेकिन आजकल यहाँ कुछ तथाकथित लोग विदेशी संस्कृति को अपनाकर हमारी संस्कृति की उपेक्षा कर रहे हैं जबकि विदेशों में बसे प्रवासी भारतीय अपनी भाषा और संस्कृति को बचाए रखने के लिए पुरजोर कोशिश कर रहे हैं. विश्वा (सं. रमेश जोशी), सौरभ (सं. अखिल मिश्रा), अनुभूति एवं अभिव्यक्ति (सं. पूर्णिमा वर्मन) आदि अंतरराष्ट्रीय पत्रिकाएँ अंतर्जाल के माध्यम से हिंदी भाषा, साहित्य और संस्कृति को बचाए रखने में महती भूमिका निभा रही हैं. उन्होंने सबसे अपील की कि ‘हमें अपनी भाषा को, अपनी सभ्यता एवं संस्कृति को बचाए रखने के लिए कदम उठाना चाहिए चूँकि भाषा ही हमें विरासत में प्राप्त हुई है. अतः इसे सींचना और संजोना हमारा कर्तव्य है.’
  • पिछले डेढ़ सौ – दो सौ वर्षों में हमारे परिवेश और चिंतन में बड़े बदलाव आए हैं. वैज्ञानिक क्रांति के साथ आधुनिकता की आहटें सुनाई देने से लेकर उत्तरआधुनिकता और उससे जुड़े विमर्शों तक की इस यात्रा ने हमें आज जिस मुकाम पर ला खड़ा किया है वहाँ हम सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक, सांस्कृतिक और मनोवैज्ञानिक मोर्चों पर नई नई चुनौतियों का सामना कर रहे हैं. राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में देखें तो भी सब ओर काफी धुंधलका बरसता दिखाई देता है. इस धुंधलके में रचनाकार को अपनी राह तलाशने की बड़ी चुनौती का सामना है. समकाल की वे चुनौतियाँ उन स्थायी चुनौतियों के अतिरिक्त हैं जिनका सामना वस्तु, विचार, अभिव्यक्ति और शिल्प की खोज के स्तर पर किसी भी रचनाकार को करना होता है.
  • डॉ. गुर्रमकोंडा नीरजा (सह-संपादक ‘स्रवन्ति’)दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा, हैदराबाद – 50004
  • प्राध्यापक, उच्च शिक्षा और शोध संसथान,

साहित्य शिरोमणि सम्मान

0-31 आक्टोबर-2014, को कर्नाटक विश्वविद्यालय (धारवाड़), अयोध्या शोध संस्थान (अयोध्या) और साहित्यिक सांस्कृतिक शोध संस्था (उल्हासनगर) के संयुक्त तत्वावधान में धारवाड में ‘समकालीन हिंदी साहित्य की चुनौतियाँ’ विषयक द्विदिवसीय अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया. कार्यक्रम के आगाज में दीप प्रज्वलन व सरस्वती वंदना की परंपरा संगीत विभाग के विद्यर्थियों द्वारा निभाई गई। पुष्प गुच्छ से महानुभूतियों का स्वागत किया गया। उदघाटन भाषण में श्रीमती देवी नागरानी जी ने विदेश में हिन्दी के उज्वल भविष्य की दिशा में हो रहे प्रयासों का विवरण दिया जो संस्थागत, व्यक्तिगत रूप में हिन्दी को अंतरार्ष्ट्रीय मंच पर स्थापित करने की पहल कर रहे हैं। कर्नाटक विश्वविध्यालय, धारवाड़, ने श्रीमती देवी नागरानी को “साहित्य शिरोमणि सम्मान” से सम्मानित किया।

उद्घाटन सत्र की मुख्य अतिथि अमेरिका से पधारी देवी नागरानी थीं. विशिष्ट अतिथियों में डॉ. विनय कुमार (हिंदी विभागाध्यक्ष, गया कॉलेज), डॉ. योगेंद्र प्रताप सिंह (निदेशक, अयोध्या शोध संस्थान, अयोध्या), डॉ. प्रदीप कुमार सिंह (सचिव, साहित्यिक सांस्कृतिक शोध संस्था, उल्हासनगर), डॉ. राम आह्लाद चौधरी (पूर्व अध्यक्ष, हिंदी विभाग, कोलकाता), डॉ. प्रभा भट्ट (अध्यक्ष, हिंदी विभाग, कर्नाटक विश्वविद्यालय), डॉ. एस. के. पवार (कर्नाटक विश्वविद्यालय) और डॉ. बी. एम. मद्री (कर्नाटक विश्वविद्यालय) शामिल थे.

उद्घाटन भाषण में देवी नागरानी ने कहा कि उन्हें भारत और अमेरिका में कोई विशेष अंतर नहीं दीखता क्योंकि जब कोई भारत से विदेश में जाते हैं तो वे सभ्यता, संस्कृति और संस्कार को भी अपने साँसों में बसाकर ले जाते हैं. एक हिंदुस्तानी जहाँ जहाँ खड़ा होता है वहाँ वहाँ एक छोटा सा हिंदुस्तान बसता है. उन्होंने भाषा और संस्कृति के बीच निहित संबंध को रेखांकित करते हुए कहा कि विदेशों में तो ‘हाय, बाय और सी यू लेटर’ की संस्कृति है जबकि हमारे भारत में विनम्रता से अभिवादन करने का रिवाज है. लेकिन आजकल यहाँ कुछ तथाकथित लोग विदेशी संस्कृति को अपनाकर हमारी संस्कृति की उपेक्षा कर रहे हैं जबकि विदेशों में बसे प्रवासी भारतीय अपनी भाषा और संस्कृति को बचाए रखने के लिए पुरजोर कोशिश कर रहे हैं.

Kim addressing

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महत्वपूर्ण बात यह की संक्षिप्त समय में भी समकालीन साहित्य पर प्रपत्र पढे गए व आलेख एक संग्रह -“समकालीन हिन्दी साहित्य की चुनौतियाँ” के रूप में आया जिसका लोकार्पन पहले सत्र में हुआ। 432 पन्नों का यह संदर्भ ग्रंथ जिसमें 122 प्रपत्र एक तार में पिरोकर सँजोये गए हैं , यह एक उपलब्धि है जिसका श्रेय जाता है प्रधान संपादक-डॉ. प्रदीप कुमार सिह , डॉ. वियनी कुमार, डॉ. भगवती प्रसाद उपाध्याय, डॉ. एस. के. पवार, प्रो. प्रभा भट्ट- , प्रो. बी. एम. मद्री जी व समस्त संपादकीय मण्डल को !

अध्यक्ष प्रो. चंद्रमा कणगलि की उपस्थिती में बीज वक्तव्य श्री राम अल्हाद (कलकता) ने प्रस्तुत किया। मंच पर उपस्थित शिरोमणि रहे डॉ. योगेंद्रप्रताप सिंह (अयोध्या), डॉ. विनय कुमार (गया) , डॉ. प्रदीप कुमार, (मुंबई), डॉ. एस. के. पवार (धारवाड़), प्रो. प्रभा भट्ट- अध्यक्ष, हिन्दी विभाग, कर्नाटक विश्वविध्यालय, धारवाड़, प्रो. बी. एम. मद्री-निदेशक अंतराष्ट्रीय संगोष्ठी, कर्नाटक विश्वविध्यालय, धारवाड़, संचालन को बखूबी निभाया डॉ. भगवती प्रसाद उपाध्याय ने।

साहित्य को अंधेरा चीरने वाला प्रकाश बताते हुए डॉ. राम अह्लाद चौधरी ने कहा कि ‘आज प्रतिकूल परिस्थितियों को अनुकूल बनाने की चुनौती साहित्यकारों के समक्ष है. भारतीय साहित्य में इतिहास, दर्शन और परंपरा का संगम होता है. लेकिन आज के साहित्य में यह संगम सिकुड़ता जा रहा है. समाकीलन साहित्य के सामने एक और खतरा है अभिव्यक्ति का खतरा. गंभीरता और जिम्मेदारी पर आज प्रश्न चिह्न लग रहा है क्योंकि सही मायने में साहित्य के अंतर्गत लोकतंत्र का विस्तार नहीं हो रहा है. हाशियाकृत समाजों को केंद्र में लाना भी आज के साहित्य के समक्ष चुनौती का कार्य है.

इस दो दिवसीय संगोष्ठी में छः सत्रों के अंतर्गत समकालीन साहित्य पर प्रपत्र पढे गए व अध्यक्षीय भाषण के दौरान चर्चा भी हुई। विषय रहे –समकालीन हिन्दी कविता, राम कथा की प्रासंगिता,  समकालीन हिन्दी नाटक, समकालीन उपन्यास, समकालीन कहानी साहित्य, समकालीन हिन्दी उपन्यास साहित्य, समकालीन हिन्दी कहानी।

इन विषयों पर अध्यक्षता के अंतरगत प्रपत्रवाचक समस्त भारत से शामिल रहे- प्रमुख वक्ता,  श्री राम परिहार (खंडवा, म. प्र.), डॉ. प्रतिभा मुदलियार (मैसूर), डॉ. ऋषभदेव शर्मा (हैदराबाद), डॉ. कविता रेगे (मुंबई), डॉ. भारतसिंह (बिहार), डॉ. आर. एस. सरज्जू (हैदराबाद), डॉ. उमा हेगड़े (शिमोगा) डॉ. एम.एस. हुलगूर, डॉ. मधुकर पाडवी (गुजरात), डॉ. अनिल सिंध (मुंबई), डॉ. नारायण (तिरुपति), डॉ. रोहितश्व शर्मा(गोवा), डॉ. अर्जुन चौहान (कोल्हापुर), डॉ. उत्तम भाई पटेल (सूरत), डॉ. चंद्रशेखर रेड्डी (तिरुपति), डॉ. को. जो. किम (दक्षिण कोरिया), प्रो. परिमाला अंबेडकर (गुलबर्गा), डॉ. बी. बी. ख्रोत (धारवाड़), डॉ. बाबू जोसफ (कोटयम)॥

समापन समारोह के दौरान विद्वानों का सम्मान किया गया –डॉ  एस. एस. चुलकिमठ,  डॉ. देवी नागरानी,  डॉ. कविता रेगे, डॉ. को. जो. किम, डॉ. आर. टी. भट्ट, डॉ. टी. वी. कट्टीमनी, डॉ. सुमंगला मुमिगट्टी, एवं श्री परसमल जैन ! इस वैभवपूर्ण एवं विशाल समारोह की संपन्नता सदा नींव का निर्माण बन कर याद रहेगी। जयहिंद

 

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