हर दुआ हो गई बेअसर

गज़लः

बददुआओं का है ये असर
हर दुआ हो गई बेअसर.

ज़ख्म अब तक हरे है मिरे
सूख कर रह गए क्यों शजर.

यूं न उलझो किसी से यहां
फितरती शहर का है बशर.

राह तेरी मेरी एक थी
क्यों न बन पाया तू हमसफ़र.
वो मनाने तो आया मुझे
रूठ कर ख़ुद गया है मगर.

चाहती हूं मैं ‘देवी’ तुझे
सच कहूं किस क़दर टूटकर.

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2 टिप्पणियाँ

  1. फ़रवरी 11, 2013 at 6:10 अपराह्न

    अति सुंदर, बधाई

  2. anandjnv09 said,

    सितम्बर 8, 2014 at 3:57 अपराह्न

    khoobsuurat
    visit here plz
    http://www.anandkriti007.blogspot.com


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