कलम का सिपाही-श्री जीवतराम सेतपाल

यह जीवन एक सफ़र है, इस सिलसिले में क़लमकार भी एक सच्चा सिपाही होता है, जो मौत से जूझता तो है, पर मरता नहीं, बस शहीद हो जाता है! लहू से लिखी वीरता की कहानी

सुनाती सियाही क़लम की जुबानी…. स्वयं

 “श्री सेतपाल जी ज़िंदगी को बारीकी से पकड़ते हैं और उसे जीवंत बनाते है। इन लघुकथाओं में ज़िंदगी धड़कती है, ज़िंदगी रोती है, ज़िंदगी जीने के रास्ते निकालती है।“ यही सच है जिसका ज़िक्र छेड़ा है श्री कमल किशोर गोयनका ने, जिन्होने श्री सेतपाल जी के कथा-संग्रह ‘पोस्ट कार्ड’ में अपनी भूमिका में लिखा है, कि इस संग्रह की एक-एक कथा ज़िंदगी का एक चित्र है।“ सच भी है। अचानक ही हमारे बीच से, हमारे हाथों से ज़िंदगी खुद को रिहा कर जाती है … प्रियतम हे री रथ में आएंगे वे रथ में श्री सतपाल जी की यह रचना ‘कर्मनिष्ठा’ अक्तूबर 2008 के अंक में दस्तावेज़ बनकर दर्ज हुई। ऐसे जैसे एक पुकार अपने प्रियतम की विरह में, अधीर आत्मा के अधर से निकली हो। यह घटना कहूँ या दुर्घटना, पर है तो हमारे ही सफ़र की हमसफ़र हैं, 12 सितम्बर, 2008 में हुई और हर साल यादों से उसी दिन रक्स करती हुई आती है, रुलाती है और फिर नमी से भीगे पलकों में याद बन कर बस जाती है, सेतपाल जी ने अपने जीवन-काल में, हिन्दी व सिंधी साहित्य के साथ हर मुमकिन दशा और दिशा की ओर खूब काम किया है। प्रोत्साहन के सफ़ल सम्पादन के साथ-साथ वे पत्रकारिता के दाइरे में भी एक हस्ताक्षर रहे। समय के तनावों, समस्याओं अतः उनके समाधानों को सर्जनात्मक ढंग से एल क़लम के सिपाही की तरह अंजाम देते रहे और देश भर की अनेक साहित्यिक एवं संस्कृतिक संस्थाओं द्वारा प्रदान किए गए अलंकार से खुद को अलंकृत करते रहे, और सुसजित करते रहे अपने सार्थक साहित्य को!!

“पोस्ट कार्ड में समाया हुआ है सारा जीवन” अपनी समीक्षात्मक टिप्पणियों में श्री राकेश विक्रांत ने अपने शब्दों में सच को आईना दिखाते हुए कहा है “जीवतराम सेतपाल ऋषितुल्य साहित्यकार हैं, मुंबई महानगर में सक्रिय लेखकों में उनकी एक अलग पहचान है, वे किसी वा-विवाद गुट की बजाय साहित्य साधना में लीन रहते हैं।“ हाँ , यह एक साधना है, जिसे अपनी रचनधर्मिता से साहित्यकार सुधी ढंग से सजीव कर देते है, और सृजन के दौरान उस पात्र में ख़ुद भी इस तरह रम जाता है कि दोनों में कोई दूरी बाक़ी नहीं रहती। लिखना मात्र साधना बन जाता ! जो लफ़्ज़ों को सच की सियाही से लिख दे क़लम से भी होती है ऐसी इबादत … देवी उनके जीवन में कई पड़ाव आए गए, जिनसे उनके जीवन की अनेक गतिविधियां, कार्यक्षमताएँ बिलकुल पारदर्शी हो जाती है। प्रोत्साहन अंक ७१ में, प्रथम विश्व हिन्दी सम्मेलन की एक झलक को अपनी क़लम से साकार व सजीव रूप से प्रस्तुत करते हुए सेतपालजी ने गाड़ी के संदर्भ में लिखा – “आँखों के आईने से, वह जा रही है, बहुत दूर जा रही है, कमबख्त ने एक बार भी मुड़कर नहीं देखा और मैं उसे दूर दूर तक जाता हुआ देखता रहा। वह धीरे धीरे छोटे से धुंधले आकार में बदल गई। वह आँखों से ओझल हो गई और मेरा दिल अपने साथ ही लटकता चला।“ अजीब संदर्भ है, उनके जीवन की गाड़ी के संदर्भ में भी वही सत्य प्रताक्ष रूप से सामने आया, वह यकायक चलते चलते रुक गई।

ज़िंदगी एक आह होती है
मौत जिसकी पनाह होती है

साहित्य, शिक्षा, गीत व कला का एक संगम श्री सेतपालजी, अपने आप में एक सम्पूर्ण विद्यालय रहे, जिनकी आधार शिला पर खड़ा रहा “प्रोत्साहन” जो प्रकाशन के 39 वें वर्ष को पूर्णता हासिल करते हुए हिन्दी और सिंधी भाषा को राह दिखाता आगे बढ़ता रहा। इस पत्रिका के ७० वें अंक का विमोचन एवं लोकार्पण कार्यक्रम मुंबई के सुप्रतिष्ठित हिन्दी दैनिक –हमारा महानगर’ के कार्यालय में सम्पन्न हुआ, इसी अवसर पर संपादक श्री द्विजेंद्र तिवारी ने अपने वक्तव्य में कहा “यह प्रसन्नता कई बात है कि आज प्रोत्साहन के 70 वें अंक का विमोचन मेरे हाथों हो रहा है, प्रकाशन के 39 वर्ष, किसी भी पत्रिका के लिए गौरव की बात है। आजकल जहां प्रतिदिन पत्र-पत्रिकाएँ बंद होती जा रहीं हैं, या उनके पन्ने कम होते जा रहे हैं, कई दैनिक-पत्रों में भी साहित्यिक पृष्ठ बंद कर दिये गए हैं, वहाँ ‘प्रोत्साहन’ जैसी साहित्यक पत्रिका का प्रकाशन करना बड़ा जीवट का काम है, जिसे जीवतराम जी ने अपने नाम को सार्थक करते हुए ‘प्रोत्साहन’ को जीवित रखकर नवोदितों को भी मंच प्रदान किया है । जीवतराम जी साधुवाद के पात्र हैं, मैं उन्हें अभिनंदन करता हूँ। “ मेरा यह पहला अवसर था उसे मिलने का और पत्रिका से भी रू-ब-रू होने का । फिर अनेक मुलाकातें होती रहीं, और उनकी पत्रिका में भी मेरी रचनाएँ छपती रहीं। साहित्य के संसार के एक प्रखर साधक और क़लम के इस सिपाही को मेरी श्रद्धांजली। जयहिंद
देवी नागरानी

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