तेरहवीं का चाँद

On 13 June  2012 for the first time I was called to attend the kavya Goshtee with an awsome name “terhavin ka chand”. organised by Jhankaar w   !!ho herself is write and more so the known qualities of an administrator. she conducts them in various places. it is an open air platform for the new and the matured–as well said New Rhyme in an Old Bottle..Founder, Organisor Jhankaar Goel, recitation: Devi nangrani

I have no words but to thank Jhankaar who spreads the sinshine with her greaceful smile to make the atmoshphere pleasant and more glorius

Devi Nangrani

गुजरात विध्यापीठ अहमदाबाद

भारतीय भाषा संस्कृति संस्थान–गुजरात विध्यापीठ अहमदाबाद में देवी नागरानी का काव्य पाठ:

 

(संस्थान के निर्देशक श्री के॰ के॰ भास्करन, प्रोफेसर निसार अंसारी (Urdu Dept), मुख्य मेहमान देवी नागरानी, डॉ॰ अंजना संधीर)

दिनाक 18 जून, 2012 की शाम, भाषा संस्कृति संस्थान –गुजरात विध्यापीठ अहमदाबाद संस्थान के प्रांगण में एक काव्य गोष्टी का आयोजन सफलता पूर्ण सम्पन्न हुई। संस्थान के निर्देशक श्री के॰ के॰ भास्करन, प्रोफेसर निसार अंसारी (Urdu Dept), मुख्य मेहमान देवी नागरानी, डॉ॰ अंजना संधीर, व वरिष्ठ लेखिका डॉ॰ इन्दिरा दीवान ने दीप प्रज्वलन किया॰ Asmitha ki sarankshak Neelam kushresht, saathi mahilayein  रजनी मोरवाल जी ने सरस्वती वंदना की, जिसके सुरों ने सभी को मुग्ध कर दिया। विध्यापीठ की परंपरा के अनुसार डॉ॰ अंजना संधीर ने ‘सुत्र की माला” से देवी जी का स्वागत किया। सभी साहित्यकारों की तरफ से श्री के॰ के॰ भास्करन, प्रोफेसर निसार अंसारी ने उनका सुमन, शाल से सन्मान किया।KK Bhaskaran, nangrani, Anjana Sandhir, Indira Deewaan

शहर की महिलाओं की संस्था ‘अस्मिता’ की मुख्य कार्य सूत्रधार डॉ॰ नीलम कुलश्रेष्ठ, तथा सहयोगी महिलाओं ने फूलों से देवी नागरानी का स्वागत किया।  ‘अनाश education Trust’ की ओर से डॉ॰ इन्दिरा दीवान ने पुष्प गुच्छ देकर देवी नागरानी का सन्मान किया। इस पूरे कार्यक्रम का सफल संचालन, हिन्दी और इंग्लिश विभाग की प्रोफेसर डॉ॰ अंजना संधीर ने किया॰

फिर सुरमई शाम अपने शबाब पर आई जिसमें गीत ग़ज़ल, दोहे, हाइकु का मुसलसल पाठ हुआ, जिसका आगाज देवी जी ने अपनी दो सुरमई ग़ज़लें पेश करते हुए किया , और सिलसिले का सिरा थामा डॉ॰ इन्दिरा दीवान ने अपनी इस रचना के साथ—“मौत हो जाएगी विधवा, जिस दिन मैं मर जाऊँगी, तेरे लिए ऐ ज़िंदगी कुछ कर जाऊंगी ” जानकी पालीवाल ने अपनी कविता “आंसुओं का हार पिरोती” नामक कविता पढ़ी जो ज़िंदगी की सच्चइयों से भरपूर थी। डॉ॰ सुधा श्रीवास्तव ने ‘फोन पर व्यस्तता से मुतालिक एक कविता का पाठ किया। श्री आत्मप्रकाश जी ने एक ग़ज़ल सुनाई जिसका मतला रहा—

“ आदमी जब भी खुदा के घर गया / देखकर उसको खुदा के घर गया/ “

अर्पणा भटनागर ने अपनी डायरी  से सुनाई ‘फरजानियां तो आगे बढ़ गईं ‘

श्री सेवाराम प्रत्युष ने पढ़ा “अँधेरों में चाहे में ज़िंदगी है/ उजालों के सपने मगर देखता हूँ/”

ज्योत्सना पांडे ने ‘ईर्षा के जीवाणूँ ’ महाभारत का मुंह चिढ़ाता इतिहास… “ नामका सशक्त रचना पढ़ी। गुजरात के गीतकार डॉ॰ द्वारका प्रसार ‘सांचीहर’ ने अपने लोकप्रिय गीत का पाठ किया-“ ज़िंदगी न सुबह है न शाम है/ ज़िंदगी तो बहता हुआ जाम है।“  जानकी पालीवाल ने ‘कविता’ नमक एक रचना का पाठ किया। डॉ॰ प्रणव भारती ने-‘रंग में न भंग डाल …’ को प्रस्तुत किया। रजनी मोरवाल ने‘ आदमी से अब मदारी हो रहा है आदमी’ नमक कविता का पाठ किया। संतोष लंगर सुहास ने “रोटियाँ नामक कविता पढ़ी। रमेश चंद शर्मा ने चंद हाइकु पेश किए, दया ललचनदानी ने ‘अब मिलेगा न कोई सच सुनने वाला, ग़ज़ल पेश की, डॉ॰ निसार अंसारी ने अपने चुनिन्दा शेर सुनाकर उपस्थित श्रोताओं से दाद पायी– ‘दिया जलाने की रस्म बहुत पुरानी है/ हमारे शहर में इंसान जलाए जाते हैं’ एक मार्मिक दृश्य आँखों के आगे रक्स करता रहा। दर्द शब्दों में तड़पता हुआ दिखयी देता है।  डॉ॰ अंजाना संधीर ने अपनी ग़ज़ल -“ होंठ चुप है, निगाह बोले है/ आँख सब दिल के राज़ खोले हैं’ सुनकर सभी को मोह लिया।

महफिल में पधारे सिन्धी के वरिष्ठ साहित्यकार डॉ॰ हूंदराज बलवानी जी और ग़जलकार श्री भगवानदास जैन भी पधरे । जिनकी बानगी रही- दिखने जख्म हम दिल के बाज़ार निकले हैं/ ज़माना कहे कुछ तो दीवानावार निकले हैं।

देवी नागरानी जी ने अंतिम ग़ज़ल से कार्यक्रम को सम्पन्न किया “बादे-सहर वतन की चन्दन सी आ रही है/ यादों के पालने में मुझको झूला रही है’ 

      उपस्थित श्रोताओं में शामिल रहे निशा चन्द्र, आर॰ सी॰ शर्मा, अपूर्ण मनोज,  हिन्दी और उर्दू के शागिर्द। डॉ॰ अंजाना संधीर ने आए सभी मेहमानों व रचनाकारों का धन्यवाद करते हुए कार्यक्रम को सम्पन्न किया। जयहिंद

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