देस-परदेस

पहचानता है यारो हमको जहाँ सारा
हिन्दोस्ताँ के हम है हिन्दोस्ताँ हमारा

कहने सुनने की बात नहीं महसूस करने की बात है, अपनाने की बात है. मान्यता रिश्तों की होती है, उनके निबाह से होती है, पर अगर परिस्थितियाँ आदमी को दो रहे पर खड़ा कर दे तो तर्क-वितर्क का कोई अंत नहीं. अपनी मिटटी से जुड़े, पनपे, फले-फूले और फिर अचानक वक्त ने करवट बदली और स्थान की, परिवेश की, संस्कारों की अदली-बदली सी हो गई.
सच ही तो है! भारत में बसे बसाए घरों को छोड़ कर नई पीड़ी के पीछे यहाँ आते-जाते, कभी तो यहीं बस जाने का निर्णय लेना पड़ता है. अमेरिका के परिवेश में रहकर, यहाँ के रहन-सहन,पहनावे को अपनाना पड़ता है. काम पर जाने के लिए जो अंग्रेजों की रिवायत है -चाल-चलन, उठन-बैठन,बातचीत, उनकी भाषा, उनकी शैली को अपनाना अनिवार्य हो जाता है. और जब काम से लौटकर घर आते हैं तो वापस अपनी निजी घरेलू व्यवस्था के साथ तालमेल रखना पड़ता है. अतः दोनों परिवेशों में संतुलन बनाये रखने का सिर्फ प्रयास ही नहीं गूढ़ परिश्रम भी करना पढता है.
इस कशमकश से गुज़रना पड़ता है हर एक गृह्निनी को, एक माँ को जो अपने बच्चों में भारतीयता के विचार कूट कूट कर भरने के प्रयास में कहीं सफल होती दिखाई देती है तो कहीं लगता है बढ़ती उम्र के बच्चों के साथ तालमेल बनाये रखने के संघर्ष में उसके हाथ से भारतीय संस्कारों व् संस्कारों का छोर छूटता चला जाता है.
इसी पेचीदा दौर से एक लेखक को भी गुज़रना पड़ता है जो साहित्य की भातीय शैली में इस नए परवेश को, अपनी सोच विचार की धारा में लाता है. यहाँ के वातावरण के कई नए नवनीतम अक्स है जो कुछ नया लिखने पर मजबूर करते है. भाषा वही, शैली वही पर विचारों में समय की बहती धरा के साथ हलचल मचाते कुछ नए कोण हाइल हो जाते हैं, जो पुरानी सोच के साथ तालमेल नहीं खाते. आज़ादियाँ पाबंदियों के दायरे तोड़कर खुले आस्मां की ओर उड़ी जा रही है. आदमी और औरत में भी कोई ज़ियादा फर्क नहीं रहा है-दोनों कम करते हैं, दोनों कमाते हैं, और दोनों सतर्क भी रहते हैं की एक दुसरे की परिधि में दखल न दे, इसी भय से की कल कहीं तकरार की दिशायें न बदल दे. ज़माने की कशमकश में यह सब देख जाता है. मनमानियां अपने पांव पुख्तगी से हर क्षेत्र में रखती चली आ रही है.
यही सोच कुछ नया लिखने के लिए संचारित करती है. परिवारों के पारस्परिक संबंध, उनके मसाइले, उनकी दुश्वारियां, सोच का ढंग, चलन के तेवर, लिखने के लिए विषय वास्तु बन जाते हैं. यहाँ की युवा पीढ़ी का बेलगाम चलन, आजादियों की परिधियों को पार करके नयी विडम्बनाओं के गर्क में धंसता जा रहा है बहुत कुछ और लेखक को अपने आस पास के माहौल में, अपने अंदर और बहार की दुनियां में जो तब्दीलियाँ महसूस करता है, उस दयिरे में जीता है, जीकर भोगता है उसे ही कभी लघुकथा, कभी कहानी या कभी उपन्यास की विषय वस्तु बना लेता है. और ऐसा हो भी क्यों न ? जो हम देखते हैं, जहाँ विचरते हैं, जो जीते है, वही तो काल्पनिक उड़ान वक़्त के यथार्थ के साथ तालमेल खाती है.
शायद यहीं आकर लेखक को इस परिवेश और भारत के परिवेश के बीच में तुलनात्मक संधि दिखाई देती है- समानताएं और असमानताएं जो वह अपनी रचनात्मक सृष्टि में पेश करता है. संतुलन बनाये रखने के कोशिश में उसके मन में अनेकों भाव उठते हैं, कहीं कहीं भावनाओं में भय भी प्रवेश पा लेता है की आगे क्या होगा? इस नए माहौल में जो बीज बोये जा रहे हैं उनसे अंकुरित पौधे कैसे होंगे? आने वाली पीढ़ी का नया निर्माण क्या रंग लायेगा? क्या भारतीय संस्कृति जिसका हम दावा करते हैं, बस बेहाल होकर देखती रह जाएगी नयी और पुराणी पीढ़ियों की दरपेश?

पिछले चालीस वर्षों में आकर बसे भारतीय परिवारों के घर बंट गए हैं, नयी पीढ़ी पूर्ण रूप से अमेरिकन संस्कृति में रंग चुकी है, बच्चे शादी से पहले ही अपने अपने घर अलग बसा लेते हैं. अक्सर अपना जीवन साथी खुद पसंद करते हैं. मतलब कई बातों की आज़ादी लेकर पुरानी पीढ़ी के हाथों से बागडोर छीन ली है. सेल्फ- सप्पोर्ट में समक्ष होने के कारन ये हक अपने हाथ में लेने में उन्हें कोई दिक्क़त नहीं होती. ऐसे परिवेश में तब्दीलियाँ आये पल आँखों के सामने रक्स करती हैं. इसी धरातल पर खड़ा होकर एल रचनात्मक मन शब्दों के जाल बुनकर अपने मन की पीढाओं को अभिव्यक्त करता है. लिखता वह अपने देश की भाषा हिंदी में है, पर साहित्य वह प्रवासी बन जाता है!
साहित्य कोई भी हो, कहीं भी रचा गया हो, वो हिंदी भाषा का साहित्य ही है. जैसे देस से आकर हिन्दोस्तानी यहाँ परदेसी हो गया है, संभवतः उनके साथ साहित्य भी प्रवासी हो गया है. जिस तरह मन की पीढ़ा का, उसकी बेचैनी का, परिस्थितिओं से उसका जूझना किसी जात या वर्ण की और इशारा नहीं करता, तो उन जज्बों को अभिव्यक्त करने वाली भाषा क्यों विविधता में आ जाती है? वैसे भी साहित्य की कोई जात पात नहीं होती चाहे वह हिंदी में हो या तेलुगु में, मराठी में हो या सिन्धी में, उसका होना तब तक सार्थक है जब तक उस भाषा को जानने वाले लोग उसको पढ़ पाते हैं. महत्त्व साहित्य का है, वो कहाँ रचा गया है, इतना महत्वपूर्ण नहीं है. हाँ! स्तर की बात और है जो यहाँ देस में भी लागू है और परदेस में भी. और अब तो सभी सीमाओं को पार करके अनुवादित किया हुआ हर भाषा का साहित्य पठनीय हो रहा है, क्या हवाओं को क़ैद किया जा सकता है? या उनकी खुशबू को किसी परिधि में बंधा जा सकता है?
यहाँ अमरीका में बैठे स्थायी भारतीय लोगों को अपने घर में, अपने परिवार के परिवेश में वही सब कुछ हासिल होता है, जो भारत के किसी घर में उपलब्ध होता है. अब इन परिधियों की कौन बैठकर गिनती करे और यह तय करें कि कौन सा देस है और कौन सा परदेस?

देवी नागरानी
न्यू जर्सी, यू. एस. ए.
dnangrani@gmail.com

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जाने-जहाँ हमारा

ग़ज़लः
वो ही चला मिटाने नामो-निशाँ हमारा
जो आज तक रहा था जाने-जहाँ हमारा

दुशमन से जा मिला है अब बागबाँ हमारा
सैयाद बन गया है लो राज़दाँ हमारा

ज़ालिम के ज़ुल्म का भी किससे गिला करें हम
कोई तो एक आकर सुनता बयाँ हमारा

हर बार क्यों नज़र है बर्क़े-तपाँ की उसपर
हर बार है निशाना क्यों आशियाँ हमारा

दुश्मन का भी भरोसा जिसने कभी न तोड़ा
बस उस यकीं पे चलता है कारवाँ हमारा

बहरों की महफ़िलों में हम चीख़ कर करें क्या
चिल्लाना-चीख़ना सब है रायगाँ हमारा

परकैंच वो परिंदे हसरत से कह रहे हैं
‘देवी’ नहीं रहा अब ये आसमां हमारा

चहरा छुपाए बैठे हैं

ग़ज़लः
वो फ़स्ले-गुल की उमीदें लगाए बैठे हैं
जो अपने ज़हन में सहरा तपाए बैठे हैं

ज़रूरत उनको अब है आइना दिखाने की
वतन-फ़रोश जो चहरा छुपाए बैठे हैं

छिपा के हाल जो अपना हमारा पूछा किये
उन्हीं को ज़ख़्म हम अपने दिखाए बैठे हैं

लगेगी देर न उसको शोला बनने में
दबी-सी आग जो दिल में छिपाए बैठे हैं

ये जानते हुए है ज़िंदगी बड़ी ज़ालिम
उसी को दिल से हम अपने लगाए बैठे हैं

ज़मीं पे पांव कभी जिनके टिक नहीं पाते
वो आसमान को सर पर उठाए बैठे हैं

उदास बैठे हुए हैं किसी की राह में हम
दिया इक आस का ‘देवी’ जलाए बैठे हैं

देवी नागरानी

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