है हमसफ़र ग़रीब मेरा, बेवफ़ा नहीं

गज़लः

मिट्टी का मेरा घर अभी पूरा बना नहीं
है हमसफ़र ग़रीब मेरा, बेवफ़ा नहीं.

माना कि मेरे दिल में ज़रा भी दया नहीं
फिर भी किसी के बारे में कुछ भी कहा नहीं.

आंगन में बीज बोए कल, अब पेड़ हैं उगे
हैरत है शाख़ पर कोई पत्ता हरा नहीं.

विशवास कर सको तो करो, वर्ना छोड़ दो
इस दम समय बुरा है मेरा, मैं बुरा नहीं.

अच्छी बुरी हैं फितरतें, टकराव लाज़मी
शतरंज का हूं मोहरा मैं फिर भी चला नहीं.

रस्मों के रिश्ते और हैं, जज़बात के हैं और
मैंने ज़बां से नाम किसी का लिया नहीं.

शादाब इसलिये भी है दिल की मेरी ज़मीं
क्योंकि मेरा ज़मीर है जिंदा, मरा नहीं.

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4 टिप्पणियाँ

  1. अगस्त 27, 2011 at 7:13 पूर्वाह्न

    क्योंकि मेरा ज़मीर है जिंदा, मरा नहीं.
    क्या बात है, लाजवाब

  2. dasjanpad said,

    सितम्बर 5, 2011 at 6:53 पूर्वाह्न

    shaandaar

  3. sandeep said,

    अक्टूबर 14, 2011 at 11:35 पूर्वाह्न

    your piom is very very nice

    sandeep bhiwani haryana

  4. v.p.singh said,

    दिसम्बर 14, 2011 at 8:25 पूर्वाह्न

    N.Delhi
    Dear,Ms.Indu Ravi Singh
    Greetings
    This is very pathetic Gazle rely touch my heart and every readers.
    Lot of thanks
    V.P.Singh
    M.09971224023


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