प्रवासी साहित्य

भारतीय पत्रिकाओं और समीक्षा में प्रवासी साहित्य/साहित्यकारों का प्रतिनिधित्व और मूल्यांकन
भाषा हमारे और आपके विचारों का माध्यम है। हिंदी को राष्ट्रीय भाषा से अंतराष्ट्रीय भाषा के मंच पर स्थापित करने के लिये हिंदी के साहित्य को संगठित होना पड़ेगा, इसमें कोई दो राय नहीं है. बाल गंगाधर तिलक ने कहा है “देश की अखंडता-आज़ादी के लिए हिंदी पुल है” अगर ऐसा है तो अब हमारी राष्ट्रभाषा देश-विदेश में रचे जा रहे साहित्य को जोड़ने का काम करेगी. हिंदी लेखकों ने कर्मभूमि बदली है पर अपने देश की भाषा, संस्कार एवं संस्क्रुति अपने साथ लाए हैं, जो उनकी विरासत है.
अपनी साहित्य की रचनात्मक दुनिया में कई संस्थानों से जुड़े रहकर विदेश में हिंदी सेवक, हिन्दी भाषा के प्रचार-प्रसार को नियमित रूप से आगे बढ़ा रहे हैं. अब उनकी बातचीत साहित्य की चौखट पार करती हुई सवालों के दरमियान मुड़ी है प्रवासी साहित्य के भविष्य की ओर. प्रवासी साहित्य की इस नई प्रवृत्ति की ओर ध्यान नहीं दिया गया है और उपेक्षा-भाव रखा जा रहा है, इस सिलसिले में कुछ मान्यताएँ, कुछ शंकायें, कुछ समाधान भी सामने आ रहे है.
गुफ़्तगू की धारा में आते-जाते हिन्दी भाषा को लेकर जो साहित्य का सफ़र है इसी की राह की विडंबनाएँ, अड़चनाएँ, उपेक्षाएँ पढ़ते हुये जहाँ हैरानी होती है, वहीं ख़ुशी भी होती है. हैरानी यह जानकर कि साहित्य का मूल्याँकन करने वाले अपनी विचारधारा, अपनी सोच से समीक्षात्मक टिप्पणियों से यह जतलाते हैं कि प्रवासी साहित्य तो साहित्य ही नहीं है और अगर है तो वह आधुनिकता से शून्य है। ख़ुशी इस सोच की प्रस्तुति से होती है कि जाने माने वरिष्ट साहित्यकार प्रवासी पुस्तको की प्रष्ठ भुमिकाओं में अपनी विचारधाराओं से स्पष्टीकरण करते हैं कि हिन्दी का प्रवासी साहित्य हिन्दी का ही साहित्य है, जो परदेश में रचा गया है, औेर जो हिन्दी साहित्य को अपनी मौलिकता एवं नये साहित्य संसार से समृध्द करता है। इस प्रवासी साहित्य की बुनियाद भारत-प्रेम तथा स्वदेश-परदेश के द्वन्द्व पर टिकी है.
महात्मा गाँधी ने विश्वग्राम का जो सपना देखते हुये कहा था- ”मैं नहीं चाहता कि मेरा घर चारों ओर दीवारों से घिरा रहे। न मैं अपनी खिड़कियों को ही कसकर बंद रखना चाहता हूँ। मैं तो सभी देशों की संस्कृति का अपने घर में बेरोक-टोक संचार चाहता हूँ।”  आज विज्ञान के प्रसारित ज्ञान के एवज़ में इंटरनेट के द्वारा विश्व जुड़ता हुआ नज़र आता है, अपनी सारी भौगोलिक सीमाएँ तोड़कर एक ‘विश्वग्राम’ को साकार स्वरूप देकर।
वैश्विकता की पुरज़ोर वकालत के बाद भी प्रवासी साहित्य आमधारा की साहित्यिक पत्रिकाओं में जगह पा सकता है या नहीं यह निर्णय करना सरल तो नहीं पर नामुमकिन भी नहीं. उसका आधार लेखक के साहित्यिक सफ़र, उसकी रच्नात्मक ऊर्जा , उसकी गहराई और गीराई पर निर्भर है, जहाँ लेखक ख़ुद को अनुकूल परिस्थितियों, व उनके साथ जुड़ी हुई हक़िकतों को ईमानदारी के साथ अभिव्यक्त करता है, नि्वाह करता है और निबाह करता है.
देवी नागरानी
न्यू जर्सी, यू एस. ए

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