जो कहूँगा सच कहूँगा

डंके की चोट पर सच का ऐलान करती हुई कृति “जो कहूँगा सच कहूँगा”

क़लम अंतरमन की खामोशियों की जुबान है. मन के अथाह सागर में जब सोच की लहरें तहलका मचाती हैं, तो उस शोर की रवानी शेरों में आकार पाने लगती है. लेखन कला एक सफ़र है, जिसकी मंजिल शायद नहीं होती. ता-उम्र सहरा की मृगतृष्णा में लिखते रहना और ज़ियादा लिखने की प्रेरणा के साथ.

क़लम के सिपाही श्री महेश अग्रवाल डंके की चोट पर सच कहने की तौफ़ीक रखते हुए अपने  रचनात्मक आसमान की ओर उड़ते हुए सोच के परिंदों को नया क्षितिज प्रदान करते हैं. उनकी लेखन कला अपने आप में एक सम्पूर्ण परिचय है. “जो कहूँगा सच कहूँगा” में उनकी क़लम  के तेवर अपने तीखेपन के साथ ज़ाहिर हो रहे हैं. देखिये यह बानगी……

कौन सुनता है यहाँ मज़लूम की चीखें

कुर्सियों पर दोस्तों केवल शिलाएं हैं

 

जंगलों में यार आदमख़ोर मत ढूंढो

बस्तियों में आजकल उनकी गुफाएं हैं

काव्यात्मक संसार का विस्तार उनके जीवन के जिए हुए उन अनेक पलों को समेट लेते हैं, जिसमें शामिल रहती है मध्य-वर्गीय मनुष्य की पीड़ा ,   न्याय अन्याय की बदलती परिस्थितियाँ, प्रशासन की जर्जर अवस्था एवं कानून की जटिलता. न्याय व्यवस्था पर कटाक्ष करती हुई उनकी पैनी क़लम के आइये प्रहार पढ़ें—

बिक जाते हैं लोग यहाँ आसानी से

कोठे जैसे लगते थाने वर्षों से

जुर्म, सियासत दोनों मिलकर एक हुए

दोनों के अच्छे याराने वर्षों से

जहाँ शीशमहल के रहने वाले पत्थर से प्रहार करने को हर पल तैयार रहते हैं, जहाँ अदालतें झूठ को पनाह देती है , जहाँ इन्सान इंसानियत का गला घोंटने पर आमद है वहीँ श्री महेश अग्रवाल जी की शायरी हमारी सोच को संचारित करके, बहुत कुछ सोचने के लिए इस कशमकश के दौर में अपने आपसे बाहर आकर अपने आसपास के संघर्षमय जीवन के साथ संधि करना कोई आसान काम नहीं, जहाँ अपने आप से जूझकर-हारकर अनेकों बार ज़मीरों से सुलह करनी पड़ती  है. उसी बेदार्गी से जागृत करती हुई उनकी इस बानगी से चलो रू-ब-रू होते हैं……

हार किसकी और किसकी है फ़तह कुछ सोचिये

जंग है ज्यादा ज़रूरी या सुलह, कुछ सोचिये

मौन है इन्सानियत के क़त्ल पर इन्साफ़ घर

अब कहाँ होगी भला उस पर जिरह, कुछ सोचिये

दे न पाए रोटियाँ, बारूद पर खर्चा करें

या खुदा अब बंद हो ऐसी कलह, कुछ सोचिये

संवेदना धारावाहिक रूप से शब्द-सरिता की तरह प्रवाहित होती जा रही है. महेश जी की रचनाएँ रोज़मर्रा ज़िन्दगी के ताने-बनों से बुनी हुई है. प्रतिभाशाली काव्यात्मक रचना एक संवेदनशील ह्रदय की उपज होती है, जिसमें शामिल है संसार में जिया गया अनुभव, साफ़-सुथरी बोलचाल की भाषा में बात कहने की निपुणता. भवन के अंदर की भव्यता बाहर से दिखाई देती है, जहाँ करीने से सजाई ईंट पर ईंट अपने आप में कुशलता का प्रमाण है. ग़ज़ल लिखने के लिए जो प्रमुखता है वह शब्दों की सजावट और बुनावट से महसूस की जा सकती है. आइये उनकी बानगी की गहराई और गीरआई को महसूस करें—

लोग उगाएं पहले खुशियों का सूरज

फिर लिखें खुशहाल इबारत दुनिया की

मुफ़लिसी दुल्हन न बन पाई कभी

यूं कई सत्तास्वयंवर हो गए

कविता का सूत्र उसकी लघुता में होता है.  सोच की संकरी गली से अहसासों की धड़कनों को शब्द बद्ध करना सागर में गागर समोहित करने का प्रयास श्री महेश जी ने खूब निभाया है. ग़ुरबत की बेबसी और छटपटाहट शब्दों से झलकती हुई दिखाई पड़ रही है. जीवन जीना अपने आप में एक बड़ी कसौटी बनता जा रहा है और उस कसौटी पर पूरा उतरना मुश्किल ज़रूर है, पर असंभव नहीं, मनोबल में अजमिय संचार की ज़रुरत पड़ती है. श्री महेश जी की ग़ज़लें आत्मीयता से गुफ़्तगू करती हुई मानवता के मर्म को छू जाती है. सहज-सरल भाषा में वो कहीं भटके हुए पथिक का मार्गदर्शक बनती है, तो कहीं अविश्वास में विश्वास की स्फूर्ति दर्शाती है. उनकी इस भावना प्रधान अभिव्यक्ति की सच्चाई से आइये परिचित होते है:

रोज़ सपनों की भले ही मौत हो पर

कोशिशों के घर कभी मातम न हो

हक़ ज़बरदस्ती अगर छीना गया हक़दार का

हम क़लम से काम लेंगे दोस्तो तलवार का

सोच भी ठिठक कर कहीं-कहीं सोचने पर आमद हो जाती है. समकालीन  हिंदी ग़ज़ल अपनी संवेदना और शिल्प की चादर ओढ़कर हमसे रू -बी-रू होती है, गुफ़्तार करती है, अपने हर तेवर, हर आक्रोश को अपने सीने में दबाये रखने के बजाय, दबी आग को उगलते हुए आम आदमी की ज़िन्दगी की समस्याओं से खुद को जोड़ती है—

हर तरफ की आंच में सिकते रहे है हम यहाँ १२२

और हम हिमखंड जैसे ही गले हैं दोस्तों

सभ्यता, नेकी, शराफ़तख़ूब रोई है यहाँ

जब कभी भी इन सलीबों पर चढ़ा है आदमी

एक न ख़त्म होने वाले द्वंद्व की तरह अंतरमन में प्रसव-पीड़ा की तरह अंगडाइयां लेता हुआ दर्द जो भोग गया है, सहा गया है, उसकी कटुता,  अलगाव, घुटन प्रदूषित करती ज़हरीली हवाओं की पुरसर झलकी आज के परिवेश में देखी जा रही है और वही इंसान को दुःख की घुटन में जकड़ लेने में सक्षम है. महेश जी की क़लम ने इन सूक्ष्म पहलुओं पर बखूबी शब्दों से निबाह और निर्वाह करते हुए कहा है—

ाव डूबी है यकीनन साहिलों के पास ही

किन्तु साबित कर रहे हैं जुर्म हम मंझधार का

रिश्ते की महत्वता मान्यता से होती है. जहाँ घर है वहीँ रिश्ते बुने जाते है पसीने के तिनकों से, अहसासों के तिनकों से, तब कहीं जाकर वह अपनाइयत की चादर हमें महफूज़ रख पाती है,  हर उस दुःख की धूप से, खौफ़ की परछाइयों से,  दिन के उजाले के घने कोहरे से. जी हाँ! वह है माँ की ममता की छांव जो बरगद का शजर बनकर हर आंच से बचाती है. इसी भाव को शब्द-शिल्पी की नागीनेदारी भावों को ‘सीप में पले मोती” उस मानिंद प्रस्तुत कर पाने में कामयाब रही है इस बानगी में—

प्यार की बाराखड़ी सब लोग बाचेंगे

फूल पर उड़ती हुई कुछ तितिलियाँ तो हो

और अतृप्त मन में तृप्ति प्रदान करती हुई यह पंक्तियाँ एक सचाई है जिसको न किसी ज़मीन की ज़रुरत है, न किसी न्यायाधीश की, न किसी अदालत की. एक मात्र सच जो ज़िन्दगी की नींव भी है और प्रेणादायक स्तोत्र भी , जो यहाँ शब्दों के माध्यम हमारा मार्गदर्शक बन रहा है—

हमें वह पालती है पोसती है दर्द-सह्सह्कर

हमारी ज़िन्दगी को सींचने वाली नहर है माँ

शब्दों की सक्षमता का प्रमाण यह ग़ज़ल-संग्रह अपनी विशालता से मनोभावों को,  उद्गारों को व्यक्त करते हुए मानव मन को दस्तक देने में सफल हुआ है. यह संग्रह पाठकों की दिलों में घर कर पाए और साहित्य जगत में उचित मान-सन्मान से स्थान पाए इसी शुभकामना के साथ.

देवी नागरानी

ग़ज़ल -संग्रह : जो कहूँगा सच कहूँगा  , लेखक : श्री महेश अग्रवाल ,  पन्ने: 96,  मूल्य: रु.150 , प्रकाशक: उत्तरायण प्रकाशन, लखनऊ 226012 .

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1 टिप्पणी

  1. मई 9, 2011 at 11:59 पूर्वाह्न

    बेहतरीन शब्दों में सटीक समीक्षा की है, साधुवाद


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