उस शिकारी से ये पूछो

ग़ज़ल

उस शिकारी से ये पूछो पर क़तरना भी है क्या
पर कटे पंछी बता परवाज़ भरना भी है क्या?

आशियाना ढूंढते हैं, शाख़ से बिछड़े हुए
गिरते उन पत्तों से पूछो, आशियाना भी है क्या?

अब बायाबां ही रहा है उसके बसने के लिए
घर से इक बर्बाद दिल का यूँ उखड़ना भी है क्या?

महफ़िलों में हो गई है शम्अ रौशन, देखिए
पूछो परवानों से उसपर उनका जलना भी है क्या?

वो खड़ी है बाल खोले आईने के सामने
एक बेवा का संवरना और सजना भी है क्या?

पढ़ ना पाए दिल ने जो लिक्खी लबों पर दास्तां
दिल से निकली आह से पूछो कि लिखना भी है क्या?

जब किसी राही को कोई रहनुमां ही लूट ले
इस तरह ‘देवी’ भरोसा उस पे रखना भी है क्या. 117

भारतीय विद्या भवन में काव्य-संध्या

भारतीय विद्या भवन में काव्य-संध्या का आयोजन

डॉ. कृष्ण कुमार एवं श्री अनूप भार्गव के सम्मिलित प्रयास से भारतीय विद्या भवन के सभागार में हिंदी भाषा की धाराओं का संगमः
29 मई, 2009 रविवार की शाम, न्यूयॉर्क के भारतीय विद्या भवन की अमेरिका की हिंदी विकास मंच और इंग्लैंड की गीतांजलि नामक संस्थाओं के सौजन्य से एक अद्वितीय काव्य-संध्या का आयोजन सफलतापूर्वक संपन्न हुआ। यह कार्यक्रम इस दृष्टिकोण से अद्वितीय था कि यह विश्व के एक भूभाग (इंग्लैंड) के हिन्दी प्रेमियों द्वारा दूसरे भूभाग (उत्तरी अमरीका) की सद्‍भावना यात्रा का एक महत्वपूर्ण अंग था।
भारतीय विद्या भवन से अनंत सेवाओं से श्री दीपक दवे ने सभागार में उपस्थित व्यक्तियों का स्वागत करते हुए डॉ० जयरामन की ओर से कार्यक्रम के लिये शुभकामनाएं दीं और भविष्य में भी होने वाले ऐसे आयोजनों में भवन की ओर से पूर्ण सहयोग का आश्वासन दिया.
इंग्लैंड से आये इस सद्‌भावना-मण्डल में डॉ० कृष्ण कुमार के नेतृत्व में आये अन्य कवि-कवियित्रियों के नाम इस प्रकार हैं: श्री परवेज़ मुज़फ्फर, डॉ. कृष्ण कन्हैया, श्रीमती नीना पॉल, श्रीमती अरुण सब्बरवाल, श्री नरेन्द्र ग्रोवर, श्रीमती जय वर्मा, श्रीमती स्वर्ण तलवाड़. डॉ० कृष्ण कुमार ने अपने संगठन के सदस्यों का संक्षिप्त परिचय दिया और गीतांजलि संस्था के विषय में भी जानकारी दी. उन्होंने बताया कि गीतांजली एक बहुभाषी साहित्यिक समुदाय है जो मुख्य रूप से बरमिंघम, यू. के., में स्थित है पर अब इसकी शाखायें अन्य शहरों में भी शुरू हो रही हैं. यह संस्था अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर साहित्य के विकास की दिशा में निष्ठा के साथ सेवा करती आई है. हिंदी की सेवा करने का महत्वपूर्ण कार्य साहित्य लेखन के माध्यम से हो रहा है। प्रवासी भारतीय अनेक हिंदी कार्यक्रमों की रूप-रेखा रचते चले आ रहे हैं। उनका अपने देश की मिट्‍टी से प्रेम और हिंदी भाषा व संस्कृति से लगाव प्रशंसनीय है।
डॉ० कृष्ण कुमार ने अपना विश्वास प्रकट करते हुए कहा कि “भारत से दूर रहकर अपनी भाषा को कैसे जीवित रखा जाये, इस प्रयास में आने वाली कठिनाइयों से कैसे जूझा जाय, और संभावनाओं को कैसे साकार किया जाय, इस दिशा में प्रवासी भारतीय साहित्यकारों का योगदान सराहनीय है। यही वे भारतीय है जो भारतीयों में बची भारतीयता को बचाने की कोशिश कर रहे हैं”। उन्होंने यह चिंता व्यक्त की कि “हम भारतीय अपनी छोटी समझ के कारण खुद को छोटे-छोटे भागों में बाँट रहे हैं और केवल एकता का नारा पीट रहे हैं”। उनका कहना है कि विचार व्यक्ति से बढ़ता है। गाँधी एक विचार लेकर चले और आज़ादी हासिल की। एक व्यक्ति दीवाली में एक दीपक घर में जलाये, तो घर प्रज्वलित होता है।
हिंदी विकास मंच की ओर से श्री अनूप भार्गव ने समय के अभाव के कारण संक्षेप में ही ई‌‌कविता याहू गुट के सफ़ल प्रयोग के विषय में बताया। अन्तर्जाल पर जाना-माना यह मंच कई वर्षों से हिंदी साहित्य, विशेषकर कविता के क्षेत्र में, प्रगतिशील है और इसके सदस्यों की संख्या लगभग ६०० हो चुकी है। सदस्य विश्व के कोने-कोने से इस गुट से जुड़े हैं। हिन्दी विकास मंच की परिकल्पना हिन्दी के विकास में योगदान दे रही संस्थाओं को एक सूत्र में बाँधने के विचार से की गई है। इंग्लैंड से कवियों को उत्तरी अमेरिका की यात्रा करने का निमंत्रण इसी विचार की पहली कड़ी है। अनूप जी ने बताया कि न्यूयॉर्क के अतिरिक्त कनाडा के टोरौँटो शहर में होने वाले कार्यक्रम में भी कवियों का यह काफ़िला भागीदार रहा.
विचारों के आदान प्रदान के उपरान्त डॉ० कृष्ण कुमार की अध्यक्षता में काव्य पाठ का आरम्भ हुआ। श्रीमती स्वर्ण तलवाड़ ने अपने साथियों का परिचय करवाते हुए उन्हें मंच पर आमांत्रित करने का संचालन-भार बखूबी निभाया। उनके साथ आए हुए यू.के. के सभी साथियों ने अपनी रचनाएं प्रस्तुत कीं। बीच-बीच में श्री अनूप भार्गव ने न्यूयॉर्क, न्यू जर्सी, और फिलाडेल्फिया में रहने वाले स्थानीय कवियों को भी संक्षिप्त परिचय के साथ काव्य पाठ के लिये आमंत्रित किया। इन कवियों में थे डा॰ सरिता मेहता, श्री घनश्याम चंद्र गुप्त, श्रीमती बिन्देश्वरी अग्रवाल, श्री राम गौतम, डा॰ अंजना संधीर, देवी नागरानी, और स्वयं श्री अनूप भार्गव। अंत में अध्यक्ष डॉ० कृष्ण कुमार ने अपनी रचनाओं और उत्कीर्ण विचारों से इस साहित्य सरिता को समेटा। अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति की न्यूयॉर्क शाखा के पूर्वाध्यक्ष मेजर शेर बहादुर सिंह भी श्रोताओं में उपस्थित रहे।
कार्यक्रम का समार्पण भारतीय विद्या भवन के श्री दीपक दवे ने आगन्तुक कवियों और श्रोताओं को धन्यवाद देते हुए किया। श्री दवे ने कहा कि पूरा कार्यक्रम उनके लिये एक सुखद अनुभव था। इस प्रकार एक सफ़ल काव्य-संध्या सम्पन्न हुई|
प्रस्तुतकर्ताः देवी नागरानी
समाचार-वर्ग– Anjana Sandhir, Anoop Bhargav, Dr. Bindeshwari Agarwal, Devi Nangrani, Dr Krishna Kumar, Geetanjali, Hindi Vikas Manch, Ram Gautam, Swarn Talwad, USA and all the writers mentioned in the News.

रंग बदलता मौसम

         रंग बदलता मौसम  (कहानी)

         साहित्य और समाज का आपस में गहरा संबंध है , जिनको एक दूसरे से अलग नहीं किया जा सकता, क्योंकि साहित्य अपने काल का प्रतिबिंब है. जिस समाज में हम रहते है, उसीका हिस्सा बन जाते हैं. समाज के आसपास की समस्याओं को, विडंबनाओं को कथा या कहानी की विषय वस्तु बनाकर, पात्रों के अनुकूल उनके विचारों को शब्दों शिल्पी की तरह तराश कर मनोभावों को अभिव्यक्त करते हैं.
       जीवन एक प्रेणादायक स्त्रोत्र है, हमेशा बहने वाली नदी की तरह निरंतर, निष्काम, कल-कल बहता हुआ.  अन्चुली भरकर पी लेने से कहाँ प्यास बुझती है? ऐसे ही मानव मन अपनी परिधि के अंदर और बाहर की दुनिया से जुड़ता है तो जीवन की हकीक़तों से परिचित होता है. दुःख-सुख, धूप-छाँव, पारिवारिक संबंध, रिशतों की पहचान,अपने पराये के भ्रम जब गर्दिशों के उत्तार-चढ़ाव की राहों पर जिए गए तजुर्बात बनकर हमारी सोच को रोशन करते हैं तो साफ़-शाफाक़ सोच पुरानी और नयी तस्वीर को ठीक से देख पाती है. यह परिपक्वता तब ही हासिल होती है जब आदमी उन पलों को जीता है, भोगता है.
            ऐसी ही पेच्चीदा पगडण्डी से गुज़रते हुए, मन को टटोलती आस की तितलियाँ जब रंग-बिरंगे पंख पसारे सोच के साथ अनेक दिशाओं में विचरती है तो मनमानी करता बांवला मन कितनी उमीदें बांध बैठता है, उन क्षण भंगुर पलों से जो दूसरे ही पल रेत के टीले की तरह भरभरा जाते हैं. ऐसा ही कुछ कहानी ” रंग बदलता मौसम” के किरदार मनीष के साथ हुआ, जो दोस्ताने को रिशतों की कच्ची पगडण्डी पर बसना चाह रहा था. पर अचानक जब सपनों के महल धराशायी हुआ तो साथ उनके क्या-क्या टूटा,  पंकज समझ नहीं पाया, न कह पाया. बस इतना था कि गाड़ी चलती रही और वह जहाँ खड़ा था वहीँ थम गया . यहाँ औरत के चरित्र को भी उजगार करते हुए ये शब्द ” वो तो बड़े भाई का कोई परिचित है” अपनों को बेगाना बनाने में बड़ी सशक्तता से अपना असर छोड़ गए. स्वार्थ के सिंघासन पर बैठे लोग क्या जाने कि ठेस लगना क्या होता है, चूर चूर होकर बिखरना क्या होता. शायद खिलवाड़ करना उनकी फ़ितरत में शामिल होता है. इस तरह की कहानियों से सामाजिक  प्रवाह में नया मोड़, नई दिशा दर्शाने की क्षमता समाई होती है.
          सुभाष जी की लेखनी की खूबी उनके शब्दों की अभिव्यक्ति से, गुफ़्तार से, ज़ाहिर होती है जहाँ उनके अनकहे तेवर अपने आप को पारदर्शी बना कर ज़ाहिर करते हैं. सँवाद कम पर पुरअसर इस कद्र कि कल्पना और यथार्थ के फासले कम होकर गुम से हो गए हैं. कहानीकार अपने किरदारों के जीवन में इस तरह घुलमिल जाते हैं कि जैसे कोई आप-बीती जग-बीती बन कर प्रवाहित हो रही है. यह कहानी सिम्रतियों और वर्तमान की अनुभूतियों की सुंदर पारदर्शी अभिव्यक्ति है, जिसमें मार्गदर्शकता का संकेत भी शामिल है. मानव के मनोभावों को अभिव्यक्त करने की कलात्मक क्षमता भी कहानी को रुचिकर बना देती है, और पाठक को और आगे क्या होता है, यह जानने की उत्सकता को भी बरक़रार रखती है.

देवी नागरानी

होंठ हैं सिले अब तो

गजल
शहर अरमानों का जले अब तो
शोले उठते हैं आग से अब तो

जान पहचान किसकी है किससे
हैं नक़ाबों में सब छुपे अब तो

चाँदनी से सजे हैं ख़्वाब मेरे
धूप में जलते देखि ये अब तो

ऐब मेरे गिना दिये जिसने
दोस्त बनकर मिला गले अब तो

मन की कड़वाहटों को पी न सकी
हो रही है घुटन मुझे अब तो

वहशी मँज़र जो देखा आंखों ने
ख़ुद ब ख़ुद होंठ हैं सिले अब तो

देवीदिल के हज़ार टुकड़े हैं
हम हज़रों में बंट गए अब तो. 64

किताब जिन्दगी की

किताब जिन्दगी की –डॉ. कृष्ण कन्हैया

 सोच को शब्दों में बुन कर, विचारों को भावनात्मक अंदाज़ में अभिव्यक्त करना एक सराहनीय रुझान है जो डॉ. कृष्ण कन्हैया की कृति “किताब ज़िन्दगी की ” में मिलता है I जिन्दगी तो हर कोई जीता है, पर उसे करीब से देखना, पहचानना, पहचान के उस अहसास के साथ जीना एक अनुभूति है I  उस जिये गए तजुर्बात को कलम की जुबानी पेश करना लेखक के लिए एक स्वाभाविक प्रक्रिया है — शायद कलम उसकी भावनाओं को जानकार, पहचानकर उसकी अभिवयक्ति के साथ इन्साफ़ करती है क्योंकि वह अंतरमन की खामोशियों की जुबान है I आईये सुनते हैं उन आहटों को कलम की ज़ुबानी..

ज़िन्दगी एक बंद किताब है / जिसे खोलने की कोशिश तब सही है

जब इसके पन्नों को दोनों तरफ से पढ़ा जाये                                                           

डा. कृष्ण कन्हैया, बिहार, भारत से आकर इंगलैंड, यू. के. के निवासी हैं, शिक्षा- एम.बी.बी.एस(आनर्स), अपने पेशे के दौरान ज़िंदगी को करीब से देखते है माना पर उस में बीते हुए पल पल का चिट्ठा अपनी शब्द सश्क्तता से जीवंत होने का आबास दिला जाता है. उनकी ज़ुबानी उनकी तनमयता सुनिये‍..”  कविता-शायरी के साथ-साथ संगीत का शौक विद्यार्थी जीवन

से था जो समय के साथ जिंदगी के जुड़ता चला गया। विदेश आने के        बाद अपनी संस्कृति का गर्व, अपने संस्कार की गरिमा, अपने गाँव की शुद्ध सौंधी ख़ुश्बू और अपनी मात्रभूमि से अनवरत लगाव मेरी अंतर्आत्मा को ज़्यादा उद्वेलित करती थी जिसकी झलक अब मैं अपनी कविताओं में महसूसता हूँ. चलिये उन के साथ सफ़र तय करते हैँ जहाँ आगे इस मर्म को स्पष्ट करते हुये डॉ.कृष्ण कन्हैया लिखते हैं –

जिंदगी एक ग्लास की तरह है /जिसमें उसके कार्यों का पानी भरा है “

आशावादी और निराशावादी सोच की कसौटी को मद्देनज़र रखते हुये उनका प्रगतिशील विचार किस तरह आपने आप को कितनी सरलता से एक जटिल सवाल का हल सामने रख पाया है —

“सच तो यह है कि/यह आधा, अधूरा सपना है

और इसे पूरा करने का संकल्प अपना है/प्रश्न है किः

देखने वाले की मानसिकता क्या है ?

इसे भविष्य में/पूरा देखना, या /पूरा खाली देखना !!

अपने अहसास को जिंदा रखने के प्रयास में ज़िन्दगी के उतर-चढाव को मुंह दिये बिना आगे के पड़ाव तक जाने का सवाल ही नहीं आता. एक दौर गुज़रता है तो राहें दूसरे मोड़ पर आ जाती है और दरगुज़र ज़िन्दगी आपने आगे एक विस्तार लिये हुये बाहें फैलाये रहती है जिसमें समोहित है गम-ख़ुशी, प्यार-नफ़रत के अहसास जो जिन्दगी की दौलत है. पर सफ़र तो सफ़र है, उनके शब्दों में आइये उन्हें टटोलते हैं-

“मेरे आरमान के आंसू /पलकों की कश्ती पर/ आँखों के सागर में /जिन्दगी के संग-संग

निरंतर तैरना चाहते हैं /किनारे तक जीना चाहते हैं” /

हां, अवसर है इस अधिकार को जीने का और लक्ष भी साफ़ है –

“मौत आती है /जब भी लगाती भूख उसे —-

कहाँ भक्ष्य जायेंगे बचकर /उनको तो आना ही आना है”  

दिल की दहलीज़ पर दस्तक देती हर आहट मानव को कहीं न कहीं आपने ही दिल की आप-बीती लगती है .जहाँ ऐसी संभावनाएं बाक़ी है, वहीं कलम की रवानी हर दिल से इन्साफ़ करती रहेगी, चाहे वह दिल किसी अमीर का हो या किसी गरीब का, किसी मजदूर का हो या किसी नेता का.      व्यक्ति समाज का दर्पण होता है और जैसे-जैसे आईने बदलते हैं, अक्स में बदलाव लाज़मी है. मन के मंथन में भावों और विचारों का सुन्दर सामंजस्य देखने- पढ़ने-सुनने को मिलता है. डॉ.कृष्ण कन्हैया जी ने सामजिक विषमताओं, राजनीतिक स्वार्थों, मानव मन की पीड़ा और विसंगतिओं पर करारी चोट करते हुये हर पहलू पर कलम चलायी है. उनमें से कुछ विषयों पर उनकी सुलझी हुई सोच दिल से दिल ताक को सन्देश पहुचाने में कामयाब हुई है…..जिसमें ‘समझौता, ‘पैसा’, ‘एहसान’ और ‘अच्छाई’ जैसे उन्वान शामिल है और उन्हीं में गहरे कहीं उनकी चिंतन-शक्ति और अनुभव की परिपक्वता सर्वत्र झलकती है .’अच्छाई’ में उनकी पारदर्शी विचारशैली, वस्तु व शिल्प अति उत्तम है . उनकी बानगी देखें –

अच्छाई की परिभाषा /दुनिया के मतलबी दौर में /बदलती जा रही है/ क्योंकि इसका प्रयोग लोग

अपनी बेहतरी के लिए करते हैं

‘इस्तेमाल’ नामक रचना में डंके की चोट पर अभिव्यक्त किये उनके विचारों से हम रूबरू होते हैं ,जहाँ लाचारगी को सियासती मोड़ पर खड़ा करते हुये वे कहते हैं-

“भले ही तुम्हारी मजबूरी है /पर औरों के लिए /रोज़गार का जरिया

सियासती दाव-पेंच ,या /अन्तर्राष्ट्रीय विवाद का विषय ”   

इसी कविता के अंतिम चरण में बेबसी की दुर्दशा पर रोशनी डालकर किस खूबसूरत अंदाज़ में अपना विचार अभिव्यक्त करते हैं-

“पर / तुम्हें मिलगा क्या -/ज़िल्लत, बेचारगी, झूठे प्रलोभन

हिकारत और असमंजस से भरी /ज़िन्दगी जीते रहने के सिवा” ?

इंसान का मन अपने अन्दर दोनों भाव लिए हुये है- राम-रावण, गुण के साथ दोष , सच के साथ झूठ, न्याय के साथ अन्याय और उन्हीं से बनती-बिगड़ती विकृत तस्वीरों को, सामान्य प्राणी की दुर्दशा को, घर के भीतर और बाहर सियासती दखल के विवरण को उनकी कलम की नोक अपने-आप को अभिव्यक्त कर पाई है .अपने ही निराले ढंग से-

“लूट, डाका,खून, फिरौती अब /एक फैलता विकसित रोज़गार है

जिसमें रक्षक और भक्षक दोनों /बराबर के हिस्सेदार हैं “

जिन्दगी से जुड़े जटिल सवालात के सुलझे जवाब को अपनी रचना में प्रस्तुत करने में उनकी महारत प्रगतिशील है, पढ़ते पढ़ते कहीं मन भ्रमित हो जाता है कि क्या ऐसा संभव है कि एक प्राणी, एक जीवन के दायरे में इतने सारे अनुभवों के मोड़ से गुज़रता हूआ जाये और अपने जिये गये उस तजुरबे को हंसते खेलते इन कागज़ के कोरे पन्नों पर इस माहिरता से उतारते जायें कि पाठक के सामने एक सजीव चित्र मानो चलने फिरने लगता है‍‍‍….बयाने अंदाज़ निराला है…

जिन्दगी एक दौर है /बैशाखी पर चलने की लाचारी नहीं

न हीं घुटनों के बल/ चलने का नाम है/ क्योंकि —

“जिंदगी की दौड़/ अतीत के खोये कन्धों पर सवार हो कर

या फिर /भविष्य की काल्पनिक उड़ान पर/ जीती नहीं जाती;

उसके लिए तो /वर्तमान की बुलंद बुनियाद चाहिए”   

कितने सशक्त शब्दों में समाज में फैले भ्रष्टाचार, अन्याय, अत्याचार, वाद-विवाद एवं उनकी विसंगतियों को उजागर किया है .सुलझे हुये विचारों से आज-कल और आने वाले कल की तस्वीर की मुक़म्मल नींव रखी है. जिन्दगी का यह स्वरुप एक न्यायात्मक पक्ष प्रकट करता है. ज़िन्दगी आज, कल और आने वाले कल के तत्वों से बुनी जाती है , जहाँ ‘आज’ ‘कल’ का साक्षी था, पर वर्तमान की बुनियाद पर टिके आनेवाले ‘कल’ का कौन साक्षी होगा -यह इतिहास बतलायेगा . ‘घड़ी’ नामक रचना भी इसी सन्दर्भ में पुख़्तगी बख्शती है —  “घड़ी —

समय के लय के साथ सुर मिलाना /हर क्षण वर्तमान से आगे बढ़ जाना

तेरी प्रगति का सूचक है/तूने अपने साये को/ विश्राम के पाये को/अपनी  अतीत की आँखों से

एक प्रतिबिम्ब की शक्ल में /कभी नहीं देखा” — 

जाने-अनजाने में रचनाकार का मन अनछुए पहलुओं को यूँ उजागर करता आ रहा है – सरल व आम बोल-चाल की भाषा में ‘व्यंजन’ नामक काविता को शब्दों में गिरफ़्त करते हुये, एक समां बांधते हुए उनकी मनोभावना की बानगी पढ़ें और महसूस करें  

“बुराई का व्यंजन/ उत्तम, सबसे उत्तम भोजन है /क्यूंकि जायकेदार होने के साथ- साथ

सस्ते दामों पर सर्वत्र उपलब्ध है :

व्यक्ति के व्यभिचार में/ हर घर, हर परिवार में /गाँव में, बाज़ार में / क्या पूरे इस संसार में”

अनेक परिभाषाओं के विस्तार से एक झलक ‘झूठ’ नामक कविता मन पर एक अमिट चित्र अंकित करती चली जाती है, शायद हर इक शख़्स ने इसका ज़ायका कभी न कभी ज़िन्दगी में लिया होगा. कहते हैं सच को गवाहों की ज़रूरत नहीं पार झूठ भी अनेकों बार बाइज़्ज़त रिहा होता है. शब्दों का कलात्मक प्रयोग बहुत ही सुलझे हुए तरीके से पेश किया है..आइये सुनते हैं कृष्ण कन्हैया जी का डंके की चोठ पर किया गया ऐलान……….

झूठ का व्यवहार —/ हत्या का चश्मदीद गवाह सच को सच नहीं बोलता —-

बोल-चल में सत्य की नगण्यता है —

और उसी झूठ की म्हणता मानते हुये स्पष्ट करते हैं –

“सूर्य की ऊष्मा /झूठ से ठंढी पड़ जायेगी /तब झूठ बोलने वाले यह मान कर चलेंगे कि

सच की यही परिभाषा है ”

अपनी सोच को एक शिल्पकार की तरह शब्दों में तराशकर कुछ ऐसे पेश करने में डॉ.कृष्ण कन्हैया कामयाब रहे हैं कि कभी, कहीं सोच को भी ठिठक कर सोचना पड़ जाता है, शायद सोच की भाषा बोलने लगती है, चलने लगती है, कभी तो चीखने लगती है. मन की बस्तियों के विस्तार से कुछ अंश, जो जिन्दगी जी कर आती है , वही अनगिनत अहसास, मनोभाव, उदगार और अनुभव लेखक ने खूब सजाये हैं अपनी जिन्दगी की किताब -“किताब जिंदगी की” में, जो अपने प्रयास से भी हमें अवगत करा रहे हैं कि लिखना मात्र मन व मस्तिषक का ही काम नहीं, पर सधा हुआ मनोबल भी उसमें शामिल हो तो कलम की स्याही और गहरा रंग लाती है… 

“विवेक की स्याही से /उत्साही उँगलियों द्वारा

दानिशमंदी का आकर /बनाने का नाम है” -और प्रमाण भी

“जिन्दगी की किताब” पाठकों से रूबरू होकर अपनी पहचान व उत्तम स्थान पायेगी. इसी शुभकामना के साथ —

देवी नागरानी,

न्यू जर्सी, dnangrani@gmail.com

पुस्तके नाम‍ः किताब ज़िंदगी की, लेखकः डॉ. कृष्ण कन्हैया, पन्नेः 104, मूल्यः Rs.125   

प्रकाशकः अक्षत प्रकाशन ए/१३४ हाऊसिंग कालोनी, मेन रोड, कंकरबाग़, पटना -८०००२०, बिहार ,भारत   

नोर्वे में स्वतंत्रता दिवस एवं टैगोर जयंती

नोर्वे में स्वतंत्रता दिवस एवं टैगोर जयंती के मनाया गया

 नार्वे की लेखक गोष्ठी में देवी नागरानी सम्मानित

‘भारतीय-नार्वेजीय सूचना एवं सांस्कृतिक फोरम ( Indo-Norwegian Informaion and Cultural फोरम) के मंच पर  शनिवार 7 मई, भारतीय- नार्वेजीय सूचना एवं सांस्कृतिक फोरम , (स्थान) वाइतवेत कल्चर सेंटर ओस्लो में नार्वे का स्वतन्त्रता दिवस (८ मई ) 2011 , और गुरुदेव रवींद्र नाथ टैगोर के १५० वे जन्मदिन पर  को मनाया गया और साथ ही एक सफ़ल लेखक गोष्ठी से उस कार्यक्रम को संपन्न  किया,  जिसमें  मुख्य अतिथि रहे स्थानीय मेयर थूर स्ताइन विंगेर और भारतीय दूतावास के सचिव बी के श्रीराम जी ने अध्यक्षता की.

विशिष्ट अतिथि रही जानी-मानी यू एस ए की कवियित्री श्रीमती देवी नागरानी जिन्हें हिंदी साहित्य सेवा के लिए सम्मानित किया गया.

         दीप  प्रज्वलन के पश्चात निकिता  और  अलक्सन्देर  शुक्ल सीमोनसेन, रविन्द सीवेर्टसेन और  कुनाल भरत ने राष्ट्रीय गान प्रस्तुत किया था.  इस संस्था के अध्यक्ष सुरेशचंद्र चन्द्र शुक्ल ‘शरद आलोक’ जी ने हिंदी व् नॉर्वेजियन भाषा में मिले- जुले संचालन का भार  सँभालते हुए  मुख्य अतिथियों  का फूलों से स्वागत किया, स्थानीय मेयर थूर स्ताइन विंगेर और भारतीय दूतावास के सचिव बी के श्रीराम जी ने देवी नागरानी जी को शाल ओढ़ाकर सम्मानित किया.

मुख्य अतिथि स्थानीय मेयर थूरस्ताइन विंगेर ने नोर्वे  की आजादी के बारे में बहुत ही रोचक हकीकतों से वाकिफ़ कराया और रौशनी डालते हुए अपनी पाई हुई आज़ादी के लिए सभी को शुभकामनयें दी. Stockholm  से आई पम्मी जेसवानी जी ने देवी जी की लिखे अंग्रेजी काव्य संकलन  ‘ द जर्नी’ से कुछ अंश अंग्रेजी में पढ़े और साथ में उनकी एक रचना का  पाठ भी किया. उन्होंने बंकिम चटर्जी  का लिखा   ‘वन्दे मातरम ‘ गाया जिसमें उनके साथ रही ओस्लो की हिंदी सेवी रूचि  माथुर.  एक तरह से सभा में शामिल सभी भारतवासी भाव विभोर होकर उस गायन में शामिल हुए. सुनकर लगा भारत अब  भी उनके दिलों में धड़कता है, चाहे वह वतन से दूर हैं.  यह भी देखने को मिलता है कि देश से दूर उन्हें अपनी भाषा , साहित्य और संस्कृति के लिए लगाव ज़ियादा हो जाता है जिसकी नींव  भारतीय प्रवासी माता -पिता अपने बच्चों में बोने के लिए अनूठे  प्रयास कर रहे  हैं.

देवी नागरानी ने अपनी आवाज़ में चंद ग़ज़लें पढ़ीं जिसमें  एक भारतीय शहीदों  की याद में रही

श्री सुरेशचंद्र चन्द्र शुक्ल, स्तानीय मेयर थूर स्ताइन विंगेर, भारतीय दूतावास के सचिव बी के श्रीराम ने शाल ओढ़ाकर देवी नागरानी जी को सम्मानित किया.

‘पहचानता है यारो हमको जहाँ सारा

हिन्दोस्तां के हम हैं हिन्दोस्तां हमारा.’

इस भारतीय- नार्वेजीय सांस्कृतिक फोरम पर एक रस हो

कर भाव विभोरता के साथ

इंगेर  मारिये लिल्लेएन्गेन  ने अपनी नार्वेजियन भाषा

में अपनी ३ रचनाओं का पाठ किया.

लीव एवेनसेन ने बच्चों की कहानी को भाव और आवाज़ के माध्यम से बेहद रुचिकर बनाकर पेश किया. यह देखकर हौसला और बुलंद होता है कि भाषा कि सरहदें अब रस्ते कि रूकावट नहीं है .

सिगरिद  मारिये रेफ्सुम  ने गिटार  वादन से और साथ साथ अंग्रेजी कविता

ओं को गाकर पेश किया. सरलता और सादगी से पेश की उनकी रचनायें सुर ताल में सुनकर लगा जैसे संगीत की कोई भाषा नहीं होती वैसे रचनात्मकता की भी पहचान भावों से की जा सकती है. जहाँ भाव प्रधान हो वहां शब्द बेमानी हो जाते है. उन्होंने दो संगीतमय रचनायें गई जो थी ‘when will my dreams come true’ और ‘About ‘choices’

राय  भट्टी जी ने एक सिंदर ग़ज़ल से श्रोताओं का मन मोह लिया..

तबाह करके जवानी असीं बड़ा रोये

गुनाह डी करके नादानी असीं बड़ा रोये
श्रीमती सुखबीर कौर भट्टी ने वहां की भाषा में बच्चों के सामने एक अनोखी भाव भरी कहानी पेश की और बच्चे गौर से सुनते रहे. बच्चों को नाटकीय ढंग से कहानी पेश करने का यह सिलसिला यकीनन भाषाई हदें तोड़ने में सफ़ल रहेगा.
राज  कुमार  भट्टी जी ने  अपनी आवाज़ में ‘ श्रोताओं के जज्बा

तों को झंझोड़ते हुए ‘ चिट्ठी आई है’  पंकज उदास द्वारा गाई ग़ज़ल को दोहराया और सभी भावविभोर होकर सुनते रहे.

 नीलम  लखनपाल जी ने एक पंजाबी गीत गाया ‘इक दिन मिट्टी में मिल जाना है’. श्री सुरेशचन्द्र शुक्ल ‘शरद आलोक’ ने कार्यक्रम को अंत की ओर ले जाते  हुए अपनी वहां की नॉर्वेजियन भाषा में और हिंदी में नमस्ते  कैसे करते हैं इस

पर  शब्दों और इशारों द्वारा पेश करने की बखूबी चेष्टा की.

उनकी दूसरी रचना के शब्द रहे  ‘ ओ कमल नयन पुलकित नमन

, पूनम का चाँद लजाती हो .’ था. और अंतिम चरण में पंडित, पादरी और मौलवी के उन्वान वाली बाल कहानी बच्चों के ओर तारुफ़ करते हुए पेश की.

Oslo Group

Oslo Group

संगीता शुक्ल

Hindi Norwegian Kavya goshti in Norway

सीमोनसेन  जी इस दिशा में हर शनिवार दुपहर हिन्दुस्तानी व् नॉर्वेजियन बच्चों की हिंदी सिखाने के साथ-साथ जब भी तीज त्यौहार के अवसर आते हैं भारतीय  संस्कृति

की दिशा में,  क्षमता के साथ  सभी बच्चों को उन  प

गडंडियों  पर ले जाती है .

भारतीय दूतावास के सचिव बी के श्रीराम जी  ने अपनी अध्यक्षता को अंजाम की ओर ले जाते हुए कहा कि विदेश में इन छोटे छोटे भाषाई प्रयासों से जल रही यह लौ  सराहनीय है. उनका कहना है कि यही रौशनी हमारी सभ्यता की प्रतीक रहेंगी, साथ में अपनी शुभकामनाएं  पेश की कार्यक्रम  का आगाज़ और अंत चाय नाश्ते के साथ चलता रहा.  परदेस में ये भाषा व् संस्कृति के ये नन्हे नन्हे जुगनी हमारी आशाओं  को जगमगाते

रहेंगे इसी विश्वास के साथ जयहिंद

देवी नागरानी

 

जो कहूँगा सच कहूँगा

डंके की चोट पर सच का ऐलान करती हुई कृति “जो कहूँगा सच कहूँगा”

क़लम अंतरमन की खामोशियों की जुबान है. मन के अथाह सागर में जब सोच की लहरें तहलका मचाती हैं, तो उस शोर की रवानी शेरों में आकार पाने लगती है. लेखन कला एक सफ़र है, जिसकी मंजिल शायद नहीं होती. ता-उम्र सहरा की मृगतृष्णा में लिखते रहना और ज़ियादा लिखने की प्रेरणा के साथ.

क़लम के सिपाही श्री महेश अग्रवाल डंके की चोट पर सच कहने की तौफ़ीक रखते हुए अपने  रचनात्मक आसमान की ओर उड़ते हुए सोच के परिंदों को नया क्षितिज प्रदान करते हैं. उनकी लेखन कला अपने आप में एक सम्पूर्ण परिचय है. “जो कहूँगा सच कहूँगा” में उनकी क़लम  के तेवर अपने तीखेपन के साथ ज़ाहिर हो रहे हैं. देखिये यह बानगी……

कौन सुनता है यहाँ मज़लूम की चीखें

कुर्सियों पर दोस्तों केवल शिलाएं हैं

 

जंगलों में यार आदमख़ोर मत ढूंढो

बस्तियों में आजकल उनकी गुफाएं हैं

काव्यात्मक संसार का विस्तार उनके जीवन के जिए हुए उन अनेक पलों को समेट लेते हैं, जिसमें शामिल रहती है मध्य-वर्गीय मनुष्य की पीड़ा ,   न्याय अन्याय की बदलती परिस्थितियाँ, प्रशासन की जर्जर अवस्था एवं कानून की जटिलता. न्याय व्यवस्था पर कटाक्ष करती हुई उनकी पैनी क़लम के आइये प्रहार पढ़ें—

बिक जाते हैं लोग यहाँ आसानी से

कोठे जैसे लगते थाने वर्षों से

जुर्म, सियासत दोनों मिलकर एक हुए

दोनों के अच्छे याराने वर्षों से

जहाँ शीशमहल के रहने वाले पत्थर से प्रहार करने को हर पल तैयार रहते हैं, जहाँ अदालतें झूठ को पनाह देती है , जहाँ इन्सान इंसानियत का गला घोंटने पर आमद है वहीँ श्री महेश अग्रवाल जी की शायरी हमारी सोच को संचारित करके, बहुत कुछ सोचने के लिए इस कशमकश के दौर में अपने आपसे बाहर आकर अपने आसपास के संघर्षमय जीवन के साथ संधि करना कोई आसान काम नहीं, जहाँ अपने आप से जूझकर-हारकर अनेकों बार ज़मीरों से सुलह करनी पड़ती  है. उसी बेदार्गी से जागृत करती हुई उनकी इस बानगी से चलो रू-ब-रू होते हैं……

हार किसकी और किसकी है फ़तह कुछ सोचिये

जंग है ज्यादा ज़रूरी या सुलह, कुछ सोचिये

मौन है इन्सानियत के क़त्ल पर इन्साफ़ घर

अब कहाँ होगी भला उस पर जिरह, कुछ सोचिये

दे न पाए रोटियाँ, बारूद पर खर्चा करें

या खुदा अब बंद हो ऐसी कलह, कुछ सोचिये

संवेदना धारावाहिक रूप से शब्द-सरिता की तरह प्रवाहित होती जा रही है. महेश जी की रचनाएँ रोज़मर्रा ज़िन्दगी के ताने-बनों से बुनी हुई है. प्रतिभाशाली काव्यात्मक रचना एक संवेदनशील ह्रदय की उपज होती है, जिसमें शामिल है संसार में जिया गया अनुभव, साफ़-सुथरी बोलचाल की भाषा में बात कहने की निपुणता. भवन के अंदर की भव्यता बाहर से दिखाई देती है, जहाँ करीने से सजाई ईंट पर ईंट अपने आप में कुशलता का प्रमाण है. ग़ज़ल लिखने के लिए जो प्रमुखता है वह शब्दों की सजावट और बुनावट से महसूस की जा सकती है. आइये उनकी बानगी की गहराई और गीरआई को महसूस करें—

लोग उगाएं पहले खुशियों का सूरज

फिर लिखें खुशहाल इबारत दुनिया की

मुफ़लिसी दुल्हन न बन पाई कभी

यूं कई सत्तास्वयंवर हो गए

कविता का सूत्र उसकी लघुता में होता है.  सोच की संकरी गली से अहसासों की धड़कनों को शब्द बद्ध करना सागर में गागर समोहित करने का प्रयास श्री महेश जी ने खूब निभाया है. ग़ुरबत की बेबसी और छटपटाहट शब्दों से झलकती हुई दिखाई पड़ रही है. जीवन जीना अपने आप में एक बड़ी कसौटी बनता जा रहा है और उस कसौटी पर पूरा उतरना मुश्किल ज़रूर है, पर असंभव नहीं, मनोबल में अजमिय संचार की ज़रुरत पड़ती है. श्री महेश जी की ग़ज़लें आत्मीयता से गुफ़्तगू करती हुई मानवता के मर्म को छू जाती है. सहज-सरल भाषा में वो कहीं भटके हुए पथिक का मार्गदर्शक बनती है, तो कहीं अविश्वास में विश्वास की स्फूर्ति दर्शाती है. उनकी इस भावना प्रधान अभिव्यक्ति की सच्चाई से आइये परिचित होते है:

रोज़ सपनों की भले ही मौत हो पर

कोशिशों के घर कभी मातम न हो

हक़ ज़बरदस्ती अगर छीना गया हक़दार का

हम क़लम से काम लेंगे दोस्तो तलवार का

सोच भी ठिठक कर कहीं-कहीं सोचने पर आमद हो जाती है. समकालीन  हिंदी ग़ज़ल अपनी संवेदना और शिल्प की चादर ओढ़कर हमसे रू -बी-रू होती है, गुफ़्तार करती है, अपने हर तेवर, हर आक्रोश को अपने सीने में दबाये रखने के बजाय, दबी आग को उगलते हुए आम आदमी की ज़िन्दगी की समस्याओं से खुद को जोड़ती है—

हर तरफ की आंच में सिकते रहे है हम यहाँ १२२

और हम हिमखंड जैसे ही गले हैं दोस्तों

सभ्यता, नेकी, शराफ़तख़ूब रोई है यहाँ

जब कभी भी इन सलीबों पर चढ़ा है आदमी

एक न ख़त्म होने वाले द्वंद्व की तरह अंतरमन में प्रसव-पीड़ा की तरह अंगडाइयां लेता हुआ दर्द जो भोग गया है, सहा गया है, उसकी कटुता,  अलगाव, घुटन प्रदूषित करती ज़हरीली हवाओं की पुरसर झलकी आज के परिवेश में देखी जा रही है और वही इंसान को दुःख की घुटन में जकड़ लेने में सक्षम है. महेश जी की क़लम ने इन सूक्ष्म पहलुओं पर बखूबी शब्दों से निबाह और निर्वाह करते हुए कहा है—

ाव डूबी है यकीनन साहिलों के पास ही

किन्तु साबित कर रहे हैं जुर्म हम मंझधार का

रिश्ते की महत्वता मान्यता से होती है. जहाँ घर है वहीँ रिश्ते बुने जाते है पसीने के तिनकों से, अहसासों के तिनकों से, तब कहीं जाकर वह अपनाइयत की चादर हमें महफूज़ रख पाती है,  हर उस दुःख की धूप से, खौफ़ की परछाइयों से,  दिन के उजाले के घने कोहरे से. जी हाँ! वह है माँ की ममता की छांव जो बरगद का शजर बनकर हर आंच से बचाती है. इसी भाव को शब्द-शिल्पी की नागीनेदारी भावों को ‘सीप में पले मोती” उस मानिंद प्रस्तुत कर पाने में कामयाब रही है इस बानगी में—

प्यार की बाराखड़ी सब लोग बाचेंगे

फूल पर उड़ती हुई कुछ तितिलियाँ तो हो

और अतृप्त मन में तृप्ति प्रदान करती हुई यह पंक्तियाँ एक सचाई है जिसको न किसी ज़मीन की ज़रुरत है, न किसी न्यायाधीश की, न किसी अदालत की. एक मात्र सच जो ज़िन्दगी की नींव भी है और प्रेणादायक स्तोत्र भी , जो यहाँ शब्दों के माध्यम हमारा मार्गदर्शक बन रहा है—

हमें वह पालती है पोसती है दर्द-सह्सह्कर

हमारी ज़िन्दगी को सींचने वाली नहर है माँ

शब्दों की सक्षमता का प्रमाण यह ग़ज़ल-संग्रह अपनी विशालता से मनोभावों को,  उद्गारों को व्यक्त करते हुए मानव मन को दस्तक देने में सफल हुआ है. यह संग्रह पाठकों की दिलों में घर कर पाए और साहित्य जगत में उचित मान-सन्मान से स्थान पाए इसी शुभकामना के साथ.

देवी नागरानी

ग़ज़ल -संग्रह : जो कहूँगा सच कहूँगा  , लेखक : श्री महेश अग्रवाल ,  पन्ने: 96,  मूल्य: रु.150 , प्रकाशक: उत्तरायण प्रकाशन, लखनऊ 226012 .

नार्वे में सन्मान

 

Indo-Norwegian Informaion and Cultural Forum के मंच पर  शनिवार 7 मई, भारतीय- नार्वेजीय सूचना एवं सांस्कृतिक फोरम , (स्थान) वाइतवेत कल्चर सेंटर ओस्लो में नार्वे का स्वतन्त्रता दिवस (८ मई ), और गुरुदेव रवींद्र नाथ टैगोर के १५० वे जन्मदिन पर  को मनाया गया और स्थानीय मेयर थूर स्ताइन विंगेर और भारतीय दूतावास के सचिव बी के श्रीराम ने शाल ओढ़ाकर सम्मानित किया।

बाएँ से शरद आलोक, स्थानीय मेयर थूरस्ताइन विंगेर और भारतीय दूतावास के सचिव बी के श्रीराम देवी नागरानी को शाल द्वारा सम्मानित करते हुए

वक्त के मंज़र

दिल ले दर्पण के अक्स बनेवक्त के मंज़र

अपनी ग़ज़लों के लिए अपनी ज़ुबानी क्या कहूँ
कैक्टस हैं ये सभी या रात रानी क्या कहूँ

डॉ. ब्रह्मजीत गौतम जी के ग़ज़ल संग्रह “वक्त के मंज़र” में जहाँ रचयिता की अनुभूतियां और उनकी खूबियाँ शब्दों से उकेरे हर बिम्ब में साफ़ साफ़ नज़र आईं हैं, साथ में सादगी से अनुभूतियों को अंतस में उतारने की कला का अद्भुत प्रयास पाया जाता है.  किसी ने खूब कहा है ‘कवि और शब्द का अटूट बंधन होता है, कवि के बिना शब्द तो हो सकते हैं, परंतु शब्द बिना कवि नहीं होता. एक हद तक यह सही है, पर दूसरी और कविता केवल शब्दों का समूह नहीं,. कविता शब्द के सहारे अपने भावों को भाषा में अभिव्यक्त करने की कला है. गौतम जी के अशयार इसी कला के हर गुण के ज़ामिन हैं. उनकी कलात्मक अनुभूतियाँ शब्द, शिल्प एवं व्याकरण से गुंथी हुई रचनाएं सुंदर शब्द-कौशल का एक नमूना है. एक हमारे सामने है……
कैक्टस हैं ये सभी या रात रानी क्या कहूं?
गौतम जी की रचनाधर्मिता पग-पग ही मुखर दिखाई पड़ती है और यही उनकी शक्सियत को अनूठी बुलंदी पर पहुंचती है. अपने परिचय में एक कड़ी और जोड़ती इस कड़ी का शब्द-सौन्दर्य और शिल्प देखिये-

गौतम गाँधी हूँ, विनोबा भी नहीं हूँ मैं

मगर महसूस करता हूँ कि कर दूं अब क्षमा उसको

काफ़िये का होश है वज्न से है वास्ता

कह रहे हैं वो ग़ज़ल बेबहर मेरे देश में

शाइरी केवल सोच कि उपज नहीं, वेदना कि गहन अनुभूति के क्षणों में जब रचनाकार शब्द शिल्पी बनकर सोच को एक आकार देकर तराशते हैं तब शायरी बनती है.  और फिर रचनात्मक ऊर्जा की परिधि में जब संवेदना का संचार होता है, तब कहीं अपनी जाकर वह अपनी अंदर की दुनिया को बाहर से जोड़ता है. अपने चिंतन के माध्यम से कवि समाज और सामाजिक सरोकारों के विभिन्न आयाम उजगार करता है. इस संग्रह में कवि ने सामाजिक, राजनैतिक, धार्मिक विडम्बनाओं, विद्रुपताओं, मानवीय संवेदनाओं पर दो पंक्तियों में शब्दों की शिल्पाकृतियों के माध्यम से अपनी जद्दो-जहद को व्यक्त किया है. उनके मनोभावों को इन अद्भुत अश्यार में टटोलिये–

हमने जिसको भी बनाया सारथी इस देश का

है सदा ढाया उन्होंने कहर मेरे देश में

हो चुकी संवेदनाएं शून्य

लाश के ओढे कफ़न हैं हम

मर गया वो मुफ़लिसी में चित्रकार

चित्र जिसके स्वर्ण से मढ़ते रहे

बड़ी सादगी और सरलता से शब्द ‘संवेदना-शून्य” का इस्तेमाल इस मिसरे में हुआ है, बिकुल सहज सहज, यह देखा और महसूस किया जा सकता है. श्री गौतम जी ने ज़िन्दगी के ‘महाभारत’ को लगातार जाना है, लड़ा है.  नए विचारों को नए अंदाज़ में केवल दो पंक्तियों में बांधने का काम,  दरिया को कूजे में समोहित करने जैसा दुष्कर प्रयास वे सुगमता से कर गए हैं. अपनी ग़ज़लों द्वारा वे देश, काल, परिस्थिति, टूटते रिश्तों और जीवन दर्शन को एक दिशा दे पाए हैं,  जो मानसिक उद्वेलन के साथ वैचारिकता की पृष्टभूमि भी तैयार करते हैं. देखिये उनकी इस बानगी में…

वक़्त कि टेडी नज़र के सामने

अच्छेअच्छे सर झुकाकर चल दिए

बेचकर ईमान अपना क़ातिलों के हाथ

बेकसों के आंसुओं पर पल रहे हैं लोग

काव्य की सबसे छोटी कविता ग़ज़ल है, जो संक्षेप्ता में बहुत कुछ कहती है. उसके शब्दों की बुनावट और कसावट पाठक को आकर्षित करती है. गौतम जी की लेखनी में उनका संस्कार, आचरण उनकी पहचान का प्रतीक है. जब वे अपनी बोलचाल की भाषा एवं राष्ट-भाषा हिंदी की बात करते हैं तो उनके तेवर महसूस करने योग्य होते हैं-

हिंदीदिवस पर कीजिये गुणगान हिंदी का

पर बाद में सब भूलकर अंग्रेजी बोलिये

मानव- जीवन से जुड़े अनुभवों, जीवन-मूल्यों में निरंतर होते ह्रास और समाज में व्याप्त कुनीतियों व् कुप्रथाओं को उन्होंने बखूबी अपनी ग़ज़लों की विषयवस्तु बनाकर पेश किया है–

इल्म की है क़द्र रत्ती भर नहीं

काम होते है यहाँ पहचान से

हाथ का मज़हब पंछी देखते

जो भी दाना दे ख़ुशी से खा गये

हिन्दू, मुस्लिम,सिख खड़े देता सबको छाँव

पेड नहीं है मानता मज़हब की प्राचीर

गौतम जी की रचनायें मानव जीवन के इतिवृत को लक्षित करती हैं. डॉ.श्याम दिवाकर के शब्दों में “यहाँ सुख के क्षण भी हैं, दुःख भी है, आंसू भी हैं, हास भी.यहाँ असफलता भी है, गिरकर उठने का साहस भी, और इसी कशमकश के बीच से गुज़ारना है, अँधेरे से रोशनी लानी है.” जहाँ चमन सूखता जा रहा है और मालियों को चिंता नहीं, वहां भी गौतम जी की सकारात्मक सोच प्यार के रिश्ते को मज़बूती प्रदान करती है. उन्हें के शब्दों में आइए सुनते हैं–

प्यार के बूटे खिलेंगे नढ़रतों की शाख़ पर

अपने दुश्मन को नज़र भर देखिये तो प्यार से

शाइर नदीम बाबा का कथन है ” ग़ज़ल एक सहराई पौधे की तरह होती है, जो पानी की कमी के बावजूद अपना विकास जारी रखता है.” इसी विकास की दिशा में गौतम जी से और भी आशाएं सुधी पाठकों और ग़ज़ल के  शायकों को हैं. उनकी क़लम की सशक्तता अपना परिचय खुद देती आ रही है, मैं क्या कहूं?

दर्ज है पृष्ट पर उनकी कहानी क्या कहूं

एक निर्झर झरने जैसे है रवानी क्या कहूं?

दिली मुबारकबाद एवं शुभकामनाओं सहित

प्रस्तुतकर्ता: देवी नागरानी

ग़ज़ल-संग्रह: वक़्त के मंज़र, लेखक: डा॰ ब्रहमजीत गौतम, पन्नेः ७२, मूल्य: रु.100. प्रकाशक: नमन प्रकाशन, नई दिल्ली.

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