शहर में उज़डी हुई देखी कई हैं बस्तियां

शहर में उज़डी हुई देखी कई हैं बस्तियां
हर तरफ देखे खंडर, देखीं फ़क़त बरबादियां.

कहते हैं बेकान दीवारें भी सुन लेती हैं बात
ग़ौर से सुनकर तो देखो तुम कभी खामोशियां.

पलकें आंखों के लिये बोझिल कभी होती नहीं
किरकिरी महसूस हो तो देख बस परछाइयां.

रश्ते तो विश्वास से पलते हैं दौलत से नहीं
वर्ना क्यों कर टूटते दिल, टूटती क्यों शादियां.

धूप दुख और छाँव सुख का है समुंदर ज़िंदगी
जो मुक़द्दर का सिकंदर वो ही जीते बाज़ियां.

जान पाओगी तुम इस शोर में अपना वजूद
खुद से मिलने पर देवी’, भायेंगी तन्हाइयां. 111

Advertisements

3 टिप्पणियाँ

  1. tejwani girdhar said,

    अप्रैल 5, 2011 at 3:00 पूर्वाह्न

    बहुत प्यारा शब्द विन्यास है

  2. R.M.TEWARI said,

    अप्रैल 26, 2011 at 12:48 अपराह्न

    Ujadtee hai jindgiya ,Ek kahani ban jati he,Tamam news papero me sama jati hai,kishi ka kam ban jata,kishi ka bana banya bigad jata hai,Kishi ke asu thamne ka na nam leta hai,Vah kya jeevan hai ,Esi ko jingani kahete hai,fir bhee devi ji mandir me jake aapka hi nam lete hai.

    Thanks Devi ji

  3. Devi nangrani said,

    मई 2, 2011 at 9:42 पूर्वाह्न

    Tiwari ji
    aapka dhanywaad
    Devi Nangrani


एक उत्तर दें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / बदले )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / बदले )

Connecting to %s

  • Blog Stats

  • मेटा

  • %d bloggers like this: