“हिंदी साहित्य बनाम प्रवासी हिंदी साहित्य”

श्री रूपसिंह चँदेल जी के ब्लाग पर http://www.vaatayan.blogspot.com/

हिंदी साहित्य बनाम प्रवासी हिंदी साहित्य” नाम का लेख पढ़ा और साथ में यू.के. के वारिष्ट ग़ज़लकार श्री प्राण शर्मा जी की यह रचना, जिसने सोच में फिर से तहलका मचा दिया

“कविता कथा को तुमने प्रवासी बना दिया

मुझको लगा कि ज्यों इन्हें दासी बना दिया ”

प्रसव पीड़ा की गहराई और गीराई उनकी इस रचना में महसूस की जाती है जब देश के बाहर रहने वाले सहित्यकार को प्रवासी के नाम से अलंक्रित किया जाता है. क्या कभी अपनी मात्र भाषा भी पराई हुई है? कभी शब्दावली अपरीचित हुई है? इस वेदना को शब्दों का पैरहन पहनाते हुए वे भारत माँ की सन्तान को निम्मलिखित कविता में एक संदेश दे रहे है….यही परम सत्य है, अनुज नीरज का कथन “शब्द, भाव प्रवासी कैसे हो सकते हैं? ,ख़ुशबू कभी क्या किसी दाइरे में क़ैद हुई!! भारत माँ हमारी जन्मदातिनी है. क्या देश से दूर परदेस में जाने से रिश्तों के नाम बदल जाते हैं. अगर नहीं तो प्रवासी शब्द किस सँदर्भ में उपयोग हो रहा है. भाषा का विकास हमारा विकास है, और यह सिर्फ देश में ही नहीं यहाँ विदेश में भी हो रहा है इसको नकारा नहीं जा सकता. इस बात को लेकर अनेक अभिव्यक्तियां अपने विचारों सहित सामने आयीं हैं . “व्यक्ति प्रवास करता है, कविता नहीं। कविता तो हृदय की भाषा है” इस कथन की गहराई में एक पीड़ा अंगड़ाई ले रही है, हिंदी का विकास हो रहा है और बढ़ावा मिल रहा है उसमें प्रवासी भारतीयों की भागीदारी बराबर रही है. दर असल साहित्य एक ऐसा लोकतंत्र है जहाँ हर व्यक्ति अपनी कलम के सहारे अपनी बात कह और लिख सकता है, यह आज़ादी उसका अधिकार है..हाँ नियमों की परिधि में रहकर! , उसे महसूस करना है.

सूरज की रोशनी की तरह भाषा पर हर हिंदोस्तानी का उतना ही अधिकार है जितना एक बालक का माँ की ममता पर होता है. ये उसका हक़ है और इस विरासत को उससे कोई नहीं छीन सकता!. पानी पर लकीरे खींचने से क्या पानी अलग होता है? साहित्य और समाज का आपस में गहरा संबंध है. एक को दूसरे से अलग नहीं किया जा सकता, एक का प्रभाव दुसरे पर अनिवार्य रूप से पड़ता है- दोनों एक दूसरे के निर्माण में सहयोगी हैं. इसमें भारतीय संस्कृति की आत्मा की संवेदनशीलता, उदारता, सदाचरण, एवं सहस जैसे मानवीय गुण हैं.  लेखक का रचनात्मक मन शब्दों के जाल बुनकर अपने मन की पीढ़ा को अभिव्यक्त करता है. लिखता वह अपने देश की भाषा में है, पर परदेस में बैठकर, और उसे प्रवासी साहित्य कह कर सुशोभित किया जाता है. लेखक सोच के ताने बने बुनता है हिंदी में, लिखता है हिंदी में, पर वह साहित्य प्रवासी कहलाया जाता है . ऐसे लगता है जैसे भाषा को ही बनवास मिल गया है.!! साहित्य कोई भी हो, कहीं भी रचा गया हो, अगर हिंदी में है तो निश्चित ही वह हिंदी का साहित्य है.  रिश्ता मान्यता की बुनियाद पर मुक्कमिल पाया जाता है.
गर्भनाल के ३७ अंक में रेनू राजवंशी गुप्ता का आलेख “अमेरिका का कथा-हिंदी साहित्य” पढ़ा. हिंदी भाषा को लेकर जो हलचल मची हुई है वह हर हिन्दुस्तानी के मन की है, जहाँ कोई प्रवासी और अप्रवासी नहीं, बस देश और देश की भाषा का भाव जब कलम प्रकट करती है तो जो मनोभाव प्रकट होते हैं उन्हें किसी भी दायरे में कैद करना नामुमकिन है. न भाषा की कोई जात है न लेखन कला की. रेणुजी का कथन “हिंदी लेखकों ने कर्मभूमि बदली है” इस बात का समर्थन है!
आदमी प्रवासी होता है, साहित्य नहीं. देस विदेस के बीच एक नयी उड़ान भरता प्रवासी साहित्य हर बदलती विचारधारा के परिवर्तित मूल्यों से परिचित कर रहा है, अपने विचार निर्भीकता से, स्पष्टता से और प्रमाणिकता से व्यक्त करके यथार्थ की परिधि में प्रवेश पाता है. प्रवास में रहकर यहाँ का
हिन्दी सम्मेलन मारिशस में प्रस्तुत डॉ. ओदोलेन स्मेकल के भाषण के एक अंश में हिन्दी-राष्ट्रीयता और अंतरराष्ट्रीयता के संदर्भ में कहा था- ”मेरी दृष्टि में जो स्वदेशी सज्जन अपनी मातृभाषा या किसी अपनी मूल भारतीय भाषा की अवहेलना करके किसी एक विदेशी भाषा का प्रयोग प्रात: से रात्रि तक दिनों दिन करता है, वह अपने देश में स्वदेशी नहीं, परदेशी है।” अगर यह सच है तो प्रवास में हिंदी साहित्य लिखने वाला भारतीय प्रवासी कैसे हो सकता है? तमिलनाडू हिन्दी अकादमी के अध्यक्ष डा॰ बालशौरि रेड्डी का इस विषय पर एक सिद्धाँतमय कथन है “हिंदी का साहित्य जहाँ भी रचा गया हो और जिसने भी रचा हो, चाहे वह जंगलों में बैठ कर लिखा गया हो या ख़लिहानों में, देश में हो या विदेश में, लिखने वाला कोई आदिवासी हो, या अमेरिका के भव्य भवन का रहवासी, वर्ण, जाति धर्म और वर्ग की सोच से परे, अपनी अनुभूतियों को अगर हिंदी भाषा में एक कलात्मक स्वरूप देता है, तो वह लेखक हिन्दी भाषा में लिखने वाला क़लमकार होता है और उसका साहित्य जिस भाषा में भी रचा होगा वह उसी भाषा का साहित्य कहलायेगा.”
साहित्य कोई भी हो, कहीं भी रचा गया हो, अगर हिंदी में है तो निश्चित ही वह हिंदी का साहित्य है. जयहिंद
देवी नागरानी.

बिखरे मोती

 वक्त की पाठशाला में एक साधक”-श्री समीर लाल समीर‘  

कलम आम इन्सान की ख़ामोशियों की ज़ुबान बन गई है. कविता लिखना एक स्वभाविक क्रिया है, शायद इसलिये कि हर इन्सान में कहीं न कहीं एक कवि, एक कलाकार, एक चित्रकार और शिल्पकार छुपा हुआ होता है. ऐसे ही रचनात्मक संभावनाओं में जब एक कवि की निशब्द सोच शब्दों का पैरहन पहन कर थिरकती है तो शब्द बोल उठते हैं. यह अहसास हू-ब-हू पाया, जब श्री समीर लाल की रचनात्मक अनुभूति ‘बिखरे मोती’ से रुबरु हुई. उनकी बानगी में ज़िन्दगी के हर अनछुए पहलू को कलम की रवानगी में खूब पेश किया है-

हाथ में लेकर कलम, मैं हाले-दिल कहता गया 

काव्य का निर्झर उमड़ता, आप ही बहता गया.  

यह संदेश उनकी पुस्तक के आखिरी पन्ने पर कलमबद्ध है. ज़िन्दगी की किताब को उधेड़ कर बुनने का उनका आगाज़ भी पठनीय है-

मेरी छत न जाने कहाँ गई 

छांव पाने को मन मचलता है!

इन्सान का दिल भी अजब गहरा सागर है,  जहाँ हर लहर मन के तट पर टकराकर बीते हुए हर पल की आहट सुना जाती है. हर तह के नीचे अंगड़ाइयां लेती हुई पीड़ा को शब्द स्पष्ट रुप में ज़ाहिर कर रहे हैं, जिनमें समोहित है उस छत के नीचे गुजारे बचपन के दिन, वो खुशी के खिलखिलाते पल, वो रुठना, वो मनाना. साथ साथ गुजरे वो क्षण यादों में साए बनकर साथ पनपते हैं. उस अनकही तड़प की वादी से निकल पाना कहाँ इतना आसान होता है , जिनको समीर जी शब्दों में बांधते हुए ‘मां’ नामक रचना में कहते हैं:

वो तेरा मुझको अपनी बाहों मे भरना

माथे पे चुम्बन का टीका वो जड़ना..

ज़िन्दगी में कई यादें आती है, उनमें से कुछ यादें मन के आईने में धुंधली पड़कर मिट जाती हैं और कुछ मन से जुड़ जाती हैं.  पर अपनी जननी से यह अलौकिक नाता, ममता के आंचल की छांव तले बीता हर पल,  तपती राह पर उस शीतलता के अहसास को ढूंढता रहता है. उसी अहसास की अंगड़ाइयों का दर्द समीर जी के रचनाओं का ज़ामिन बना है-

जिन्दगी, जो रंग मिले/ हर रंग से भरता गया,

वक्त की है पाठशाला/ पाठ सब पढ़ता गया…

        इस पुस्तक में अपने अभिमत में हर दिल अज़ीज श्री पंकज सुबीर की पारखी नज़र इन सारगर्भित रचनाओं के गर्भ से एक पोशीदा सच को सामने लाने में सफल हुई है. उनके शब्दों में ‘पीर के पर्वत की हंसी के बादलों से ढंकने की एक कोशिश है और कभी कभी हवा जब इन बादलों को इधर उधर करती है तो पर्वत साफ नज़र आता है.”. माना हुआ सत्य है, ज़िन्दगी कोई फूलों की सेज तो नहीं, अहसासों का गुलदस्ता है जिसमें शामिल है धूप-छांव, गम-खुशी और उतार-चढ़ाव की ढलानें. ज़िन्दगी के इसी झूले में झूलते हुए समीर जी का सफ़र कनाडा  के टोरंटो  से लेकर हिन्दोस्तान के अपने उस घर के आंगन से लेकर हर दिल को टटोलता हुआ वो उस गांव की नुक्कड़ पर फिर यादों के झरोखे से सजीव चित्रकारी पेश कर रहा है अपनी यादगार रचना में ‘मीर की गजल सा’-

सुना है वो पेड़ कट गया है/ उसी शाम माई नहीं रही

अब वहां पेड़ की जगह मॉल बनेगा/ और सड़क पार माई की कोठरी

अब सुलभ शौचालय कहलाती है,

मेरा बचपन खत्म हुआ!

कुछ बूढ़ा सा लग रहा हूँ मैं!!

मीर की गज़ल सा…!

        दर्द की दहलीज़ पर आकर मन थम सा जाता है. इन रचनाओं के अन्दर के मर्म से कौन अनजान है ?  वही राह है, वही पथिक और आगे इन्तजार करती मंजिल भी वही-जानी सी,  पहचानी सी, जिस पर सफ़र करते हुए समीर जी एक साधना के बहाव में पुरअसर शब्दावली में सुनिये क्या कह रहे हैं-

गिनता जाता हूँ मैं अपनी/ आती जाती इन सांसों को

नहीं भूल पाता हूँ फिर भी/ प्यार भरी उन बातों को

लिखता हूँ बस अब लिखने को/ लिखने जैसी बात नहीं है.

        अनगिनत इन्द्रधनुषी पहुलुओं से हमें रुबरु कराते हुए हमें हर मोड़ पर वो रिश्तों की जकड़न, हालात की घुटन, मन की वेदना और तन की कैद में एक छटपटाहट का संकेत भी दे रहे हैं जो रिहाई के लिये मुंतजिर है. मानव मन की संवेदनशीलता, कोमलता और भावनात्मक उदगारों की कथा-व्यथा का एक नया आयाम प्रेषित करते हैं-  ‘मेरा वजूद’ और ‘मौत’ नामक रचनाओं में:

मेरा वजूद एक सूखा दरख़्त / तू मेरा सहारा न ले

मेरे नसीब में तो / एक दिन गिर जाना है

मगर मैं/ तुम्हें गिरते नहीं देख सकता, प्रिये!!

एक अदभुत शैली मन में तरंगे पैदा करती हुई अपने ही शोर में फिर ‘मौत’ की आहट से जाग उठती है-

उस रात नींद में धीमे से आकर/ थामा जो उसने मेरा हाथ…

और हुआ एक अदभुत अहसास/ पहली बार नींद से जागने का…

माना ज़िन्दगी हमें जिस तरह जी पाती है वैसे हम उसे नहीं जी पाते हैं, पर समीर जी के मन का परिंदा अपनी बेबाक उड़ान से किस कदर सरलता से जोश का रंग,  भरता चला जा रहा है. उनकी रचना ‘वियोगी सोच’ की निशब्दता कितने सरल शब्दों की बुनावट में पेश हुई है-

पूर्णिमा की चांदनी जो छत पर चढ़ रही होगी..

खत मेरी ही यादों के तब पढ़ रही होगी…

हकीकत में ये ‘बिखरे मोती’ हमारे बचपन से अब तक की जी हुई जिन्दगी के अनमोम लम्हात है,  जिनको सफ़ल प्रयासों से समीर जी ने एक वजूद प्रदान किया है. ब्लॉग की दुनिया के सम्राट समीर लाल ने गध्य और पध्य पर अपनी कलम आज़माई है. अपने हृदय के मनोभावों को,  अपनी जटिलताओं को  मन के मंथन के उपरांत सरलता से वस्तु व शिल्प के अनोखे अक्स बनाकर अपने गीतों, मुक्त कविता, मुक्तक, क्षणिकाओं और ग़ज़ल स्वरुप पेश कर पाए हैं. उनकी गज़ल का मक्ता परिपक्वता में कुछ कह गया, आइये सुनते हैं….

शब्द मोती से पिरोकर, गीत गढ़ता रह गया

पी मिलन की आस लेकर, रात जगता रह गया.

वक्त की पाठशाला के शागिर्द ‘समीर’ की इबारत, पुख़्तगी से रखा गया यह पहला क़दम…आगे और आगे बढ़ता हुआ साहित्य के विस्तार में अपनी पहचान पा लेगा इसी विश्वास और शुभकामना के साथ….

शब्द मोती के पिरोकर, गीत तुमने जो गढ़ा

मुग्ध हो कर मन मेरा ‘देवी’ उसे पढ़ने लगा

तुम कलम के हो सिपाही, जाना जब मोती चुने

ऐ समीर! इनमें मिलेगी दाद बनकर हर दुआ..

 समीक्षकः देवी नागरानी

न्यू जर्सी, यू. एस. ए.

कृति: बिखरे मोती, लेखक: समीर लाल ‘समीर’, पृष्ठ : १०४, मूल्य: रु २००/,प्रकाशक: शिवना प्रकाशन, पी.सी. लेब, सम्राट कॉम्पलैक्स बेसमेन्ट, बस स्टैंड के सामने, सिहोर, म.प्र. ४६६ ००१

   

Princeton Mushaira

डा. सरदार सोज़ साहिब, शिवरंजनी, डा॰ शशि तिवारी، देवी नागरानी, रजनी भार्गव , अनीता सोनी, अनूप भार्गव और डॉ. दाऊजी गुप्त

Association of South Asians at Princeton (ASAP)  ईकविता समूह और हिंदी विकास मंच की प्रस्तुति एक सुरमई शाम..गीत, ग़ज़ल और कविता के नाम भारत से आमंत्रित चुनी हुई कविये त्रियों के साथ एक भूलने वाली शाम !! 

 

शनिवार तारीख़ १३ जून, २००९ की शाम, काविता और संगीत का अनूठा संगम ,

Carl A. Fields Center, in Princeton University, NJ में सफलता पूर्ण संपूर्ण हुआ

 

आमंत्रित कवियेत्रियां 

 

 

 गीत, और ग़ज़ल की शोख़ी अनीता सोनि (इन्दौर) 

 

ग़ज़ल की मिठास और नज़ाकत देवी नागरानी (मुंबईन्यू जर्सी)

 बालीवुड की उभरती गायिका शिवरंजनी (मुंबई

डा॰ शशि तिवारी, डा. सरदार सोज़ साहिब, देवी नागरानी, अनीता सोनी

 

 साहित्य प्रेमियों ने कला, साहित्य और सामाजिक कार्यों के प्रोत्साहन हेतु ईकविता समूह और हिंदी विकास मंच की प्रस्तुति की शुरुवात की है. साहित्य सृजन में अपने किये गए प्रयासों को आगे बढ़ाते हुए, शनिवार तारीख़ १३ जूलाई, २००९ की शाम, एक काव्य गोष्टी का आयोजन किया गया. इसमें प्रवासी भारतीय साहित्य प्रेमियों की मौजूदगी इसे अंतराष्ट्रीय स्तर पर स्थापित कर पाई. आइये गोष्टी का एक सुखद सफ़र तय करते हैं
मुख्य अतिथिअमेरिका निवासी डा॰ सरदार सोज़ साहिब ने अध्यक्षता के पद संभाला, आयोजकश्री अनूप भार्गव ने संचालन का भार बख़ुबी संभाला.
माँ शारदा को नमन करते हुए, श्री अनूप भार्गव ने मुख्य अतिथि का परिचय दिया.. सुरमई शाम की शुरूवात युवा शागिर्द कार्तिकेय ने, जिसने पिआनो पर सुरमई धुन से सभाग्रह में बैठे श्रोताओं का मन मोह लिया. फिर सिलसिला शुरू हूआ चारों कवियित्रिओं से, जिसमें शामिल थे गीत, मुक्तक, ग़जल, देश भक्ति पर आधारित रचनाएं..

 

वंदना ki शुरुवात करते हुए शिवरंजनी ने कई गीतों को सुरों में पिरोते हुए शाम को और सुनहरा बना दिया. जिसकी छोर पकड़ी उनकी माताजी डा॰ शशि तिवारी ने . हर राग की रचनाएं बिना साज़ों के दिल के तारों पर बजती रहीं. ढिर बारी डेवी नागरानी जी की आई जिन्होंने अपनी सुरीली आवाज़ में अपनी गज़लें सुनाई और उनका छोर पकड़ा अनीता सोनी जी ने जो भारत से आई हुई थी, उनकी रचनाओं के विषय रुचिकर रहे और अदायगी लाजवाब 

 शाम का रंग और गाढा़ करने के लिये शामिल रहे श्री घनश्याम चंद्र गुप्ता, रजनी भार्गव, सुरे्द्र नाथ तिवारी, हिमांशू पाठक, डा॰ मेहता और अनूप भार्गव, डा॰ दाऊजी गुप्त. अध्यक्षता के अंतिम चरण को अंजाम देने के पहले डा॰ सरदार सोज़ जी उर्दू शायरी के अनमोल शेर अपनी खालिश भरी आवाज़ में सुनाये. श्रोताओं मे शामिल रही डा॰ आभा, कांता जी, .सुनकर आन्नद उठाने के लिये download करें यहां से kavita.sune@yahoo.com  , http://ibc2006.smugmug.com/share/1jWCfQm4JF7es 

सुरीली आवाज़ और भावों का संगम डा॰ शशि तिवारी (आगरा)  

शोर दिल में मचा नहीं होता

शोर दिल में मचा नहीं होता

गर उसे कुछ हुआ नहीं होता॰

काश! वो भी कभी बदल जाते

सोच में फासला नहीं होता॰

कुछ कशिश है ज़मीन में वर्ना

आसमाँ यूँ झुका नहीं होता

झूठ की बेसिबातियों की क़सम

सच के आगे खड़ा नहीं होता

अपना नुक्सान यूं न वो करता

तैश में आ गया नहीं होता

नज़रेआतिश न होती बस्ती यूं

गर मेरा दिल जला नहीं होता

दर्द देवीका जानता कैसे?

ग़म ने उसको छुआ नहीं होता

  • Blog Stats

  • मेटा