शाइर गज़ल तुम्हारी

गजलः

ये नैनहोंट चुप है, फिर भी सुनी है हमने
उन्वां थी गुफ़्तगू की, शाइर गज़ल तुम्हारी

ये रात का अँधेरा, तन्हाइयों का आलम
ऐसे में सिर्फ साथी, शाइर गज़ल तुम्हारी

नाचे हैं राधा मोहन, नाचे है सारा गोकुल
मोहक ये कितनी लगती, शाइर गज़ल तुम्हारी

है ताल दादरा ये, और राग भैरवी है
सँगीत ने सजाई, शाइर गज़ल तुम्हारी

मन की जो भावनायें, शब्दों में हैं पिरोई
है ये बड़ी रसीली, शाइर गज़ल तुम्हारी

अहसास की रवानी, हर एक लफ्ज़ में है
है शान शायरी की, शाइर गज़ल तुम्हारी

अनजान कोई रिश्ता, दिल में पनप रहा है
धड़कन ये है उसीकी, शाइर गज़ल तुम्हारी

दो अक्षरों का पाया जो ग्यान तुमने देवी
उससे निखर के आई, शायर गजल तुम्हारी

लगती है मन को अच्छी, शाइर गज़ल तुम्हारी
आवाज़ है ये दिल की, शाइर गज़ल तुम्हारी

मेरे साथ वो मेरी मां की दुआ है.

अंधेरी गली में मेरा घर रहा है
जहां तेलबाती बिना इक दिया है.

जो रौशन मेरी आरजू का दिया है
मेरे साथ वो मेरी मां की दुआ है.

अजब है, उसी के तले है अंधेरा
दिया हर तरफ़ रौशनी बांटता है.

यहां मैं भी मेहमान हूं और तू भी
यहां तेरा क्या है, यहां मेरा क्या है.

खुली आंख में खाहिशों का समुंदर
अंजाम जिनका कोई जानता है.

जहां देख पाई अपनी ख़ुदी मैं
जाने वहीं मेरा सर क्यों झुका है.

तुझे वो कहां देवीबाहर मिलेगा
धड़कते हुए दिल के अंदर खुदा है.

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