उस शिकारी से ये पूछो

ग़ज़ल:

उस शिकारी से ये पूछो पर क़तरना भी है क्या
पर कटे पंछी बता परवाज़ भरना भी है क्या?

आशियाना ढूंढते हैं, शाख़ से बिछड़े हुए
गिरते उन पत्तों से पूछो, आशियाना भी है क्या?

अब बायाबां ही रहा है उसके बसने के लिए
घर से इक बर्बाद दिल का यूँ उखड़ना भी है क्या?

महफ़िलों में हो गई है शम्अ रौशन, देखिए
पूछो परवानों से उसपर उनका जलना भी है क्या?

वो खड़ी है बाल खोले आईने के सामने
एक बेवा का संवरना और सजना भी है क्या?

पढ़ ना पाए दिल ने जो लिक्खी लबों पर दास्तां
दिल से निकली आह से पूछो कि लिखना भी है क्या?

जब किसी राही को कोई रहनुमां ही लूट ले
इस तरह ‘देवी’ भरोसा उस पे रखना भी है क्या. 117

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2 टिप्पणियाँ

  1. tejwani girdhar said,

    दिसम्बर 20, 2010 at 2:57 पूर्वाह्न

    कमाल का दार्शनिक चिंतन झलकता है आपकी रचनाओं में, बहुत बहुत साधुवाद

  2. दिसम्बर 23, 2010 at 5:48 अपराह्न

    हो गय बरबाद उन्की आशिकी शमशीर से /
    इश्क करने से डरोगे, तो भला डरना है क्या ?


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