रेत पर तुम बनाके घर देखो

गजलः
रेत पर तुम बनाके घर देखो
कैसे ले जायेगी लहर देखो

सारी दुनिया ही अपनी दुशमन है
कैसे होगी गुज़रबसर देखो

शब की तारीकियां उरूज पे हैं
कैसे होती है अब सहर देखो

खामुशी क्या है तुम समझ लोगे
पत्थरों से भी बात कर देखो

वो मेरे सामने से गुज़रे हैं
मुझसे हों जैसे बेख़बर देखो

 

रूह आज़ाद फिर भी कैद रहे
तन में भटके हैं दरबदर देखो

 

सोच की शम्अ बुझ गई देवी
दिल की दुनियां में डूबकर देखो

 

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2 टिप्पणियाँ

  1. दिसम्बर 13, 2010 at 8:52 अपराह्न

    आदरणीया देवी नांगरानीजी
    प्रणाम !
    अंतर्जाल पर जबसे चहलकदमी शुरू की है मैंने , अपने मिज़ाज के मुताबिक ब्लॉग-साइट्स की तलाश करता रहा हूं । कई अच्छे रचनाकारों तक पहुंच कर लगता है कि यहां भी बड़े हुनरमंद अदीब मौजूद हैं ।
    इनमें सर्वाधिक ध्यान खींचने वाले नामों में एक देवी नांगरानी यानी आपका नाम है ।
    जब पत्र-पत्रिकाओं में मैं आपकी ग़ज़लियात देखता-पढ़ता था तब भी बहुत प्रभावित होता था ।
    अब सौभाग्य से आपकी दोनों ग़ज़ल-पुस्तकें मुझे आपने उपलब्ध करवाई हैं , ( आभारी हूं ) तो लगता है कि एक ख़ज़ाना मिल गया … !

    और इस ख़ज़ाने के लालो-जवाहिर, एक से एक नायाब गौहर अब आम ब्लॉगर के लिए भी लगातार उपलब्ध कराए जा रहे हैं … बहुत ख़ुशी की बात है ।
    ग़ज़ल सीखने के सच्चे ख़्वाहिशमंदों के लिए तो इस ब्लॉग पर आने का मतलब है बहुत कुछ पाना ।

    बात करूं आज प्रस्तुत ग़ज़ल की …
    छोटी बह्र की इस ग़ज़ल की रवानी देखते ही बनती है । … और तमाम अश्’आर एक से एक । किसे कोट किया जाए किसे छोड़ा जाए …

    शब की तारीकियां उरूज पे हैं
    कैसे होती है अब सहर देखो

    कितने मानी निकल कर आते हैं इस शे’र के
    वाह वाऽऽह वाऽऽऽह

    ख़ामुशी क्या है तुम समझ लोगे
    पत्थरों से भी बात कर देखो
    क्या एहसास का शे’र है ! माशाअल्लाह !

    … और इस शे’र की मा’सूमियत काबिले-ता’रीफ़ है-
    रूह आज़ाद फिर भी क़ैद रहे
    तन में भटके हैं दर- बदर देखो

    मक़ता !
    जहां सारी संभावनाएं समाप्त लग रही हों
    वहीं जैसे उम्मीद का सूरज सामने आने का एहसास …
    सोच की शम्अ बुझ गई ‘देवी’
    दिल की दुनियां में डूबकर देखो

    हमारी मंज़िल हमारे अंदर ही है …
    जितनी बधाई दूं , कम है…

    अनंत शुभकामनाओं सहित
    – राजेन्द्र स्वर्णकार

  2. दिसम्बर 15, 2010 at 8:28 अपराह्न

    Rajendra ji
    aapka bahut bahut aabhaar. Safar ka mera safar taveel nahin hai, har mod par kuch naya seekhne ko mil jaata hai..manzil to iski hoti hi nahin..aapki shubhkamanyein bhi usmein shamil hai.
    ssneh
    Devi nangrani


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