मेरे वतन की खुशबू

बादेसहर वतन की, चँदन सी रही है
यादों के पालने में मुझको झुला रही है.

ये जान कर भी अरमां होते नहीं हैं पूरे
पलकों पे ख़्वाब देवीफिर भी सजा रही है.

कोई कमी नहीं है हमको मिला है सब कुछ
दूरी मगर दिलों को क्योंकर रुला रही है.

कैसा सिला दिया है ज़ालिम ने दूरियों का
इक याद रही है, इक याद जा रही है.

पत्थर का शहर है ये, पत्थर के आदमी भी
बस ख़ामशी ये रिश्ते, सब से निभा रही है.

तुमको गिला है मुझसे, मुझको नसीब से था
ये जिंदगी भी क्या क्या, सदमें उठा रही है.

शादाब याद दिल में, इक याद है वतन की
तेरी भी याद उसमें, घुलमिल के रही है.

देवीमहक है इसमें, मिट्टी की सौंधी सौंधी
मेरे वतन की खुशबू, केसर लुटा रही है.

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3 टिप्पणियाँ

  1. tejwani girdhar said,

    दिसम्बर 8, 2010 at 2:52 पूर्वाह्न

    आपकी रचना वाकई मर्मस्पर्शी है
    अपने वतन के प्रति आपका कितना प्यार है, वो आपने एक रचना ही भर दिया है

  2. दिसम्बर 8, 2010 at 1:54 अपराह्न

    सुन्दर रचना. अपना वतन आखिर अपना ही होता है.

  3. दिसम्बर 10, 2010 at 11:55 अपराह्न

    Aapka abhaar in protsahan bhare shabdon mein jo meri soch ko seenchti rahti hai


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