जाने क्यों बात मगर करने से शरमाते हैं

गज़लः

देख कर तिरछी निगाहों से वो मुस्काते हैं
जाने क्यों  बात मगर करने से शरमाते हैं.

मेरी यादों में तो वो रोज चले आते हैं
अपनी आँखों में बसाने से वो कतराते हैं.

दिल के गुलशन में बसाया था जिन्हें कल हमने
आज वो बनके खलिश जख्म दिये जाते हैं.

बेवफा मैं तो नहीं हूं ये उन्हें है मालूम
जाने क्यों फिर भी मुझे दोषी वो ठहराते हैं.

मेरी आवाज़ उन्होंने भी सुनी है, फिर क्यों
सामने मेरे वो आ जाने से कतराते  हैं.

दिल के दरिया में अभी आग लगी है जैसे
शोले कैसे ये बिना तेल लपक जाते हैं.

रँग दुनियां के कई देखे है देवी लेकिन
प्यार के इँद्रधनुष याद बहुत आते हैं.

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6 टिप्पणियाँ

  1. tejwani girdhar said,

    दिसम्बर 7, 2010 at 3:05 पूर्वाह्न

    bahut pyara hai, taareef ke liye shabd nahi hai.

  2. tejwani girdhar said,

    दिसम्बर 7, 2010 at 3:06 पूर्वाह्न

    behad pyara hai

  3. puja jha said,

    दिसम्बर 7, 2010 at 6:14 पूर्वाह्न

    बढि़या प्रवाह है भाई साहब आपकी लेखनी में, धन्‍यवाद.
    pujajha

  4. tejwani girdhar said,

    दिसम्बर 7, 2010 at 7:53 पूर्वाह्न

    ve bhaaisahab nahi, bahin ji hai.

  5. दिसम्बर 10, 2010 at 4:39 अपराह्न

    ये खूब सूरत लफ्ज , कहां से लाते है ?
    शायरी लिखने के लिये , आप क्या खाते है ?

  6. दिसम्बर 13, 2010 at 4:49 अपराह्न

    Bajpeyi Saheb
    aapki housla afzayi hamari soch ko seenchti hai..


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