शिक्षायतन-काव्य श्री पुरुस्कार2010

संस्कृति सभ्यता का महाविश्वविद्यालय शिक्षायतन

  तारीख़ १८, दिसम्बर २०१० शिक्षायतन की ओर से आयोजित किया गया २२ वां सांस्कृतिक संगीतमय बालदिवस Hindu Temple Society of North America, Flushing, NY में सम्पन्न हुआ। पूर्णिमा देसाई शिक्षायतन की निर्माता, निर्देशिका अध्यक्ष एवं संचालिका है, जिन्होंने बड़ी समर्थता के साथ संचालन की बागडोर संभाली. दीप प्रज्वलन और शंख नाद के साथ कार्यक्रम आरँभ हुआ, जिसमें स्वामी राजा राम व मुख्य मेहमान श्री सुरेन्द्र कौशिक जी शरीक रहे. समारोह पावन श्री गणेश व शिव वंदना से आगे बढ़ता रहा.

शिक्षायतन के प्रांगण में आना एक अनुभूति है और साथ में एक अनुभव भी. इस समारोह में भाग लेते हुए ऐसे लगा कि जो बीज पूर्णिमा जी ने कल बोये थे वे आज इतने फले फूले है, बस यूं कहिये एक महकता हुआ गुलिस्ताँ बन गया हैं. इस संगठन का विकास अनेक त्रिवेणियों के रूप में हो रहा है – हिन्दी भाषा का विकास, संगीत, नाट्य, वायलिन वादन,शास्त्रीय संगीत, और तबले पर जुगलबंदी, लगता है अमरिका में यह एक अद्भुत महा विश्वविद्यालय है जहाँ हमारी भारतीय संस्कृति पनप रही है. एक मंच पर इस प्रतिभाशाली नव युग की पीढ़ी को विकसित होता देखकर यह महसूस हुआ जैसे हर युग में रवीन्द्रनाथ टैगोर का एक शांतिनिकेतन स्थापित हो रहा है. विश्वास सा बंधता चला जा रहा है जैसे देश हमसे दूर नहीं है. जहाँ जहाँ इस तरह की संस्कृति पनपती रहेगी वहीं वहीं हिंदोस्तान की खुशबू फैलती रहेगी. श्रीमती पूर्णिमा देसाई का सपना है अपने भारत की सभ्यता व संस्क्रुति को सक्रिय रूप से न्यू यार्क में अपने शिक्षायतन के प्रांगण में एक गुरुकुल की अनुकूलता का स्वरूप देने का है और यह क़दम क़ाबिले तारीफ़ है जिसके लिये वे बधाई की पात्र हैं. इस श्रेष्ट कार्य में उनकी सुपुत्री कविता का भी सहयोगी हाथ है जिन्हें मेरा साधुवाद.

  • “मैं हिंदी हूँ, भारत माँ की बिंदी हूँ” अभिव्यक्त करने वाली हस्ताक्षर श्रीमती पूर्णिमा देसाई ने एक भक्ति गीत प्रस्तुत किया. शिक्षायतन की शिक्षा प्रधान पत्रिका “अभ्युदय” का विमोचन भी हुआ. साथ साथ पहल हुई श्रीमद् भगवद् गीता के श्लोक, और मन्त्रों के उच्चारण की, जिससे वातावरण पावन हो गया. साज़ और आवाज़ में  “वन्दे मातरम” और फिर शिक्षायतन का गायन “हर धरती का रहने वाला ”  प्रस्तुत किया गया जिसको गाया गया कविता, सुतपा, मोइत्रेयी, केवल और वायलन पर साथ दिया ऋतू ने.
  • श्रीमती योशिता चंद्रानी ने अपने भीतर की सितार वादन की अनुभूतियों को अपने विद्यार्थियों की क्षमता में दर्शाया, जिन्होंने सितार पर प्रस्तुत किये राग काफ़ी, भैरवी, सोहनी, और राग तोड़ी. एक समां सा सुर-सागर का बंध गया और रसपान करते हुए श्रोतागण भाव विभोर होकर संगीत का आनंद लेते रहे.
  • त्रिमूर्ति आर्ट स्कूल के निर्देशक श्री अनिल रामबदरी जी के विद्यार्थियों  ने जुगलबंदी में लास्य ताँडव पेश किया जिसमें भागीदारी रही शिव के रूप में अमृता और पार्वती के रूप थी सात्विक . प्राण्या नृत्य में सनम राधा बनी और शालिनी बनी कृष्ण. पुरातन संस्कृति के ये पावन दृश्य मनोरंजन के साथ अपना परिचय भी दे रहे थे जिससे विश्वास हुआ कि भारतीय सभ्यता और संस्कृति हमारी धरोहर है.
  • श्री अनिल शुक्ल, राज ढींगरा, व रतन धार, ने गायकी की हर धारा को अपनी इल्म और हुनर से एक लहर का स्वरुप प्रदान किया. मीनू पुरुषोतम ने ‘ये हकीकत नहीं तो क्या है?’ अपने कोकिल स्वर में गाकर श्रोताओं का मन जीत लिया.  हाल में तालियों के गूँज प्रतिध्वनित होती रही.
  • ·स्वरांजली ने फ़िज़ाओं में एक मधुर समां बांधा जब विख़्यात सितार वादक श्री पार्थ बोस की उंगलियाँ सितार पर थिरकती हुई राग जयजयवंती और राग पीलू के सुरों में श्रोताओं को बहाव में बहा ले जाने में बखूबी कामयाब रहीं. तबले पर साथ रहा इमरान ख़ान का और तानपुरे पर संगत की श्री इब्राहिम मशरकी ने.

काव्यांजली के अंतर्गत काव्य पाठ करने वाले कविगण रहे, श्रीमती पूर्णिमा देसाई, डॉ.सरिता मेहता, श्री राम गौतम, श्री अशोक व्यास, श्रीमती देवी नागरानी, श्री गोपाल बघेल “मधु”,  श्रीमती सुषमा मल्होत्रा और श्री आनंद आहूजा.  श्रीमती पूर्णिमा देसाई की हाज़िरी में विशेष अतिथी डा॰ क्रष्ना एवं श्री दिगविजय गिरनार ने अपने हाथों से सभी कवियों को “काव्य श्री”  पुरुस्कार से सन्मानित किया.

अंत में दीपक शेनाइ, बिपाशा डे, एवं प्रियंका देबनाथ ने संयुक्त पंजाबी भांगड़ा किया और उसी धमाल के साथ कार्यक्रम की समाप्ति हुई जिसके बाद  सभी ने मिलजुल कर राष्ट्रीय गान “जन गन मन” गाया .

  • 2010 Shikshayatan

    2010 Shikshayatan

    संगीत विभूषण पंडित कमला प्रसाद मिश्रा जी, जो इस संस्था को सुर और साज़ से सींचते आ रहे है उनकी अनुपस्थिति का आभास रहा.  उन्हें २००९ में संगीत सम्राट की उपाधि से निवाजा गया और २०१० में छत्तीसगढ़ भारतीय सन्मान से सुशोभित किया गया है. उन्हें हमारी शत शत बधाई. जयहिंद

देवी नागरानी

२० दिसंबर २०१०

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उस शिकारी से ये पूछो

ग़ज़ल:

उस शिकारी से ये पूछो पर क़तरना भी है क्या
पर कटे पंछी बता परवाज़ भरना भी है क्या?

आशियाना ढूंढते हैं, शाख़ से बिछड़े हुए
गिरते उन पत्तों से पूछो, आशियाना भी है क्या?

अब बायाबां ही रहा है उसके बसने के लिए
घर से इक बर्बाद दिल का यूँ उखड़ना भी है क्या?

महफ़िलों में हो गई है शम्अ रौशन, देखिए
पूछो परवानों से उसपर उनका जलना भी है क्या?

वो खड़ी है बाल खोले आईने के सामने
एक बेवा का संवरना और सजना भी है क्या?

पढ़ ना पाए दिल ने जो लिक्खी लबों पर दास्तां
दिल से निकली आह से पूछो कि लिखना भी है क्या?

जब किसी राही को कोई रहनुमां ही लूट ले
इस तरह ‘देवी’ भरोसा उस पे रखना भी है क्या. 117

रेत पर तुम बनाके घर देखो

गजलः
रेत पर तुम बनाके घर देखो
कैसे ले जायेगी लहर देखो

सारी दुनिया ही अपनी दुशमन है
कैसे होगी गुज़रबसर देखो

शब की तारीकियां उरूज पे हैं
कैसे होती है अब सहर देखो

खामुशी क्या है तुम समझ लोगे
पत्थरों से भी बात कर देखो

वो मेरे सामने से गुज़रे हैं
मुझसे हों जैसे बेख़बर देखो

 

रूह आज़ाद फिर भी कैद रहे
तन में भटके हैं दरबदर देखो

 

सोच की शम्अ बुझ गई देवी
दिल की दुनियां में डूबकर देखो

 

दोस्ती के नाम पर

दोस्तों का है अजब ढब, दोस्ती के नाम पर
हो रही है दुश्मनी अब, दोस्ती के नाम पर.

इक दिया मैने जलाया, पर दिया उसने बुझा
सिलसिला कैसा ये यारब, दोस्ती के नाम पर.

दाम बिन होता है सौदा, दिल का दिल के दर्द से
मिल गया है दिल से दिल जब, दोस्ती के नाम पर.

जो दरारें ज़िंदगी डाले, मिटा देती है मौत
होता रहता है यही सब, दोस्ती के नाम पर.

किसकी बातों का भरोसा हम करें ये सोचिए
धोखे ही धोखे मिलें जब, दोस्ती के नाम पर.

कुछ न कहने में ही अपनी ख़ैरियत समझे हैं हम
ख़ामुशी से हैं सजे लब, दोस्ती के नाम पर.

दिल का सौदा दर्द से होता है ‘देवी’ किसलिए
हम समझ पाए न ये ढब, दोस्ती के नाम पर.

मेरे वतन की खुशबू

बादेसहर वतन की, चँदन सी रही है
यादों के पालने में मुझको झुला रही है.

ये जान कर भी अरमां होते नहीं हैं पूरे
पलकों पे ख़्वाब देवीफिर भी सजा रही है.

कोई कमी नहीं है हमको मिला है सब कुछ
दूरी मगर दिलों को क्योंकर रुला रही है.

कैसा सिला दिया है ज़ालिम ने दूरियों का
इक याद रही है, इक याद जा रही है.

पत्थर का शहर है ये, पत्थर के आदमी भी
बस ख़ामशी ये रिश्ते, सब से निभा रही है.

तुमको गिला है मुझसे, मुझको नसीब से था
ये जिंदगी भी क्या क्या, सदमें उठा रही है.

शादाब याद दिल में, इक याद है वतन की
तेरी भी याद उसमें, घुलमिल के रही है.

देवीमहक है इसमें, मिट्टी की सौंधी सौंधी
मेरे वतन की खुशबू, केसर लुटा रही है.

जाने क्यों बात मगर करने से शरमाते हैं

गज़लः

देख कर तिरछी निगाहों से वो मुस्काते हैं
जाने क्यों  बात मगर करने से शरमाते हैं.

मेरी यादों में तो वो रोज चले आते हैं
अपनी आँखों में बसाने से वो कतराते हैं.

दिल के गुलशन में बसाया था जिन्हें कल हमने
आज वो बनके खलिश जख्म दिये जाते हैं.

बेवफा मैं तो नहीं हूं ये उन्हें है मालूम
जाने क्यों फिर भी मुझे दोषी वो ठहराते हैं.

मेरी आवाज़ उन्होंने भी सुनी है, फिर क्यों
सामने मेरे वो आ जाने से कतराते  हैं.

दिल के दरिया में अभी आग लगी है जैसे
शोले कैसे ये बिना तेल लपक जाते हैं.

रँग दुनियां के कई देखे है देवी लेकिन
प्यार के इँद्रधनुष याद बहुत आते हैं.

धूप से रूठी चांदनी

एक परिपक्व कवि-मन की संवेदना 

       कविता एक तजुर्बा है, एक  ख़्वाब है, एक भाव है | जब दिल के अंतर्मन में मनोभावों का तहलका  मचता है, मन डांवाडोल होता है या ख़ुशी की लहरें अपने बांध को उलांघ जाती है तो कविता बन जाती है | कविता अन्दर से बाहर की ओर बहने वाला निर्झर झरना है |

        कविता शब्दों में अपना आकार पाती है, सोच के तिनके बुनकर, बुनावट और कसावट में अपने आप को प्रकट करती है | रचनात्मक सृष्टि के लिए शब्द बहुत जरुरी है, जिनको करीने  से सजाकर, सवांरकर एक भव्य भवन का निर्माण किया जाता है | दूसरी विशेषता जो कविता को मुखरित करती है वह है शब्दों को जीवंत बनाने की कलात्मक अभिव्यक्ति जो एक रीति का प्रयोग करने पर रचनाकार को कसौटी पर खरा उतारती है | इन्हीं  सभी गुणों की नींव  पर निर्माण करती, अपनी देश-परदेश की  भूली-बिसरी यादों को जीवंत करती, जानी मानी प्रवासी रचनाकार सुधा ओम ढींगरा की सुन्दर और भावनात्मक कविताएँ  ” धूप से रूठी चांदनी ” काव्य संग्रह में हमारे  रूबरू हुई है |

       आज की व्यवसायिक परिस्थितियों में आदमी अपनी उलझनों के दायरे से निकलने के प्रयासों में और गहरे धंसता चला जा रहा है | ऐसे दौर में मनोबल में सकारात्मक संचार कराती उनकी कविता
“मैं दीप बाँटती हूँ” अपने सर्वोत्तम दायित्व से हमें मालामाल करती है—
 “मैं दीप  बाँटती हूँ /  इनमें तेल है मुहब्बत का/
  बाती है प्यार की/ और लौ है प्रेम की /

रौशनी करती है जो हर अंधियारे ह्रदय औ’ मस्तिष्क  को |
निराला जी के शब्दों में “भावनाएं शब्द-रचना द्वारा अपना विशिष्ट अर्थ तथा चित्र द्वारा परिस्पुष्ट होती है | अर्थ शब्दों के द्वारा और शब्द वर्णों द्वारा”
 देखिये इसी कविता की एक कड़ी कैसे भाषा के माध्यम से भावो के रत्नों का प्रकाश भरती जा रही है | उनकी दावे दारी के तेवर देखिये:
  “मैं दीप लेती भी हूँ/ पुराने टूटे-पुटे
   नफरत, ईर्ष्या, द्वेष की दीप
  जिनमें तेल है/ कलह-कलेश का/बाती है बैर-विरोध की
   लौ करती है जिनकी जग- अँधियारा
सुधाजी, एक बहु आयामी रचनाकार के रूप में हिंदी जगत को अपनी रचनात्मक ऊर्जा से परिचित कराती आ रही है | उनके साहित्यिक व्यक्तित्व का विस्तार उनकी कहानियाँ, इंटरव्यू, अनुवादित उपन्यास हर क्षेत्र में अपनी पहचान पा चुका है  और अब ८०  कविताओं का यह संग्रह अपने बहु विध वैशिष्टिय से हमारा ध्यान बरबस आकृष्ट कर रहा है | इनकी रचनाएँ आपाधापी वाले संघर्षों से गुज़रते बीहड़ संसार के बीच एक आत्मीयता का बोध कराती हैं |
      “आज खड़ी हूँ…./ईश्वर और स्वयं की पहचान की ऊहापोह में……”
इनकी कवितात्मक ऊर्जा में आवेग है, एक परिपक्व कवि मन की गहन संवेदना, चिंतात्मक और सामाजिक बोध का जीवंत बोध शब्दों के बीच से झांकता हुआ कह रहा है :
“अब दाग लगे दामन पर जितने, सह लुंगी
दुनिया जो कहे झेलूंगी/ तू जो कहे ….चुप रहूंगी
अपनी  लाश को काँधे पर उठाये/ वीरानों  में
दो काँधे और ढूँढूँगी  / जो उसे मरघट तक पहुंचा दे…….”
      दर्द ही वो है जो मानव-मन  की पीड़ा का मंथन करता है और फिर मंथन का फल  तो सभी को समय के दायरे में रहकर चखना पड़ता है | कौन है जो बच पाया है? कौन है जो ज़ायके से वंचित रहा  है? सुधाजी ने बड़ी संवेदना से समाज में पनपते अमानवीय कोण की प्रबलता को दर्शाया है | जहाँ नारी की पहचान घर की चौखट तक ही रह गई है, अपने जिम्मेदारियों की सांकल से बंधी हुई वह नारी जकड़ी हुई अपने तन की कैद में, घर की कैद में..
    ” दुनिया ने जिसे सिर्फ औरत / और तूने महज़ बच्चों की माँ समझा / “
जिन्दगी की सारी चुनौतीयों से रूबरू कराती सुधाजी की कलम अपनी सशक्तता का परिचय दे रही है | जो कवि अपने शीश-महल में बैठकर काव्य सृजन करते है वे तानाशाहों के अत्याचारों से वाकिफ़ तो है, लेकिन मनुष्य की पीड़ा और वेदना उन्हें द्रवित नहीं करती | धरती पर न जाने कितने लोग कराहते  हैं, कितना लहू बहता रहता है, कितनी साँसों में घुटन भर दी जाती है, ज़ुल्मतों का दहकता हुआ साया जब कवि  मन पर अपनी छाप छोड़ जाता है, तो कलम से निकले शब्द जीवंत हो जाते हैं, खामोशियों से सम्वाद करते हैं,  उन पीड़ाओं का, जिनको तनमन से भोगा ,सहा. जहाँ वेदना कराह उठती है वहीँ उनकी बानगी में हर एहसास धीमे से थपथपाता है, टटोलता है और उलझे हुए प्रश्नों का जवाब तलब करता है:
  “आतंकवादी हमला हो/ या जातिवाद की लड़ाई /
   रूह, वापिस देश अपने भाग जाती है.”
 और फिर कटाक्ष करती शब्दावली का रूप देखिये :
 “तोड़ा था पुजारी ने /मंदिर के भरम को
जब सिक्के लिए हाथ में बेईमान मिल गए”
जीवन सिर्फ जीने और भोगने का नाम नहीं, समझने और समझाने का विषय भी है | इसी काव्य सुधा में उनके उर्वर मस्तिष्क की अभिनव उपज है उनकी अनूठी रचना (जिसको सुनने का मौका मुझे उनके रूबरू ले गया )जिससे उनकी सम्पूर्ण कविताओं की स्तरीयता एवं विलक्ष्णता का अनुभव सहज ही लगाया जा सकता है.”प्रतिविम्ब “में उठाये प्रसंग समाजिक, पारिवारिक —- चिंतन को पारदर्शी बिम्ब बनकर सामने आये..

“मैं  आप का ही प्रतिबिम्ब हूँ.
बलात्कार से पीड़ित कोई बाला हो/ या सवर्णों से पिटा कोई दलित …
मेरा खून उसी तरह खौलता है/ जैसे आप भड़कते थे |”

लेखन कला अपनी पूर्णता तब ही प्रकट कर पाती है जब भाषा या शैली अपने तेवरों के प्रयोग से कल्पना  और यथार्थ का अंतर मिटा दे… अपने परिवेश में जो देखा गया, महसूस किया गया और भोगा गया, उसे विषय-वस्तु बनाकर सुधाजी  अपनी रचनाओं  द्वारा पाठक को अनुभव सागर से जोड़ लेती हैं |  उनकी अनेक रचनाएँ आप बीती से जग बीती तक का सफ़र करती हुई, हद की सरहदों तक को पार करने की कोशिश में कहती है अपनी कविता “शहीद” में
“नेताओ और धर्म के लिए,
इन्सान नहीं
सिर्फ सिपाही शहीद    हुआ.”                                                                                                                                                        

हर रचना अपने धर्म क्षेत्र के दायरे में घूमती है, कहीं छटपटाती है, और कहीं- कहीं मंजिल के पास आते- आते दम तोड़ देती है | ऐसी सशक्त कविताएँ है “बेरुखी, समाज, मुड़ कर देखा, परदेस की धूप, खुश हूँ मैं ,और  देस -परदेस  की व्यथा- गाथा को बहुत सुन्दरता से माँ के नाम चिट्ठी में लिख भेजा सन्देश उनकी जुबानी सुनें :
“परदेस से  चिट्ठी आई,
माँ की आँख भर आई
लिखा था खुश हूँ मैं चिंता न करना
घर के लिया है किश्तों पर/ कार ले ली है किश्तों पर
फर्नीचर ले लिया किश्तों पर / यहाँ तो सब कुछ ख़रीदा जाता है किश्तों पर”

सोच की हर सलवट पीड़ा से भीगी हुई, आँख फिर भी नम नहीं | ऐसी अभिभूत करती हुई रचनाओ के लिए सुधाजी को बधाई एवं शुभ कामनाएँ | शिवना प्रकाशन की कई कृतियों में से यह एक अनूठी कृति अब भारत और विदेश के बीच की पुख्ता कड़ी बनी है श्रेय है शिवना प्रकाशन को, हर प्रयास को जो हर कदम आगे और आगे सफलता की ओर बढ़ रहा है !

देवी नागरानी                                                           

काव्य संग्रह :धूप से रूठी चांदनी, कवित्री :डॉ सुधा ओम ढींगरा
पन्ने :११२ मूल्य :३०० रु 
प्रकाशक :शिवना प्रकाशन,
P.B.Lab,
Samart Complex Basement,
Bus Stand,
Sehore-466001. U.P.

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