Sanmaan mein Kayvya Goshti

डा॰ सरिता मेहता के सन्मान में काव्य गोष्टी

मुम्बई बी.ए.आर.सी. के साहित्य प्रेमियों ने कला, साहित्य और सामाजिक कार्यों के प्रोत्साहन हेतु “सबरस” नामक समूह की शुरुवात की है. साहित्य सृजन में अपने किये गए प्रयासों को आगे बढ़ाते हुए, २९ मार्च २००९ के दिन मुम्बई में चेम्बूर इलाके के कलेक्टर कालोनी में एक काव्य गोष्टी का आयोजन किया गया. इसमें प्रवासी भारतीय साहित्य प्रेमियों की मौजूदगी इसे अंतराष्ट्रीय स्तर का बना देती है. आइये गोष्टी का एक सुखद सफ़र करते हैं …

मुख्य अतिथि- अमेरिका से आयी प्रवासी भारतीय श्रीमती डॉ सरिता मेहता और गजलकार श्रीमती देवी नांगरानी | अन्य वरिष्ठ साहित्य सृजक- श्रीमती शुक्ला शाह जिन्होंने नारी साहित्य सृजन को एक सम्मानजनक स्थान दिलवाया है, रंजन नटराजन जो “कुतुबनुमा” नामक पत्रिका की संपादिका हैं।

आयोजक- ” सबरस ” समूह, जिनमें कवि कुलवंत, श्री गिरीश जोशी और प्रमिला शर्मा सक्रीय रहें|

संचालक- लोचन सक्सेना

काव्य गोष्टी रचना पाठ- शाम ५.३० बजे काव्य गोष्टी की शुरूआत हुई.| माँ शारदा को नमन करते हुए, संचालक ने मुख्य अतिथि का परिचय दिया. प्रमिला शर्मा ने सभी उपस्थित रचनाकारों को गुलाब पुष्प देकर स्वागत किया. रचनाओं के सुनने और सुनाने का सिलसिला शुरू हुया और रात ८.४५ तक चलता ही रहा| देवी नांगरानी ने अपनी ग़ज़ल गा कर सुनाई| वरिष्ट रचनाकार कपिल कुमार ने दोहे कहे। नीरज गोस्वामी ने गज़लें गायीं | नंदलाल थापर ने अपनी रचना “चूड़ी” सुनाई. शकुन्तला शर्मा जी ने देश भक्ति रचना गायी|. मानिक मूंदे, जो मराठी के भी रचनाकार हैं, अपनी हिन्दी की समसामयिक रचना सुनाकर लोगों का ध्यान आकर्षित करते रहे | मुख्य अतिथि डॉ सरिता मेहता ने भी अपनी ग़ज़ल सुनाई . कवि कुलवंत ने ” मुखौटा ” की बातें अपनी रचना से की| अवनीश तिवारी ने देवी सरस्वती पर अपने छंद कहे और बसंत पर रचना सुनाई |

इसके अतिरिक्त ओमप्रकाश चतुर्वेदी, प्रमिला शर्मा, मंजू गुप्ता, त्रिलोचन, कुमार जैन था अन्य कई रचनाकारों ने रचना पाठन किया | गीत, ग़ज़ल, शेर, छंद और दोहे से सजी इस महफ़िल का समापन सभी के मेल मिलाप और आशीष-आशीर्वाद से हुआ|

आठवाँ विश्व हिंदी सम्मेलन

हिंदी का नया सूर्योदय नज़र आ रहा है.

१३, १४, १५ जुलाई, न्यू यार्क

८वें विश्व हिंदी सम्मेलन के शिखर पर एक सुन्हरा दरवाज़ा UNO में भारतवासियों के लिये खुला है, उसका इतिहास गवाह है.सम्मेलन का मूल मक्सद ही यही है कि हिंदी को विश्व मंच पर स्थापित करना. तमाम देशों से आए हिंदी प्रेमी संयुक्त राष्ट्र संघ के मुख्यालय के कान्फ्रेंस हाल में दाखिल हुए तो अहसास हुआ UNO ने खुले दरवाजों ने हिंदुस्तानियों का सन्मानित स्वागत किया है. यहाँ गाँधी जी का कथन सत्य बनकर सामने आया ” अपने दरवाज़े खुले रखो, विकास अंदर आएगा,”

और यह दिन एक ऐतिहासिक यादगार रहेगा.वह दिन दूर नहीं जब संयुक्त राष्ट्र संघ हिंदी भाषा को भी अपने आलंगन में ले लगा.संयुक्त राष्ट्र संग की भाषा बनाने का प्रयास सफलता की सीडियाँ चढता जहां पहुंचा है वहां पर मुकाम पाने की संभावना रौशन नज़र आती है. किसी भी भाषा का साहित्य उस भाषा का वैभव है, उस भाषा का सौंदर्य है. हर देश की तरक्की उसकी भाषा की तरक्की से जुड़ी होती है. हिंदी केवल भाषा नहीं, एक सौंदर्य है, बहती गंगा है, मधुर वाणी है.

मानव मन की वाणी हिंदी
आदि वेद की वाणी हिंदी.

वहाँ उपस्थित उद्घोषिका सुश्री शीला चमन ने सम्मान पूर्वक घोषणा करने का दायित्व लिया. मंच पर उपस्थित मुख्यगण थेः

१.भारत के विदेश मंत्री माननीय श्री आनंद शर्मा
२.अमरीका के भारत के राजदूत श्री राजेंद्र सेन
३. संयुक्त राष्ट्र के बारत के स्थाई प्रतिनिधि श्री निरुपम सेन
४. मरीशस के शिक्षा और मानव सँसाधन के साधन मंत्री श्री धरमबिर सेन गोखुल
५. नेपाल के उध्योग पति श्री राजेंद्र महतो
६. संयुक्त राष्ट्र के महा सचिव/प्रतिर्निधि बान की मून
७. भारतीय विध्या भवन, न्यू यार्क के अध्यक्ष डा॰ नवीन मेहता.
सयुंक्त राष्ट्र के महासचिव बान की मून हिंदी प्रेमियों का नमस्ते कह कर संबोधन करते हुए कहा “हिंदी दुनियां भर के लोगों को पास लाने का काम कर रही है और दुनियां भर की संस्क्रुर्तियों के बीच एक पुल का काम कर रही है. अंत में हिंदी में संबोधित करते हुए कहा ” उस सम्मेलन में भाग लेते हुए मुझे खुशी हो रही है. मैं सब को शुभकामनाएं देता हूँ, नमस्ते और धन्यवाद.” इससे पहले भारत के प्रधानमँत्री डा॰ मनमोहन सिंह का वीडियो संदेश दर्शाया गया जिसमें संदेश स्वरूप ” आज हिंदी विश्व भाषा बन चुकी है. आँकडे यह बताते हैं कि दुनियां में सबसे अधिक बोली जाने वाली भाषाऔं में हिंदी दूसरे स्थान पर है, सौ से अधिक विश्वविध्यालयों में हिंदी की पढ़ाई हो रही है. शनिवार इतवार के दिन हिंदी अनेक सँस्थाओं द्वारा पढ़ाई जाती है और यह एक शुभ संकेत है कि अमरीकी स्कूलों में सिलबस में भी हिंदी ने अपनी जगह बनानी शुरू कर दी है.
“यू एन ए के प्रँगण में टहलना, वहाँ की भीड का हिस्सा बनना भी एक अनुभव तो है पर ऐतिहासिक घटना भी है. परिसर में स्थंभित एक मूर्तिशिल्प था जो एक जो एक पिसतौल के आकार का था, जिसकी नाल की गाँठ बंधी हूई थी जैसे संकेत कर रही हो ” अब हिंसा नहीं चाहिये”. दिल्ली के प्रसिद्ध कवि और उस शाम के कवि सम्मेलन के सँचालक श्री अशोक चक्रधर जी का कहना है ” एक गाँठ यहाँ ज़रूर खुलती हुई दिखाई दी जो हिंदी को लेकर अब तह बंधी हुई नज़र आ रही है. यकीन कीजिये इस प्राँगण में
जिस तरह आज गूंजी है आगे भी गूँजती रहेगी. “हाँ सच है, जिस तरह भारत का राष्ट्रीय गीत ” जन गन मन” सभी के मुखारबिंद से मुख्यालय में गूंज बन के प्रतिध्वनित हो रहा था तो यह कहना अतिशयोक्ति न होगा
कि हम देश की भाषा को यहाँ अब यहाँ तक लाने में कामयाब रहे हैं, और होकर रहेंगे.
हिंदी भाषा जो हमारे साहित्यक , समाजिक, और सांस्क्रतिक कार्यों का माध्यम है और वही अब एकता को द्रढ करने लगी है. श्री आनंद शर्मा ने एक सुखद ऐलान किया दो आक्टोबर महात्मा गाँधी के जन्म दिन को “शाँति दिवस “ घोषति करते हुए कहा कि गाँधी जी के विचारों को, उनके सँदेशों को, उनके चुने हुए रास्तों
को अपनाने के सँकल्प से उन्हें और जनता को जो हर्ष हुआ वो तालियों की गूँज में समाया था, जहाँ भारत की आवाज़ आज अंतराष्ट्रीय स्तर पर सुनी जा रही है उसे सँपर्क की भाषा बनाने पर भी ज़ोर दिया गया. तिरँगा भारत की आज़ादी का प्रतीक है. जिन लोगों ने आज़ादी दिलाई, उन लोगों को याद रखना ऐसा है जैसे अपनी भाषा के ज़रिये हम अपनी भावनाओं को अभिव्यक्त करने में समर्थ हैं उसी के संदर्भ में हम उन शूरवीरों को, देश की मात्र भाषा को और माता के स्थान को नहीं भूल सकेंगे.
॰॰
सिलसिला आगे बढ़ा विशयों की बातचीत पर जिनमें कुछ विषय इस तरह थेः
संयुक्त राष्ट्र संघ में हिंदीः अध्यक्ष डा॰ गिरिजा व्यास
देश विदेश में हिंदी शिक्षणः अध्यक्ष श्री प्रेम चंद शर्मा
वैश्वी करण, मीडिया और हिंदीः अध्यक्षः श्रीमती म्रणाल पाँडेय
विदेशों में हिंदी स्रजन (प्रवासी हिंदी साहित्य) अध्यक्ष डा॰ इंदरा गोस्वामी
हिंदी के प्रसार प्रचार में सूचना प्रौध्योगिकी की भूमिकाः अध्यक्ष प्रो॰ अशोक चक्रधर
हिंदी के प्रसार प्रचार में हिंदी फिल्मों की भूमिकाः अध्यक्षः श्री गुलज़ार साहिब
हिंदी युवा पीढी और ग्यान विग्यानःअध्यक्ष डा॰ वाई लक्ष्मी प्रसाद
हिंदी भाषा और साहित्यः विविध अयामः अध्यक्षः श्रीमती चित्रा मुद्गल
साहित्य में अनुवाद की भूमिकाः अध्यक्षः डा॰ गोपीचंद नारंग

हिंदी और बाल साहित्यः अध्यक्षः डा॰ बालशौररि रेड्डी
देवनागरी लिपिः अध्यक्षः बालकवि बैरागी
राष्ट्रीय एकता का सूत्रः साँस्क्रतिक अयामज
अनुवाद की समस्याएः
पुस्तक व्यवसायः एक विहंगम द्रुष्टि
पुस्तकों का लोकार्पणः श्री आँनंद शर्मा
॰॰
विविध विषयों पर हिंदी पुस्तकों और पत्र पत्रिकाओं का लोकार्पण

विदेश राज्य मंत्री श्री आँनंद शर्मा ने “हिंदी उत्सव ग्रंथ ” “गगनाचल” के विशेषांक और हिंदी विद्वानों की निर्देशिकाओं का लोकार्पण किया. उसके बाद उन्होंने प्रवासी साहित्य की मुख्य कार्यकर्ता डा॰ अंजना संधीर व अन्य प्रवासी लेखिकाओं की मदद से सजाई गई ” प्रवासी पुस्तक प्रदर्शनी” का निरीक्षण किया और उसी शाम

अपने हाथों से २२ प्रवासी लेखक और लेखिकाओं की ३७ पुस्तकों का वोमोचन किया जिसमें मेरा “चराग- दिल” भी शामिल था. पुस्तकों का लोकार्पण और फोटो अवसर बहुत शुभ साबित हुआ. प्रवासी साहित्य को लेकर हिंदी की मुख्य धारा से जोड़कर एक मुकमिल कदम उठा सकते है, जिसमें हिंद के वासियों की धारा प्रवासी साहित्य से मिलकर पुख़्तगी पा सके और एक महासागर का स्वरूप प्रप्त कर हो सके.साहित्य के माध्यम से ही हम एक दूसरे से जुड़ सकते है. इसमें पत्रिकाओं का बहुत बडा हाथ है, उस सत्य को नकारा नहीं जा सकता.
१४ तारीख को डा॰ गिरिजा व्यास ने भी काफी समय तक पुस्तकों का निरीक्षण कियाऔर प्रोतसाहित करते शब्दों में हर लेखक के प्रयास को सराहा. संकेत यही मिलता है कि सिमटाव का कवच उतारकर अपने आपको फैलाने का वक्त आया है. खुद को पहचानकर राष्ट्र में अपनी जड़ें भाषा द्वारा मज़बूत करके अंतराष्ट्रीय स्तर पर पहचान पानी है, माधंयम फिर भी भाषा ही रहेगी. भाषा है तो हम हैं, हमारे देश की शान है.

बाल साहित्य के अध्यक्ष श्री बालशौर रेड्डी ने अपनी प्रतिक्रिया में संक्षेप में बताते हुए कहा ” बाल साहित्य के सूत्रों से आपका कहने सुनने का नाता है, था और चलता रहेगा. टिमटिमाते सितारे, पानी में मछली, , जिग्यासा भरे प्रश्न उत्पन करती है, प्रश्न उत्तर की चाहत रखता है, बस बाल मन समझने की जरूरत है, चिंतन मनन के पश्चात उसको पाचन करने का समय देना हमारा कर्तव्य है.
डा॰सुशीला गुप्ता ने कहा कि बच्चों के मनोविग्यान की ओर इशारा करते हुए कहा कि बच्चों का मन मस्तिष्क साफ स्वच्छ दिवार होता है जिस पर कुछ भी बड़ी सरलता से उकेरा जा सकता है. इसलिये बच्चों में बचपन से ये शब्द बीज बो देने चाहिये. इसी सिलसिले में दिल्ली के इंदिरा गाँधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविध्यालय की डा॰ स्मिता चतुर्वेदी ने बाल साहित्य के स्वरूप और दिशाओं पर रौशनी डालते हुए यही कहा ” कि साहित्य बालकों की अपनी विशिष्ट छोटी छोटी समस्याओं को उभारे, उन्हें गुदगुगाए, उनका मनोरंजन करे, और उनकी समस्याओं का आदर्श से हट कर समाधान दे, वही साहित्य श्रेष्ठ बाल साहित्य है.
हिंदी युवा पीढी और ग्यान विग्यान के अध्यक्षः डा॰ वाई लक्ष्मी प्रसाद एवं श्री गोविंद मिश्र थे. उस सिलसिले को आगे बढ़ाते हुए श्री नवीन मेहता ने अपने वक्तव्य में नई पीढी को हमारी गौरवशाली परंम्परा और भाषाओं के साथ जोडने का आग्रह किया. श्री गोपीनाथ जी ने कहा ग्यान की दिशा में अब जो खाइयाँ हैं, उन्हें पाटने के लिये जरूरी है कि उन्हें जन्म की भाषाओ में लाया जाये. पेन्सिलवेनिया के प्रों॰ सुरेंद्र गंभीर ने इस बात पर जोर दिया कि आवश्यक्ता ” शिक्षार्थी केंद्रित कार्यक्रमों की है. हिंदी के साथ प्रवासी भारतियों का यह भावात्मक संबध बहुत ही महत्वपूर्ण है. जहां पारंपरिक भाषा कमजोर हुई है, उसे फिर से सशक्त करने के आसार अच्छे हैं.”
सयुंक्त राष्ट्र संघ में हिंदी की अध्यक्ष डा॰ गिरिजा व्यास ने मंच पर अपने विचार जनता के सामने रखते हुए कहा “हिंदी भाषा जनता की भाषा है, इसका शिक्षण, परिक्षण, शोध, अनुशोध ज़रूरी है. शब्दावली का विस्तार हो शब्द कोष समर्थ हो यही सफलता की सीडी का पहला पड़ाव है. इस बात पर ज़ोर देते हुए राष्ट्रीय महिला आयोग की अध्यक्ष डा॰ गिरिजा व्यास ने कहा कि भाषा के माध्यम से हर क्षेत्र में उन्नति प्राप्त करनी है और लेखक ही सिर्फ दिशा दिखा सकते है अपनी कलम के जोर पर. इन सुंदर पंक्तियों से सारे हाल में गूंज सुनाई पड़ रही थीः

“हमने जड़ से उसे ढूंढा है
पर आज भावनाएं जड़ हो गई है.”

हिंदी के प्रचार-प्रसार में फिल्मों की भूमिका सत्र के अध्यक्ष सुप्रसिद्ध फिल्मकार गुलज़ार ने कहा कि हिन्दी भाषा के प्रचार-प्रसार में सिनेमा ने साहित्य से ज्यादा काम किया है. हिंदी फिल्मों ने ही हिंदी भाषा को संपर्क भाषा बनाया है इतना काम तो साहित्य अकादमी और नैशनल बुक ट्रस्ट जैसी स्स्थाओं ने भी नहिं किया.

विश्व के विभिन्न देशों के प्रितिनिधि, साहित्यकार, हिंदी सेवी, शिक्षक, प्रचारक, पत्रकार, सम्मेलन में आए और हिंदी के अतीत, वर्तमान, तथा भविष्य के संदर्भ में हिंदी के शिक्षण, प्रयोग, तथा प्रसार के अन्यान्य पहलुओं Top of Form 1
Bottom of Form 1
पर संवाद करते रहे, डा॰ पी जयरमन जो कार्यकारी निर्देशक, भारतीय विध्या भवन द्वारा सम्मेलन की रिपोर्ट की प्रस्तुति की दौरान बोले ” हिंदी की बहु अयामी उपलब्धियाँ एवं भविष्य के लिये दिशा निर्देश की चर्चाएं कर रहे हैं, यह अपने आप में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है”

राष्ट्रीय मान अधिकार आयोग के माननीय सदस्य श्री पी. सी. शर्मा जी ने अपनी बातों के दौरान कहा कि भाषा एक अदभुत रचना है, जो मनुष्य द्वारा रची भी जाती है और उसे रचती भी है. भारत की आत्मा को पहचानने के लिये हिंदी भाषा का ग्यान अत्यंत आवश्यक है. भाषा उन्नति का मूल है, कारण कि हमारे सारे पर्यास इसी के माध्यम से होते हैं, उसी से जुड़े होते हैं. हम भाषा में ही जीते हैं और भाषा हमारे व्यहवार में घुली है.

यू के से आए “पुरवाई” के संपादक र्श्री पद्मेश गुप्ता ने देश विदेश में हिंदी शिक्षण पर अगली पीढी को हिंदी से जोडने के अभियान ” हिंदी ग्यान प्रतियोगिता” की विस्त्रत जानकारी देते हुए कहा कि चर्चाओं के बजाए युवा पीढी को हिंदी से जोड़ने के ठोस प्रयास होने चाहिये और ब्रिटेन में किये जा रहे प्रयासों का वैश्विक विस्तार किया जाना चाहिये.”

हिंदी के प्रचार प्रसार में सूचना प्रोध्यौजिकी की भूमिका के अध्यक्ष श्री अशोक चक्रधर ने बडे ही रोचक ढंग से हिंदी के विकास के लिए सूचना तकनीक की आवश्यकता पर ज़ोर दिया. उन्होंने सत्र में उपस्थित सभी लोगों से अपील की कि वे भी हिंदी के प्रसार के लिये उन सभी हिंदी सेवियों और साहित्यकारों को तकनीक से जोड़ने की प्रतिबद्धता निभाएं जो सूचना प्रौध्योगिकी से दोस्ती करने से डरते हैं.

भारतीय विध्या भवन (न्यूयार्क) के अध्यक्ष श्री नवीन मेहता ने कहा यह एक ऐतिहासिक घटना अवसर है, हिंदी हमारे लिये एक भाषा से अधिक भारतीय संस्क्रुति के सम्मान का प्रतीक ह
“हिंदी भाषा नहीं है, एक प्रतीक है, भारत की पहचान है, हिंदी को बढावा मिल रहा है, यह हिंदुस्तानियों की मेहनत है. अनेक भाषाओं के आदान प्रदान से हमारी संस्क्रुति पहचानी जाती है. देश की तरक्की उस की भाषा से जुड़ी हुई होती है. इसमें बड़ा हाथ साहित्य कारों, लेखकों, संपादकों और मीडिया का है.
देवनागरी लिपि के अध्यक्ष श्री बालकवि बैरागी “प्रवासी पुस्तक प्रदर्शनी” के दौरान. दायें से बायें खडी है देवी नागरानी, अंजना संधीर, बालकवि बैरागी, कुसुम और अनूप भार्गव

वैश्वी करण, मीडिया और हिंदी के सेशन की अध्यक्ष और “दैनिक हिंदुस्तान” की संपादक म्रणाल पाँदेय ने आठवें हिंदी सम्मेलन के प्रथम दिन “वैश्वीकरण, मीडिया और हिंदी” सत्र के अपने अध्यक्षीय वक्तव्य में व्यक्त किये. उन्होंने कहा कि हमें आज हिंदी को लेकर अत्यधिक सशंकित होने की आवश्यकता नहीं है, न ही हमें अकारण चिंताएं करनी चाहिये.उन्होंने स्पष्ट किया कि कहीं न कहीं हम सब उपभोक्ता है, अंतः उपभोक्तावाद को गलत साबित करने में हमें अपनी शक्ति व्यर्थ नहीं करनी चाहिये.”

हिंदी भाषा और साहित्य की अध्यक्ष श्रीमती चित्रा मुद्गल ने अपने विचारों से अवगत कराते हुए कहा “इस सम्मेलन में मुझे अच्छी संभावनायें नज़र आ रही है. विषयगत जो चर्चाएं-परिचर्चाएं हो रही हैं वह प्रगति के लिये एक उत्तम संकेत है. हिंदी का भविष्य बहुत उज्ज्वल है और हिंदी को कोई रोक नहीं सकता.”

भाषा शिक्षण के अपने अनुभवों से परिचित कराते हुए सुश्री सुषम बेदी कहती है “भाषा पढ़ाना एक कला है और विज्यान भी. कला इसलिये कि उसमें लगातार सर्जनात्मकता की जरूरत है और विग्यान इसलिये कि उसमें व्यवस्था और नियमों का पूरा पूरा ध्यान रखना पड़ता है. ऊर्जा, उत्साह, सर्जनात्मकता और उपज जहां भाषा शिक्षण को एक कला का रूप पर्दान करते हैं, वहीं पाठक -पद्धतियों का सही इस्तेमाल विग्यान का. दोनों का संतुलन ही श्रेष्ठ भाषा शिक्षण की नींव है.”

दिल्ली से पधारे संपादक (हिंदी), नेशनल बुक ट्रस्ट के श्री देवशंकर नवीन जी ने राष्ट्रीय एकता का सूत्र के अंतरगत जो कहा वो कथन भी इसी सत्य को दोहराता है. उनका कहना है ” भाषा, मनुष्य के लिये अभिव्यक्ति का माध्यम मात्र नहीं, यह मानवीय संबंध-बंध का आधार है और शब्द रूप से हिंदी और अन्य भाषाओं मे लिखा साहित्य एक सूत्र में अनुवाद के द्वारा बंधता जा रहा है.” पुस्तक व्यवसाय की बात करते हुए भी उन्होंने आक सत्य से परदा उठाते हुए कहा “सर्वतोन्मुखी विकास के बाद लेखक, पाठक, प्रकाशक, वितरक, सब के सब राग में रोते रहते हैं. क्रेताओं का कहना है पुस्तकें मंहगी हो गई हैं, तो सवाल उठता है मानवता के अलावा कौन सी चीज़ सस्ती हुई जा रही है?”

हां ये और बात है कि विचारों के आदान प्रदान के बीच में मत भेद भी होगा, सवाल होंगे जिनका जवाब पाना मुशकिल होगा.पर मेरा अपना विचार है कार्य का सिलसिला चलता रहे, कड़ी से कडी जुडती रहे, ताकि सिलसिला बनता रहे कारवाँ बनता रहे. देश की भाषा उसकी संस्क्रुति, प्रवासी देशों से जुडती रहे तभी तो जाकर हम एक स्तर पर मिलजुल कर कुछ कार्य इस दिशा में कर पाएंगे. जब तक कलम तलवार का काम
नहीं करेंगी, अपनी नोक से लेखक, साहित्यकार, जनता की सोच, उनकी बात, उनके इरादे लेखन द्वारा आम जनता तक नहीं पहुंचाएंगे, तब तक संगठन बन नहीं सकता., इरादों में पुख्तगी व बुलंदी आ नहीं सकती. लक्ष्य एक है मंजिल एक है, तो राह भी एक ही बनानी पड़ेगी, और यह है अपनी देश की मात्र भाषा को घर घर तक लाने का संकल्प जो किया है उसे अपनी मंजिल तक पहुंचाये.
पर उस मुकाम को हासिल करने का जो भाषा का यग्य है उसकी बडी जिम्मेदारी हम पर, आप पर, और इस पीढी के नौजवान कंधों पर भी है. सवाल यह फिर भी मन में उठता है कि विरासत में हम अपने बच्चों को वह भाषा “हिंदी” , जिसके लिये हम तकरीरें करते हैं, दलीलें देते है, इकत्ठे होकर भीड का हिस्सा बनते हैं, वो अमानत उन्हें दे पाते है या नहीं. अगर हमारी युवा पीढी और आने वाली पीडियां इसे अपनाने में, संपर्क की भाषा बनाने में नाकामयाब होती है तो दोष हमारा है, देश की भाषा देश में मज़बूत रहेगी तो तब जाकर वह विदेश में पनप पायेगी, और तब ही मात्रभाषा से राष्ट्र भाषा बनेगी. देश की भाषा विदेश तक पहुंचे, यह हमारी परीक्षा है, कहाँ तक हम निभा पाते हैं, कितना सींच पाते है इसे अपना व्यहवार से, दुलार से ताकि इसकी जडों में पुख्तगी आ सके, और यह लोरी बनकर देश , प्रवासी देश के घर घर में जहां एक हिंदुस्तानी का दिल धडकता है, वहां गूज बन कर फिज़ाओं में फैलती रहे, जिसका विस्तार आकाश की बुलंदियों से ऊँचा हो. जय हिंद.

तीनों दिनों की शाम को थकान से राहत देने के लिये आयोजित किये गए थेः
१३ जूलाईः कवि सम्मेलन (संचालकः श्री अशोक चक्रधर)
१४ जूलाईः उस्ताद शुजात हुशेन का सितार वादन
श्रीमती गीता चंद्नन द्वारा भरतनाट्यम
१५ जूलाईः श्री पंकज उधास का गज़ल कार्यक्रम

प्रस्तुतकर्ताः

देवी नागरानी, न्यू जर्सी
dnangrani@gmail.com

कविता पाठ प्रतियोगिता

मात्रभूमि, मात्र-संस्कृति और मात्रभाषा को सन्मान के साथ सुसजित करती संस्था हिंदी यू.एस.ए की ओर से श्री कृष्ण वृन्दावन मंदिर के प्रांगण में कविता पाठ प्रतियोगिता

 

दिनांक शनिवार, १६ जनवरी २०१० हिंदी USA  जिसके के संस्थापक हैं श्री देवेन्द्र सिंह एवं रचिता सिंह. उनकी अनेकों शाखाओं से अपने आप में सर्वोतम काम करती शाखा  “एडिसन हिन्दी पाठशाला”  के छात्रों की कविता पाठ प्रतियोगिता सफलतापूर्ण संपन हुई जिसमें पाठशाला के १६० छात्र / छात्राओं ने जो अमेरिका में ही जन्मे तथा पले हैं उन्होंने भाग लिया . अधिकांश छात्र ६ वर्ष से १२ वर्ष की आयु के बीच के हैं. कविता पाठ प्रतियोगिता २ समूहों में विभाजित की गयी है. प्रत्येक समूह में तीन निर्णायकों की एक मंडली रही. इस विभाग के सेनानी संचालक है राज मित्तल, मानक काबरा, अजय कुमार,  और गोपाल चतुर्वेदी.

 पहले समूह में १२:०० से २:०० बजे निर्णय करने वाले थे- श्री रामबाबू गौतम, सुश्री देवी नागरानी, डा. श्री उमेश शुक्ला और दूसरे समूह में २.०० से ४.०० तक रहे डा. श्री हिमांशु ओम पाठक , डा. श्री नरेश शर्मा,  डा. श्री सुशील श्रीवास्तव.

बच्चों के मापदंड की श्रेणियां थीं उच्चारण , आत्मविश्वास, शैली, अभिव्यक्ति, स्मरण.

पहले समूह के तीन सत्र रहे जिन में अलग अलग उम्र के हिसाब से बच्चों को मौका दिया गया था. और उन तीनों सत्रों के संचालन का भार संभाला शशि शर्मा, प्रतिभा जी, और अंजलि मलिक ने. बच्चों ने अनेकों कविताएं पढ़ी जिनमे कुछ महादेवी वर्मा की और श्याम सुंदर अग्रवाल जी की भी शामिल थी,  जिनके उन्वान रहे कोयल, चंदामामा, कछुआ, हाथी राजा, घड़ी,  सारी दुनिया गोल है, तोता,  मेरा घर, दिवाली, सारे जहाँ से अच्छा. कई कवितायेँ सुनी हुई फिर से बच्चों के मुख से सुनने में भली लगी.

कविता पाठ से झलक रही थी हिंदी सिखाने वाले निस्वार्थ भावी हिंदी सेवक-सेविकाएँ की निष्ठा जो शुक्रवार के दिन इन कक्षाओं की बागडोर संभल लेते हैं. अंत की ओर आते मन को छूने वाली कविता का पाठ किया कुमारी सुमेघा दुबे ने अपने दादा जी श्री सूर्यदत्त दुबे जी ( उनका दुखद निधन १५, जनवरी २०१० को हुआ)  की एक रचना उन्हें ही श्रधांजलि स्वरुप अर्पित करते हुए पढ़ी

दीनानाथ दया निधि /दीजे कोई ऐसी संधि

यह प्रतियोगता सिर्फ बच्चों की ही नहीं थी, इस सफ़लता के भागीदार रहे उनके माता-पिता, उनके शिक्षक जिन्होंने इन बच्चों में वतन की मिटटी, उसके परिवेश के साथ जोड़ने में सहयोगी और सहभागी बने हैं. हिंदी भाषा के माध्यम से ये बच्चे अपने मनोबल को बढ़ाते हुए अपनी संस्कृति के साथ परिचित हो पाए हैं जिसका श्रेय इन हिंदी सेवकों को जाता है जिन्होंने अपने कन्धों पर मात्रभाषा को यहाँ इस परिवेश में स्थापित करने की ठान ली है.  इस समारोह के सफ़ल कार्यकर्ता रहे : राज मित्तल, मानक काबरा, अजय कुमार, गोपाल चतुर्वेदी, अर्चना कुमार, अरुण कुमार , सीमा गुप्ता, शिव एवं सुधा अग्रवाल, सुशील एवं वन्दना अग्रवाल, दीपक एवं नूतन लाल,   तथा अन्य तरुण कार्यकर्ता, अमर्पित अध्यापक एवं अभिभावक. ऐसे देश के सिपाहियों को मेरी शुभकामनयें और हार्दिक बधाई . जय हिंद

प्रस्तुतकर्ताः देवी नागरानी,

कैसी हवा चली है

गजलः ७५

कैसी हवा चली है मौसम बदल रहे हैं

सर सब्ज़ पेड़, जिनके साये में जल रहे हैं .

 

वादा किया था हमसे, हर मोड़ पर मिलेंगे

रुस्वाइयों के डर से अब रुख़ बदल रहे हैं.

 

चाहत, वफ़ा, मुहब्बत की हो रही तिजारत

रिश्ते तमाम आख़िर सिक्कों में ढल रहे हैं.

 

शादी की महफिलें हों या जन्म दिन किसीका

सब के खुशी से, दिल के अरमाँ निकल रहे हैं.

 

शहरों की भीड़ में हम तन्हा खड़े हैं ‘देवी’

बेचेहरा लोग सारे खुद को ही छल रहे हैं.

चराग़े-दिल/ १०१

  • Blog Stats

  • मेटा