काफ़िये का सिलसिलाः भाग छः

श्री आर. पी. शर्मा ‘महर्षि’
काफ़िये का सिलसिला आगे.

सहारे के लिये तिनका बहुत है
तिमिर में ज्योति की आशा बहुत है.

यदि मतले में यादगार – साज़गार को काफ़िये बनाया जाता है, तो वे इसलिये ग़लत हैं, क्योंकि दोनों में से गार निकाल देने पर याद – साज़ शेष बचते हैं जो तुकांत शब्द नहीं है, किंतु गार के स्थान पर यदि एक जगह बार जोड़ा जाये, तो वे का़फ़िये दोष रहित होंगे, जैसे

गुलिस्तां नें नसीमें – सुबह भी अब शोलाबार आये
ये मौसम मेरे दुश्मन को भी कैसे साज़गार आये.

कहने का मतलब यह है कि –
१. मतले में या तो दोनों काफ़िये विशुद्ध मूल शब्द हों, अथवा
२. एक मूल शब्द हो और दूसरा ऐसा शब्द जिसमें कुछ अंश बढ़ाया गया हो, अथवा
३. दोनों ही काफ़यों से बढ़ाये हुए अंश निकाल देने पर समान तुकांत शब्द ही शेष रहें, अथवा दोनों ही बढ़ाये हुए अंशों वाले काफ़ियों में व्याकरण भेद हो, अथवा
४. दोनों काफ़ियों में बढ़ाए हिए अंश समान अर्थ न दें.
उपयुक्त नियमों के अनुसार, मत्लों में काफ़ियों का रख – रखाव ध्यानपूर्वक देखें और समझें –

अगर ख़ुदा न करे सच ये ख़्वाब हो जाये
तेरी सहर हो, मेरा आफ़ताब हो जाये – दुष्यंत कुमार

जिंदगी भी अजब तमाशा है
जिस तरफ़ देख़िये हताशा है – महर्षि

ज़िन्दगी का ज़िंदगी से वास्ता ज़िंदा रहे
हम रहें जब तक हमारा हौसला ज़िंदा रहे – अशोक अंजुम

शिद्दते-गमींए-अहसास से जल जाऊंगा
बर्फ़ हूं, हाथ लगाया तो पिघल जाऊँगा – मुमताज राशिद

हर इक चहरा इबादत बन गया है
जिसे देखूँ शिकायत बन गया है – इब्राहिम अश्क

न पूछों कि मै क्यों सरे- दार हूँ
मैं सच बोलने का गुनहगार हूँ – महर्षि

बहुत घुटन है कोई सूरते- बयाँ निकले
अगर सदा न उठे कम से कम फुगां निकले – साहिर लुधयानवी

रही है दाद तलब उनकी शोख़ियाँ हमसे
अदा शनास बहुत है मगर कहाँ हमसे – जानिसार अख्तर

ग़ज़ल के नाम से जो कुछ कहा है
मेरी ज़िदादिली का मर्सिया है – सग़ीर मंजर, खंडवा

डाल दे साया अपने आँचल का
नातवां हूँ, कफ़न भी हो हल्का – नासिंख

टिप्पणीः इस मत्तले में एक क़ाफ़िया आँचल है जो स्वंय एक शब्द है, रदीफ़ का इससे अलग है, परंतु काफ़िया हल्का है, जिसमें क़फ़िया हल तथा रदीफ का एक ही शब्द के दो आँश हैं, ऐसी रदीफ़ को तहलीली कहते हैं.

चाह तन – मन को गुनहगार बना देती है
बाग़ के बाग़ को बीमार बना देती है – गोपालदास नीरज

धनक – धनक मेरी पोरों को ख़्वाब कर देगा
वो लम्स मेरे बदन को गुलाब कर देगा – परवीन शाकिर

हम है मताए – कूचे बाज़ार की तरह
उठती है हर निगाह खरीदार की तरह – मजरूह सुल्तानपुरी

अब के हम बिछड़े तो शायद ख़्वाबों में मिले
जिस तरह सूखे हुए फूल किताब में मिले – अहमद फराज़

हर जगह इम्तिहान है फिर भी
ये ग़ज़ल का जहान है फिर भी – इम्तियाज अहमद गाज़ी

मैं जब भी जाऊँ, वो घर को बड़ा सजा के रखे
बदन गुलाब तो दिल मैक़दा बना के रखे – जगदीस चँद्र पाण्डया

टिप्पणीः सजा मूल शब्द है. बना में दीर्घ मात्रा बढाई हुई है. अतः काफिये नियमानुसार निर्दोष हैं.
आगे और –
सिनाद दोष और इक्फा दोष के बारे में
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2 टिप्पणियाँ

  1. मार्च 26, 2008 at 4:37 अपराह्न

    बढ़िया जानकारी दे रही हैं..जारी रखें अपना आशीष. 🙂

  2. Devi Nangrani said,

    मार्च 27, 2008 at 12:14 अपराह्न

    Sameeer
    ye jaankari Shri sharma ji Book gazal lekhan kala se prastut kar rahi hoon jiska zikr shuroo mein kiya tha. main to bus type karke pesh kar rahi hoon. Jo seekha use share kar rahi hoon.

    dhanyawaad ke saath

    Devi


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