यही रौशनी है, यही रौशनी है.

ग़ज़लः ३५
बुझे दीप को जो जलाती रही है
यही रौशनी है, यही रौशनी है.
जो बेलौस अपने ख़ज़ाने लुटा दे
यही सादगी है,यही सादगी है.
रहे दूर सुख मेँ, मगर पास दुख में
यही दोस्ती है, यही दोस्ती है.
पिया हो मगर प्यास फिर भी हो बाक़ी
यही तिशनगी है, यही तिशनगी है.

बिना कुछ कहे बात आए समझ में
यही आशिकी है, यही आशिकी है.

कभी शांति में ख़ुश, कभी शोर में ख़ुश
यही बेदिली है, यही बेदिली है.

जो चाहा था वो सब न कर पाई ‘देवी’
यही बेबसी है, यही बेबसी है.

चराग़े-दिल/ ६१

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1 टिप्पणी

  1. mehek said,

    मार्च 25, 2008 at 5:52 अपराह्न

    रहे दूर सुख मेँ, मगर पास दुख में
    यही दोस्ती है, यही दोस्ती है.पिया हो मगर प्यास फिर भी हो बाक़ी
    यही तिशनगी है, यही तिशनगी है.bahut satya kaha,yahi dosti hai,aisi hi tishnagi hoti hai,wha bahut hi khubsurat.


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