बहता रहा जो दर्द का सैलाब

ग़ज़लः ३४
बहता रहा जो दर्द का सैलाब था न कम
आंखें भी रो रही हैं, ये अशआर भी है नम.

जिस शाख पर खड़ा था वो, उसको ही काटता
नादां न जाने खुद पे ही करता था क्यों सितम.

रिश्तों के नाम जो भी लिखे रेगज़ार पर
कुछ लेके आंधियां गईं, कुछ तोड़ते हैं दम.

मुरझा गई बहार में, वो बन सकी न फूल
मासूम-सी कली पे ये कितना बड़ा सितम.

रोते हुए-से जश्न मनाते हैं लोग क्यों
चेहरे जो उनके देखे तो, असली लगे वो कम.
चराग़े-दिल/ ६०

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3 टिप्पणियाँ

  1. mehhekk said,

    मार्च 21, 2008 at 3:07 अपराह्न

    जिस शाख पर खड़ा था वो, उसको ही काटता
    नादां न जाने खुद पे ही करता था क्यों सितम.
    bahut sachi,gehri baat kahi deviji,jab dard mein insan andha ho jata,usko kuch bhi nahi sujhta.khud ke paav pe kulhadi mar deta hai.bahut khubsurat gazal hai,holi ka ye tohfa pasand aaya,holi mubarak.

  2. मार्च 25, 2008 at 4:58 पूर्वाह्न

    Mehek
    aapko bhi har khushi apne aap mein mehek samete hue

    ssneh
    Devi

  3. Aliasgar said,

    मार्च 25, 2008 at 2:21 अपराह्न

    devi ji aap ki gazal bohat achi lagi khas kar yah line
    रिश्तों के नाम जो भी लिखे रेगज़ार पर
    कुछ लेके आंधियां गईं, कुछ तोड़ते हैं दम.

    aap ki gazal ka intzar karunga bye khuda hafiz


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