बताऊँ तुम्हें क्या है दिल का लगाना

ग़ज़लः ३३
ख़ता अब बनी है सजा का फ़साना
बताऊँ तुम्हें क्या है दिल का लगाना.
हवा में न जाने ये कैसा नशा है
पिये बिन ही झूमे है सारा ज़माना.
यहां रोज सजती है खुशियों की महफ़िल
मचलता है लब पर खुशी का तराना.
सदा घूमते हैं सरे-आम खतरे
बहुत ही है दुश्वार खुद को बचाना.
करें कैसे अपने-पराये की बातें
दिलों ने अगर दिल से रिश्ता न माना.
चराग़े-दिल/ ५९
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6 टिप्पणियाँ

  1. mehek said,

    मार्च 6, 2008 at 12:15 अपराह्न

    सदा घूमते हैं सरे-आम खतरे
    बहुत ही है दुश्वार खुद को बचानाbahut sach baat,itne khataron mein khud ko bachana mushkil,roz ke jeevan ko dharshati sundar gazal,bahut achhi lagi deviji.

  2. ramadwivedi said,

    मार्च 6, 2008 at 2:15 अपराह्न

    Devi ji,

    bahut khoob likha hai aapane….

    ख़ता अब बनी है सजा का फ़साना
    बताऊँ तुम्हें क्या है दिल का लगाना

  3. मार्च 6, 2008 at 5:17 अपराह्न

    वाह वाह देवी जी…बहुत खूब…

  4. मार्च 6, 2008 at 9:01 अपराह्न

    aadarniye ma’am
    bahut badiya ghazal hai aapki pad kar aanand aaya
    saadar

  5. मार्च 7, 2008 at 4:16 अपराह्न

    Bhai sameer ji
    aapki waah ka andaaz hi kuch aur hai. sabhi ka sneh safar mein humsafar ban kar chal rha hai is raah par. thanks Hem,Mehek and Ramaji aapki nazar ek sher karti hoon

    कैसे दावा करूं मैं सच्ची हूं
    झूठ की बस्तियों में रहती हूं.

    ssneh
    Devi

  6. Aliasgar said,

    मार्च 12, 2008 at 7:40 पूर्वाह्न

    aap gazal mujhe bohat achi lagi kiyo ki koi mujhse bohat door chala gaya hai our is zindagi mai Ali ne apne pyar ko kho diya hai


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