छवि ७. आईना अक्स

छवि ७. आईना अक्स
c-7.jpg
द्रश्य मेरे जीवन का
सामने मेरे खडा़
ऐसे जैसे
आईना और अक्स
बाल अवस्था, काट जवानी
हरी भरी जो धानी धानी
अब पतझड़ में तन्हा तन्हा
खडा हुआ बिन दाना पानी
मूक, निराधार
पर मन में इक आस लिए
कोई तो उसका है
जो बिन बताये
छलकेगा उस पर
बनकर शबनमी सी बूँद
उसकी प्यास बुझाने॥

तर्क कर के दोस्ती फिरता है क्यों?

ग़ज़लः ३७
तर्क कर के दोस्ती फिरता है क्यों
बनके आखिर अजनबी फिरता है क्यों?
चल वहां होगी जहां शामे-गज़ल
साथ लेकर बेदिली फिरता है क्यों?
बैठ आपस में चलो बातें करें
ओढ़ कर तू ख़ामुशी फिरता है क्यों?
जब नहीं दिल में खुशी तो किस लिये
लेके होटों पर हंसी फिरता है क्यों?
चाहतों के फूल, रिश्तों की महक
लेके ये दीवानगी फिरता है क्यों?
दाग़ दामन के ज़रा तू धो तो ले
इतनी लेकर गँदगी फिरता है क्यों?
है हकीकत से सभी का वास्ता
करके उससे बेरुख़ी फिरता है क्यों?
चराग़े-दिल/ ६३

sanmaan

न्यू जर्सी की प्रवासी साहित्यकार देवी नागरानी का सम्मान

न्यू जर्सी, अमेरिका की प्रवासी साहित्यकार देवी नागरानी को ग़ज़ल लेखन के लिए १६-१७ फरवरी को देश की महत्वपूर्ण साहित्यिक संस्था सृजन-सम्मान द्वारा सृजन-श्री से अलंकृत किया गया । उन्हें सम्मानित करते हुए धर्मयुग, नवभारत टाइम्स के पूर्व संपादक व वर्तमान में नवनीत के संपादक, विश्वनाथ सचदेव, वरिष्ठ आलोचक व प्रवासी साहित्य विशेषज्ञ कमलकिशोर गोयनका, तथा उत्तरप्रदेश के पूर्व विधानसभा अध्यक्ष व वरिष्ठ साहित्यकार केशरीनाथ त्रिपाठी

छवि ६. रूह के लिये

c6.jpg 

ि. रूह के लिये

रूह के लिये कोई कै़द नहीं है

बस, इस पिंजर शरीर की सलाखें

उसे बाँधे हुए है बंधन में॥

मुक्त होने की छटपटाहट

पल पल महसूस होती है

रिहाई के तलबगार सभी हम,

पा सकते हैं अभी यहाँ

बस! उल्टे कुँए की गहराई से

पार होकर जाना है॥

वहीं पर, हाँ वहीं पर

इक नये सूरज की रौशनी

एक नहीं, अनेकों सूरज

चाँद, सितारे,

झिलमिलाती नूरानी वह ज्योति

जगमग जगमग जलकर

राह रौशन कर रही है,

अँधेरे को चीरकर

अभी उसी तक जाना

आगे जाकर पाना है॥

 ॰ 

छवि ६ . वो मेरे अँदर है

 

    

पुखतगी से बंद कर

ठक ठक करता यह कभी

कभी करे है वह

पर मैं

दाँत भींचे शांत

                                                       गुम होना चाहती हूँ, यूँ

 

भनक पडे न किसको ये

मैं अदर रहती हूँ

रौशनदान कभी इक खोल

साँस मैं ले लेती हूँ

दुनिया के सब रंग देख

आँखें बंद करती हूँ

उम्र गुजारी ऐसा करते

पर अब

इसमें कोई शक नहीं

जो मैं बाहर ढूँढ रही हूँ

वो मेरे अंदर है॥

कोई षडयंत्र रच रहा है क्या

ग़ज़लः३६

कोई षडयंत्र रच रहा है क्या
जन्मदाता बना हुआ है क्या?

राहगीरों को मिलके राहों पर
राह को घर समझ रहा है क्या?

रात दिन किस ख़ुमार में है तू
तुझ को अपना भी कुछ पता है क्या?

सुर्खियां जुल्म की हैं चेहरे पर
इस पे खुश होने में मज़ा है क्या?

दुष्ट देवीहो कोई तुमको क्या
छोड़ इस सोच में रखा है क्या?

चराग़ेदिल/ ६२

छवि ५: मँजिल तेरी दूर

c-5.jpg
मुसाफिर मंजि़ल तेरी दूर
जाना बहुत ज़रूर….मुसाफिर॥
लंबा रस्ता, कदम है भारी
तन है चकनाचूर…मुसाफिर॥
पाप की गठरी सिर पर भारी
फिर तू क्यों मग़रूर…मुसाफिर॥
आप किया है आप उठाना
खुद का तू मज़दूर…मुसाफिर॥
॰॰

छवि ५. हाइकू

श्रम दिव्य है
जीवन सुँदर ये
मँगलधाम

प्यास बुझाए
जीवन मरुथल
आँख का पानी
३.
सब पडाव
हार हो चाहे जीत
हमसफर

हमसफर
है मेरे सफर की
ये तन्हाइयाँ
५.
माया छळनी
पग पग मुझको
डँक लगाए
६.
पाप पुञ्य को
मजबूरी या मर्ज
न पहचाने
७.
बहरा गूँगा
शहर पत्थरों का,
सुनता कौन?

काफ़िये का सिलसिलाः भाग छः

श्री आर. पी. शर्मा ‘महर्षि’
काफ़िये का सिलसिला आगे.

सहारे के लिये तिनका बहुत है
तिमिर में ज्योति की आशा बहुत है.

यदि मतले में यादगार – साज़गार को काफ़िये बनाया जाता है, तो वे इसलिये ग़लत हैं, क्योंकि दोनों में से गार निकाल देने पर याद – साज़ शेष बचते हैं जो तुकांत शब्द नहीं है, किंतु गार के स्थान पर यदि एक जगह बार जोड़ा जाये, तो वे का़फ़िये दोष रहित होंगे, जैसे

गुलिस्तां नें नसीमें – सुबह भी अब शोलाबार आये
ये मौसम मेरे दुश्मन को भी कैसे साज़गार आये.

कहने का मतलब यह है कि –
१. मतले में या तो दोनों काफ़िये विशुद्ध मूल शब्द हों, अथवा
२. एक मूल शब्द हो और दूसरा ऐसा शब्द जिसमें कुछ अंश बढ़ाया गया हो, अथवा
३. दोनों ही काफ़यों से बढ़ाये हुए अंश निकाल देने पर समान तुकांत शब्द ही शेष रहें, अथवा दोनों ही बढ़ाये हुए अंशों वाले काफ़ियों में व्याकरण भेद हो, अथवा
४. दोनों काफ़ियों में बढ़ाए हिए अंश समान अर्थ न दें.
उपयुक्त नियमों के अनुसार, मत्लों में काफ़ियों का रख – रखाव ध्यानपूर्वक देखें और समझें –

अगर ख़ुदा न करे सच ये ख़्वाब हो जाये
तेरी सहर हो, मेरा आफ़ताब हो जाये – दुष्यंत कुमार

जिंदगी भी अजब तमाशा है
जिस तरफ़ देख़िये हताशा है – महर्षि

ज़िन्दगी का ज़िंदगी से वास्ता ज़िंदा रहे
हम रहें जब तक हमारा हौसला ज़िंदा रहे – अशोक अंजुम

शिद्दते-गमींए-अहसास से जल जाऊंगा
बर्फ़ हूं, हाथ लगाया तो पिघल जाऊँगा – मुमताज राशिद

हर इक चहरा इबादत बन गया है
जिसे देखूँ शिकायत बन गया है – इब्राहिम अश्क

न पूछों कि मै क्यों सरे- दार हूँ
मैं सच बोलने का गुनहगार हूँ – महर्षि

बहुत घुटन है कोई सूरते- बयाँ निकले
अगर सदा न उठे कम से कम फुगां निकले – साहिर लुधयानवी

रही है दाद तलब उनकी शोख़ियाँ हमसे
अदा शनास बहुत है मगर कहाँ हमसे – जानिसार अख्तर

ग़ज़ल के नाम से जो कुछ कहा है
मेरी ज़िदादिली का मर्सिया है – सग़ीर मंजर, खंडवा

डाल दे साया अपने आँचल का
नातवां हूँ, कफ़न भी हो हल्का – नासिंख

टिप्पणीः इस मत्तले में एक क़ाफ़िया आँचल है जो स्वंय एक शब्द है, रदीफ़ का इससे अलग है, परंतु काफ़िया हल्का है, जिसमें क़फ़िया हल तथा रदीफ का एक ही शब्द के दो आँश हैं, ऐसी रदीफ़ को तहलीली कहते हैं.

चाह तन – मन को गुनहगार बना देती है
बाग़ के बाग़ को बीमार बना देती है – गोपालदास नीरज

धनक – धनक मेरी पोरों को ख़्वाब कर देगा
वो लम्स मेरे बदन को गुलाब कर देगा – परवीन शाकिर

हम है मताए – कूचे बाज़ार की तरह
उठती है हर निगाह खरीदार की तरह – मजरूह सुल्तानपुरी

अब के हम बिछड़े तो शायद ख़्वाबों में मिले
जिस तरह सूखे हुए फूल किताब में मिले – अहमद फराज़

हर जगह इम्तिहान है फिर भी
ये ग़ज़ल का जहान है फिर भी – इम्तियाज अहमद गाज़ी

मैं जब भी जाऊँ, वो घर को बड़ा सजा के रखे
बदन गुलाब तो दिल मैक़दा बना के रखे – जगदीस चँद्र पाण्डया

टिप्पणीः सजा मूल शब्द है. बना में दीर्घ मात्रा बढाई हुई है. अतः काफिये नियमानुसार निर्दोष हैं.
आगे और –
सिनाद दोष और इक्फा दोष के बारे में

यही रौशनी है, यही रौशनी है.

ग़ज़लः ३५
बुझे दीप को जो जलाती रही है
यही रौशनी है, यही रौशनी है.
जो बेलौस अपने ख़ज़ाने लुटा दे
यही सादगी है,यही सादगी है.
रहे दूर सुख मेँ, मगर पास दुख में
यही दोस्ती है, यही दोस्ती है.
पिया हो मगर प्यास फिर भी हो बाक़ी
यही तिशनगी है, यही तिशनगी है.

बिना कुछ कहे बात आए समझ में
यही आशिकी है, यही आशिकी है.

कभी शांति में ख़ुश, कभी शोर में ख़ुश
यही बेदिली है, यही बेदिली है.

जो चाहा था वो सब न कर पाई ‘देवी’
यही बेबसी है, यही बेबसी है.

चराग़े-दिल/ ६१

छवि ४. दस्तक दे रहा है

chavi-4.jpg

दस्तक दे रहा है

वातावरण मौन
बाहर शोर
विपरीत उसके
वह लीन है
आँखें मूँदे बाहर
अंदर की वह खोल रहा है
कोशिश में वह डोल रहा है
पर
दस्तक फिर भी दे रहा है
हाँ!
दस्तक फिर भी दे रहा है॥
॰॰
छवि ४. एक आत्मपिंजर शरीर
पिघलती हुई भूख
ठंडी से ठिठुरकर
थम गई है
एक आस
तिनका तिनका
भूख प्यास
साँसों की सरगम बनकर
धौंकनी सी चल रही है
भूख से शरीर ठंडा हो सकता है
पर आत्मा नहीं
उसका विश्वास है
वह शरीर नहीं है
आत्मा है
परमात्मा की याद में
पडा पडा उसी में विलीन
होने का प्रयास करती
एक आत्मा
माध्यम शरीर॥

छवि ४. दोहेजीवन तो इक देन है, दौलत जिसकी साँस
काल शिकारी आएगा, बनके लुटेरा बाज॥

मायूसी मँडरा रही, मन भी बहुत उदास
घायल पँछी क्या करे, कैसे हो परवाज॥

खुश हो बोया कल उसे, पाना तुमको आज
लाठी उसकी से डरो, करे न वो आवाज॥

बहता रहा जो दर्द का सैलाब

ग़ज़लः ३४
बहता रहा जो दर्द का सैलाब था न कम
आंखें भी रो रही हैं, ये अशआर भी है नम.

जिस शाख पर खड़ा था वो, उसको ही काटता
नादां न जाने खुद पे ही करता था क्यों सितम.

रिश्तों के नाम जो भी लिखे रेगज़ार पर
कुछ लेके आंधियां गईं, कुछ तोड़ते हैं दम.

मुरझा गई बहार में, वो बन सकी न फूल
मासूम-सी कली पे ये कितना बड़ा सितम.

रोते हुए-से जश्न मनाते हैं लोग क्यों
चेहरे जो उनके देखे तो, असली लगे वो कम.
चराग़े-दिल/ ६०

« Older entries

  • Blog Stats

  • मेटा