ईता दोष-भाग पाँचवा

एक परिचयःश्री आर. पी. शर्मा ‘महर्षि’

ग़ज़ल के अन्य काफ़िये, मत्ले में नियमानुसार प्रयुक्त काफ़ियों पर आधारित होते हैं. अतः मत्लों में काफ़िये प्रयुक्त करते समय पूरी सावधानी बरतना बहुत आवश्यक है. अन्यथा मत्लों के दोषपुर्ण होने का अंदेशा बना रहता है.

. ईता दोष काम कब शीघ्रता में बनता हैइस तरह और भी बिगड़ता है.उस मतले में बनताबिगड़ताक़ाफ़िये लाये गये हैं, जो दोषपूर्ण है, क्योंकि यदि इन दोनों शब्दों से तानिकाल दिया जाय तो बनबिगड़‘ ( मूल शब्द) शेष रहते हैं, जो समान तुकांत काफ़िये नहीं है, क्योंकि इनके अंतिम अक्षरों और में व्यंजनसाम्य नहीं है.अतः केवल ता बढ़ाने मात्र से ये शब्द समान तुकांत काफ़िये नहीं बन जाते. इसलिए बनताबिगड़ताको मत्ले में लाने से मत्ला दोषपूर्ण हो गया है. मूल शब्दों में से बढ़ाये हुए अंश निकाल देने पर, उनका तुकांत होना आवश्यक है. यदि पहली पंक्ति को इस प्रकार कर दें

काम जल्दी में बन न पाया हैइस तरह और भी बिगड़ता है. इस प्रकार पाया और बिगड़ता के अंत में स्वरसाम्य याता होने से काफ़िये दोषरहित बन जाते हैं और मत्ले के दोष का निराकरण हो जाता है. .

हमारे युग में सुविधाएँ बहुत हैं

समय के पास छलनाएँ बहुत हैं.

डा॰ स्वामी श्यामनंद सरस्वती रौशन

इस मत्ले में सुविधाएँ छलनाएँ का़फ़िये लाये गये हैं. इनमें से बढ़ाया हुआ शब्द एँ ‘ निकाल देने पर सुविधा-छलना शेष रहते हैं, जो दोनों ही समान तुकाँत शब्द हैं, क्योंकि उनमें धा-ना में स्वर-साम्य है. अतः सुविधाएँछलनाएँ दोषरहित क़ाफ़िये हैं.

३.

करें सम्मान हम अपने बड़ों काउठायें लाभ उनके अनुभवों का.यध्यपि बढ़ाये हुए अंश निकाल देने पर ‘बड़’ तथा ‘अनुभव’ शेष रहते हैं, जो समान तुकांत शब्द नहीं है. अतः ‘बड़ों अनुभवों‘ सही क़ाफ़िये हैं. ऐसे क़ाफ़ियों में से बड़ाया हुआ अंश निकाल देने पर एक सार्थक तो दूसरा निर्थक शेष रहना चाहिये. ४.

था अगर शिकवा या गिला मुझसे हाल कोई तो पूछता मुझसे. म.ना नरहरिगिला मूल शब्द है जब कि ‘पूछता ‘ में ‘ता’ का अंश बढ़ाया हुआ है. ‘ ला – ता’ में स्वर साम्य है अतः का़फ़िये नियमानुसार हैं.५.

दोस्त रखते जो राब्ता मुझसेहाल कोई तो पूछता मुझसे. ‘ – इसी प्रकार उपयुक्तमत्ले में डा॰ नलिनी विभा नाज़लीद्वारा एक विशुद्ध मूल उर्दू शब्द राबता को काफ़िया बनाया गया है तथा दूसरे क़ाफ़िया पूछता को, जिसमे ता बढ़ाया हुआ अंश है. अतः मत्ले में ये दोनों ही काफ़िये नियमानुसार लाये गये है.आगे और

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करम ख़ुदा का है सब पर

ग़ज़लः ३२

ये सायबां है जहां, मुझको सर छुपाने दो

करम ख़ुदा का है सब पर, वो आज़माने दो.

जो दिल के तार छेड़े थे हमने बरसों से

उन्हें तो आज अभी छेड़ कर बजाने दो.

ख़फा न तुम हो किसी से भी देखकर कांटे

कि फूल कहता है जो कुछ, उसे बताने दो.

कभी तो दर्द भुलाकर भी मुस्कराओ तुम

दर्द के वो पुराने कभी बहाने दो.

ख़फ़ा हुई है खुशी इस क़दर भी क्यों हमसे

ग़मों का श् नेमुबारक हमें मनाने दो.

उदासियों को छुपाओ दिल में तुम देवी

कभी लबों को भी कुछ देर मुस्कराने दो.

चराग़ेदिल/ ५८

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