अणुशक्ति नगर में अंतर्राष्ट्रीय काव्य गोष्ठी

भारत के महानगर मु्बई में अंतर्राष्ट्रीय काव्य गोष्ठी

नये साल के प्रारंभ में १२ तारीख, २००८ अणुशक्ति नगर , मुम्बई में हिंदयुग्म के सहयोग से कवि कुलवंत जी द्वारा आयोजित काव्य गोष्टी सफलता संपन्न हुई. इस दौर को सफल बनाने में जो सहकार देने वाले हाथ रहे श्री कुलवंत सिंह, श्री अवनीश तिवारी और श्री आर. पी. हंस जिनके संयुक्त प्रयासों से स्कूल न॰१ के प्रांगण में संभव हुआ.
यह सम्मेलन अपने आप में एक सफल प्रयास रहा. अपने विचारों से अवगत कराते हुए कवियों ने अपने मत के अनुसार इसे विश्व हिंदी समेलन का दर्जा दिया, शायद इसलिये कि पूरब और पश्चिम के कवियों का उस सुअवसर पर अनोखा सँगम रहा जिसमें शामिल रहे कैनेडा की अति प्रभावशाली लेखल समीर लाल जी जिन्हें नेट पर आजकल उड़न तशतरी के नाम से जाना जा रहा है. वे इस गोष्टी के मुख्य महमान रहे, और संचालन में भी अपनी दक्षता को दर्शाते रहे. अध्यक्षता का स्थान लिया देवी नागरानी जी ने, और विशेष नाम जिसका जि़क्र है वो है आस्ट्रेलिया से पधारे श्री हरिहर अध्याय जी का, जो एक अच्छे रचनाकार होने के साथ साथ अपनी कविता की छाप भी छोड़ गए. संचालन की बागडौर बड़ी ही दक्षता के साथ श्री कुलवंत जी ने संभाली. एक टीम स्पिरिट का जलवा जो वहां मैंने पाया उसमें एक खा़स बात थी वह थी उनकी आदमीयत और आपनाइयत जो बख़ूबी घुली मिली नज़र आ रही थी.

काव्य गोष्टी का आगाज़ दीप को प्रज्वलित करने के पश्चात सरस्वती वंदना के साथ हुआ जिसकी प्रस्तुतकर्ता रहीं गौरी एवं सिमरन. कवि गण जिन्होंने काव्य पाठ से महफिल को सजाया और अपनी रस भरी कविताओं से उल्लास भरा माहौल पैदा किया ,उसमें कई मुक्तक, गीत, गज़ल शामिल थे. महफ़िल को मौसिकी का आलम बनाये रखने के लिये काफ़ी काफ़ी मददगार सिद्ध हूए.

मंच की शान बने, हिंदुस्तान की आन बने
सब के सब कवि यहां, इक दूजे के महमान बने.

तस्वीर में मौजूद सप्तरंगी कवि एवं कवित्रियों जिन्होंने रचनाओं का पाठ कियाः

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, समीरलाल- कनाडा से, डा. हरिहर झा- आस्ट्रेलिया से, देवी नागरानी-न्यू जर्सी से, मरियम गजाला, नीरज गोस्वामी, राजीव सारस्वत, अरविंद राही, भरत शब्द वर्मा, हरनाम सिंह यादव, प्रमिला शर्मा, ऋषि कुमार मिश्र, रवि दत्त गौड़, शकुंतला शर्मा, मधुपेश मुंतजिर इंदौरी, डा. वफा, त्रिलोचन अरोड़ा, शीतल नागपुरी, मंजू गुप्ता, नंदलाल थापर, शैली, शारदा गोस्वामी, शुभकीर्ति माहेश्वरी, रमेश श्री वास्तव, विजय कुमार भटनागर, सुरिंदर रत्ती, वी डी तिवारी और रवि यादव.
इस कार्यक्रम की एक विशेष बात यह भी रही कि बहुत से कवियों ने देश के विभिन्न हिस्सों से और विदेशों
से भी कार्यक्रम के सफल आयोजन के लिए शुभकामनाएं भेजीं और गोष्ठी से जुड़ने का प्रयास भी किया – अपने संदेश भेजकर, रचनाएं भेजकर, और कार्यक्रम के दौरान फोन कर अपनी उपस्थिति दर्ज करा कर. अमेरिका से प्रसिद्ध गीतकार रकेश ख्देलवाल और अभिनव शुक्ला से बात करते हुए एक सुखद आभास हुआ, यही कि हम सब एक है. देश और विदेश की सीमाएं अब मिलजुल रही हैं. दुबई से पूर्णिमा वर्मन (अभिव्यक्ति) ,कोयंबतूर से राजश्री, आंध्र प्रदेश से रमा द्विवेदी, औरंगाबाद से सुनीता यादव, मध्य प्रदेश से गिरीश बिलौरी, पाकिस्तान से गुल देहलवी. इन सभी का अभिनंदन.
नागरानी जी ने अंत में संबोधित करते हुए कहा ” अब देश और परदेस के बीच अंतर करना मुशकिल है. जहां एक हिंदुस्तानी ख,डा हो जाता है वहीं हिंदुस्तान का दिल धड़कने लगता है” अंत की ओर बढ़ते हुए एक सुर होकर सभी मौजूदा कवि गण ने “जन गन मन” गाया. सभी का साभार व आभार मानते हूए कवि कुलवात जी ने धन्यवाद अता किया, जिसके पूर्व खाने की व्यवस्था रही जहां कवि एक दूसरे से मेल मेलाप में व्यस्त रहे.
देवी नागरानी
१२.जनवरी २००८
dnangrani@gmail.com

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ग़ज़ल एक गेय कविता-चौथा भाग

एक परिचयः

श्री आर. पी. शर्मा ‘महर्षि’

ग़ज़ल एक सुकोमल विधा है. वह नफ़ासत पसंद है. हाथ लगाए मैली होती है, उसे स्चच्छता तथा सलीके से स्पर्श करना होता है. ग़ज़ल चूँकि एक गेय कविता है, अतः उसका किसी बहर अथवा छंद में होना अपरिहार्य है. ग़ज़लकार को इसके लिये, यदि रचना बहर में है तो “तख़्ती” का, और अगर छंद में है तो मात्रा गणना का व्यहवारिक ग्यान एवं अभ्यास होना ही पर्याप्त है, जो कोई कठिन कार्य नहीं. अतः इसके लिये ग़ज़लकार को अरूज़ी अथवा छंदशास्त्री बनने की बिलकुल भी आवश्यक्ता नहीं है, इस पुस्तक में ‘तख़्ती ‘ तथा ‘मात्र- गणना’ की विधियों को, उदाहरणों साहित, विस्तार से समझाया गया है. अतः इन विधियों को सीखने के लिये कहीं दूर जाने की ज़रूरत नहीं. निरंतर अभ्यास से इनमें दक्षता प्राप्त की जा सकती है.
बहर अथवा छंद, ग़ज़ल की पहली प्राथमिकता है. “कविता और छंद का संबंध उसी प्रकार का है जिस प्रकार आत्मा और शरीर का. आत्मा की सक्रियता शरीर के द्वारा ही है. इसी प्रकार कविता की प्रभावोत्पादकता भी छंद के द्वारा ही है.”
ग़ज़ल तो एक गेय कविता है, अतः उसमें छँदों की महत्वपूर्ण भूमिका है. बहर अगर ग़ज़ल की जान है तो छंद ग़ज़ल के प्राण. ग़ज़ल का फार्म.(स्वरूप) बहर अथवा छंद बिना निष्प्राण है. यदि उसको जिंदा रखना है तो उसे हर प्रकार स्वस्थ रखना हमारा दायित्य बनता है. ग़ज़ल के बहर और छंद के बारे में इससे ज़्यादा और क्या कहा जा सकता है. अब यह ग़ज़लकारों पर निर्भर करता है कि वे बहर के लिये ‘तख़्ती’ करना अथवा छंद के लिये ‘मात्र-गणना’ सही-सही करना मन लगाकर सीखें और ग़ज़लों में प्राण फूंकें और उन्हें तरोताज़ा बनाये. ‘तख़्ती’ और ‘मात्र-गणना’ की विधियाँ आगे यथास्थान दी जा रही है.

अब ग़ज़ल का फार्म, बाह्य ( बाह्य स्वरूप) कैसा होता है तथा ‘ ज़मीने शे’र’ किसे कहते हैं, काफ़िये क्या होते हैं, रदीफ़ क्या होती है, मत्ला क्या होता है, हुस्ने मत्ला क्या होता है, तथ मक्ता क्या होता है, शेर क्या होता है. हुस्ने मतला क्या होता है, तथा मक्ता क्या है. इन सवालों का स्पष्टीकरण आइये शुरू करते हैः
मान लें हमें निम्नलिखित मिसरे के आधार पर ग़ज़ल लिखने के लिये कहा गया-

‘हाल कोई तो पूछता मुझसे’

वस्तुतः इस पंक्ति के आधार पर हिंदी पत्रिका फनकार, ग्वालियर के अंक फरवरी २००५ में पाठकों द्वारा कही गई कई ग़ज़लें प्रकाशित हुई हैं. जनाब कमरउद्दीन बरतर साहब का यह अभिनव प्रयोग है, जो हर द्रष्टी से साराहनीय है. उपर्युक्त मिसरे में प्रयुक्त काफ़िया (तुकान्त शब्द) पूछता है और उसके पश्चात आने वाली रदीफ़ (जो पूरी ग़ज़ल में अपरिवर्तित ही रहती है) मुझसे है. मिसरे का वज़्न हैः बहरे-ख़फी़फ़ अर्थात फाइलातुन, मफाइलुन, फालुन /फ-इलुन. इस वज़्न के अंत में फालुन और फ-इलुन के आख़िर में एक एक शब्द, आवश्यकतानुसार बढ़ाया जा सकता है. जिस किसी वज़्न में शुरू में फाइलातुन आता है, उसमें एक अक्षर कम करके, फ इ ला तु न भी आवश्यकतानुसार लाया जा सकता है. अतः उपर्युक्त मिसरा-वज़्न /बहर +का़फिया+रदीफ प्रस्तुत करता है, इसी को ज़मीने शे’र कहते हैं

रदीफ़ काफिया को समझाने के लिये मोना हैदराबादी का यह शेर पाठनीय है-

साथ देके रदीफ़ आगे आगे चली
काफ़ियों को लेकर चली है ग़ज़ल.

इस बयाँ को ‘साकार करते हुए ‘हाल कोई तो पूछता मुझसे ‘ के आधार पर फनकार पत्रिका में पाठकों की जी जो ग़ज़लें पेश हुई हैं, उनसे कुछ ग़ज़लें, कुछ अंश साभार यहाँ पेश हैं ताकि ग़ज़ल के फार्म को सरलतापूर्वक समझा जा सके –

१. राज साग़री, खरगोन ( म.प्र.)

खुद पे कैसे हो तब्सिरा मुझसे
दूर रखो ये आईना मुझसे…मतला

उसकी आँखों ने क्या कहा मुझसे
उम्र भर मैं रहा ख़फा़ मुझसे…हुस्ने मतला

खुन के घूँट पीके बैठा हूँ
ज़हर का पूछ ज़ायका मुझसे.

कौन था ‘राज़’, आईना चेहरा
जिसने मुझको मिला दिया मुझसे…मक़्ता
॰॰
२.म. ना. नरहरि, विरार( महाराष्ट्र )

था अगर शिकवा या गिला मुझसे
हाल कोई तो पूछता मुझसे.

जिस्म मिट्टी सा कर दिया मेरा
तोड़कर उसने सिलसिला मुझसे.
॰॰

३. शैलजा नरहरि, विरार ( महाराष्ट्र)

बाद मुड्दत के वो मिला मुझसे
हाल कोई तो पूछता मुझसे.

बाँधने की फिज़ूल कोशिश की
छूटना तय ही था सिरा मुझसे.

रोशनी को फरेब देना था
तीरगी ने लिया पता मुझसे.
॰॰
४. मरियम ग़ज़ला, थाने ( महाराष्ट्र)

इस तरह आज वो मिला मुझसे
हो नहीं जैसे आशना मुझसे.

दे गया धूप की मुझे चादर
ले गया रात की रिदा मुझसे.

कुछ ‘गज़ाला’ मुझे रही रंजिश
कुछ तो उसको भी था गिला मुझसे.
॰॰
५. डा॰ नलिनी विभा नाज़ली, हमीरपुर (हि.प्र)

दोस्त रखते जो राब्ता मुझसे
हाल कोई तो पूछता मुझसे.

मेरी कश्ती डुबि ही दी आख़िर
था खफ़ा मेरा नुख़ुदा मुझसे.

‘नाज़ली’ बनके किस कदर मासूम
पूछता है वो मुद्दआ मुझसे.
॰॰

६.द्विजेन्द्र द्विज, कांगड़ा (हि.प्र)

अब है मेरा मुकाबला मुझसे
मेरा साया तो डर गया मुझसे.

इंतिहा द्विज न जाने क्या होगी
देखी जाए न इब्तिदा मुझसे.
॰॰
७. दा॰ विनय मिश्र, अलवर ( राजस्थान)

रात ने जाने क्या सुना मुझसे
ले गई धूप का पता मुझसे.

जैसे गुल में समाई है खुशबू
वो कहाँ है भला जुदा मुझसे.
॰॰
७. जनाब कमरउद्दीन सा॰ बरतर, गव्लियर( म.प्र.)

अब मुख़ातिब है आईना मुझसे
अब मेरा सामना हुआ मुझसे.

वो जो पत्थर ही मुझको समझेगा
दूर ही दूर जो रहा मुझसे.

पूछने वाले की तरह बरतर
हाल कोई तो पूछता मुझसे.

बकौल अमरजीत सिंह अंबाली के शेर की ज़ुबानी-

मत्ले से मक़्ते तलक की ये मसाफ़त महरबा!
दर्द से रिश्ते में जैसे ग़म पिरोती है ग़ज़ल.

शब्दार्थः मसाफ्त= सफ़र

और आगे…………..अंक ५

आर.पी शर्मा महर्षि को “पिंगलाचार्य” की उपाधि

आर.पी शर्मा महर्षि को “पिंगलाचार्य” की उपाधि

गुफ्तगू (जनवरी-मार्च २००५)में अदबी खबरों के अंतरगत उनके सुपुत्र डा॰ रमाकांत शर्मा द्वारा पेश की गई उपाधि की सूचना काव्य शोध संस्थान द्वारा हिंदी भवन, नई दिल्ली में। मुंबई के प्रख़्यात ग़ज़ल शिल्पकार और ग़ज़लकार श्री आर।पी शर्मा महरिषको माननीय devi-pic-artist-074.jpgश्री विष्णु प्रभाकर और श्री कमलेश्वर के हाथों “पिंगलाचार्य” की उपाधि से विभूषित किया गया। इस अवसर पर उन्हें काव्य शोध संस्थान ने शाल और मनमोहन गोसाई जी की पावन स्मृति में ११००० हजा़र रुपये देकर पुरस्कृत किया गया। समारोह में डा॰ सादिक, डा॰ कमाल सिद्दिकी, शिव कुमार मिश्र तथा मख़मूर सईदी सहित हिंदी और ऊर्दू साहित्य के जाने माने साहित्यकार उपस्थित थे।

ग़ज़ल क्या, कब, क्यों और कैसे?

काफ़िया-शास्त्र जो इस वार्तालाप का अंग भी है, उसपर खास रौशनी डालते हुए श्री आर. पी. शर्मा महरिषकी प्रकाशित किताब “ग़ज़ल-लेखन कला” के शुरूवाती पन्नों (११-१६) में ग़ज़ल के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले विभिन्न प्रश्न मुंबई के जाने माने साहित्यकार, कहानीकार, कवि और ग़ज़लकार श्री म॰ न॰ नरहरि ने साक्षात्कार के दौरान किये और प्रश्नों का क्रम कुछ इस प्रकार था कि ग़ज़ल क्या, कब, क्यों और कैसे पर क्रमबद्ध रूप से विस्तार में गहन चर्चा हुई। पाठकों के लाभ के लिये साक्षात्कार के कुछ हिस्से यहाँ पेश करना चाहती हूँ।

प्रश्न : ग़ज़ल कहाँ और कैसे अस्तित्व में आई?

उत्तर : बादशाहों, अमीर उमरावों आदि की प्रशंसा में लिखे जाने वाले कसीदे का पहले तो फारसीकरण हुआ, तत्पश्चात् ईरान के शायरों में उसकी तशबीब (शृंगारिक भूमिका) को कसीदे से अलग करके उसका नाम ग़ज़ल रखा (ग़ज़ल अर्थात् प्रेयसी से वार्तालाप) ईरान में यह विधा बहुत फूली-फली तथा लोकप्रिय हुई। वस्तुतः भारतवर्ष को यह विधा ईरान की ही देन है।

प्रश्न : अमीर खुसरो को हिंदी का पहला ग़ज़लगो शायर माना जाता है। इस पर आप को क्या कहना है?

उत्तर : अमीर खुसरो ने खिलजी शासनकाल में, उस समय की बोली जाने वाली भाषा में कुछ अरबी-फारसी शब्दों का मिश्रण करके एक नई भाषा विकसित की थी, जिसका नाम उन्होंने हिंदी/ हिंदवी रखा था और इस भाषा में उनके द्वारा कुछ ग़ज़लें भी कही गईं थीं, इसलिये उनको हिंदी भाषा का आविष्कारिक तथा हिंदी का पहला ग़ज़लगो शायर माना जाता है। यह और बात है कि हिंदी के काव्य क्षेत्र में बालस्वरूप राही, शेरजंग गर्ग, सूर्यभानु गुप्त आदि ग़ज़ल लिख रहे थे, परंतु इसे स्थापित करने का श्रेय दुष्यंतकुमार को प्राप्त हुआ है।

प्रश्न : ग़ज़लिया शायरी में क्रमिक विकास में किन शायरों का महत्वपूर्ण योगदान रहा है?

उत्तर : प्रारंभिक दौर के कुछ उल्लेखनीय शायर- आरज़ू, मज़हर, हातिम, नाजी, यकरंग आदि थे। यह दौर ईमामगोई का था। शायर अपने कलाम में ऐसे शब्द लाते थे जो दो अर्थ देते थे -एक पास का और दूसरा दूर का, किंतु शायर की मुराद दूर के अर्थ से होती थी। इस प्रकार शेरों को वर्ग पहेली बना दिया जाता था। संतोष की बात है, विरोध के कारण ईमामगोई अधिक समय तक नहीं चली।

दूसरे दौर में पूर्वार्ध में सौदा, मीर, सोज और दर्द जैसे उस्ताद शायर हुए हैं। इन शायरों में “मीर”सर्वोपरि हैं। उन्हें खुदाये-सुखन कहा जाता है। इसी दौर में उत्तरार्द्ध में मुसहफ़ी इंशा, जुर्रत का नाम उल्लेखनीय हैं। इंशा और जुर्रत की शायरी अवध की विलासिता से प्रभावित है, जब मुगलिया सल्तनत के कमज़ोर होने के कारण, बाहरी आक्रमणों, लूटपाट और नादिरशाही कत्ले- आम से दिल्ली उजड़ती जा रही थी, तो सौदा, मीर, सोज़, मुसहफी और इंशा को, वहाँ संरक्षण न मिलने के कारण लखनऊ जाना पड़ा था जो नवाब आसफुद्दौला के साथ विलासिता मं् डूबा पड़ा था।

तीसरे दौर में पूर्वार्ध में, लखनवी शायरों में नासिख और आतिश के नाम उल्लेखनीय हैं, दोनों ही लखनवी रंग के प्रसिद्ध शायर थे। दूसरी ओर देहलवी शायरों में जौक, मोमिन और मिर्ज़ा ग़ालिब थे। मिर्जा दाग़ और बादशाह जफ़र उस्ताद जौक के शिष्य थे, शेफ़्ता उस्ताद मोमिन के शिष्य तथा हाली मिर्ज़ा ग़ालिब के शिष्य थे। मिर्ज़ा ग़ालिब ने अपनी गज़लिया शायरी में इतना सब कुछ कह दिया था, कि दूसरों के कहने के लिये कुछ बचा ही नहीं। आगे चलकर असगर, फानी, इसरत, सीमाब और जिगर ने इस शून्य को भरने का प्रयास किया। सबसे बड़ा नाम दाग ने कमाया जिनके हज़ार से अधिक शिष्यों में, सर इकबाल, सीमाव अकबरावादी, जिग़र मुरादाबादी जैसे अज़ीम शायर शामिल है। हाली ने इश्किया किस्म की शायरी का जम कर विरोध किया और उसके स्तर में सुधार लाने का आहवान किया।

प्रश्न : देहलवी और लखनवी शायरी में क्या अंतर है? बताएँ।

उत्तर : देहलवी शायरी में प्रेमी का उसके सच्चे प्रेम तथा दुख-दर्द का स्वाभाविक वर्णन होता है, जब कि लखनवी शायरी अवध की उस समय विलासता से प्रभावित रही। अतः उसमें प्रेम को वासना का रूप दे दिया गया तथा शायरी प्रेमिका के इर्द -गिर्द ही घूमती रही। वर्णन में कृत्रिमता एवं उच्छृंखलता से काम लिया गया। अब लखनवी शायरी में सुधार आ गया है। इससे मुग़ल काल में ग़ज़ल की दशा तथा उसके स्तर पर भी समुचित प्रकाश पड़ता है।

प्रश्न : गज़ल की तकनीक ‌एवं उसकी संरचना पर प्रकाश डालने का कष्ट करेंगे?

उत्तर : ग़ज़ल की बाहरी संरचना में छंद-काफ़िया-रदीफ़ का महत्वपूर्ण योगदान हैं। छंद को अथवा बहर, रचना का सही छंदोबद्ध होना ज़रूरी होता है, साथ में छंद-बहर की विशिष्ट लय का निर्वाह भी आवश्यक है। ग़ज़ल की काफ़ियायुक्त प्ररंभिक दो पंक्तियों को “मतला” तथा अंतिम दो पंक्तियों को,जिसमें शायर अपना उपनाम लाता है उसे “मक़्ता” कहते हैं। काफ़िया तुकांत शब्द को कहते हैं। रदीफ़, काफ़ियों के पश्चात आने वाला वह शब्द अथवा वाक्य है, जो ग़ज़ल में बिना किसी परिवर्तन के दोहराया जाता है। चूंकि मतके में प्रयुक्त काफ़ियों पर, ग़ज़ल के अन्य काफ़िये आधारित होते हैं, अतः मतले में सही काफ़िये आयें, यह देखना ज़रूरी है। जैसे –

१. मतले में या तो दोनों काफ़िये विशुद्ध मूल शब्द हों, जैसे-

हर हक़ीक़त में बआंदज़े-तमाशा देखा

खूब देखा तेरे जलवों को मगर क्या देखा।

२. एक विशुद्ध मूल शब्द और दूसरा बढ़ाया हुआ शब्द, जैसे –

जब से उसकी निगाह बदली है

सारी दुनिया नयी-नयी सी है।

३. दोनों ही बढ़ाये हुए अंश निकाल देने पर समान तुकांत शब्द शेष बचें, जैसे –

हो गई है पीर पर्वत-सी पिघलनी चाहिये

इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिये।

४. दोनों बढ़ाये हुए शब्दों में व्याकरण भेद हो, जैसे –

देख मुझ को यूँ न दुश्मनी से

इतनी नफ़रत न कर आदमी से।

५. यदि मतले में ख़फा-वफ़ा जैसे अथवा मन-चमन जैसे काफ़िये लाये जाते हैं तो उस अवस्था में क्रमशः “फ” व्यंजन-साम्य वाले काफ़िये ही पूरी ग़ज़ल में लाये जायें या अपवाद स्वरूप उनकी जगह अन्य व्यंजन भी लाये जा सकते हैं, जैसा कि डा॰ इकबाल अपनी एक ग़ज़ल में लाये हैं, –

फिर चिराग़े-लाल से रौशन हुए कोहो-दमन

मुझको फिर नग्मों पे उकसाने लगा मुर्गे-चमन।

मन की दौलत हाथ आती है तो फिर जाती नहीं

तन की दौलत छाँव है, आता है धन जाता है धन।

इस ग़ज़ल के अन्य काफ़िये है बन, फन, तन आदि। काफ़िया-शास्त्र बड़ा है यहाँ केवल मुख्य-मुख्य बातें ही बताई जा सकती है। सबसे महत्वपूर्ण है ग़ज़ल के अन्तरंग की संरचना, जिसके माध्यम से शायर अपने मनोभाव, उद्‌गार, विचार, अनुभव, दुःख-दर्द तथा अपनी अनुभूतियाँ आदि व्यक्त करता है, अतः अन्तरंग बहुत ही धीर-गंभीर , अर्थपूर्ण तर्कसंगत तथा अंतरमन की गहराई से प्रस्फुटित होने वाला होना चाहिये। अंतरंग को जितना परिष्कृत किया जाए, उतना ही वह प्रभावशाली बनता है। तगज़्जुल, अंदाज़े-बयाँ कुछ ऐसा हो कि शेर की पहली पंक्ति सुनने पर हम दूसरी पंक्ति सुनने को लालायित हो उठें तथा उसे सुनते ही अभिमूत हो जाएँ। यह प्रसंग बहुत बड़ा है अतः इसे यहाँ इतना ही दिया जा सकता है।

प्रश्न : अच्छी ग़ज़ल की विशेषताएँ?

उत्तर : ऊपर ग़ज़ल के अन्तरंग के बारे में जो बातें बताई गई हैं तथा उनके अतिरिक्त ग़ज़ल समसामयिक, जनोपयोगी तथा अपनी धरती और परिवेष से जुड़ी हो, कथ्य एवं शिल्प में सामंजस्य हो, भाषा सरस-सरल हो। पाठकों एवं श्रोताओं में वही भाव सम्प्रेषित हो, जो ग़ज़लकार व्यक्त करना चाहता है, और सबसे बड़ी बात यह कि वह अंतरमन में गहरे उतर जाए, कुछ सोचने को विवश करे, जिसके शेर उदाहरण स्वरूप पेश किये जा सकें तथा जिसके शब्दों के उच्चारण प्रामाणिक हों, बहर में हो अथवा सही छंदोबद्ध हो।

प्रश्न : हिंदी में लिखी जा रही ग़ज़ल के विषय में आपकी क्या राय है?

उत्तर : दुष्यंत कुमार ने हिंदी ग़ज़लों की अच्छी शुरुआत कर गये हैं, उनके बाद से हिंदी में ग़ज़ल- लेखन अबाध रूप से चल रहा है। अच्छी ग़ज़लें सराही भी जा रही हैं, आगे उन पर अधिक निख़ार आएगा, ऐसी अपेक्षा है।

प्रश्न : हिंदी ग़ज़लों में उर्दू शब्दों का प्रयोग किस सीमा तक होनं चाहिये?

उत्तर : जहाँ बात न बनती हो, वहाँ उर्दू शब्द आने से बात बन जाए, तब वहाँ उर्दू शब्द लाना ही चाहिये, परंतु उसके सही उच्चारण के साथ, क्योंकि लबो‍-लहज़ा उर्दू शब्दों के उच्चारण से ही बनता है, इसके लिये उर्दू शब्दों के हलन्त अक्षरों को ध्यान में रखना आवश्यक है।

प्रश्न : आजकल दोहा छंद में ग़ज़ल लिखने का प्रयोग हो रहा है, क्या यह उचित है? यदि हाँ तो क्यों?

उत्तर : आश्चर्य तो इस बात का है कि जब ग़ज़ल को दोहे से प्रेरित बताया जा रहा है तो ग़ज़ल-लेखन में उसका प्रयोग अब इतनी देरी से क्यों किया जा रहा है, पहले क्यों नहीं किया गया? ग़ज़लों को सभी अच्छी बहरें और अच्छे छंद ग्राह्य हैं, बशर्ते कि वो संगीतात्मक हो। दोहा छंद भी अच्छा छंद है और इसकी दोनों पंक्तियाँ तुकांत होने के कारण ग़ज़ल के मतले के अनुरूप भी है। हाँ, ग़ज़ल की स्वतंत्र पंक्तियों को दोहों में किस प्रकार फिट किया जाएगा, यह विचारणीय है।

प्रश्न : क्या ग़ज़लों की कुछ बहरें काव्य-छंदों से समकक्ष हैं? कृपया उदाहरणों सहित बतायें?

उतरः कुछ प्रचलित बहरें ऐसी हैं जो हिंदी वाक्य छंदों के समकक्ष हैं। जैसे-

१. मानव भवन में आर्यजन जिसकी उतारें आरती

बहरे-रजज् /हरिगीतिका

२. हाँ, कमल के फूल पाना चाहते हैं इसलिये

बहरे-रमल /गीतिका

३. कमल बावना के तुम्हें है समर्पित

बहरे-मुतकारिब / भुजंगप्रयात

४. मेघ आकर भी बरसे नहीं

बहरे-मुतदारिक / महालक्ष्मी

५. परिंदे अब भी पर तोले हुए हैं

बहरे-रजज्/सुमेरु

ऐसे ही और भी बहरों के समकक्ष, हिंदी छंदों के उदाहरण दिये जा सकते हैं।

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