बाल साहित्य

बाल साहित्य

बाल साहित्य के अध्यक्ष श्री बालशौर रेड्डी ने अपनी प्रतिक्रिया में संक्षेप में बताते हुए कहा ” बाल साहित्य के सूत्रों से आपका कहने सुनने का नाता है, था और चलता रहेगा. टिमटिमाते सितारे, पानी में मछली, , जिग्यासा भरे प्रश्न उत्पन करती है, प्रश्न उत्तर की चाहत रखता है, बस बाल मन समझने की जरूरत है, चिंतन मनन के पश्चात उसको पाचन करने का समय देना हमारा कर्तव्य है.
डा॰सुशीला गुप्ता ने कहा कि बच्चों के मनोविग्यान की ओर इशारा करते हुए कहा कि बच्चों का मन मस्तिष्क साफ स्वच्छ दिवार होता है जिस पर कुछ भी बड़ी सरलता से उकेरा जा सकता है. इसलिये बच्चों में बचपन से ये शब्द बीज बो देने चाहिये. इसी सिलसिले में दिल्ली के इंदिरा गाँधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविध्यालय की डा॰ स्मिता चतुर्वेदी ने बाल साहित्य के स्वरूप और दिशाओं पर रौशनी डालते हुए यही कहा ” कि साहित्य बालकों की अपनी विशिष्ट छोटी छोटी समस्याओं को उभारे, उन्हें गुदगुगाए, उनका मनोरंजन करे, और उनकी समस्याओं का आदर्श से हट कर समाधान दे, वही साहित्य श्रेष्ठ बाल साहित्य है.
हिंदी युवा पीढी और ग्यान विग्यान के अध्यक्षः डा॰ वाई लक्ष्मी प्रसाद एवं श्री गोविंद मिश्र थे. उस सिलसिले को आगे बढ़ाते हुए श्री नवीन मेहता ने अपने वक्तव्य में नई पीढी को हमारी गौरवशाली परंम्परा और भाषाओं के साथ जोडने का आग्रह किया. श्री गोपीनाथ जी ने कहा ग्यान की दिशा में अब जो खाइयाँ हैं, उन्हें पाटने के लिये जरूरी है कि उन्हें जन्म की भाषाओ में लाया जाये. पेन्सिलवेनिया के प्रों॰ सुरेंद्र गंभीर ने इस बात पर जोर दिया कि आवश्यक्ता ” शिक्षार्थी केंद्रित कार्यक्रमों की है. हिंदी के साथ प्रवासी भारतियों का यह भावात्मक संबध बहुत ही महत्वपूर्ण है. जहां पारंपरिक भाषा कमजोर हुई है, उसे फिर से सशक्त करने के आसार अच्छे हैं.”
सयुंक्त राष्ट्र संघ में हिंदी की अध्यक्ष डा॰ गिरिजा व्यास ने मंच पर अपने विचार जनता के सामने रखते हुए कहा “हिंदी भाषा जनता की भाषा है, इसका शिक्षण, परिक्षण, शोध, अनुशोध ज़रूरी है. शब्दावली का विस्तार हो शब्द कोष समर्थ हो यही सफलता की सीडी का पहला पड़ाव है. इस बात पर ज़ोर देते हुए राष्ट्रीय महिला आयोग की अध्यक्ष डा॰ गिरिजा व्यास ने कहा कि भाषा के माध्यम से हर क्षेत्र में उन्नति प्राप्त करनी है और लेखक ही सिर्फ दिशा दिखा सकते है अपनी कलम के जोर पर. इन सुंदर पंक्तियों से सारे हाल में गूंज सुनाई पड़ रही थीः

“हमने जड़ से उसे ढूंढा है
पर आज भावनाएं जड़ हो गई है.”

हिंदी के प्रचार-प्रसार में फिल्मों की भूमिका सत्र के अध्यक्ष सुप्रसिद्ध फिल्मकार गुलज़ार ने कहा कि हिन्दी भाषा के प्रचार-प्रसार में सिनेमा ने साहित्य से ज्यादा काम किया है. हिंदी फिल्मों ने ही हिंदी भाषा को संपर्क भाषा बनाया है इतना काम तो साहित्य अकादमी और नैशनल बुक ट्रस्ट जैसी स्स्थाओं ने भी नहिं किया.

विश्व के विभिन्न देशों के प्रितिनिधि, साहित्यकार, हिंदी सेवी, शिक्षक, प्रचारक, पत्रकार, सम्मेलन में आए और हिंदी के अतीत, वर्तमान, तथा भविष्य के संदर्भ में हिंदी के शिक्षण, प्रयोग, तथा प्रसार के अन्यान्य पहलुओं Top of Form 1
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पर संवाद करते रहे, डा॰ पी जयरमन जो कार्यकारी निर्देशक, भारतीय विध्या भवन द्वारा सम्मेलन की रिपोर्ट की प्रस्तुति की दौरान बोले ” हिंदी की बहु अयामी उपलब्धियाँ एवं भविष्य के लिये दिशा निर्देश की चर्चाएं कर रहे हैं, यह अपने आप में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है”

राष्ट्रीय मान अधिकार आयोग के माननीय सदस्य श्री पी. सी. शर्मा जी ने अपनी बातों के दौरान कहा कि भाषा एक अदभुत रचना है, जो मनुष्य द्वारा रची भी जाती है और उसे रचती भी है. भारत की आत्मा को पहचानने के लिये हिंदी भाषा का ग्यान अत्यंत आवश्यक है. भाषा उन्नति का मूल है, कारण कि हमारे सारे पर्यास इसी के माध्यम से होते हैं, उसी से जुड़े होते हैं. हम भाषा में ही जीते हैं और भाषा हमारे व्यहवार में घुली है.

यू के से आए “पुरवाई” के संपादक र्श्री पद्मेश गुप्ता ने देश विदेश में हिंदी शिक्षण पर अगली पीढी को हिंदी से जोडने के अभियान ” हिंदी ग्यान प्रतियोगिता” की विस्त्रत जानकारी देते हुए कहा कि चर्चाओं के बजाए युवा पीढी को हिंदी से जोड़ने के ठोस प्रयास होने चाहिये और ब्रिटेन में किये जा रहे प्रयासों का वैश्विक विस्तार किया जाना चाहिये.”

हिंदी के प्रचार प्रसार में सूचना प्रोध्यौजिकी की भूमिका के अध्यक्ष श्री अशोक चक्रधर ने बडे ही रोचक ढंग से हिंदी के विकास के लिए सूचना तकनीक की आवश्यकता पर ज़ोर दिया. उन्होंने सत्र में उपस्थित सभी लोगों से अपील की कि वे भी हिंदी के प्रसार के लिये उन सभी हिंदी सेवियों और साहित्यकारों को तकनीक से जोड़ने की प्रतिबद्धता निभाएं जो सूचना प्रौध्योगिकी से दोस्ती करने से डरते हैं.

भारतीय विध्या भवन (न्यूयार्क) के अध्यक्ष श्री नवीन मेहता ने कहा यह एक ऐतिहासिक घटना अवसर है, हिंदी हमारे लिये एक भाषा से अधिक भारतीय संस्क्रुति के सम्मान का प्रतीक ह
“हिंदी भाषा नहीं है, एक प्रतीक है, भारत की पहचान है, हिंदी को बढावा मिल रहा है, यह हिंदुस्तानियों की मेहनत है. अनेक भाषाओं के आदान प्रदान से हमारी संस्क्रुति पहचानी जाती है. देश की तरक्की उस की भाषा से जुड़ी हुई होती है. इसमें बड़ा हाथ साहित्य कारों, लेखकों, संपादकों और मीडिया का है.
देवनागरी लिपि के अध्यक्ष श्री बालकवि बैरागी “प्रवासी पुस्तक प्रदर्शनी” के दौरान. दायें से बायें खडी है देवी नागरानी, अंजना संधीर, बालकवि बैरागी, कुसुम और अनूप भार्गव

वैश्वी करण, मीडिया और हिंदी के सेशन की अध्यक्ष और “दैनिक हिंदुस्तान” की संपादक म्रणाल पाँदेय ने आठवें हिंदी सम्मेलन के प्रथम दिन “वैश्वीकरण, मीडिया और हिंदी” सत्र के अपने अध्यक्षीय वक्तव्य में व्यक्त किये. उन्होंने कहा कि हमें आज हिंदी को लेकर अत्यधिक सशंकित होने की आवश्यकता नहीं है, न ही हमें अकारण चिंताएं करनी चाहिये.उन्होंने स्पष्ट किया कि कहीं न कहीं हम सब उपभोक्ता है, अंतः उपभोक्तावाद को गलत साबित करने में हमें अपनी शक्ति व्यर्थ नहीं करनी चाहिये.”

हिंदी भाषा और साहित्य की अध्यक्ष श्रीमती चित्रा मुद्गल ने अपने विचारों से अवगत कराते हुए कहा “इस सम्मेलन में मुझे अच्छी संभावनायें नज़र आ रही है. विषयगत जो चर्चाएं-परिचर्चाएं हो रही हैं वह प्रगति के लिये एक उत्तम संकेत है. हिंदी का भविष्य बहुत उज्ज्वल है और हिंदी को कोई रोक नहीं सकता.”

भाषा शिक्षण के अपने अनुभवों से परिचित कराते हुए सुश्री सुषम बेदी कहती है “भाषा पढ़ाना एक कला है और विज्यान भी. कला इसलिये कि उसमें लगातार सर्जनात्मकता की जरूरत है और विग्यान इसलिये कि उसमें व्यवस्था और नियमों का पूरा पूरा ध्यान रखना पड़ता है. ऊर्जा, उत्साह, सर्जनात्मकता और उपज जहां भाषा शिक्षण को एक कला का रूप पर्दान करते हैं, वहीं पाठक -पद्धतियों का सही इस्तेमाल विग्यान का. दोनों का संतुलन ही श्रेष्ठ भाषा शिक्षण की नींव है.”

दिल्ली से पधारे संपादक (हिंदी), नेशनल बुक ट्रस्ट के श्री देवशंकर नवीन जी ने राष्ट्रीय एकता का सूत्र के अंतरगत जो कहा वो कथन भी इसी सत्य को दोहराता है. उनका कहना है ” भाषा, मनुष्य के लिये अभिव्यक्ति का माध्यम मात्र नहीं, यह मानवीय संबंध-बंध का आधार है और शब्द रूप से हिंदी और अन्य भाषाओं मे लिखा साहित्य एक सूत्र में अनुवाद के द्वारा बंधता जा रहा है.” पुस्तक व्यवसाय की बात करते हुए भी उन्होंने आक सत्य से परदा उठाते हुए कहा “सर्वतोन्मुखी विकास के बाद लेखक, पाठक, प्रकाशक, वितरक, सब के सब राग में रोते रहते हैं. क्रेताओं का कहना है पुस्तकें मंहगी हो गई हैं, तो सवाल उठता है मानवता के अलावा कौन सी चीज़ सस्ती हुई जा रही है?”

हां ये और बात है कि विचारों के आदान प्रदान के बीच में मत भेद भी होगा, सवाल होंगे जिनका जवाब पाना मुशकिल होगा.पर मेरा अपना विचार है कार्य का सिलसिला चलता रहे, कड़ी से कडी जुडती रहे, ताकि सिलसिला बनता रहे कारवाँ बनता रहे. देश की भाषा उसकी संस्क्रुति, प्रवासी देशों से जुडती रहे तभी तो जाकर हम एक स्तर पर मिलजुल कर कुछ कार्य इस दिशा में कर पाएंगे. जब तक कलम तलवार का काम
नहीं करेंगी, अपनी नोक से लेखक, साहित्यकार, जनता की सोच, उनकी बात, उनके इरादे लेखन द्वारा आम जनता तक नहीं पहुंचाएंगे, तब तक संगठन बन नहीं सकता., इरादों में पुख्तगी व बुलंदी आ नहीं सकती. लक्ष्य एक है मंजिल एक है, तो राह भी एक ही बनानी पड़ेगी, और यह है अपनी देश की मात्र भाषा को घर घर तक लाने का संकल्प जो किया है उसे अपनी मंजिल तक पहुंचाये.
पर उस मुकाम को हासिल करने का जो भाषा का यग्य है उसकी बडी जिम्मेदारी हम पर, आप पर, और इस पीढी के नौजवान कंधों पर भी है. सवाल यह फिर भी मन में उठता है कि विरासत में हम अपने बच्चों को वह भाषा “हिंदी” , जिसके लिये हम तकरीरें करते हैं, दलीलें देते है, इकत्ठे होकर भीड का हिस्सा बनते हैं, वो अमानत उन्हें दे पाते है या नहीं. अगर हमारी युवा पीढी और आने वाली पीडियां इसे अपनाने में, संपर्क की भाषा बनाने में नाकामयाब होती है तो दोष हमारा है, देश की भाषा देश में मज़बूत रहेगी तो तब जाकर वह विदेश में पनप पायेगी, और तब ही मात्रभाषा से राष्ट्र भाषा बनेगी. देश की भाषा विदेश तक पहुंचे, यह हमारी परीक्षा है, कहाँ तक हम निभा पाते हैं, कितना सींच पाते है इसे अपना व्यहवार से, दुलार से ताकि इसकी जडों में पुख्तगी आ सके, और यह लोरी बनकर देश , प्रवासी देश के घर घर में जहां एक हिंदुस्तानी का दिल धडकता है, वहां गूज बन कर फिज़ाओं में फैलती रहे, जिसका विस्तार आकाश की बुलंदियों से ऊँचा हो. जय हिंद.
देवी नागरानी, न्यू जर्सी
dnangrani@gmail.com
URL: https://charagedil.wordpress.com

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