एक परिचय : आर.पी. शर्मा “महर्षि” (भाग – १)

mehrish.jpgश्री आर.पी. शर्मा का जन्म ७ मार्च १९२२ ई को गोंडा में (उ.प्र.) में हुआ। शासकीय सेवा से सेवानिवृत्त श्री शर्मा जी का उपनाम “महरिष” है और आप मुंबई में निवास करते हैं। अपने जीवन-सफर के ८५ वर्ष पूर्ण कर चुके श्री शर्मा जी की साहित्यिक रुचि आज भी निरंतर बनी हुई है। ग़ज़ल रचना के प्रति आप की सिखाने की वृति माननीय है। विचारों में स्फूर्ति व ताज़गी बनी हुई है, जिसका प्रभाव आपकी ग़ज़लों में बखूबी देखा जा सकता है, तथा विचारों की यह ताज़गी आप की रोज़मर्रा की जिंदगी को भी संचालित करती रहती है। ग़ज़ल संसार में वे “पिंगलाचार्य” की उपाधि से सम्मानित हुए हैं, और मुझे फ़क्र है कि आज मैं उन्हें अपना गुरु मानती हूँ, शायद इस श्रद्धा और विश्वास का एक कारण यह भी है कि मैं बिलकुल थोड़े ही समय में बहुत कुछ सीख पाई, जो मुझे इस राह का पथिक होने का अधिकार देता है। गज़ल लेखन कला मेरे विचार में एक सफ़र है जिसकी मंज़िल शायद नहीं होती।

तवील जितना सफ़र ग़ज़ल का/ कठिन है मंज़िल का पाना उतना। देवी

आपकी प्रकाशित पुस्तकें इस प्रकार हैं

१. हिंदी गज़ल संरचना-एक परिचय (सन् १९८४ में मेरे द्वारा इल्मे- अरूज़ – उर्दू छंद-शास्त्र) का सर्व प्रथम हिंदी में रूपांतर,

२. गज़ल-निर्देशिका,

३. गज़ल-विद्या,

४. गज़ल-लेखन कला,

५. व्यहवारिक छंद-शास्त्र (पिंगल और इल्मे- अरूज़ के तुलनात्मक विश्लेषण सहित),

६. नागफनियों ने सजाईं महफिलें (ग़ज़ल-संग्रह),

७. गज़ल और गज़ल की तकनीक।

उनकी आने वाली पुस्तक है “मेरी नज़र में” जिसमें उनके द्वारा लिखी गईँ अनेक प्रस्तावनाएँ, समीक्षाएँ रहेंगी जो उन्होंने अनेक लेखकों, कवियों और ग़ज़लकारों पर लिखीं हैं और वो अनेक पत्रिकाओं में प्रकाशित हुई हैँ। यह संग्रह एक अनुभूति बनके सामने आयेगा, जिसे पढ़ने वालों को जानने का एक सुअवसर मिलेगा कि कैसे महरिष जी सरलता और सादगी से अपनी पारखी नज़र अपनी अमूल्य राय के साथ साथ सुझाव भी देते है।

मेरे पहले गज़ल संग्रह चराग़े दिल के विमोचन के अवसर पर ग़ज़ल के विषय में श्री आर.पी.शर्मा महरिष् इस किताब में छपे अपनी प्रस्तावना स्वरूप लेख देवी दिलकश ज़ुबान है तेरीमें क्या कहते हैं, अब सुनिये महरिष जी की ज़ुबानीः

ग़ज़ल उर्दू साहित्य की एक ऐसी विधा है जिसका जादू आजकल सबको सम्मोहित किए हुए है। ग़ज़ल ने करोड़ों दिलों की धड़कनों को स्वर दिया है। इस विधा में सचमुच ऐसा कुछ है जो आज यह अनगिनत होंठों की थरथराहट और लेखनी की चाहत बन गई है। ग़ज़ल कहने के लिये हमें कुशल शिल्पी बनना होता है, ताकि हम शब्दों को तराश कर उन्हें मूर्त रूप दे सकें, उनकी जड़ता में अर्थपूर्ण प्राणों का संचार कर सकें तथा ग़ज़ल के प्रत्येक शेर की दो पंक्तियाँ या मिसरों में अपने भावों, उद्‌गारों, अनुभूतियों आदि के उमड़ते हुए सैलाब को मुट्ठी में आकाश, कठौती में गंगा, कूजे में दरिया, बूँद में सागर के समान समेट कर भर सकें।”

यहाँ मैं ग़ज़ल के मिज़ाज के बारे में भी कुछ कहना चाहूँगा। ग़ज़ल कोमल भी है और कठोर भी। उसका लहज़ा कभी नर्म तो कभी तीखे तेवर लिये होता है, तो कभी दोनों का मणि कांचन संयोग कुछ और ही लुत्फ़ पैदा कर देता है,

चटपटी है बात लक्षमण – सी मगर/अरथ में रघुवीर- सी गंभीर है

सुनके महरिषयूँ लगा उसका सुख़न/ चाप से अर्जुन के निकला तीर है।

हरियाणा के प्रख़्यात उस्ताद शाइर सत्यप्रकाश शर्मा तफ़्ता ज़ारी‘ (कुरुक्षेत्र) ने तो ग़ज़ल से संबोधित एक अनूठी बात कही है, वे फर्माते है:

सुलूक करती है माँ जैसा मुब्तदी से ग़ज़ल/मगर एक अग्नि-परीक्षा है मुन्तही के लिये।

कहने का मतलब यह कि नवोदतों के लिये तो ग़ज़ल माँ जैसा व्यवहार करती है परन्तु इस विधा में पारंगत व्यक्तियों को भी कभी अग्नि-परीक्षा से गुज़रना पड़ता है।

बात बनाये भी नहीं बनती” जैसी कठिन परिस्थिति इनके सामने उत्पन्न हो जाती है। इस शेर पर मेरी तज़्मीम भी है, –

निसार करती है उस पर ये ममता के कंवल

उसी के फिक्र में रहती है हर घड़ी, हर पल

मसाइल उसके बड़े प्यार से करती है ये हल

सुलूक करती है माँ जैसा मुब्तदी से ग़ज़ल

मगर इक अग्नि-परीक्षा है मुन्तही के लिये।

प्रख्यात शाइर श्री क्रष्ण बिहारी नूरके एक मशहूर शेर :

“चाहे सोने के फ़्रेम में जड़ दो

आईना झूठ बोलता ही नहीं।“

इस शेर पर मैंने अपनी ओर से तीन मिसरे लगाये हैं:

तुम जो चाहो तो ये भी कर देखो

हर तरह इसका इम्तिहां ले लो

लाख लालच दो, लाख फुसुलाओ

चाहे सोने के फ़्रेम में जड़ दो

आईना झूठ बोलता ही नहीं।”

यह तज़्मीन श्री तर्ज़ साहिब को सादर समर्पित है।

अब मैं आपको एक पद्यात्मक रचना सुनाना चाहूँगा, मौके की चीज़ है, समाअत फ़रमाएँ:

आशीर्वाद श्रीमती देवी नागरानी जी को चराग़े‍-दिलके विमोचन के अवसर पर

“किस कदर रौशन है महफ़िल आज की अच्छा लगा

इस चराग़े‍-दिलने की है रौशनी अच्छा लगा।

आप सब प्रबुद्ध जन को है मेरा सादर नमन

आप से इस बज़्म की गरिमा बढ़ी अच्छा लगा।

कष्ट आने का किया मिल जुल के बैठे बज़्म में

भावना देखी जो ये सहयोग की अच्छा लगा।

इस विमोचन के लिये देवी बधाई आपको

आरज़ू ये आपकी पूरी हुई अच्छा लगा।

इक ख़ज़ना मिल गया जज़्बातो-एहसासात का

हम को ये सौग़ात गज़लों की मिली अच्छा लगा।

आपको कहना था जो देवीकहा दिल खोलकर

बात जो कुछ भी कही दिल से कही अच्छा लगा।

भा गया है आपका आसान अंदाज़े-बयां

आपने गज़लों को दी है सादगी अच्छा लगा।

हर तरफ बिखरी हुई है आज तो रंगीनियाँ

रंग बरसाती है गज़लें आपकी अच्छा लगा।

ज़ायका है अपना अपना, अपनी अपनी है मिठास

चख के देखी हर गज़ल की चाशनी अच्छा लगा।

यूँ तो महरिषऔर भी हमने कहीं गज़लें बहुत

ये जो देवीआप की ख़ातिर कही अच्छा लगा।“

क्रमशः —

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3 टिप्पणियाँ

  1. दिसम्बर 26, 2007 at 1:44 पूर्वाह्न

    महर्षि जी को सलाम। उन की पहली पुस्तक मेरे संग्रह में है। नए गजल कारों के लिए खुद को दुरूस्त करने का सब से उत्तम उपाय। सभी गजलकार इस का लोहा मान चुके हैं। मेरे जैसे गद्य लेखकों और गजल का रसास्वादन करने के शोकीनों के लिए भी गजल को समझने का सर्वोत्तम साधन सिद्ध हुई है।

  2. दिसम्बर 29, 2007 at 4:28 पूर्वाह्न

    Dinesh ji

    mujhe khushi hai ki unki lekhni logon ki margdarshak bani hai. ye meri choti si koshish hai ki maine jo kuch seekha hai us silsile ko is tarah post karke aam tak koi sandesh tak pahuncha sakoon.
    Devi

    • विजय धीमान said,

      जनवरी 9, 2016 at 5:00 अपराह्न

      माननीय शर्मा जी की पुस्तकें किस पते पर उपलब्ध हो सकेंगी कृप्या बतायें।


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