“प्रवासी पुस्तक प्रदर्शनी”

आठवाँ विश्व हिंदी सम्मेलनः १३, १४, १५ जुलाई, न्यू यार्क

“प्रवासी पुस्तक प्रदर्शनी” हिंदी लेखकों की रचनात्मकता का एक अत्यात परिद्रश्य का उध्गाटन करती है” कमल किशोर गोयनका

अब फिज़ाओं में महक रही है हिंदी भाषाविश्व का मँच मिला हिंदी का

घर घर में अब हिंदी बोलो

रात की रानी जैसे महकी
हिंदी भाषा फिज़ा में घोलो… देवी नागरानी

हिंदी का नया सूर्योदय नज़र आ रहा है. ८वें विश्व हिंदी सम्मेलन के शिखर पर एक सुन्हरा दरवाज़ा UNO में भारतवासियों के लिये खुला है, उसका इतिहास गवाह है. सम्मेलन का मूल मक्सद ही यही है कि हिंदी को विश्व मंच पर स्थापित करना. तमाम देशों से आए हिंदी प्रेमी संयुक्त राष्ट्र संघ के मुख्यालय के कान्फ्रेंस हाल में दाखिल हुए तो अहसास हुआ UNO ने खुले दरवाजों ने हिंदुस्तानियों का सन्मानित स्वागत किया है. यहाँ गाँधी जी का कथन सत्य बनकर सामने आया ” अपने दरवाज़े खुले रखो, विकास अंदर आएगा,”
और यह दिन एक ऐतिहासिक यादगार रहेगा.वह दिन दूर नहीं जब संयुक्त राष्ट्र संघ हिंदी भाषा को भी अपने आलंगन में ले लगा. संयुक्त राष्ट्र संग की भाषा बनाने का प्रयास सफलता की सीडियाँ चढता जहां पहुंचा है वहां पर मुकाम पाने की संभावना रौशन नज़र आती है. किसी भी भाषा का साहित्य उस भाषा का वैभव है, उस भाषा का सौंदर्य है. हर देश की तरक्की उसकी भाषा की तरक्की से जुड़ी होती है. हिंदी केवल भाषा नहीं, एक सौंदर्य है, बहती गंगा है, मधुर वाणी है.
मानव मन की वाणी हिंदी
आदि वेद की वाणी हिंदी.


“प्रवासी पुस्तक प्रदर्शनी”


डा॰ अँजना संधीर जिसकी मुख्य कार्यकर्ता रही, जिसकी मेहनत और लगन साहित्य के साथ सदा जुड़ी रहेगी.वहां प्रदर्शित तस्वीरें , बैनर्स, व सजावट में साथ दिया डा॰ सरिता रानी ने. जिन्होंने अपने
8th-vhs-books.jpgसहयोग साथियों की मदद से किताबों की सजवट और बिक्रि का बार बखूबी स्भाला. तस्वीरों से अनेक लेखकों के कार्य और सफलताएं सामने आई.

हिंदी के प्रवासी साहित्यकारों की लिखी २७० पुस्तकें वहां प्रदर्शित रहीं, सुंदर ढंग से सजी हुई . किकाबों की सूची भी सबको दी जा रही थी. एक प्रतिक्रिया के लिये डायरी रखी गई थी जिसमें, कई साहित्यकारों ने, संपादकों ने और साहित्य प्रेमियों ने सराहना के शब्द लिखे जिससे लेखकों में नई शक्ति का सँचार होने की संभावना रहेगी. कुछ मैं यहां उल्लेख करना चाहूगीं महिलाओं के इस सँगठित कार्य के बारे में.
प्रवासी साहित्य की मुख्य कार्यकर्ता डा॰ अंजना संधीर विदेश राज्य मंत्री श्री आँनंद शर्मा का प्रदर्शनी में स्वागत किया. उन्होंने उत्साह से पुस्तकों पर अपनी पारखी नज़र डालते हुए कहा ” यह एक सुखद प्रयास है जो सेतू का काम कर रही है. उस प्रवासी हिंदी धारा को लेकर हिंदी की मुख्य धारा से
vhs-2007.jpg जोड़कर एक मुकमिल कदम उठा सकते हैं जिसे भाषा को पुख़्तगी मिल सके और एक महासागर का स्वरूप प्राप्त कर हो सके. साहित्य के माध्यम से ही हम एक दूसरे से जुड़ सकते है. यह मिलन आने वाली राहों को रौशन करता रहेगा.” लोकार्पण के समय के उपस्थित सभी लेखक और लेखिकायें तस्वीर में हैं


” प्रवासी पुस्तक प्रदर्शनी” का निरीक्षण सुबह हुआ और उसी शाम अपने हाथों से २२ प्रवासी लेखक और लेखिकाओं की उपस्थिति में ३७ पुस्तकों का विमोचन किया जिसमें मेरा “चराग- दिल” भी शामिल था. पुस्तकों का लोकार्पण और फोटो अवसर बहुत शुभ साबित हुआ. उनके शब्दों से एक नया संचार जन्म ले रहा था सभी साहित्यकारों के दिलों में.

vhs-minister.jpg

तस्वीर में दिखाई दे रहे हैं श्री अमरेंद्र कुमार, श्री गौतम कपूर, श्री आंनद शर्मा, अभिनव शुक्ला इला प्रसाद, अंजना सँधीर, देवी नागरानी, और कुसुम टँडन.
१४ तारीख को डा॰ गिरिजा व्यास ने भी काफी समय तक पुस्तकों का निरीक्षण कियाऔर प्रोतसाहित करते शब्दों में हर लेखक के प्रयास को सराहा. संकेत यही मिलता है कि सिमटाव का कवच उतारकर अपने आपको फैलाने का वक्त आया है. खुद को पहचानकर राष्ट्र में अपनी जड़ें भाषा द्वारा मज़बूत करके अंतराष्ट्रीय स्तर पर पहचान पानी है, माधंयम फिर भी भाषा ही रहेगी. भाषा है तो हम हैं, हमारे देश की शान है.
बाल साहित्य के अध्यक्ष श्री बालशौर रेड्डी ने अपनी प्रतिक्रिया में संक्षेप में बताते हुए कहा ” बाल साहित्य के सूत्रों से आपका कहने सुनने का नाता है, था और चलता रहेगा. टिमटिमाते सितारे, पानी में मछली, , जिग्यासा भरे प्रश्न उत्पन करती है, प्रश्न उत्तर की चाहत रखता है, बस बाल मन समझने की जरूरत है, चिंतन मनन के पश्चात उसको पाचन करने का समय देना हमारा कर्तव्य है. प्दर्शनी की सराहना करते हुए कहा ” यह कोई साधारण काम नहीं हैं. लगन ओर मेहनत रंग लाई है” १३ जूलाई २००७
सयुंक्त राष्ट्र संघ में हिंदी की अध्यक्ष डा॰ गिरिजा व्यास ने मंच पर अपने विचार जनता के सामने रखते हुए कहा “हिंदी भाषा जनता की भाषा है, इसका शिक्षण, परिक्षण, शोध, अनुशोध ज़रूरी है. शब्दावली का विस्तार हो शब्द कोष समर्थ हो यही सफलता की सीडी का पहला पड़ाव है. प्रदर्शनी में जब वह पधारी तो मैंने अपना गज़ल संग्रह ” चरागे दिल ” उन्हें भेंट करते हूए कहा कि आप शेर अच्छे बोल लेती हैं, उसे जरूर पढ़ियेगा” तो तैरती नज़र किताब पर डालते हुए कहा ” इतना आकर आकर्षक कवर है, इसे जरूर ले जाऊँगी और पढूँगी।” प्रदर्शनी को करीब से देखते हुए अनायास राष्ट्रीय महिला आयोग की अध्यक्ष डा॰ गिरिजा व्यास ने कहा “भाषा के माध्यम से हर क्षेत्र में उन्नति प्राप्त करनी है और लेखक ही सिर्फ दिशा दिखा सकते है अपनी कलम के जोर पर. हिंदी भाषा नहीं है, एक प्रतीक है, भारत की पहचान है, हिंदी को बढावा मिल रहा है, यह हिंदुस्तानियों की मेहनत है. अनेक भाषाओं के आदान प्रदान से हमारी संस्क्रुति पहचानी जाती है. देश की तरक्की उस की भाषा से जुड़ी हुई होती है. इसमें बड़ा हाथ साहित्य कारों, लेखकों, संपादकों और मीडिया का है.”
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देवनागरी लिपि के अध्यक्ष श्री बालकवि बैरागी “प्रवासी पुस्तक प्रदर्शनी” के दौरान. उसे बहुत सराहा और सभी लेखकों को मुबारकबाद देते हूए अंजना के इस कार्य की सराहना करते हुए कहा वे तो शारदा सुता हैं ”
उनके साथ दायें से बायें खडी हैदेवी नागरानी, अंजना संधीर, बालकवि बैरागी, कुसुम टंडन और अनूप भार्गव.
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श्री गौतम कपूर ने प्रदर्शनी को देखते हुए कहा “अंजना व समस्थ साथियों, जिन्होंने अपनी क्रतुयों के सशक्त माधंयम से इस प्रदर्शिनी को एक नया रूप दिया है, उन सभीको मेरा शत शत प्रणाम. मुझे यह देखकर एक सुखद आश्चर्य की अनुभूति का अहसास है जो मेरे रोम रोम को खिलित कर रही है कि अपने देश से हज़ारों मील दूर, प्देश में मेरे देश के लोग वहां की भाषा को पुस्तकों के माध्यम से भारत की संस्क्रुति विश्व भर में प्रचारित कर रहे हैं.” गौतम कपूर, १४ जूलाई २००७.
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कमलकिशोर गोयानका जी ने अपने मन के भाव व्यक्त करने में कोई ” यह प्रद्रशनी देखना एक सौभाग्य का विषय है. यह अमरिका के हिंदी लेखकों की रच्नात्मकता का एक अत्यात परिद्रिश्य का उद्घाटन करती है .” कमल किशोर गोयनका. १५जूलाई, २००७
हां ये और बात है कि विचारों के आदान प्रदान के बीच में मत भेद भी होगा, सवाल होंगे जिनका जवाब पाना मुशकिल होगा.पर मेरा अपना विचार है कार्य का सिलसिला चलता रहे, कड़ी से कडी जुडती रहे, ताकि सिलसिला बनता रहे कारवाँ बनता रहे. देश की भाषा उसकी संस्क्रुति, प्रवासी देशों से जुडती रहे तभी तो जाकर हम एक स्तर पर मिलजुल कर कुछ कार्य इस दिशा में कर पाएंगे. जब तक कलम तलवार का काम
नहीं करेंगी, अपनी नोक से लेखक, साहित्यकार, जनता की सोच, उनकी बात, उनके इरादे लेखन द्वारा आम जनता तक नहीं पहुंचाएंगे, तब तक संगठन बन नहीं सकता., इरादों में पुख्तगी व बुलंदी आ नहीं सकती. लक्ष्य एक है मंजिल एक है, तो राह भी एक ही बनानी पड़ेगी, और यह है अपनी देश की मात्र भाषा को घर घर तक लाने का संकल्प जो किया है उसे अपनी मंजिल तक पहुंचाये.
पर उस मुकाम को हासिल करने का जो भाषा का यग्य है उसकी बडी जिम्मेदारी हम पर, आप पर, और इस पीढी के नौजवान कंधों पर भी है. सवाल यह फिर भी मन में उठता है कि विरासत में हम अपने बच्चों को वह भाषा “हिंदी” , जिसके लिये हम तकरीरें करते हैं, दलीलें देते है, इकत्ठे होकर भीड का हिस्सा बनते हैं, वो अमानत उन्हें दे पाते है या नहीं. अगर हमारी युवा पीढी और आने वाली पीडियां इसे अपनाने में, संपर्क की भाषा बनाने में नाकामयाब होती है तो दोष हमारा है, देश की भाषा देश में मज़बूत रहेगी तो तब जाकर वह विदेश में पनप पायेगी, और तब ही मात्रभाषा से राष्ट्र भाषा बनेगी. देश की भाषा विदेश तक पहुंचे, यह हमारी परीक्षा है, कहाँ तक हम निभा पाते हैं, कितना सींच पाते है इसे अपना व्यहवार से, दुलार से ताकि इसकी जडों में पुख्तगी आ सके, और यह लोरी बनकर देश , प्रवासी देश के घर घर में जहां एक हिंदुस्तानी का दिल धडकता है, वहां गूज बन कर फिज़ाओं में फैलती रहे, जिसका विस्तार आकाश की बुलंदियों से ऊँचा हो. जय हिंद.

nasha.jpg

Devi Nangrani
dnangrani@gmail.com
URL: <https://charagedil.wordpress.com&gt;
aur UNO ki tasveerein yahan dehein.ttp://indianera.com/slideshow/HindiKaviSamelan/index.asp http://indianeraimages.com/categories2.asp?id=65&gt; pictures from here
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3 टिप्पणियाँ

  1. दिसम्बर 26, 2007 at 7:38 पूर्वाह्न

    पूरी खबर पढ़वाने के लिए धन्‍यवाद

  2. दिसम्बर 26, 2007 at 10:52 पूर्वाह्न

    बहुत सुंदर जानकारी .हिंदी भाषा के प्रचार प्रसार हेतु इस तरह के आयोजन होते रहना ज़रूरी है .धन्यवाद

  3. दिसम्बर 26, 2007 at 3:58 अपराह्न

    महेंद्र जी
    आप ने इस पुरानी खबर को पढा इसके लिये बहुत अभारी हूं. पर हमारा मसइला अब भी वही है. हिंदी को बोलचाल की भाषा बनाने में बढ़ावा देना.
    देवी


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