“अभिमत”

 

“अभिमत”

देवी नागरानी की गज़लें उनकी दिल की तलहटी से निकले कोमल हृदयोदगार हैं. यह कोमलता उनकी ग़ज़लों के शिल्प में तों प्रतिबिम्बित हैं लेकिन कथ्य में वे बहुत गहराई लिए हुए हैं. उनका आलोच्य vijaya.jpgग़ज़ल संग्रह ‘चरागे-दिल’ इस सत्य की बहुत शिद्दत से तस्कीद करता है. इस संग्रह की तमाम ग़ज़लों से गुज़रते हुए रदीफ़-काफिये की आश्चर्यजनक सादगी एवं उस सादगी में चम्कृत कर देने वाली छुपी हुई गहराई के दर्शन संग्रह के बहुत से स्थानों पर देखने को मिलती हैं.
हाल के वर्षों की प्रवासी हिन्दी ग़ज़ल यात्रा में जिन शायरों ने अपना मुकाम ख़ुद-ब-ख़ुद तैयार किया है, उनमें न्यू जर्सी में रह रही अनिवासी भारतीय गज़लकारा देवी नागरानी का नाम भी अदब से शुमार किया जाता है. उनके संग्रह ‘चरागे-दिल’ का समकालीन हिन्दी ग़ज़ल परिदृश्य में निश्चित तौर पर इस्तकबाल किया जाना लाज़मी है. उनकी गजलों से गुज़रते हुए यह सवाल हावी रहता है कि भले ग़ज़ल उनके दिल की तलहटी से उपजने पर भी महज़ भावुकता की दरिया की तरह न बहकर, एक सार्थक सँवाद (गुफ्तगू) सी करती है. ज़माने के दर्द के साथ हमसाया हो जाती हैं उनकी गज़लें और यही वो बात है जो देवी नागरानी की गज़ली शक्सियत को सर्वथा भिन कलेवर बख़ँशती है. ग़ज़ल के शास्त्रीय विधि विधानों से पूर्णत: अनुप्राणित उनकी गजलें ज़माने के दर्द को बखूबी ‘गागर में सागर सी’ भावामिव्यक्त करने की विपुल क्षमता लिए हुए हैं. उनकी ग़ज़लों में अशयार का प्रभावी संयोजन, शेर का अच्छा तासीर एवं समग्र तौर पर स्राजनात्मक प्रभावोत्त्पाद्कता झिलमिलाती है जो एक मुकमिल शायरी के बेशकीमती नगीने हैं. उनकी ग़ज़ल की विषयवस्तु काफी विस्तृत है, शालीन कटाक्ष एवं गहरी पीड़ा के ताने बाने में वे पूरी कायनात के दुःख-दर्द को पूरे इत्मिनान से आवाज़ देती है. उनके शेरों में आश्चर्यजनक रूप से स्वाभाविकता है जो उनके बहुत से शेरों को ‘आमद’ के ‘शेर’ बनाती है.
शमशेर के शब्दों में-
वही उम्र का एक पल कोई लाये
तड़पती हुई-सी ग़ज़ल कोई लाये.
देवी नागरानी की गज़ल्लियात से रूबरू होते हुए यह बात बार-बार उभरती है कि उनकी ग़ज़ल का सुभाव (मिजाज़) भाव-मंगिमा तथा शब्द-सौष्ह्तव सभी एक नई ज़मीन की तलाश करते हैं, एक मौलिक उर्वर ज़मीन जिसमें नई-नई दिशाओं रूपी कोंपलें उभरती दिखती हैं. उनकी गज़लें नई उर्जा और रचनात्मकता के साथ अपने सरोकारों को अभिव्यक्त कर रही है.
मैं उनके ग़ज़ल संग्रह की अप्पार लोकप्रियता की कामना करता हूँ. अंत में बशीर बद्र के शब्दों में:
“चमकती है कहीं सदियों में आंसुओं की ज़मीन
ग़ज़ल के शेर यहाँ रोज़-रोज़ होते हैं.”
पुन: असीम मंगलकामनाओं के साथ
विजय सिंह नहाता
B_92, scheme 10-B
Gopalpura Byepass
Jaipur 302018

 

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1 टिप्पणी

  1. mehek said,

    दिसम्बर 10, 2007 at 2:51 पूर्वाह्न

    aap ne sach kaha,zindagi aur dil ki baaton ki gehrai hai in sari gazalon mein.behad ummda .


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