अंधेरी गली में मेरा घर रहा है

गज़लः ३१
अंधेरी गली में मेरा घर रहा है
जहां तेल-बाती बिना इक दिया है.
जो रौशन मेरी आरजू का दिया है
मेरे साथ वो मेरी मां की दुआ है.
अजब है, उसी के तले है अंधेरा
दिया हर तरफ़ रौशनी बांटता है.
यहां मैं भी मेहमान हूं और तू भी
यहां तेरा क्या है, यहां मेरा क्या है.

खुली आंख में खाहिशों का समुंदर
न अंजाम जिनका कोई जानता है.

जहां देख पाई न अपनी ख़ुदी मैं
न जाने वहीं मेरा सर क्यों झुका है.

तुझे वो कहां ‘देवी’ बाहर मिलेगा
धड़कते हुए दिल के अंदर खुदा है.

चराग़े-दिल/ ५७

८वें विश्व हिंदी सम्मेलन

हिंदी का नया सूर्योदय नज़र आ रहा है.

८वें विश्व हिंदी सम्मेलन के शिखर पर एक सुन्हरा दरवाज़ा UNO में भारतवासियों के लिये खुला है, उसका इतिहास गवाह है.सम्मेलन का मूल मक्सद ही यही है कि हिंदी को विश्व मंच पर स्थापित करना. तमाम देशों से आए हिंदी प्रेमी संयुक्त राष्ट्र संघ के मुख्यालय के कान्फ्रेंस हाल में दाखिल हुए तो अहसास हुआ UNO ने खुले दरवाजों ने हिंदुस्तानियों का सन्मानित स्वागत किया है. यहाँ गाँधी जी का कथन सत्य बनकर सामने आया ” अपने दरवाज़े खुले रखो, विकास अंदर आएगा,”

और यह दिन एक ऐतिहासिक यादगार रहेगा.वह दिन दूर नहीं जब संयुक्त राष्ट्र संघ हिंदी भाषा को भी अपने आलंगन में ले लगा.संयुक्त राष्ट्र संग की भाषा बनाने का प्रयास सफलता की सीडियाँ चढता जहां पहुंचा है वहां पर मुकाम पाने की संभावना रौशन नज़र आती है. किसी भी भाषा का साहित्य उस भाषा का वैभव है, उस भाषा का सौंदर्य है. हर देश की तरक्की उसकी भाषा की तरक्की से जुड़ी होती है. हिंदी केवल भाषा नहीं, एक सौंदर्य है, बहती गंगा है, मधुर वाणी है.

मानव मन की वाणी हिंदी
आदि वेद की वाणी हिंदी.

वहाँ उपस्थित उद्घोषिका सुश्री शीला चमन ने सम्मान पूर्वक घोषणा करने का दायित्व लिया. मंच पर उपस्थित मुख्यगण थेः

१.भारत के विदेश मंत्री माननीय श्री आनंद शर्मा
२.अमरीका के भारत के राजदूत श्री राजेंद्र सेन
३. संयुक्त राष्ट्र के बारत के स्थाई प्रतिनिधि श्री निरुपम सेन
४. मरीशस के शिक्षा और मानव सँसाधन के साधन मंत्री श्री धरमबिर सेन गोखुल
५. नेपाल के उध्योग पति श्री राजेंद्र महतो
६. संयुक्त राष्ट्र के महा सचिव/प्रतिर्निधि बान की मून
७. भारतीय विध्या भवन, न्यू यार्क के अध्यक्ष डा॰ नवीन मेहता.
सयुंक्त राष्ट्र के महासचिव बान की मून हिंदी प्रेमियों का नमस्ते कह कर संबोधन करते हुए कहा “हिंदी दुनियां भर के लोगों को पास लाने का काम कर रही है और दुनियां भर की संस्क्रुर्तियों के बीच एक पुल का काम कर रही है. अंत में हिंदी में संबोधित करते हुए कहा ” उस सम्मेलन में भाग लेते हुए मुझे खुशी हो रही है. मैं सब को शुभकामनाएं देता हूँ, नमस्ते और धन्यवाद.” इससे पहले भारत के प्रधानमँत्री डा॰ मनमोहन सिंह का वीडियो संदेश दर्शाया गया जिसमें संदेश स्वरूप ” आज हिंदी विश्व भाषा बन चुकी है. आँकडे यह बताते हैं कि दुनियां में सबसे अधिक बोली जाने वाली भाषाऔं में हिंदी दूसरे स्थान पर है, सौ से अधिक विश्वविध्यालयों में हिंदी की पढ़ाई हो रही है. शनिवार इतवार के दिन हिंदी अनेक सँस्थाओं द्वारा पढ़ाई जाती है और यह एक शुभ संकेत है कि अमरीकी स्कूलों में सिलबस में भी हिंदी ने अपनी जगह बनानी शुरू कर दी है.
“यू एन ए के प्रँगण में टहलना, वहाँ की भीड का हिस्सा बनना भी एक अनुभव तो है पर ऐतिहासिक घटना भी है. परिसर में स्थंभित एक मूर्तिशिल्प था जो एक जो एक पिसतौल के आकार का था, जिसकी नाल की गाँठ बंधी हूई थी जैसे संकेत कर रही हो ” अब हिंसा नहीं चाहिये”. दिल्ली के प्रसिद्ध कवि और उस शाम के कवि सम्मेलन के सँचालक श्री अशोक चक्रधर जी का कहना है ” एक गाँठ यहाँ ज़रूर खुलती हुई दिखाई दी जो हिंदी को लेकर अब तह बंधी हुई नज़र आ रही है. यकीन कीजिये इस प्राँगण में
जिस तरह आज गूंजी है आगे भी गूँजती रहेगी. “हाँ सच है, जिस तरह भारत का राष्ट्रीय गीत ” जन गन मन” सभी के मुखारबिंद से मुख्यालय में गूंज बन के प्रतिध्वनित हो रहा था तो यह कहना अतिशयोक्ति न होगा
कि हम देश की भाषा को यहाँ अब यहाँ तक लाने में कामयाब रहे हैं, और होकर रहेंगे.
हिंदी भाषा जो हमारे साहित्यक , समाजिक, और सांस्क्रतिक कार्यों का माध्यम है और वही अब एकता को द्रढ करने लगी है. श्री आनंद शर्मा ने एक सुखद ऐलान किया दो आक्टोबर महात्मा गाँधी के जन्म दिन को “शाँति दिवस “ घोषति करते हुए कहा कि गाँधी जी के विचारों को, उनके सँदेशों को, उनके चुने हुए रास्तों
को अपनाने के सँकल्प से उन्हें और जनता को जो हर्ष हुआ वो तालियों की गूँज में समाया था, जहाँ भारत की आवाज़ आज अंतराष्ट्रीय स्तर पर सुनी जा रही है उसे सँपर्क की भाषा बनाने पर भी ज़ोर दिया गया. तिरँगा भारत की आज़ादी का प्रतीक है. जिन लोगों ने आज़ादी दिलाई, उन लोगों को याद रखना ऐसा है जैसे अपनी भाषा के ज़रिये हम अपनी भावनाओं को अभिव्यक्त करने में समर्थ हैं उसी के संदर्भ में हम उन शूरवीरों को, देश की मात्र भाषा को और माता के स्थान को नहीं भूल सकेंगे.
॰॰
सिलसिला आगे बढ़ा विशयों की बातचीत पर जिनमें कुछ विषय इस तरह थेः
संयुक्त राष्ट्र संघ में हिंदीः अध्यक्ष डा॰ गिरिजा व्यास
देश विदेश में हिंदी शिक्षणः अध्यक्ष श्री प्रेम चंद शर्मा
वैश्वी करण, मीडिया और हिंदीः अध्यक्षः श्रीमती म्रणाल पाँडेय
विदेशों में हिंदी स्रजन (प्रवासी हिंदी साहित्य) अध्यक्ष डा॰ इंदरा गोस्वामी
हिंदी के प्रसार प्रचार में सूचना प्रौध्योगिकी की भूमिकाः अध्यक्ष प्रो॰ अशोक चक्रधर
हिंदी के प्रसार प्रचार में हिंदी फिल्मों की भूमिकाः अध्यक्षः श्री गुलज़ार साहिब
हिंदी युवा पीढी और ग्यान विग्यानःअध्यक्ष डा॰ वाई लक्ष्मी प्रसाद
हिंदी भाषा और साहित्यः विविध अयामः अध्यक्षः श्रीमती चित्रा मुद्गल
साहित्य में अनुवाद की भूमिकाः अध्यक्षः डा॰ गोपीचंद नारंग

हिंदी और बाल साहित्यः अध्यक्षः डा॰ बालशौररि रेड्डी
देवनागरी लिपिः अध्यक्षः बालकवि बैरागी
राष्ट्रीय एकता का सूत्रः साँस्क्रतिक अयामज
अनुवाद की समस्याएः
पुस्तक व्यवसायः एक विहंगम द्रुष्टि
पुस्तकों का लोकार्पणः श्री आँनंद शर्मा
॰॰
विविध विषयों पर हिंदी पुस्तकों और पत्र पत्रिकाओं का लोकार्पण

विदेश राज्य मंत्री श्री आँनंद शर्मा ने “हिंदी उत्सव ग्रंथ ” “गगनाचल” के विशेषांक और हिंदी विद्वानों की निर्देशिकाओं का लोकार्पण किया. उसके बाद उन्होंने प्रवासी साहित्य की मुख्य कार्यकर्ता डा॰ अंजना संधीर व अन्य प्रवासी लेखिकाओं की मदद से सजाई गई ” प्रवासी पुस्तक प्रदर्शनी” का निरीक्षण किया और उसी शाम

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अपने हाथों से २२ प्रवासी लेखक और लेखिकाओं की ३७ पुस्तकों का वोमोचन किया जिसमें मेरा “चराग- दिल” भी शामिल था. पुस्तकों का लोकार्पण और फोटो अवसर बहुत शुभ साबित हुआ. प्रवासी साहित्य को लेकर हिंदी की मुख्य धारा से जोड़कर एक मुकमिल कदम उठा सकते है, जिसमें हिंद के वासियों की धारा प्रवासी साहित्य से मिलकर पुख़्तगी पा सके और एक महासागर का स्वरूप प्रप्त कर हो सके.साहित्य के माध्यम से ही हम एक दूसरे से जुड़ सकते है. इसमें पत्रिकाओं का बहुत बडा हाथ है, उस सत्य को नकारा नहीं जा सकता.
१४ तारीख को डा॰ गिरिजा व्यास ने भी काफी समय तक पुस्तकों का निरीक्षण कियाऔर प्रोतसाहित करते शब्दों में हर लेखक के प्रयास को सराहा. संकेत यही मिलता है कि सिमटाव का कवच उतारकर अपने आपको फैलाने का वक्त आया है. खुद को पहचानकर राष्ट्र में अपनी जड़ें भाषा द्वारा मज़बूत करके अंतराष्ट्रीय स्तर पर पहचान पानी है, माधंयम फिर भी भाषा ही रहेगी. भाषा है तो हम हैं, हमारे देश की शान है.

बाल साहित्य के अध्यक्ष श्री बालशौर रेड्डी ने अपनी प्रतिक्रिया में संक्षेप में बताते हुए कहा ” बाल साहित्य के सूत्रों से आपका कहने सुनने का नाता है, था और चलता रहेगा. टिमटिमाते सितारे, पानी में मछली, , जिग्यासा भरे प्रश्न उत्पन करती है, प्रश्न उत्तर की चाहत रखता है, बस बाल मन समझने की जरूरत है, चिंतन मनन के पश्चात उसको पाचन करने का समय देना हमारा कर्तव्य है.
डा॰सुशीला गुप्ता ने कहा कि बच्चों के मनोविग्यान की ओर इशारा करते हुए कहा कि बच्चों का मन मस्तिष्क साफ स्वच्छ दिवार होता है जिस पर कुछ भी बड़ी सरलता से उकेरा जा सकता है. इसलिये बच्चों में बचपन से ये शब्द बीज बो देने चाहिये. इसी सिलसिले में दिल्ली के इंदिरा गाँधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविध्यालय की डा॰ स्मिता चतुर्वेदी ने बाल साहित्य के स्वरूप और दिशाओं पर रौशनी डालते हुए यही कहा ” कि साहित्य बालकों की अपनी विशिष्ट छोटी छोटी समस्याओं को उभारे, उन्हें गुदगुगाए, उनका मनोरंजन करे, और उनकी समस्याओं का आदर्श से हट कर समाधान दे, वही साहित्य श्रेष्ठ बाल साहित्य है.
हिंदी युवा पीढी और ग्यान विग्यान के अध्यक्षः डा॰ वाई लक्ष्मी प्रसाद एवं श्री गोविंद मिश्र थे. उस सिलसिले को आगे बढ़ाते हुए श्री नवीन मेहता ने अपने वक्तव्य में नई पीढी को हमारी गौरवशाली परंम्परा और भाषाओं के साथ जोडने का आग्रह किया. श्री गोपीनाथ जी ने कहा ग्यान की दिशा में अब जो खाइयाँ हैं, उन्हें पाटने के लिये जरूरी है कि उन्हें जन्म की भाषाओ में लाया जाये. पेन्सिलवेनिया के प्रों॰ सुरेंद्र गंभीर ने इस बात पर जोर दिया कि आवश्यक्ता ” शिक्षार्थी केंद्रित कार्यक्रमों की है. हिंदी के साथ प्रवासी भारतियों का यह भावात्मक संबध बहुत ही महत्वपूर्ण है. जहां पारंपरिक भाषा कमजोर हुई है, उसे फिर से सशक्त करने के आसार अच्छे हैं.”
सयुंक्त राष्ट्र संघ में हिंदी की अध्यक्ष डा॰ गिरिजा व्यास ने मंच पर अपने विचार जनता के सामने रखते हुए कहा “हिंदी भाषा जनता की भाषा है, इसका शिक्षण, परिक्षण, शोध, अनुशोध ज़रूरी है. शब्दावली का विस्तार हो शब्द कोष समर्थ हो यही सफलता की सीडी का पहला पड़ाव है. इस बात पर ज़ोर देते हुए राष्ट्रीय महिला आयोग की अध्यक्ष डा॰ गिरिजा व्यास ने कहा कि भाषा के माध्यम से हर क्षेत्र में उन्नति प्राप्त करनी है और लेखक ही सिर्फ दिशा दिखा सकते है अपनी कलम के जोर पर. इन सुंदर पंक्तियों से सारे हाल में गूंज सुनाई पड़ रही थीः

“हमने जड़ से उसे ढूंढा है
पर आज भावनाएं जड़ हो गई है.”

हिंदी के प्रचार-प्रसार में फिल्मों की भूमिका सत्र के अध्यक्ष सुप्रसिद्ध फिल्मकार गुलज़ार ने कहा कि हिन्दी भाषा के प्रचार-प्रसार में सिनेमा ने साहित्य से ज्यादा काम किया है. हिंदी फिल्मों ने ही हिंदी भाषा को संपर्क भाषा बनाया है इतना काम तो साहित्य अकादमी और नैशनल बुक ट्रस्ट जैसी स्स्थाओं ने भी नहिं किया.

विश्व के विभिन्न देशों के प्रितिनिधि, साहित्यकार, हिंदी सेवी, शिक्षक, प्रचारक, पत्रकार, सम्मेलन में आए और हिंदी के अतीत, वर्तमान, तथा भविष्य के संदर्भ में हिंदी के शिक्षण, प्रयोग, तथा प्रसार के अन्यान्य पहलुओं Top of Form 1
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पर संवाद करते रहे, डा॰ पी जयरमन जो कार्यकारी निर्देशक, भारतीय विध्या भवन द्वारा सम्मेलन की रिपोर्ट की प्रस्तुति की दौरान बोले ” हिंदी की बहु अयामी उपलब्धियाँ एवं भविष्य के लिये दिशा निर्देश की चर्चाएं कर रहे हैं, यह अपने आप में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है”

राष्ट्रीय मान अधिकार आयोग के माननीय सदस्य श्री पी. सी. शर्मा जी ने अपनी बातों के दौरान कहा कि भाषा एक अदभुत रचना है, जो मनुष्य द्वारा रची भी जाती है और उसे रचती भी है. भारत की आत्मा को पहचानने के लिये हिंदी भाषा का ग्यान अत्यंत आवश्यक है. भाषा उन्नति का मूल है, कारण कि हमारे सारे पर्यास इसी के माध्यम से होते हैं, उसी से जुड़े होते हैं. हम भाषा में ही जीते हैं और भाषा हमारे व्यहवार में घुली है.

यू के से आए “पुरवाई” के संपादक र्श्री पद्मेश गुप्ता ने देश विदेश में हिंदी शिक्षण पर अगली पीढी को हिंदी से जोडने के अभियान ” हिंदी ग्यान प्रतियोगिता” की विस्त्रत जानकारी देते हुए कहा कि चर्चाओं के बजाए युवा पीढी को हिंदी से जोड़ने के ठोस प्रयास होने चाहिये और ब्रिटेन में किये जा रहे प्रयासों का वैश्विक विस्तार किया जाना चाहिये.”

हिंदी के प्रचार प्रसार में सूचना प्रोध्यौजिकी की भूमिका के अध्यक्ष श्री अशोक चक्रधर ने बडे ही रोचक ढंग से हिंदी के विकास के लिए सूचना तकनीक की आवश्यकता पर ज़ोर दिया. उन्होंने सत्र में उपस्थित सभी लोगों से अपील की कि वे भी हिंदी के प्रसार के लिये उन सभी हिंदी सेवियों और साहित्यकारों को तकनीक से जोड़ने की प्रतिबद्धता निभाएं जो सूचना प्रौध्योगिकी से दोस्ती करने से डरते हैं.

भारतीय विध्या भवन (न्यूयार्क) के अध्यक्ष श्री नवीन मेहता ने कहा यह एक ऐतिहासिक घटना अवसर है, हिंदी हमारे लिये एक भाषा से अधिक भारतीय संस्क्रुति के सम्मान का प्रतीक ह
“हिंदी भाषा नहीं है, एक प्रतीक है, भारत की पहचान है, हिंदी को बढावा मिल रहा है, यह हिंदुस्तानियों की मेहनत है. अनेक भाषाओं के आदान प्रदान से हमारी संस्क्रुति पहचानी जाती है. देश की तरक्की उस की भाषा से जुड़ी हुई होती है. इसमें बड़ा हाथ साहित्य कारों, लेखकों, संपादकों और मीडिया का है.
देवनागरी लिपि के अध्यक्ष श्री बालकवि बैरागी “प्रवासी पुस्तक प्रदर्शनी” के दौरान. दायें से बायें खडी है देवी नागरानी, अंजना संधीर, बालकवि बैरागी, कुसुम और अनूप भार्गव

वैश्वी करण, मीडिया और हिंदी के सेशन की अध्यक्ष और “दैनिक हिंदुस्तान” की संपादक म्रणाल पाँदेय ने आठवें हिंदी सम्मेलन के प्रथम दिन “वैश्वीकरण, मीडिया और हिंदी” सत्र के अपने अध्यक्षीय वक्तव्य में व्यक्त किये. उन्होंने कहा कि हमें आज हिंदी को लेकर अत्यधिक सशंकित होने की आवश्यकता नहीं है, न ही हमें अकारण चिंताएं करनी चाहिये.उन्होंने स्पष्ट किया कि कहीं न कहीं हम सब उपभोक्ता है, अंतः उपभोक्तावाद को गलत साबित करने में हमें अपनी शक्ति व्यर्थ नहीं करनी चाहिये.”

हिंदी भाषा और साहित्य की अध्यक्ष श्रीमती चित्रा मुद्गल ने अपने विचारों से अवगत कराते हुए कहा “इस सम्मेलन में मुझे अच्छी संभावनायें नज़र आ रही है. विषयगत जो चर्चाएं-परिचर्चाएं हो रही हैं वह प्रगति के लिये एक उत्तम संकेत है. हिंदी का भविष्य बहुत उज्ज्वल है और हिंदी को कोई रोक नहीं सकता.”

भाषा शिक्षण के अपने अनुभवों से परिचित कराते हुए सुश्री सुषम बेदी कहती है “भाषा पढ़ाना एक कला है और विज्यान भी. कला इसलिये कि उसमें लगातार सर्जनात्मकता की जरूरत है और विग्यान इसलिये कि उसमें व्यवस्था और नियमों का पूरा पूरा ध्यान रखना पड़ता है. ऊर्जा, उत्साह, सर्जनात्मकता और उपज जहां भाषा शिक्षण को एक कला का रूप पर्दान करते हैं, वहीं पाठक -पद्धतियों का सही इस्तेमाल विग्यान का. दोनों का संतुलन ही श्रेष्ठ भाषा शिक्षण की नींव है.”

दिल्ली से पधारे संपादक (हिंदी), नेशनल बुक ट्रस्ट के श्री देवशंकर नवीन जी ने राष्ट्रीय एकता का सूत्र के अंतरगत जो कहा वो कथन भी इसी सत्य को दोहराता है. उनका कहना है ” भाषा, मनुष्य के लिये अभिव्यक्ति का माध्यम मात्र नहीं, यह मानवीय संबंध-बंध का आधार है और शब्द रूप से हिंदी और अन्य भाषाओं मे लिखा साहित्य एक सूत्र में अनुवाद के द्वारा बंधता जा रहा है.” पुस्तक व्यवसाय की बात करते हुए भी उन्होंने आक सत्य से परदा उठाते हुए कहा “सर्वतोन्मुखी विकास के बाद लेखक, पाठक, प्रकाशक, वितरक, सब के सब राग में रोते रहते हैं. क्रेताओं का कहना है पुस्तकें मंहगी हो गई हैं, तो सवाल उठता है मानवता के अलावा कौन सी चीज़ सस्ती हुई जा रही है?”

हां ये और बात है कि विचारों के आदान प्रदान के बीच में मत भेद भी होगा, सवाल होंगे जिनका जवाब पाना मुशकिल होगा.पर मेरा अपना विचार है कार्य का सिलसिला चलता रहे, कड़ी से कडी जुडती रहे, ताकि सिलसिला बनता रहे कारवाँ बनता रहे. देश की भाषा उसकी संस्क्रुति, प्रवासी देशों से जुडती रहे तभी तो जाकर हम एक स्तर पर मिलजुल कर कुछ कार्य इस दिशा में कर पाएंगे. जब तक कलम तलवार का काम
नहीं करेंगी, अपनी नोक से लेखक, साहित्यकार, जनता की सोच, उनकी बात, उनके इरादे लेखन द्वारा आम जनता तक नहीं पहुंचाएंगे, तब तक संगठन बन नहीं सकता., इरादों में पुख्तगी व बुलंदी आ नहीं सकती. लक्ष्य एक है मंजिल एक है, तो राह भी एक ही बनानी पड़ेगी, और यह है अपनी देश की मात्र भाषा को घर घर तक लाने का संकल्प जो किया है उसे अपनी मंजिल तक पहुंचाये.
पर उस मुकाम को हासिल करने का जो भाषा का यग्य है उसकी बडी जिम्मेदारी हम पर, आप पर, और इस पीढी के नौजवान कंधों पर भी है. सवाल यह फिर भी मन में उठता है कि विरासत में हम अपने बच्चों को वह भाषा “हिंदी” , जिसके लिये हम तकरीरें करते हैं, दलीलें देते है, इकत्ठे होकर भीड का हिस्सा बनते हैं, वो अमानत उन्हें दे पाते है या नहीं. अगर हमारी युवा पीढी और आने वाली पीडियां इसे अपनाने में, संपर्क की भाषा बनाने में नाकामयाब होती है तो दोष हमारा है, देश की भाषा देश में मज़बूत रहेगी तो तब जाकर वह विदेश में पनप पायेगी, और तब ही मात्रभाषा से राष्ट्र भाषा बनेगी. देश की भाषा विदेश तक पहुंचे, यह हमारी परीक्षा है, कहाँ तक हम निभा पाते हैं, कितना सींच पाते है इसे अपना व्यहवार से, दुलार से ताकि इसकी जडों में पुख्तगी आ सके, और यह लोरी बनकर देश , प्रवासी देश के घर घर में जहां एक हिंदुस्तानी का दिल धडकता है, वहां गूज बन कर फिज़ाओं में फैलती रहे, जिसका विस्तार आकाश की बुलंदियों से ऊँचा हो. जय हिंद.

तीनों दिनों की शाम को थकान से राहत देने के लिये आयोजित किये गए थेः
१३ जूलाईः कवि सम्मेलन (संचालकः श्री अशोक चक्रधर)
१४ जूलाईः उस्ताद शुजात हुशेन का सितार वादन
श्रीमती गीता चंद्नन द्वारा भरतनाट्यम
१५ जूलाईः श्री पंकज उधास का गज़ल कार्यक्रम

प्रस्तुतकर्ताः

देवी नागरानी, न्यू जर्सी
dnangrani@gmail.com


बाल साहित्य

बाल साहित्य

बाल साहित्य के अध्यक्ष श्री बालशौर रेड्डी ने अपनी प्रतिक्रिया में संक्षेप में बताते हुए कहा ” बाल साहित्य के सूत्रों से आपका कहने सुनने का नाता है, था और चलता रहेगा. टिमटिमाते सितारे, पानी में मछली, , जिग्यासा भरे प्रश्न उत्पन करती है, प्रश्न उत्तर की चाहत रखता है, बस बाल मन समझने की जरूरत है, चिंतन मनन के पश्चात उसको पाचन करने का समय देना हमारा कर्तव्य है.
डा॰सुशीला गुप्ता ने कहा कि बच्चों के मनोविग्यान की ओर इशारा करते हुए कहा कि बच्चों का मन मस्तिष्क साफ स्वच्छ दिवार होता है जिस पर कुछ भी बड़ी सरलता से उकेरा जा सकता है. इसलिये बच्चों में बचपन से ये शब्द बीज बो देने चाहिये. इसी सिलसिले में दिल्ली के इंदिरा गाँधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविध्यालय की डा॰ स्मिता चतुर्वेदी ने बाल साहित्य के स्वरूप और दिशाओं पर रौशनी डालते हुए यही कहा ” कि साहित्य बालकों की अपनी विशिष्ट छोटी छोटी समस्याओं को उभारे, उन्हें गुदगुगाए, उनका मनोरंजन करे, और उनकी समस्याओं का आदर्श से हट कर समाधान दे, वही साहित्य श्रेष्ठ बाल साहित्य है.
हिंदी युवा पीढी और ग्यान विग्यान के अध्यक्षः डा॰ वाई लक्ष्मी प्रसाद एवं श्री गोविंद मिश्र थे. उस सिलसिले को आगे बढ़ाते हुए श्री नवीन मेहता ने अपने वक्तव्य में नई पीढी को हमारी गौरवशाली परंम्परा और भाषाओं के साथ जोडने का आग्रह किया. श्री गोपीनाथ जी ने कहा ग्यान की दिशा में अब जो खाइयाँ हैं, उन्हें पाटने के लिये जरूरी है कि उन्हें जन्म की भाषाओ में लाया जाये. पेन्सिलवेनिया के प्रों॰ सुरेंद्र गंभीर ने इस बात पर जोर दिया कि आवश्यक्ता ” शिक्षार्थी केंद्रित कार्यक्रमों की है. हिंदी के साथ प्रवासी भारतियों का यह भावात्मक संबध बहुत ही महत्वपूर्ण है. जहां पारंपरिक भाषा कमजोर हुई है, उसे फिर से सशक्त करने के आसार अच्छे हैं.”
सयुंक्त राष्ट्र संघ में हिंदी की अध्यक्ष डा॰ गिरिजा व्यास ने मंच पर अपने विचार जनता के सामने रखते हुए कहा “हिंदी भाषा जनता की भाषा है, इसका शिक्षण, परिक्षण, शोध, अनुशोध ज़रूरी है. शब्दावली का विस्तार हो शब्द कोष समर्थ हो यही सफलता की सीडी का पहला पड़ाव है. इस बात पर ज़ोर देते हुए राष्ट्रीय महिला आयोग की अध्यक्ष डा॰ गिरिजा व्यास ने कहा कि भाषा के माध्यम से हर क्षेत्र में उन्नति प्राप्त करनी है और लेखक ही सिर्फ दिशा दिखा सकते है अपनी कलम के जोर पर. इन सुंदर पंक्तियों से सारे हाल में गूंज सुनाई पड़ रही थीः

“हमने जड़ से उसे ढूंढा है
पर आज भावनाएं जड़ हो गई है.”

हिंदी के प्रचार-प्रसार में फिल्मों की भूमिका सत्र के अध्यक्ष सुप्रसिद्ध फिल्मकार गुलज़ार ने कहा कि हिन्दी भाषा के प्रचार-प्रसार में सिनेमा ने साहित्य से ज्यादा काम किया है. हिंदी फिल्मों ने ही हिंदी भाषा को संपर्क भाषा बनाया है इतना काम तो साहित्य अकादमी और नैशनल बुक ट्रस्ट जैसी स्स्थाओं ने भी नहिं किया.

विश्व के विभिन्न देशों के प्रितिनिधि, साहित्यकार, हिंदी सेवी, शिक्षक, प्रचारक, पत्रकार, सम्मेलन में आए और हिंदी के अतीत, वर्तमान, तथा भविष्य के संदर्भ में हिंदी के शिक्षण, प्रयोग, तथा प्रसार के अन्यान्य पहलुओं Top of Form 1
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पर संवाद करते रहे, डा॰ पी जयरमन जो कार्यकारी निर्देशक, भारतीय विध्या भवन द्वारा सम्मेलन की रिपोर्ट की प्रस्तुति की दौरान बोले ” हिंदी की बहु अयामी उपलब्धियाँ एवं भविष्य के लिये दिशा निर्देश की चर्चाएं कर रहे हैं, यह अपने आप में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है”

राष्ट्रीय मान अधिकार आयोग के माननीय सदस्य श्री पी. सी. शर्मा जी ने अपनी बातों के दौरान कहा कि भाषा एक अदभुत रचना है, जो मनुष्य द्वारा रची भी जाती है और उसे रचती भी है. भारत की आत्मा को पहचानने के लिये हिंदी भाषा का ग्यान अत्यंत आवश्यक है. भाषा उन्नति का मूल है, कारण कि हमारे सारे पर्यास इसी के माध्यम से होते हैं, उसी से जुड़े होते हैं. हम भाषा में ही जीते हैं और भाषा हमारे व्यहवार में घुली है.

यू के से आए “पुरवाई” के संपादक र्श्री पद्मेश गुप्ता ने देश विदेश में हिंदी शिक्षण पर अगली पीढी को हिंदी से जोडने के अभियान ” हिंदी ग्यान प्रतियोगिता” की विस्त्रत जानकारी देते हुए कहा कि चर्चाओं के बजाए युवा पीढी को हिंदी से जोड़ने के ठोस प्रयास होने चाहिये और ब्रिटेन में किये जा रहे प्रयासों का वैश्विक विस्तार किया जाना चाहिये.”

हिंदी के प्रचार प्रसार में सूचना प्रोध्यौजिकी की भूमिका के अध्यक्ष श्री अशोक चक्रधर ने बडे ही रोचक ढंग से हिंदी के विकास के लिए सूचना तकनीक की आवश्यकता पर ज़ोर दिया. उन्होंने सत्र में उपस्थित सभी लोगों से अपील की कि वे भी हिंदी के प्रसार के लिये उन सभी हिंदी सेवियों और साहित्यकारों को तकनीक से जोड़ने की प्रतिबद्धता निभाएं जो सूचना प्रौध्योगिकी से दोस्ती करने से डरते हैं.

भारतीय विध्या भवन (न्यूयार्क) के अध्यक्ष श्री नवीन मेहता ने कहा यह एक ऐतिहासिक घटना अवसर है, हिंदी हमारे लिये एक भाषा से अधिक भारतीय संस्क्रुति के सम्मान का प्रतीक ह
“हिंदी भाषा नहीं है, एक प्रतीक है, भारत की पहचान है, हिंदी को बढावा मिल रहा है, यह हिंदुस्तानियों की मेहनत है. अनेक भाषाओं के आदान प्रदान से हमारी संस्क्रुति पहचानी जाती है. देश की तरक्की उस की भाषा से जुड़ी हुई होती है. इसमें बड़ा हाथ साहित्य कारों, लेखकों, संपादकों और मीडिया का है.
देवनागरी लिपि के अध्यक्ष श्री बालकवि बैरागी “प्रवासी पुस्तक प्रदर्शनी” के दौरान. दायें से बायें खडी है देवी नागरानी, अंजना संधीर, बालकवि बैरागी, कुसुम और अनूप भार्गव

वैश्वी करण, मीडिया और हिंदी के सेशन की अध्यक्ष और “दैनिक हिंदुस्तान” की संपादक म्रणाल पाँदेय ने आठवें हिंदी सम्मेलन के प्रथम दिन “वैश्वीकरण, मीडिया और हिंदी” सत्र के अपने अध्यक्षीय वक्तव्य में व्यक्त किये. उन्होंने कहा कि हमें आज हिंदी को लेकर अत्यधिक सशंकित होने की आवश्यकता नहीं है, न ही हमें अकारण चिंताएं करनी चाहिये.उन्होंने स्पष्ट किया कि कहीं न कहीं हम सब उपभोक्ता है, अंतः उपभोक्तावाद को गलत साबित करने में हमें अपनी शक्ति व्यर्थ नहीं करनी चाहिये.”

हिंदी भाषा और साहित्य की अध्यक्ष श्रीमती चित्रा मुद्गल ने अपने विचारों से अवगत कराते हुए कहा “इस सम्मेलन में मुझे अच्छी संभावनायें नज़र आ रही है. विषयगत जो चर्चाएं-परिचर्चाएं हो रही हैं वह प्रगति के लिये एक उत्तम संकेत है. हिंदी का भविष्य बहुत उज्ज्वल है और हिंदी को कोई रोक नहीं सकता.”

भाषा शिक्षण के अपने अनुभवों से परिचित कराते हुए सुश्री सुषम बेदी कहती है “भाषा पढ़ाना एक कला है और विज्यान भी. कला इसलिये कि उसमें लगातार सर्जनात्मकता की जरूरत है और विग्यान इसलिये कि उसमें व्यवस्था और नियमों का पूरा पूरा ध्यान रखना पड़ता है. ऊर्जा, उत्साह, सर्जनात्मकता और उपज जहां भाषा शिक्षण को एक कला का रूप पर्दान करते हैं, वहीं पाठक -पद्धतियों का सही इस्तेमाल विग्यान का. दोनों का संतुलन ही श्रेष्ठ भाषा शिक्षण की नींव है.”

दिल्ली से पधारे संपादक (हिंदी), नेशनल बुक ट्रस्ट के श्री देवशंकर नवीन जी ने राष्ट्रीय एकता का सूत्र के अंतरगत जो कहा वो कथन भी इसी सत्य को दोहराता है. उनका कहना है ” भाषा, मनुष्य के लिये अभिव्यक्ति का माध्यम मात्र नहीं, यह मानवीय संबंध-बंध का आधार है और शब्द रूप से हिंदी और अन्य भाषाओं मे लिखा साहित्य एक सूत्र में अनुवाद के द्वारा बंधता जा रहा है.” पुस्तक व्यवसाय की बात करते हुए भी उन्होंने आक सत्य से परदा उठाते हुए कहा “सर्वतोन्मुखी विकास के बाद लेखक, पाठक, प्रकाशक, वितरक, सब के सब राग में रोते रहते हैं. क्रेताओं का कहना है पुस्तकें मंहगी हो गई हैं, तो सवाल उठता है मानवता के अलावा कौन सी चीज़ सस्ती हुई जा रही है?”

हां ये और बात है कि विचारों के आदान प्रदान के बीच में मत भेद भी होगा, सवाल होंगे जिनका जवाब पाना मुशकिल होगा.पर मेरा अपना विचार है कार्य का सिलसिला चलता रहे, कड़ी से कडी जुडती रहे, ताकि सिलसिला बनता रहे कारवाँ बनता रहे. देश की भाषा उसकी संस्क्रुति, प्रवासी देशों से जुडती रहे तभी तो जाकर हम एक स्तर पर मिलजुल कर कुछ कार्य इस दिशा में कर पाएंगे. जब तक कलम तलवार का काम
नहीं करेंगी, अपनी नोक से लेखक, साहित्यकार, जनता की सोच, उनकी बात, उनके इरादे लेखन द्वारा आम जनता तक नहीं पहुंचाएंगे, तब तक संगठन बन नहीं सकता., इरादों में पुख्तगी व बुलंदी आ नहीं सकती. लक्ष्य एक है मंजिल एक है, तो राह भी एक ही बनानी पड़ेगी, और यह है अपनी देश की मात्र भाषा को घर घर तक लाने का संकल्प जो किया है उसे अपनी मंजिल तक पहुंचाये.
पर उस मुकाम को हासिल करने का जो भाषा का यग्य है उसकी बडी जिम्मेदारी हम पर, आप पर, और इस पीढी के नौजवान कंधों पर भी है. सवाल यह फिर भी मन में उठता है कि विरासत में हम अपने बच्चों को वह भाषा “हिंदी” , जिसके लिये हम तकरीरें करते हैं, दलीलें देते है, इकत्ठे होकर भीड का हिस्सा बनते हैं, वो अमानत उन्हें दे पाते है या नहीं. अगर हमारी युवा पीढी और आने वाली पीडियां इसे अपनाने में, संपर्क की भाषा बनाने में नाकामयाब होती है तो दोष हमारा है, देश की भाषा देश में मज़बूत रहेगी तो तब जाकर वह विदेश में पनप पायेगी, और तब ही मात्रभाषा से राष्ट्र भाषा बनेगी. देश की भाषा विदेश तक पहुंचे, यह हमारी परीक्षा है, कहाँ तक हम निभा पाते हैं, कितना सींच पाते है इसे अपना व्यहवार से, दुलार से ताकि इसकी जडों में पुख्तगी आ सके, और यह लोरी बनकर देश , प्रवासी देश के घर घर में जहां एक हिंदुस्तानी का दिल धडकता है, वहां गूज बन कर फिज़ाओं में फैलती रहे, जिसका विस्तार आकाश की बुलंदियों से ऊँचा हो. जय हिंद.
देवी नागरानी, न्यू जर्सी
dnangrani@gmail.com
URL: https://charagedil.wordpress.com

रूठा वो बे सबब न था मुझसे

ग़ज़लः ३०
जाने क्या कुछ हुई ख़ता मुझसे
रूठा वो बे सबब न था मुझसे.
जिसको हासिल न कुछ हुआ मुझसे
मौन का अर्थ पूछता मुझसे.
लोग क्या जाने जानने आए
नाता जिनका न था जुड़ा मुझसे.
जिसने रक्खा था कै़द में मुझको
खुद रिहाई था चाहता मुझसे.
ना-शनासों की बस्तियों में, कब
किसने रक्खा है राब्ता मुझसे.
सिलसिला राहतों का टूट गया
दिल की धड़कन हुई खफ़ा मुझसे.
चराग़े-दिल/ ५६

“प्रवासी पुस्तक प्रदर्शनी”

आठवाँ विश्व हिंदी सम्मेलनः १३, १४, १५ जुलाई, न्यू यार्क

“प्रवासी पुस्तक प्रदर्शनी” हिंदी लेखकों की रचनात्मकता का एक अत्यात परिद्रश्य का उध्गाटन करती है” कमल किशोर गोयनका

अब फिज़ाओं में महक रही है हिंदी भाषाविश्व का मँच मिला हिंदी का

घर घर में अब हिंदी बोलो

रात की रानी जैसे महकी
हिंदी भाषा फिज़ा में घोलो… देवी नागरानी

हिंदी का नया सूर्योदय नज़र आ रहा है. ८वें विश्व हिंदी सम्मेलन के शिखर पर एक सुन्हरा दरवाज़ा UNO में भारतवासियों के लिये खुला है, उसका इतिहास गवाह है. सम्मेलन का मूल मक्सद ही यही है कि हिंदी को विश्व मंच पर स्थापित करना. तमाम देशों से आए हिंदी प्रेमी संयुक्त राष्ट्र संघ के मुख्यालय के कान्फ्रेंस हाल में दाखिल हुए तो अहसास हुआ UNO ने खुले दरवाजों ने हिंदुस्तानियों का सन्मानित स्वागत किया है. यहाँ गाँधी जी का कथन सत्य बनकर सामने आया ” अपने दरवाज़े खुले रखो, विकास अंदर आएगा,”
और यह दिन एक ऐतिहासिक यादगार रहेगा.वह दिन दूर नहीं जब संयुक्त राष्ट्र संघ हिंदी भाषा को भी अपने आलंगन में ले लगा. संयुक्त राष्ट्र संग की भाषा बनाने का प्रयास सफलता की सीडियाँ चढता जहां पहुंचा है वहां पर मुकाम पाने की संभावना रौशन नज़र आती है. किसी भी भाषा का साहित्य उस भाषा का वैभव है, उस भाषा का सौंदर्य है. हर देश की तरक्की उसकी भाषा की तरक्की से जुड़ी होती है. हिंदी केवल भाषा नहीं, एक सौंदर्य है, बहती गंगा है, मधुर वाणी है.
मानव मन की वाणी हिंदी
आदि वेद की वाणी हिंदी.


“प्रवासी पुस्तक प्रदर्शनी”


डा॰ अँजना संधीर जिसकी मुख्य कार्यकर्ता रही, जिसकी मेहनत और लगन साहित्य के साथ सदा जुड़ी रहेगी.वहां प्रदर्शित तस्वीरें , बैनर्स, व सजावट में साथ दिया डा॰ सरिता रानी ने. जिन्होंने अपने
8th-vhs-books.jpgसहयोग साथियों की मदद से किताबों की सजवट और बिक्रि का बार बखूबी स्भाला. तस्वीरों से अनेक लेखकों के कार्य और सफलताएं सामने आई.

हिंदी के प्रवासी साहित्यकारों की लिखी २७० पुस्तकें वहां प्रदर्शित रहीं, सुंदर ढंग से सजी हुई . किकाबों की सूची भी सबको दी जा रही थी. एक प्रतिक्रिया के लिये डायरी रखी गई थी जिसमें, कई साहित्यकारों ने, संपादकों ने और साहित्य प्रेमियों ने सराहना के शब्द लिखे जिससे लेखकों में नई शक्ति का सँचार होने की संभावना रहेगी. कुछ मैं यहां उल्लेख करना चाहूगीं महिलाओं के इस सँगठित कार्य के बारे में.
प्रवासी साहित्य की मुख्य कार्यकर्ता डा॰ अंजना संधीर विदेश राज्य मंत्री श्री आँनंद शर्मा का प्रदर्शनी में स्वागत किया. उन्होंने उत्साह से पुस्तकों पर अपनी पारखी नज़र डालते हुए कहा ” यह एक सुखद प्रयास है जो सेतू का काम कर रही है. उस प्रवासी हिंदी धारा को लेकर हिंदी की मुख्य धारा से
vhs-2007.jpg जोड़कर एक मुकमिल कदम उठा सकते हैं जिसे भाषा को पुख़्तगी मिल सके और एक महासागर का स्वरूप प्राप्त कर हो सके. साहित्य के माध्यम से ही हम एक दूसरे से जुड़ सकते है. यह मिलन आने वाली राहों को रौशन करता रहेगा.” लोकार्पण के समय के उपस्थित सभी लेखक और लेखिकायें तस्वीर में हैं


” प्रवासी पुस्तक प्रदर्शनी” का निरीक्षण सुबह हुआ और उसी शाम अपने हाथों से २२ प्रवासी लेखक और लेखिकाओं की उपस्थिति में ३७ पुस्तकों का विमोचन किया जिसमें मेरा “चराग- दिल” भी शामिल था. पुस्तकों का लोकार्पण और फोटो अवसर बहुत शुभ साबित हुआ. उनके शब्दों से एक नया संचार जन्म ले रहा था सभी साहित्यकारों के दिलों में.

vhs-minister.jpg

तस्वीर में दिखाई दे रहे हैं श्री अमरेंद्र कुमार, श्री गौतम कपूर, श्री आंनद शर्मा, अभिनव शुक्ला इला प्रसाद, अंजना सँधीर, देवी नागरानी, और कुसुम टँडन.
१४ तारीख को डा॰ गिरिजा व्यास ने भी काफी समय तक पुस्तकों का निरीक्षण कियाऔर प्रोतसाहित करते शब्दों में हर लेखक के प्रयास को सराहा. संकेत यही मिलता है कि सिमटाव का कवच उतारकर अपने आपको फैलाने का वक्त आया है. खुद को पहचानकर राष्ट्र में अपनी जड़ें भाषा द्वारा मज़बूत करके अंतराष्ट्रीय स्तर पर पहचान पानी है, माधंयम फिर भी भाषा ही रहेगी. भाषा है तो हम हैं, हमारे देश की शान है.
बाल साहित्य के अध्यक्ष श्री बालशौर रेड्डी ने अपनी प्रतिक्रिया में संक्षेप में बताते हुए कहा ” बाल साहित्य के सूत्रों से आपका कहने सुनने का नाता है, था और चलता रहेगा. टिमटिमाते सितारे, पानी में मछली, , जिग्यासा भरे प्रश्न उत्पन करती है, प्रश्न उत्तर की चाहत रखता है, बस बाल मन समझने की जरूरत है, चिंतन मनन के पश्चात उसको पाचन करने का समय देना हमारा कर्तव्य है. प्दर्शनी की सराहना करते हुए कहा ” यह कोई साधारण काम नहीं हैं. लगन ओर मेहनत रंग लाई है” १३ जूलाई २००७
सयुंक्त राष्ट्र संघ में हिंदी की अध्यक्ष डा॰ गिरिजा व्यास ने मंच पर अपने विचार जनता के सामने रखते हुए कहा “हिंदी भाषा जनता की भाषा है, इसका शिक्षण, परिक्षण, शोध, अनुशोध ज़रूरी है. शब्दावली का विस्तार हो शब्द कोष समर्थ हो यही सफलता की सीडी का पहला पड़ाव है. प्रदर्शनी में जब वह पधारी तो मैंने अपना गज़ल संग्रह ” चरागे दिल ” उन्हें भेंट करते हूए कहा कि आप शेर अच्छे बोल लेती हैं, उसे जरूर पढ़ियेगा” तो तैरती नज़र किताब पर डालते हुए कहा ” इतना आकर आकर्षक कवर है, इसे जरूर ले जाऊँगी और पढूँगी।” प्रदर्शनी को करीब से देखते हुए अनायास राष्ट्रीय महिला आयोग की अध्यक्ष डा॰ गिरिजा व्यास ने कहा “भाषा के माध्यम से हर क्षेत्र में उन्नति प्राप्त करनी है और लेखक ही सिर्फ दिशा दिखा सकते है अपनी कलम के जोर पर. हिंदी भाषा नहीं है, एक प्रतीक है, भारत की पहचान है, हिंदी को बढावा मिल रहा है, यह हिंदुस्तानियों की मेहनत है. अनेक भाषाओं के आदान प्रदान से हमारी संस्क्रुति पहचानी जाती है. देश की तरक्की उस की भाषा से जुड़ी हुई होती है. इसमें बड़ा हाथ साहित्य कारों, लेखकों, संपादकों और मीडिया का है.”
॰॰
देवनागरी लिपि के अध्यक्ष श्री बालकवि बैरागी “प्रवासी पुस्तक प्रदर्शनी” के दौरान. उसे बहुत सराहा और सभी लेखकों को मुबारकबाद देते हूए अंजना के इस कार्य की सराहना करते हुए कहा वे तो शारदा सुता हैं ”
उनके साथ दायें से बायें खडी हैदेवी नागरानी, अंजना संधीर, बालकवि बैरागी, कुसुम टंडन और अनूप भार्गव.
॰॰
श्री गौतम कपूर ने प्रदर्शनी को देखते हुए कहा “अंजना व समस्थ साथियों, जिन्होंने अपनी क्रतुयों के सशक्त माधंयम से इस प्रदर्शिनी को एक नया रूप दिया है, उन सभीको मेरा शत शत प्रणाम. मुझे यह देखकर एक सुखद आश्चर्य की अनुभूति का अहसास है जो मेरे रोम रोम को खिलित कर रही है कि अपने देश से हज़ारों मील दूर, प्देश में मेरे देश के लोग वहां की भाषा को पुस्तकों के माध्यम से भारत की संस्क्रुति विश्व भर में प्रचारित कर रहे हैं.” गौतम कपूर, १४ जूलाई २००७.
॰॰
कमलकिशोर गोयानका जी ने अपने मन के भाव व्यक्त करने में कोई ” यह प्रद्रशनी देखना एक सौभाग्य का विषय है. यह अमरिका के हिंदी लेखकों की रच्नात्मकता का एक अत्यात परिद्रिश्य का उद्घाटन करती है .” कमल किशोर गोयनका. १५जूलाई, २००७
हां ये और बात है कि विचारों के आदान प्रदान के बीच में मत भेद भी होगा, सवाल होंगे जिनका जवाब पाना मुशकिल होगा.पर मेरा अपना विचार है कार्य का सिलसिला चलता रहे, कड़ी से कडी जुडती रहे, ताकि सिलसिला बनता रहे कारवाँ बनता रहे. देश की भाषा उसकी संस्क्रुति, प्रवासी देशों से जुडती रहे तभी तो जाकर हम एक स्तर पर मिलजुल कर कुछ कार्य इस दिशा में कर पाएंगे. जब तक कलम तलवार का काम
नहीं करेंगी, अपनी नोक से लेखक, साहित्यकार, जनता की सोच, उनकी बात, उनके इरादे लेखन द्वारा आम जनता तक नहीं पहुंचाएंगे, तब तक संगठन बन नहीं सकता., इरादों में पुख्तगी व बुलंदी आ नहीं सकती. लक्ष्य एक है मंजिल एक है, तो राह भी एक ही बनानी पड़ेगी, और यह है अपनी देश की मात्र भाषा को घर घर तक लाने का संकल्प जो किया है उसे अपनी मंजिल तक पहुंचाये.
पर उस मुकाम को हासिल करने का जो भाषा का यग्य है उसकी बडी जिम्मेदारी हम पर, आप पर, और इस पीढी के नौजवान कंधों पर भी है. सवाल यह फिर भी मन में उठता है कि विरासत में हम अपने बच्चों को वह भाषा “हिंदी” , जिसके लिये हम तकरीरें करते हैं, दलीलें देते है, इकत्ठे होकर भीड का हिस्सा बनते हैं, वो अमानत उन्हें दे पाते है या नहीं. अगर हमारी युवा पीढी और आने वाली पीडियां इसे अपनाने में, संपर्क की भाषा बनाने में नाकामयाब होती है तो दोष हमारा है, देश की भाषा देश में मज़बूत रहेगी तो तब जाकर वह विदेश में पनप पायेगी, और तब ही मात्रभाषा से राष्ट्र भाषा बनेगी. देश की भाषा विदेश तक पहुंचे, यह हमारी परीक्षा है, कहाँ तक हम निभा पाते हैं, कितना सींच पाते है इसे अपना व्यहवार से, दुलार से ताकि इसकी जडों में पुख्तगी आ सके, और यह लोरी बनकर देश , प्रवासी देश के घर घर में जहां एक हिंदुस्तानी का दिल धडकता है, वहां गूज बन कर फिज़ाओं में फैलती रहे, जिसका विस्तार आकाश की बुलंदियों से ऊँचा हो. जय हिंद.

nasha.jpg

Devi Nangrani
dnangrani@gmail.com
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aur UNO ki tasveerein yahan dehein.ttp://indianera.com/slideshow/HindiKaviSamelan/index.asp http://indianeraimages.com/categories2.asp?id=65&gt; pictures from here

“ग़ज़ल-लेखन कला” – ( दूसरा भाग)

“ग़ज़ल-लेखन कला” के कुछ चुनिंदा अंश प्रस्तुत है श्री आर.पी. शर्मा “महर्षि” की लेखनी से उनके शब्दों में – पृष्ठ १८-२३ से साभार।


prbook-front-2.jpgग़ज़ल कहने के लिये हमें कुशल शिल्पी बनना होता है ताकि हम शब्दों कोmehrish1.jpg तराश कर उन्हें मूर्त रूप दे सकें, उनकी जड़ता में अर्थपूर्ण प्राणों का संचार कर सकें तथा ग़ज़ल के प्रत्येक शेर की दो पंक्तियों (मिसरों) में अपने भावों, उद्‌गारों, अनुभूतियों आदि के उमड़ते हुए सैलाब को मुट्ठी में आकाश, कठौती में गंगा, कूजे में दरिया, बूँद में सागर के समान समेट कर भर सकें। इसके लिये हमें स्वयं को सक्षम तथा लेखनी को सशक्त बनाना होता है। तब जाकर हम में वह सलीका, वह शऊर, वह सलाहियत, वह योग्यता एवं क्षमता उत्पन्न होती है कि हम ऐसे कलात्मक शेर सृजित करने में समर्थ होते हैं जो “लोकोक्ति” बन जाते हैं, और अक्सर मौकों पर हमारी ज़बान पर रवाँ (गतिशील) हो जाते हैं।” जैसेः

मैं जिसे ओढ़ता बिछाता हूँ

वो ग़ज़ल आपको सुनाता हूँ

–दुष्यंत कुमार

कहानी मेरी रूदादे-जहाँ मालूम होती है

जो सुनता है, उसीकी दास्ताँ मालूम होती है

-सीमाब अकबराबादी

इस संबंध में, श्री ज्ञानप्रकाश विवेक, ग़ज़ल के कला पक्ष को विशेष महत्व देते हुए कहते हैं

ग़ज़ल की बुनियादी शर्त उसका शिल्प है। एक अनगढ़ ग़ज़ल एक अनगढ़ पत्थर की तरह होती है। संगतराश जिस प्रकार छेनी ओर हथोड़ी से पत्थर में जीवंतता ला देता है और तराशे गये पत्थर में उसका एहसास, उसकी अनुभूतियाँ और उसकी अभिव्यक्ति छुपी होती है, वो सब सजीव सी लगती हैं। इसी प्रकार ‌क तराशी हुई ग़ज़ल का तराशा हुआ शेर, सिर्फ दो मिसरों का मिलाप नहीं होता, न उक्ति होती है, न सूक्ति, अपितु वह एक आकाश होता है -अनुभूतियों का आकाश! ग़ज़ल का एक-एक शेर कहानी होता है।” हिंदी में ग़ज़ल-दुष्यंत के बाद-एक पड़ताल, आरोह ग़ज़ल अंक से

यूँ तराशा है उनको शिल्पी ने

जान सी पड़ गई शिलाओं में

-देवी

सारा आकाश नाप लेता है

कितनी ऊँची उड़ान है तेरी

-देवी

(ये शेर महरिष जी को बहुत पसंद थे)

शेर को कहने व समझने के बारे में बकौल हज़त मुन्नवर लख़नवी साहब का शेर प्रस्तुत करते हैं –

शेर कहना यूँ तो मोती है मोी पिरोने का अमल

शेर कहने से भी बहतर है समझना शेर का।

इस फ़न के कद्रदान हज़रत अनवर साबरी के लफ्ज़ों में सुनियेः “ग़ज़ल को छोटी छोटी बहरों में ढालना तथा उसमें प्रयुक्त थोड़े से शब्दों में मन की बात कहना और वह भी सहजता से, यह भी एक कमाल की कला है।”

ग़ज़ल विधा को कलात्मक बनाने में सुलझी हुई भाषा का बहुत बड़ा हाथ है। जैसा कि पद्मश्री गोपालदास “नीरज” का कहना हैः “उर्दू शायरी की लोकप्रियता का सबसे बड़ा कारण है भाषा का सही प्रयोग। उर्दू में वाक्यों को तोड़-मरोड़ने बजाय, भाषा को उसके गद्यात्मक अनुशासन के साथ पेश किया जाय तो उसमें रस, अलंकार बरपूत आ जाते हैं”

शायर तो कोई शख़्स भी हो सकता है

फ़नकार मगर बनना बहुत मुश्किल है….बक़ौल डा॰ अल्लामी(रुबाई की अंतिम दो पंक्तियाँ)

अपने नये ग़ज़ल संग्रह चराग़े दिल में देवी नागरानी ग़ज़ल के विषय में क्या कहती हैः

कुछ खुशी की किरणें, कुछ पिघलता दर्द आँख की पोर से बहता हुआ, कुछ शबनमी सी ताज़गी अहसासों में, तो कभी भँवर गुफा की गहराइयों से उठती उस गूँज को सुनने की तड़प मन में जब जाग उठती है तब कला का जन्म होता है। सोच की भाषा बोलने लगती है, चलने लगती है, कभी कभी तो चीखने भी लगती है।यह कविता बस और कुछ नहीं, केवल मन के भाव प्रकट करने का माध्यम है, जिन्हें शब्दों का लिबास पहना कर एक आकृति तैयार करते हैं, वो हमारी सोच की उपज होती है फिर चाहे रुबाई हो या कोई लेख, गीत हो या ग़ज़ल।”

और आगे बढ़ते हुए महरिष जी कहते है ग़ज़ल उर्दू के अतिरिक्त हिंदी, मराठी, गुजराती, पंजाबी, कशमीरी, भोजपुरी, छत्तीसगढ़ी, सिंधी तथा भारत की अन्य कुछ भाषाओं में लिखी जाती है। ज़रा मुलाइजा फरमा‌एँ कि “प्रोत्साहन” त्रैमासिक के प्रधान संपादक श्री जीवतराम सेतपाल अपने सम्पादकीय में ग़ज़ल के बारे में क्या कहते हैः

सुकुमार जूही की कली की भांति, मोंगरे की मदमाती सुगंध लेकर, गुलाबी अंगड़ाई लेती हुई, पदार्पण करने वाली ग़ज़ल, भारतीय वाङ्‌मय की काव्य विधा के उपवन में रात की रानी बन बैठी। अरबी साहित्य से निस्सृत, फ़ारसी भाषा में समादृत, उर्दू में जवान होकर, अपनी तरुणाई की छटा बिखेरने और हिंदी साहित्य के महासागर में सन्तरण करने आ गई है ग़ज़ल। कम शब्दों में गंभीरता पूर्वक बड़ी से बड़ी बात को भी, नियमों में बाँधकर बड़ी सफलता और सहजता से दोहों की भाँति गहराई से कह देने में समर्थ, गेय, अत्याधिक लयात्मक, काव्य विधा का मख़मली अंग है ग़ज़ल।

हरियाणा के श्री निशांतकेतु एक जगह लिखते है- “शायरी एक मखमली चादर जैसी होती है, जिसे शाइर अपनी साँसों से बुनता है, जिस्म और रूह के बीच दिल की धड़कनों से सुनता है।”

प्रो॰ रामचन्द्र के शब्दों में “जब तक ग़ज़लकार अपने शेरों में सामूहिक सच्चाइयों के व्यक्तिगत भोग को आत्मसात कर, प्रस्तुत नहीं करता, तब तक उसके काफ़िये और रदीफ़ चाहे जितने सुंदर क्यों न हो, उसके शेर उसकी ग़ज़ल का सही अस्तित्व खड़ा नहीं कर सकता। ग़ज़लकार के अनुभव जब पाठकों के भागीदार बनते है तब जाकर ग़ज़ल की जान सामने आती है।”

ग़ज़ल के परिचय से वाकिफ़ कराते हुए आगे महरिष जी कहते हैं – “अच्छी ग़ज़ल के प्रत्येक शेर का पहला मिसरा कुछ इस प्रकार कहा जाता है कि श्रोता दूसरे मिसरे को सुनने के लिये उत्कंठित हो जाता है, और उसे सुनते ही चमत्कृत तथा आनन्द विभोर हो उठता है। “ग़ज़ल” के विचार काफ़ियों (तुकांत शब्दों) के इर्द गिर्द घूमते हैं। काफ़िया शेर का चर्मोत्कर्ष है, जिस पर आते ही और निहितार्थ या व्यंगार्थ को समझते ही श्रोता अथवा पाठक चमत्कृत एवं विमुग्ध हो उठते हैं। वास्तविकता यह है कि कथ्य और शिल्प के सुंदर तालमेल से ही एक सही ग़ज़ल जन्म लेती है। “ श्री दीक्षित दनकौरी द्वारा संपादित “ग़जल दुष्यंत के बाद” में लिखे महरिष जी के कुछ अंश है ये। अंत में स्वरचित ग़ज़ल की कुछ पँक्तियाँ प्रस्तुत हैं –

फूल खिले, गुंजार हुई है

एक ग़ज़ल साकार हुई है

झनके है शब्दों के नुपुर

अर्थ-भरी झंकार हुई है।

मन की कोई अनुभूति अचानक

रचना का आधार हुई है

बात कभी शबनम सी “महरिष”

और कभी अंगार हुई है।

(ग़ज़ल लेखन कला से)

कितना सत्य है उनके कहे इस शेर में

वो अल्फ़ाज़ मुँह बोले ढूँढती है

ग़ज़ल ज़िन्दादिल काफिए ढूँढती है।

आगे और तीसरा भाग

अगले भाग में श्री आर. पी. शर्मा महरिष से किये कुछ प्रश्नोत्तर सामने आयेंगे जिसमें ग़ज़ल क्या, कब, क्यों और कैसे लिखी जाती है उसके बारें में जानकारी होगी।

ग़ज़ल क्या, कब, क्यों और कैसे…..

एक परिचय : आर.पी. शर्मा “महर्षि” (भाग – १)

mehrish.jpgश्री आर.पी. शर्मा का जन्म ७ मार्च १९२२ ई को गोंडा में (उ.प्र.) में हुआ। शासकीय सेवा से सेवानिवृत्त श्री शर्मा जी का उपनाम “महरिष” है और आप मुंबई में निवास करते हैं। अपने जीवन-सफर के ८५ वर्ष पूर्ण कर चुके श्री शर्मा जी की साहित्यिक रुचि आज भी निरंतर बनी हुई है। ग़ज़ल रचना के प्रति आप की सिखाने की वृति माननीय है। विचारों में स्फूर्ति व ताज़गी बनी हुई है, जिसका प्रभाव आपकी ग़ज़लों में बखूबी देखा जा सकता है, तथा विचारों की यह ताज़गी आप की रोज़मर्रा की जिंदगी को भी संचालित करती रहती है। ग़ज़ल संसार में वे “पिंगलाचार्य” की उपाधि से सम्मानित हुए हैं, और मुझे फ़क्र है कि आज मैं उन्हें अपना गुरु मानती हूँ, शायद इस श्रद्धा और विश्वास का एक कारण यह भी है कि मैं बिलकुल थोड़े ही समय में बहुत कुछ सीख पाई, जो मुझे इस राह का पथिक होने का अधिकार देता है। गज़ल लेखन कला मेरे विचार में एक सफ़र है जिसकी मंज़िल शायद नहीं होती।

तवील जितना सफ़र ग़ज़ल का/ कठिन है मंज़िल का पाना उतना। देवी

आपकी प्रकाशित पुस्तकें इस प्रकार हैं

१. हिंदी गज़ल संरचना-एक परिचय (सन् १९८४ में मेरे द्वारा इल्मे- अरूज़ – उर्दू छंद-शास्त्र) का सर्व प्रथम हिंदी में रूपांतर,

२. गज़ल-निर्देशिका,

३. गज़ल-विद्या,

४. गज़ल-लेखन कला,

५. व्यहवारिक छंद-शास्त्र (पिंगल और इल्मे- अरूज़ के तुलनात्मक विश्लेषण सहित),

६. नागफनियों ने सजाईं महफिलें (ग़ज़ल-संग्रह),

७. गज़ल और गज़ल की तकनीक।

उनकी आने वाली पुस्तक है “मेरी नज़र में” जिसमें उनके द्वारा लिखी गईँ अनेक प्रस्तावनाएँ, समीक्षाएँ रहेंगी जो उन्होंने अनेक लेखकों, कवियों और ग़ज़लकारों पर लिखीं हैं और वो अनेक पत्रिकाओं में प्रकाशित हुई हैँ। यह संग्रह एक अनुभूति बनके सामने आयेगा, जिसे पढ़ने वालों को जानने का एक सुअवसर मिलेगा कि कैसे महरिष जी सरलता और सादगी से अपनी पारखी नज़र अपनी अमूल्य राय के साथ साथ सुझाव भी देते है।

मेरे पहले गज़ल संग्रह चराग़े दिल के विमोचन के अवसर पर ग़ज़ल के विषय में श्री आर.पी.शर्मा महरिष् इस किताब में छपे अपनी प्रस्तावना स्वरूप लेख देवी दिलकश ज़ुबान है तेरीमें क्या कहते हैं, अब सुनिये महरिष जी की ज़ुबानीः

ग़ज़ल उर्दू साहित्य की एक ऐसी विधा है जिसका जादू आजकल सबको सम्मोहित किए हुए है। ग़ज़ल ने करोड़ों दिलों की धड़कनों को स्वर दिया है। इस विधा में सचमुच ऐसा कुछ है जो आज यह अनगिनत होंठों की थरथराहट और लेखनी की चाहत बन गई है। ग़ज़ल कहने के लिये हमें कुशल शिल्पी बनना होता है, ताकि हम शब्दों को तराश कर उन्हें मूर्त रूप दे सकें, उनकी जड़ता में अर्थपूर्ण प्राणों का संचार कर सकें तथा ग़ज़ल के प्रत्येक शेर की दो पंक्तियाँ या मिसरों में अपने भावों, उद्‌गारों, अनुभूतियों आदि के उमड़ते हुए सैलाब को मुट्ठी में आकाश, कठौती में गंगा, कूजे में दरिया, बूँद में सागर के समान समेट कर भर सकें।”

यहाँ मैं ग़ज़ल के मिज़ाज के बारे में भी कुछ कहना चाहूँगा। ग़ज़ल कोमल भी है और कठोर भी। उसका लहज़ा कभी नर्म तो कभी तीखे तेवर लिये होता है, तो कभी दोनों का मणि कांचन संयोग कुछ और ही लुत्फ़ पैदा कर देता है,

चटपटी है बात लक्षमण – सी मगर/अरथ में रघुवीर- सी गंभीर है

सुनके महरिषयूँ लगा उसका सुख़न/ चाप से अर्जुन के निकला तीर है।

हरियाणा के प्रख़्यात उस्ताद शाइर सत्यप्रकाश शर्मा तफ़्ता ज़ारी‘ (कुरुक्षेत्र) ने तो ग़ज़ल से संबोधित एक अनूठी बात कही है, वे फर्माते है:

सुलूक करती है माँ जैसा मुब्तदी से ग़ज़ल/मगर एक अग्नि-परीक्षा है मुन्तही के लिये।

कहने का मतलब यह कि नवोदतों के लिये तो ग़ज़ल माँ जैसा व्यवहार करती है परन्तु इस विधा में पारंगत व्यक्तियों को भी कभी अग्नि-परीक्षा से गुज़रना पड़ता है।

बात बनाये भी नहीं बनती” जैसी कठिन परिस्थिति इनके सामने उत्पन्न हो जाती है। इस शेर पर मेरी तज़्मीम भी है, –

निसार करती है उस पर ये ममता के कंवल

उसी के फिक्र में रहती है हर घड़ी, हर पल

मसाइल उसके बड़े प्यार से करती है ये हल

सुलूक करती है माँ जैसा मुब्तदी से ग़ज़ल

मगर इक अग्नि-परीक्षा है मुन्तही के लिये।

प्रख्यात शाइर श्री क्रष्ण बिहारी नूरके एक मशहूर शेर :

“चाहे सोने के फ़्रेम में जड़ दो

आईना झूठ बोलता ही नहीं।“

इस शेर पर मैंने अपनी ओर से तीन मिसरे लगाये हैं:

तुम जो चाहो तो ये भी कर देखो

हर तरह इसका इम्तिहां ले लो

लाख लालच दो, लाख फुसुलाओ

चाहे सोने के फ़्रेम में जड़ दो

आईना झूठ बोलता ही नहीं।”

यह तज़्मीन श्री तर्ज़ साहिब को सादर समर्पित है।

अब मैं आपको एक पद्यात्मक रचना सुनाना चाहूँगा, मौके की चीज़ है, समाअत फ़रमाएँ:

आशीर्वाद श्रीमती देवी नागरानी जी को चराग़े‍-दिलके विमोचन के अवसर पर

“किस कदर रौशन है महफ़िल आज की अच्छा लगा

इस चराग़े‍-दिलने की है रौशनी अच्छा लगा।

आप सब प्रबुद्ध जन को है मेरा सादर नमन

आप से इस बज़्म की गरिमा बढ़ी अच्छा लगा।

कष्ट आने का किया मिल जुल के बैठे बज़्म में

भावना देखी जो ये सहयोग की अच्छा लगा।

इस विमोचन के लिये देवी बधाई आपको

आरज़ू ये आपकी पूरी हुई अच्छा लगा।

इक ख़ज़ना मिल गया जज़्बातो-एहसासात का

हम को ये सौग़ात गज़लों की मिली अच्छा लगा।

आपको कहना था जो देवीकहा दिल खोलकर

बात जो कुछ भी कही दिल से कही अच्छा लगा।

भा गया है आपका आसान अंदाज़े-बयां

आपने गज़लों को दी है सादगी अच्छा लगा।

हर तरफ बिखरी हुई है आज तो रंगीनियाँ

रंग बरसाती है गज़लें आपकी अच्छा लगा।

ज़ायका है अपना अपना, अपनी अपनी है मिठास

चख के देखी हर गज़ल की चाशनी अच्छा लगा।

यूँ तो महरिषऔर भी हमने कहीं गज़लें बहुत

ये जो देवीआप की ख़ातिर कही अच्छा लगा।“

क्रमशः —

ठहराव जिंदगी में दुबारा नहीं मिला

गज़लः २९
ठहराव जिंदगी में दुबारा नहीं मिला
जिसकी तलाश थी वो किनारा नहीं मिला.

वर्ना उतारते न समंदर में कश्तियां
तूफान आया जब भी इशारा नहीं मिला.

हम ने तो खुद को आप संभाला है आज तक
अच्छा हुआ किसी का सहारा नहीं मिला.

बदनामियां घरों में दबे पांव आ ईं
शोहरत को घर कभी भी, हमारा नहीं मिला.

खुशबू, हवा और धूप की परछाइयां मिलीं
रौशन करे जो शाम, सितारा नहीं मिला.

खामोशियां भी दर्द से ‘देवी’ पुकारतीं
हम-सा कोई नसीब का मारा नहीं मिला.

चराग़े-दिल/ ५५

याद मुझे है अब तक

गजलः २८
वो अदा प्यार भरी याद मुझे है अब तक
बात बरसों की मगर कल की लगे है अब तक.
हम चमन में ही बसे थे वो महक पाने को
ख़ार नश्तर की तरह दिल में चुभे है अब तक.
जा चुका कब का ये दिल तोड़ के जाने वाला
आखों में अश्कों का इक दरिया बहे है अब तक.
आशियां जलके हुआ राख, ज़माना गुज़रा
और रह रह के धुआँ उसका उठे है अब तक.
क्या ख़बर वक्त ने कब घाव दिये थे ‘देवी’
वक्त गुज़रा है मगर खून बहे है अब तक.
चराग़े-दिल/ ५४

चोट ताज़ा कभी जो खाते हैं

ग़ज़लः २७
चोट ताज़ा कभी जो खाते हैं
ज़ख्मे-‍‌दिल और मुस्कराते हैं.

मयकशी से ग़रज़ नहीं हमको
तेरी आँखों में डूब जाते हैं.

जिनको वीरानियों ही रास आईं
कब नई बस्तियां बसाते हैं.

शाम होते ही तेरी यादों के
दीप आंखों में झिलमिलाते हैं.

कूछ तो गुस्ताख़ियों को मुहलत दो
अपनी पलकों को हम झुकाते हैं.

तुम तो तूफाँ से बच गई देवी
लोग साहिल पे डूब जाते हैं.

चराग़े-दिल/ ५३

 

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