“ग़ज़ल कहता हूँ”

पुस्तक विचार
शाइरः प्राण शर्मा
प्रकाशकः अनिभव प्रकाशन,
ई-२८, लजपतनगर,
साहिबाबाद. उ.प्र.
मूल्यः १५०
पन्नेः ११२

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“ग़ज़ल कहता हूँ”

श्री प्राण शर्मा ग़ज़ल विधा के संसार में एक जाने माने उस्ताद है जिन्होने अपनी शैली और सोच को शिल्पकार की तरह अपने ढंग से ढाला है. आए दिनों उनके लेख गज़ल के बारे में पढ़ने को मिलते है जो नये लिखने वालों के लिये मार्गदर्शक बनते चले जा रहे हैं. आपके द्वारा लिखा गया “हिंदी ग़ज़ल बनाम उर्दू ग़ज़ल” धारावाहिक रूप में हमारे सामने आता रहा और पथ दर्शक बन कर वह कई ग़ज़ल विधा की बारीकियों पर रोशनी pran-s.jpgडालते हुए बड़ा ही कारगर सिद्ध हुआ. उसी के एक अंश में आइये सुनें वो ग़ज़ल के बारे में क्या कहते हैं -“अच्छी ग़ज़ल की कुछ विशेषताएं होती हैं. इन पर समय के साथ के चलते हुए विशेषग्यता हासिल की जाये तो उम्दा ग़ज़ल कही जा सकती है. साथ ही इनका अभाव हो तो ग़ज़ल अपना प्रभाव खो देती है या ज़्यादा लोकप्रिय नहीं हो पाती. सरल, सुगम एवं कर्णप्रिय शब्दों में यदि हिंदी ग़ज़ल लिखी जायेगी तो प्रश्न ही पैदा नहीं होता कि वह जन मानस को न मथ सकें. यदि ग़ज़ल में सर्वसाधारण के समझ में आने वाली कर्ण प्रिय मधुर शब्द आएंगे तो वह न केवल अपनी भीनी- भीनी सुगंध से जनमानस को महकाएगी बल्कि अपनी अलग पहचान बनायेगी. हिंदी ग़ज़ल को लोकप्रिय बनाने के लिये उसको बोलचाल या देशज शब्दावली को चुनना होगा, जटिल ग़ज़ल की वकालत को छोड़ना होगा. “

जब किसी रचनाकार की साहित्य रुचि किसी एक खास विधा में हो और वह उसके लिये जुस्तजू बन जाये तो वहाँ लेखन कला साधना स्वरूप सी हो जाती है. ऐसी ही एक स्थिती में अंतरगत प्राण शर्मा जी ने अपने इस ग़ज़ल संग्रह के आरंभ में लिखा है जिसे पढ़ कर सोच भी यही सोचती है कि किस जमीन की बुनियाद पर इस सोच की शिला टिकी होगी, किस वीचार के उत्पन होने से, उसके न होने तक का फासला तय हुआ होगा. विचार की पुख़्तगी को देखिये, सुनिये और महसूस कीजिये.

“ग़ज़ल कहता हूँ तेरा ध्यान करके
यही ए प्राण अपनी आरती है.”

अद्भुत, सुंदरता की चरम सीमा को छूता हुआ एक सच. यही भावार्थ लेकर एक शेर मेरी गज़ल का इसी बात की सहमति दे रहा है

“दिल की दुनियाँ में जब मैं डूबी रही
कहकशाँ में नज़र आ गया कहकशाँ.” स्वराचित

“एक आसमान जिस्म के अंदर भी है
तुम बीच से हटों तो नज़ारा दिखाई दे.” गणेश बिहारी तर्ज़

नज़रिया एक पर हर लफ़्ज अपने अपने भाव से शेर में पिरोये हुए तालमेल का अंतर अपनी अपनी द्रष्टि से अलग- अलग ज़ाहिर कर रहा है, जैसे कोई अपने वजूद की गहराइयों में डूबकर, बहुत कुछ टटोलकर प्रस्तुत करता है जिसमें कथ्य और शिल्प दोनों साकार हो जाते हैं. निशब्द सोच, शब्दों का सहारा लेकर बोलने लगती है, चलने लगती है. यही आकार एक अर्थपूर्ण स्वरूप धारण करके सामने आ जाता है एक कलाकार की कलात्मक अर्चना की तरह.

सीप में मोती
स्वास स्वास में राम
बसा हो जैसे…. स्वरचित हाइकू

यूँ मानिये कि अपनी अपनी सोच के परों पर सवार होकर प्राण जी का मन शब्दों के जाल बुनता है, उधेड़ता है और फिर बुनता है कुछ यूँ कि वो छंद के दाइरे में जहाँ कभी तो आसानियाँ साथ देती है, कहीं तो बस कशमकश के घेराव में छटपटाहट ही होने लगती है, जब तक सोच का एक मिसरा दूसरे मिसरे के साथ नियमानुसार ताल मेल नहीं खाता. ग़ज़ल लिखने के कुछ अपने कायदे हैं, कुछ रस्में है, उनका अपना एक लहज़ा होता है. उन्हीं के साथ इन्साफ करते हुए अपनी तबीयत की फिक्र को किस तरह ज़ाहिर कर रहे हैं, गौर फरमायें, सुनते है उनके ही शब्दों में-

“ढूँढ लेता मैं कहीं उसका ठिकाना
पाँव में पड़ते न छाले सोचता हूँ.

प्राण दुख आए भले ही जिंदगी में
उम्र भर डेरा न डाले सोचता हूँ.” ५१

किसीने खूब कहा है ‘कवि और शब्द का अटूट बंधन होता है. कवि के बिना शब्द तो हो सकते हैं, परंतु शब्द बिना कवि नहीं होता. एक हद तक यह सही है, पर दूसरी ओर ‘कविता’ केवल भाषा या शब्द का समूह नहीं. उन शब्दों का सहारा लेकर अपने अपने भावों को भाषा में व्यक्त करने की कला गीत-गज़ल है. ये तजुरबात की गलियों से होकर गुज़रने का सफर उम्र की मौसमें को काटने के बाद कुछ और ही गहरा होने लगता है, हकी़कतों से वाकिफ कराता हुआ. सोच का निराला अंदाज़ है, शब्दों का खेल भी निराला, कम शब्दों की पेशकश, जिससे साफ़ ज़ाहिर होता है वह ग़ज़ल की लेखन कला की माहिरता और उनकी सोच की परवाज़ सरहदों की हदें छूने के लिये बेताब है. बस शब्द बीज बोकर अपनी सोच को आकार देते हैं, कभी तो सुहाने सपने साकार कर लेते हैं, तो कहीं अपनी कड़वाहटों का ज़हर उगल देते हैं. सुनते हैं जब गमों के मौसम आते हैं तो बेहतरीन शेर बन जाते हैं. अब देखिये प्राण जी का एक गज़ल का मतला, जहाँ उनके अहसास सांस लेने लगते है, जैसे इनमें प्राण का संचार हुआ हो. बस शब्द बीज के अंकुर जब निकलते हैं तो सोच भी सैर को निकलती है, हर दिशा की रंगत साथ ले आती है. सोच का परिंदा पर लगाकर ऊंचाइयों को छू जाता है, तो कभी ह्रदय की गहराइयों में डूब जाता है. वहाँ पर जिस सच के साथ उसका साक्षातकार होता है उसी सत्य को कलम की जुबानी कागज़ पर भावपूर्ण अर्थ के साथ पेश कर देता है. अब देखिये प्राण जी एक गज़ल का मक्ता इसी ओर इशारा कर रहा है:

छूप में तपते हूए, ए प्राण मौसम में
सूख जाता है समन्दर, कौन कहता है.

“हिंदी ग़ज़ल बनाम उर्दू ग़ज़ल” धारावाहिक में उनका संकेत ग़ज़ल की अर्थपूर्ण संभावनाओं को प्रस्तुत करते समय क्या होता है और क्यों होता है कहते हुए प्राण शर्मा जी की जुबानी सुनें क्या फरमाते हैं- “अच्छे शेर सहज भाव, स्पष्ट भाषा और उपयुक्त छंद में सम्मिलन का नाम है. एक ही कमी से वह रसहीन और बेमानी हो जाता है. भवन के अंदर की भव्यता बाहर से दिख जाती है. जिस तरह करीने से ईंट पर ईंट लगाना निपुण राजगीर के कौशल का परिचायक होता है, उसी तरह शेर में विचार को शब्द सौंदर्य तथा कथ्य का माधुर्य प्रदान करना अच्छे कवि की उपलब्धि को दर्शाता है. जैसे मैंने पहले यह लिखा है कि यह उपलब्धि मिलती है गुरू की आशीष तथा परिश्रम अभ्यास से. जो यह समझता है कि ग़ज़ल लिखना उसके बाएं हाथ का खेल है तो वह भूल-भुलैया में विचरता है तथा भटकता है. सच तो यह है कि अच्छा शेर रचने के लिये शायर को रातभर बिस्तर पर करवटें बदलनी पड़ती है. मैंने भी लिखा है” –

सोच की भट्टी में सौ सौ बार दहता है
तब कहीं जाके कोई इक शेर बनता है.६१

किसी हद तक यह ठीक भी है. शिल्पकारी में भी कम मेहनत नहीं करनी पड़ती है. मेरा एक शेर

” न दीवार पुख़्ती वहाँ पर खड़ी है
जहाँ ईंट से ईंट निस दिन लड़ी है”

कभी गर्व से ऊँचा सर है किसीका
कभी शर्म से किसकी गरदन झुकी है” – देवी

बकौल शाइर डा॰ कुँअर बेचैन ने इस ग़ज़ल संग्रह कि प्रस्तावना को एक नये व अनोखे अंदाज से पेश किया है, हाँ कूब इन्साफ भी किया है उनकी शैली उनकी दार्शनिकता के विस्तार के साथ खूब इन्साफ किया है. उनका प्राण जी की ग़ज़ल के साथ साक्षातकार होना, और फिर उसके साथ गुफ्तगू का सिलसिला इतना रोचक और जानदार लगा कि शुरू करने के बाद समाप्ति की ओर बढ़ती चली गई और फिर तो सोच का नतीजा आपके सामने है. सोच की उड़ान आसमाँ को छेदने की शिद्दत रखती है. छोटे बहर में बड़ी से बड़ी बात कहना इतना आसान नहीं. यह तो एक शिल्पकला है. ग़ज़ल लिखना एक क्रिया है, एक अनुभूति है जो ह्रदय में पनपते हुए हर भाव के आधार पर टिकी होती है. एक सत्य यह भी है कि यह हर इन्सान की पूंजी है, शायद इसलिये कि हर बशर में एक कलाकार, एक चित्रकार, शिल्पकार एवं एक कवि छुपा हुआ होता है. किसी न किसी माध्यम द्वारा सभी अपनी भावनाएं प्रकट करते हैं, पर स्वरूप सब का अलग अलग होता है. एक शिल्पकार पत्थरों को तराश कर एक स्वरूप बनाता है जो उसकी कल्पना को साकार करता है, चित्रकार तूलिका पर रंगों के माध्यम से अपने सपने साकार करता है और एक कवि की अपनी निश्बद सोच, शब्दों का आधार लेकर बोलने लगती है तो कविता बन जाती है, चाहे वह गीत स्वरूप हो या रुबाई या गज़ल. देखिये प्राण जी की इस कला के शिल्प का एक नमूना-

प्राण दुख आए भले ही जिंदगी में
उम्र भर न डाले डेरा सोचता हूँ.

काव्यानुभव में ढलने के लिये रचनाकार को जीवन पथ पर उम्र के मौसमों से गुज़रना होता है और जो अनुभव हासिल होते है उनकी प्राण जी के पास कोई कमी नहीं है. जिंदगी की हर राह पर जो देखा, जाना, पहचाना, महसूस किया और फिर परख कर उनको शब्दों के जाल में बुन कर प्रस्तुत किया, उस का अंदाज़ देखिये इस शेर में-

झोंपड़ी की बात मन करिये अभी
भूखे के मुंह में निवाला चाहिये. ५७

हम भी थे अनजान माना आदमियत से मगर
आदमी हमको बनाया आदमी के प्यार ने.५६

उनकी शैली उनके चिंतन मनन के विस्तार से परिचित कराते हुए प्राण जी के शौर हमें इस कदर अपने विश्वास में लेते हैं कि हमें यकीन करना पड़ता है कि उनकी शाइरी का रंग आने वाली नवोदित कवियों की राहों में अपनी सोच के उजाले भर देगा. लहज़े में सादगी, ख्याल में संजीदगी और सच्चाइयों के सामने आइना बन कर खड़ा है. हर राज का पर्दा फाश करते हुए प्राण जी के शेर के सिलसिले अब काफिले बन रहे है जो अपने साथ एक पैग़ाम लिये,बिन आहट के खामोशियों के साथ सफर करते हुए अपने मन के गुलशन में उमडते हुए भारतीयता के सभी रंग, वहाँ की सभ्यता, संस्क्रुति, तीज त्यौहार, परिवेश, परंपराओं की जलतरंग से हमारी पहचान कराते चले जा रहे हैं.
उनका ये ग़ज़ल संग्रह ” मैं ग़ज़ल कहता हूँ” . बोलचाल की भाषा में अपने मन के भाव प्रकट करने के इस सलीके से मैं खुद बहुत मुतासिर हुई हूँ और आशा ही नहीं यकीन के साथ कह सकती हूँ कि उनका यह सँग्रह लोगों की दिलों में अपना स्थान बनाता रहेगा.
“मेरी राह रौशन करें आज देवी
यही वो दिये है, यही वो दिये हैं.”- स्वराचित

जाते जाते एक अनुपम शेर उनकी जुबानी-

“रोशनी आए तो कैसे घर में
दिन में भी हर खिड़की पर परदा है प्यारे.”

देवी नागरानी
न्यू जर्सी, यू.एस.ए
१० , अक्टूबर २००७
dnangrani@gmail.com
URL://charagedil.wordpress.com


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2 टिप्पणियाँ

  1. balkishan said,

    नवम्बर 25, 2007 at 8:24 पूर्वाह्न

    आपने बहुत बेहतरीन ढंग से आपनी बात कही साथ-साथ ग़ज़ल कि रवायतों के बारे मे भी अच्छी बातें बताई. और प्राण जी के शेर पढ़कर आनंद आया. आपको धन्यवाद.

  2. dinesh kumar said,

    अप्रैल 11, 2014 at 8:56 पूर्वाह्न

    Bhaut khub behtrin rachna 🙂


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