हम दिलों में निवास करते हैं

ग़ज़लः २४
दिल को हम कब उदास करते हैं
आज भी उनकी आस करते हैं.

हमको ढूँढो नही मकानों में
हम दिलों में निवास करते हैं.

पहले ख़ुद ही उदास रहते थे
अब वो सबको उदास करते हैं.

चढ़के काँधों पे हो गए ऊँचे
इस तरह भी विकास करते हैं.

इक्तिफा़कन निगाह उट्ठी थी
लोग क्या क्या क़यास करते हैं.

राग़े-दिल/ ५०

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4 टिप्पणियाँ

  1. kakesh said,

    नवम्बर 15, 2007 at 12:50 पूर्वाह्न

    हमको ढूँढो नही मकानों में
    हम दिलों में निवास करते हैं.

    सुन्दर.

  2. balkishan said,

    नवम्बर 15, 2007 at 9:46 पूर्वाह्न

    हम भी कुछ लिख सके अच्छा आपके जैसा
    हरघड़ी हरपल बस यही प्रयास करतें है.

  3. नवम्बर 18, 2007 at 8:09 अपराह्न

    काकेश जी व बाल क्रिशन जी

    आपका प्रोत्साहन मेरे हौसलों का मार्गदर्शक बन गया है

    सादर देवी

  4. नवम्बर 22, 2007 at 9:43 अपराह्न

    दिल को हम कब उदास करते हैं
    आज भी उनकी आस करते हैं.

    हमको ढूँढो नही मकानों में
    हम दिलों में निवास करते हैं.

    पहले ख़ुद ही उदास रहते थे
    अब वो सबको उदास करते हैं.

    चढ़के काँधों पे हो गए ऊँचे
    इस तरह भी विकास करते हैं.

    Aadarniye Deviji
    sabhi sher bahut badiya lage…
    bahut sundar ghazal 🙂

    saadar
    hem


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