छवि १. कोई तो आएगा

छवि १. कोई तो आएगा

chavi-1.jpg

सूनी सी पगडंडी पर,
इक आस
अभी भी साँस ले रही है
आँखो में निर्जीव सी आशा
बुझ कर फिर भी जल रही है
कोई तो आ॓एगा इस राह पर?
देखे हैं चिह्न मैंने जीवन के !
चिह्न कहो पदचिह्न कहो, या
साँसों की धीमी सी आहट
इंतजार में हवाओं के
सरसराहट सुन रही है
हाँ ! सुन रही है जिंदगी
“कोई तो आएगा”
ये सोच रही है.

***

चित्रावली 

छवि की आक्रतियाँ कलाकार की तूलिका से उतरकर लेखनी की नोक से स्याही में ढलकर एक अलग रूप धारण करती हैं, और सजीव होकर अपने भाव प्रकट करने की क्षमता रखती हैं. ऐसा एक सिसिला चला है हमारे चित्रकार कलाकार श्री विजेंद्र “विज” की इन अनुभूतियों का जिन में जिनके साथ उनमें जान फूंक कर पूरा इन्साफ किया है. अब कलम की नोक ने मेरे मन की भाननाओं को उजगार करते हुए कितना इन्साफ किया है यह आप पढ़े, परखें और…..


देवी नागरानी

ttp://photos.groups.yahoo.com/group/anubhuti-hindi/lst

 

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6 टिप्पणियाँ

  1. नवम्बर 11, 2007 at 1:19 पूर्वाह्न

    अभी भी साँस ले रही है
    आँखो में निर्जीव सी आशा
    —- दिल में गहरे तक उतर गए भावों ने मेरी बेज़ान होती आशा में कुछ साँसें डाल दीं हैं. बहुत मर्मस्पर्शी रचना.

  2. नवम्बर 11, 2007 at 5:57 अपराह्न

    chitar sajeev ho uthaa

  3. Meet said,

    नवम्बर 12, 2007 at 12:02 अपराह्न

    सुन रही है जिंदगी
    “कोई तो आएगा”
    ये सोच रही है.

    बहुत दिनों के बाद ‘देवी’ की कोई रचना पढी. वैसा ही एहसास हुआ जैसा शुरू से होता रहा है.

  4. देवी said,

    नवम्बर 14, 2007 at 2:51 अपराह्न

    मेरे हौसलों को बहुत ही हिम्मत मिल जाती है. जाना की बेज़ुबाबों की खामोशियन भ्ही बोलती है.
    धन्यवाद के साथ
    देवी

  5. देवी said,

    नवम्बर 15, 2007 at 4:47 अपराह्न

    मीनाक्षी, मीत एवं ज्योत

    कवि के अंतर्मन की भाषा दूसरा कवि जान पाता है क्योंकि क्षमता में वे दोनों समांतर होते हैं. बस शब्द के सुर ताल पर जब भावनाएं रक्स करती है तो एक कविता बन जाती है. यही मेरा प्रयास आपकी तवाजू पाकर उड़ान भरने लगता है, विचरने लगता है, उड़ने लगता है. आपका तहे दिल से धन्यवाद करती हूँ.

    भाव के बीजों के अंकुर
    शब्द से बुनकर सजायें.

    ज़िंदगी की पुस्तकें पढ़
    उससे अनुभव को बढायें.

    है सुजंध फल-फूल जैसे
    दिल का मधुबन सींच पायें.

    मन के उदगारों को देवी
    शब्द बिन कैसे बताएं.

    देवी

  6. नवम्बर 15, 2007 at 10:52 अपराह्न

    मीनाक्षी, मीत एवं ज्योत

    कवि के अंतर्मन की भाषा दूसरा कवि जान पाता है क्योंकि क्षमता में वे दोनों समांतर होते हैं। बस शब्द के सुर ताल पर जब भावनाएं रक्स करती है तो एक कविता बन जाती है. यही मेरा प्रयास आपकी तवाजू पाकर उड़ान भरने लगता है, विचारने लगता है, उड़ने लगता है. आपका तहे दिल से धन्यवाद करती हूँ.

    भाव के बीजों के अंकुर
    शब्द से बुनकर सजायें।

    ज़िंदगी की पुस्तकें पढ़
    उससे अनुभव को बढाएं।

    है सुगंध फल-फूल जैसी
    दिल का मधुबन सींच पायें।

    मन के उदगारों को देवी
    शब्द बिन कैसे बतायें।

    देवी


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