सिसकियों में हों पल रहे जैसे

गज़लः २२
हिज्र में उसके जल रहे जैसे
प्राण तन से निकल रहे जैसे.

 

जो भटकते रहे जवानी में
वो कदम अब संभल रहे जैसे.

 

मौसमों की तरह ये इन्सां भी
फ़ितरत अपनी बदल रहे जैसे.

 

दर्द मुझसे ज़ियादा दूर नहीं
पास में ही टहल रहे जैसे.

 

आईना रोज़ यूं बदलते वो
अपने चेहरे बदल रहे जैसे.

 

सांस लेते हैं इस तरह ‘देवी’
सिसकियों में हों पल रहे जैसे.

चराग़े-दिल/ ४८

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3 टिप्पणियाँ

  1. prabhakar said,

    नवम्बर 8, 2007 at 7:25 पूर्वाह्न

    असर करने वाली गज़ल

    छोटी बहर ज्यादा गहराई तक दिल में उतरती है।

  2. नवम्बर 8, 2007 at 10:28 पूर्वाह्न

    आईना रोज़ यूं बदलते वो
    अपने चेहरे बदल रहे जैसे.

    सांस लेते हैं इस तरह ‘देवी’
    सिसकियों में हों पल रहे जैसे………. waah waah kya baat hai…
    bahut achi ghazal ………..
    saadar
    hemjyotsana

  3. mehek said,

    दिसम्बर 10, 2007 at 6:14 पूर्वाह्न

    atti sundar varnan hai,5 baar padhi phir bhi ji nahi bhara,aakhir jubani yaad karli,aaj to yahi gungunayenge hum.


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