“ग़ज़ल कहता हूँ”

पुस्तक विचार
शाइरः प्राण शर्मा
प्रकाशकः अनिभव प्रकाशन,
ई-२८, लजपतनगर,
साहिबाबाद. उ.प्र.
मूल्यः १५०
पन्नेः ११२

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“ग़ज़ल कहता हूँ”

श्री प्राण शर्मा ग़ज़ल विधा के संसार में एक जाने माने उस्ताद है जिन्होने अपनी शैली और सोच को शिल्पकार की तरह अपने ढंग से ढाला है. आए दिनों उनके लेख गज़ल के बारे में पढ़ने को मिलते है जो नये लिखने वालों के लिये मार्गदर्शक बनते चले जा रहे हैं. आपके द्वारा लिखा गया “हिंदी ग़ज़ल बनाम उर्दू ग़ज़ल” धारावाहिक रूप में हमारे सामने आता रहा और पथ दर्शक बन कर वह कई ग़ज़ल विधा की बारीकियों पर रोशनी pran-s.jpgडालते हुए बड़ा ही कारगर सिद्ध हुआ. उसी के एक अंश में आइये सुनें वो ग़ज़ल के बारे में क्या कहते हैं -“अच्छी ग़ज़ल की कुछ विशेषताएं होती हैं. इन पर समय के साथ के चलते हुए विशेषग्यता हासिल की जाये तो उम्दा ग़ज़ल कही जा सकती है. साथ ही इनका अभाव हो तो ग़ज़ल अपना प्रभाव खो देती है या ज़्यादा लोकप्रिय नहीं हो पाती. सरल, सुगम एवं कर्णप्रिय शब्दों में यदि हिंदी ग़ज़ल लिखी जायेगी तो प्रश्न ही पैदा नहीं होता कि वह जन मानस को न मथ सकें. यदि ग़ज़ल में सर्वसाधारण के समझ में आने वाली कर्ण प्रिय मधुर शब्द आएंगे तो वह न केवल अपनी भीनी- भीनी सुगंध से जनमानस को महकाएगी बल्कि अपनी अलग पहचान बनायेगी. हिंदी ग़ज़ल को लोकप्रिय बनाने के लिये उसको बोलचाल या देशज शब्दावली को चुनना होगा, जटिल ग़ज़ल की वकालत को छोड़ना होगा. “

जब किसी रचनाकार की साहित्य रुचि किसी एक खास विधा में हो और वह उसके लिये जुस्तजू बन जाये तो वहाँ लेखन कला साधना स्वरूप सी हो जाती है. ऐसी ही एक स्थिती में अंतरगत प्राण शर्मा जी ने अपने इस ग़ज़ल संग्रह के आरंभ में लिखा है जिसे पढ़ कर सोच भी यही सोचती है कि किस जमीन की बुनियाद पर इस सोच की शिला टिकी होगी, किस वीचार के उत्पन होने से, उसके न होने तक का फासला तय हुआ होगा. विचार की पुख़्तगी को देखिये, सुनिये और महसूस कीजिये.

“ग़ज़ल कहता हूँ तेरा ध्यान करके
यही ए प्राण अपनी आरती है.”

अद्भुत, सुंदरता की चरम सीमा को छूता हुआ एक सच. यही भावार्थ लेकर एक शेर मेरी गज़ल का इसी बात की सहमति दे रहा है

“दिल की दुनियाँ में जब मैं डूबी रही
कहकशाँ में नज़र आ गया कहकशाँ.” स्वराचित

“एक आसमान जिस्म के अंदर भी है
तुम बीच से हटों तो नज़ारा दिखाई दे.” गणेश बिहारी तर्ज़

नज़रिया एक पर हर लफ़्ज अपने अपने भाव से शेर में पिरोये हुए तालमेल का अंतर अपनी अपनी द्रष्टि से अलग- अलग ज़ाहिर कर रहा है, जैसे कोई अपने वजूद की गहराइयों में डूबकर, बहुत कुछ टटोलकर प्रस्तुत करता है जिसमें कथ्य और शिल्प दोनों साकार हो जाते हैं. निशब्द सोच, शब्दों का सहारा लेकर बोलने लगती है, चलने लगती है. यही आकार एक अर्थपूर्ण स्वरूप धारण करके सामने आ जाता है एक कलाकार की कलात्मक अर्चना की तरह.

सीप में मोती
स्वास स्वास में राम
बसा हो जैसे…. स्वरचित हाइकू

यूँ मानिये कि अपनी अपनी सोच के परों पर सवार होकर प्राण जी का मन शब्दों के जाल बुनता है, उधेड़ता है और फिर बुनता है कुछ यूँ कि वो छंद के दाइरे में जहाँ कभी तो आसानियाँ साथ देती है, कहीं तो बस कशमकश के घेराव में छटपटाहट ही होने लगती है, जब तक सोच का एक मिसरा दूसरे मिसरे के साथ नियमानुसार ताल मेल नहीं खाता. ग़ज़ल लिखने के कुछ अपने कायदे हैं, कुछ रस्में है, उनका अपना एक लहज़ा होता है. उन्हीं के साथ इन्साफ करते हुए अपनी तबीयत की फिक्र को किस तरह ज़ाहिर कर रहे हैं, गौर फरमायें, सुनते है उनके ही शब्दों में-

“ढूँढ लेता मैं कहीं उसका ठिकाना
पाँव में पड़ते न छाले सोचता हूँ.

प्राण दुख आए भले ही जिंदगी में
उम्र भर डेरा न डाले सोचता हूँ.” ५१

किसीने खूब कहा है ‘कवि और शब्द का अटूट बंधन होता है. कवि के बिना शब्द तो हो सकते हैं, परंतु शब्द बिना कवि नहीं होता. एक हद तक यह सही है, पर दूसरी ओर ‘कविता’ केवल भाषा या शब्द का समूह नहीं. उन शब्दों का सहारा लेकर अपने अपने भावों को भाषा में व्यक्त करने की कला गीत-गज़ल है. ये तजुरबात की गलियों से होकर गुज़रने का सफर उम्र की मौसमें को काटने के बाद कुछ और ही गहरा होने लगता है, हकी़कतों से वाकिफ कराता हुआ. सोच का निराला अंदाज़ है, शब्दों का खेल भी निराला, कम शब्दों की पेशकश, जिससे साफ़ ज़ाहिर होता है वह ग़ज़ल की लेखन कला की माहिरता और उनकी सोच की परवाज़ सरहदों की हदें छूने के लिये बेताब है. बस शब्द बीज बोकर अपनी सोच को आकार देते हैं, कभी तो सुहाने सपने साकार कर लेते हैं, तो कहीं अपनी कड़वाहटों का ज़हर उगल देते हैं. सुनते हैं जब गमों के मौसम आते हैं तो बेहतरीन शेर बन जाते हैं. अब देखिये प्राण जी का एक गज़ल का मतला, जहाँ उनके अहसास सांस लेने लगते है, जैसे इनमें प्राण का संचार हुआ हो. बस शब्द बीज के अंकुर जब निकलते हैं तो सोच भी सैर को निकलती है, हर दिशा की रंगत साथ ले आती है. सोच का परिंदा पर लगाकर ऊंचाइयों को छू जाता है, तो कभी ह्रदय की गहराइयों में डूब जाता है. वहाँ पर जिस सच के साथ उसका साक्षातकार होता है उसी सत्य को कलम की जुबानी कागज़ पर भावपूर्ण अर्थ के साथ पेश कर देता है. अब देखिये प्राण जी एक गज़ल का मक्ता इसी ओर इशारा कर रहा है:

छूप में तपते हूए, ए प्राण मौसम में
सूख जाता है समन्दर, कौन कहता है.

“हिंदी ग़ज़ल बनाम उर्दू ग़ज़ल” धारावाहिक में उनका संकेत ग़ज़ल की अर्थपूर्ण संभावनाओं को प्रस्तुत करते समय क्या होता है और क्यों होता है कहते हुए प्राण शर्मा जी की जुबानी सुनें क्या फरमाते हैं- “अच्छे शेर सहज भाव, स्पष्ट भाषा और उपयुक्त छंद में सम्मिलन का नाम है. एक ही कमी से वह रसहीन और बेमानी हो जाता है. भवन के अंदर की भव्यता बाहर से दिख जाती है. जिस तरह करीने से ईंट पर ईंट लगाना निपुण राजगीर के कौशल का परिचायक होता है, उसी तरह शेर में विचार को शब्द सौंदर्य तथा कथ्य का माधुर्य प्रदान करना अच्छे कवि की उपलब्धि को दर्शाता है. जैसे मैंने पहले यह लिखा है कि यह उपलब्धि मिलती है गुरू की आशीष तथा परिश्रम अभ्यास से. जो यह समझता है कि ग़ज़ल लिखना उसके बाएं हाथ का खेल है तो वह भूल-भुलैया में विचरता है तथा भटकता है. सच तो यह है कि अच्छा शेर रचने के लिये शायर को रातभर बिस्तर पर करवटें बदलनी पड़ती है. मैंने भी लिखा है” –

सोच की भट्टी में सौ सौ बार दहता है
तब कहीं जाके कोई इक शेर बनता है.६१

किसी हद तक यह ठीक भी है. शिल्पकारी में भी कम मेहनत नहीं करनी पड़ती है. मेरा एक शेर

” न दीवार पुख़्ती वहाँ पर खड़ी है
जहाँ ईंट से ईंट निस दिन लड़ी है”

कभी गर्व से ऊँचा सर है किसीका
कभी शर्म से किसकी गरदन झुकी है” – देवी

बकौल शाइर डा॰ कुँअर बेचैन ने इस ग़ज़ल संग्रह कि प्रस्तावना को एक नये व अनोखे अंदाज से पेश किया है, हाँ कूब इन्साफ भी किया है उनकी शैली उनकी दार्शनिकता के विस्तार के साथ खूब इन्साफ किया है. उनका प्राण जी की ग़ज़ल के साथ साक्षातकार होना, और फिर उसके साथ गुफ्तगू का सिलसिला इतना रोचक और जानदार लगा कि शुरू करने के बाद समाप्ति की ओर बढ़ती चली गई और फिर तो सोच का नतीजा आपके सामने है. सोच की उड़ान आसमाँ को छेदने की शिद्दत रखती है. छोटे बहर में बड़ी से बड़ी बात कहना इतना आसान नहीं. यह तो एक शिल्पकला है. ग़ज़ल लिखना एक क्रिया है, एक अनुभूति है जो ह्रदय में पनपते हुए हर भाव के आधार पर टिकी होती है. एक सत्य यह भी है कि यह हर इन्सान की पूंजी है, शायद इसलिये कि हर बशर में एक कलाकार, एक चित्रकार, शिल्पकार एवं एक कवि छुपा हुआ होता है. किसी न किसी माध्यम द्वारा सभी अपनी भावनाएं प्रकट करते हैं, पर स्वरूप सब का अलग अलग होता है. एक शिल्पकार पत्थरों को तराश कर एक स्वरूप बनाता है जो उसकी कल्पना को साकार करता है, चित्रकार तूलिका पर रंगों के माध्यम से अपने सपने साकार करता है और एक कवि की अपनी निश्बद सोच, शब्दों का आधार लेकर बोलने लगती है तो कविता बन जाती है, चाहे वह गीत स्वरूप हो या रुबाई या गज़ल. देखिये प्राण जी की इस कला के शिल्प का एक नमूना-

प्राण दुख आए भले ही जिंदगी में
उम्र भर न डाले डेरा सोचता हूँ.

काव्यानुभव में ढलने के लिये रचनाकार को जीवन पथ पर उम्र के मौसमों से गुज़रना होता है और जो अनुभव हासिल होते है उनकी प्राण जी के पास कोई कमी नहीं है. जिंदगी की हर राह पर जो देखा, जाना, पहचाना, महसूस किया और फिर परख कर उनको शब्दों के जाल में बुन कर प्रस्तुत किया, उस का अंदाज़ देखिये इस शेर में-

झोंपड़ी की बात मन करिये अभी
भूखे के मुंह में निवाला चाहिये. ५७

हम भी थे अनजान माना आदमियत से मगर
आदमी हमको बनाया आदमी के प्यार ने.५६

उनकी शैली उनके चिंतन मनन के विस्तार से परिचित कराते हुए प्राण जी के शौर हमें इस कदर अपने विश्वास में लेते हैं कि हमें यकीन करना पड़ता है कि उनकी शाइरी का रंग आने वाली नवोदित कवियों की राहों में अपनी सोच के उजाले भर देगा. लहज़े में सादगी, ख्याल में संजीदगी और सच्चाइयों के सामने आइना बन कर खड़ा है. हर राज का पर्दा फाश करते हुए प्राण जी के शेर के सिलसिले अब काफिले बन रहे है जो अपने साथ एक पैग़ाम लिये,बिन आहट के खामोशियों के साथ सफर करते हुए अपने मन के गुलशन में उमडते हुए भारतीयता के सभी रंग, वहाँ की सभ्यता, संस्क्रुति, तीज त्यौहार, परिवेश, परंपराओं की जलतरंग से हमारी पहचान कराते चले जा रहे हैं.
उनका ये ग़ज़ल संग्रह ” मैं ग़ज़ल कहता हूँ” . बोलचाल की भाषा में अपने मन के भाव प्रकट करने के इस सलीके से मैं खुद बहुत मुतासिर हुई हूँ और आशा ही नहीं यकीन के साथ कह सकती हूँ कि उनका यह सँग्रह लोगों की दिलों में अपना स्थान बनाता रहेगा.
“मेरी राह रौशन करें आज देवी
यही वो दिये है, यही वो दिये हैं.”- स्वराचित

जाते जाते एक अनुपम शेर उनकी जुबानी-

“रोशनी आए तो कैसे घर में
दिन में भी हर खिड़की पर परदा है प्यारे.”

देवी नागरानी
न्यू जर्सी, यू.एस.ए
१० , अक्टूबर २००७
dnangrani@gmail.com
URL://charagedil.wordpress.com


छवि ३. सँगम

 

 

 

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“मौत की गोद
में ज़िंदगी आबाद
अब हो रही”

खोखला जिस्म
खोखली साँसें
पर, फिर भी रुक रुककर
चलने की चाह ज़िंदा है
शायद इसलिए ही
कच्ची उम्र की डोर
पीढी़ ढो रही है.
कदम लड़खडा़कर
सँभलने लगे है
ढलती उम्र है पर
सूर्यास्त शायद दूर.
सीने से लिपटी
हर खुशी दम तोड़ती है
हर आस रेत सी
क्यों हाथ से फिसलती है?
जीवन की गरमी
मौत की ठंडक
दोनों समुद्र के किनारे
पर मिलती हैं जब गले
हैरान होकर ज़िंदगी
पूछती है मौत से
“पहले क्यों ना तू मिला?
क्यूँ मिली थी ज़िंदगी?”
“ढळ गई थी उम्र पर
ढला न था सूरज तेरा ए जिँदगी!
चलो छोडो गिले शिकवे
जीवन है यतार्थ
जब तू मिली है मुझसे
और
मैं मिला हूँ तुझसे.”

**
छवि ३. रौशन मीनार

आस उम्मीद जिंदा मुझमें
और रहेगी तब तक
जब तक
चलती रहेगी, निडर हो
मेरी साँसें
सँग सँग मेरे
उस क्षितिज की ओर
जहाँ कल
उम्मीद का इक नया सूरज
फिर से उदय हो
मेरे वजूद का
रौशन मीनार कहलाएगा.
॰॰
छवि ३. ‍‍‍‍ ‍अः सच की सरहद

ज़िंदगी की शान है
सूरज अस्त होने तक
इन्सान की आन है
ज़िंदगी ढलने तक.
सच यह भी है
सच वह भी है
हर दौर से गुजर कर ज़िंदगी
हर पडा़व पर
ले साँसें, उनको सहलाती
सोच रही है
“जाना था सफ़र पर मुझे
क्यों मैं होश में बेहोश रही
क्यों ना भरम की हद को पार कर
सच की सरहद छू सकी
हाँ छू सकी!!!

“सिंदूरी शाम कवियों के नाम”

“सिंदूरी शाम कवियों के नाम”

बहु -भाषी कवि सम्मेलन ११, नवंबर की शाम श्री सत्य नारायण मंदिर, वुड साइड, न्यू यार्क में विद्याधाम की तरफ से सम्पन्न हुआ.

डॉ. सरिता मेहता विद्याधाम की निर्देशिका है जिनकी बतौर ये बहुभाषी कवि- सम्मेलन आयोजित किया गया. यह सफल कवि सम्मेलन एक तरह से कविओं का गुलशन “सिन्दूरी शाम-कविओं के नाम” एक नया पैग़ाम ले आया क्योंकि इसमें बहू-भाषी पंजाबी, बंगाली, सिन्धी, अवधी और अंग्रेज़ी भाषा के कवियों ने भाग लिया, और इस सामारोह की संचालक रही डॉक्टर सरिता मेहता. दीवाली की शुभकामनाओं के साथ मौजूद श्रोताओं ने उन्हें इस संगोष्ठी को आयोजित करने के लिए बधाई और शुभकामनाएं दी. ग्यान का दीपक जलाते हुए पंडित त्रिपाठी जी अपने मन में जड़े हुए काव्य प्रेम, राष्ट्र प्रेम, देश के प्रति भावनाएं अपने तरीके से छंदों में व्यक्त करते हुए कहा “अपने संस्कारों के रूप में वसीयत स्वरूप जो हिन्दी भाषा का प्रचार-प्रसार सरिता जी सत्यनारायण मन्दिर में बखूबी करती रही हैं.”
डॉ.सरिता मेहता किसी पहचान की मोहताज नहीं है, शिक्षा के जगत में उनका हिन्दी के क्षेत्र में जो योगदान रहा है वह काबिले तारीफ है. अज्ञान का अँधेरा दूर करके ज्ञान की दिशा को उज्गार करने का यह प्रयास उनकी नवनीतम पुस्तक “आओ हिन्दी सीखें” के रूप में एक वरदान बनकर आया है जो हिन्दी को अंगेजी जुबां के आधार पर बचों एवं शिक्षकों को बहुत लाभाविंत कर रहा है. बचों के शिक्षण के लिए इनकी यह देन बचों के लिए एक अनमोल सौग़ात है. कला की कई दिशाओं में उनकी अभिरुचि रही है -मूलत: चित्रकार है कई ललित कला प्रदर्शिनियों में भाग लेती रही हैं और अनेक उपाधियों से निवाजी गई हैं.’ वह ख़ुद इसकी काव्य गोष्टी की सरंक्षक व संचालिका रही.
कवि गोष्टी में उपस्थित कवि गण थे -राम बाबू गौतम, आनंद आहूजा, अशोक व्यास, अनुराधा चंदर, ग़ुरबंस कौर गिल, पूर्णिमा देसाई, बिंदेश्वरी अगरवाल, अनंत कौर, सुषमा मल्होत्रा, वी.के चौधरी, मंजू राय, अनूप भार्गव, सीमा खुराना, देवी नागरानी और नीना वाही.

डा॰ सरिता मेहता जी की कविता के शब्द अब तक उनके छोड़े हुए नक्श याद दिला रही है, उनका मक्सद जो अनेकता में एकता के रंग भर रहा है…

फैलाया है मैंने अपना आँचल
इस धरती से उस अंबर तक
हम सब मिल एक हो जायें
विश्व में अमन शाँति का ध्वज फहरायें
ये ख्वाब है मेरा, सच हो जाये
ये मुशकिल है, असंभव तो नहीं.सरिता मेहता
कविता पाठ के रसपान कि कुछ झलकियाँ प्रस्तुत कर रही हूं जो जाने माने कवियों ने उस शाम को सजाने के लिये प्रस्तुत की.

वर्जीनिया से आई प्रख्यात कवित्री ग़ुरबंस कौर गिल ने अपने काव्य तथा साजो-आवाज़ से पँजाबी को रचना सुनाकर महफिल को अपनी गिरफ्त में बाँध रखा.

अनूप भार्गव की कविताओं में सत्य का सूरज चमकता हुआ दिखाई दिया मधुर क्षणों की अनुभूति है ये कविता का उन्वान दिवाली.

” कब तक लिए बैठी रहोगी मुट्ठी में धूप को
ज़रा हथेली को खोलो तो सवेरा हो.” अनूप

बिंदेश्वरी अगरवाल ने अवधि भाषा में ए हास्य रचना के द्वारा उनका प्रथम बार अमिरिका में
पाँव धरते ही जो तजुरबा हासिल किया बड़े रोचक ढँग से पेश किया जिससे वातावरण कुछ ज़्यादा चहकने लगा.

पूर्णिमा देसाई जी शिक्षायतन की निर्देशिका व हर्ता कर्ता है जिनकी रचनाओं का शुमार एक अनंन्त सागर की तरह लहलहाता है, जिसकी एक सुदर झलक सुस्वर में सुनाते हुए वे मानवता को एक स्देश भी दे रही थी -“आओ मानव बनें अब तन मन से” जो हमेशा एक मार्गदर्शक तुकबंदी है और रहेंगी.

वाह !!!सरल शुभ संदेश .

राम बाबू गौतम ने कई रचनाओं से अपना समाँ बांधा जिसमें खास थी उनकी वे छेडा खानी करते हुए जवान शोख अदाज, की रचना जो सब ने साराही.

आनंद आहूजा अपने समय के प्ख्यात कवि है जिनके अपने रचित भंडार से कुछ राह रौशन करती हुई
“न मंज़िल न मंजिल की राह चाहता हूँ
न दादे सुख़न न वाह वाह चाहता हूँ
तुम्हारी निगाहें अनंद जिसमें सब कुछ है शामिल
मैं बस तुमसे वो निगाह चाहता हूँ .”

एक पथिक का मार्गदर्शन करने के लिये बहुत कुछ गागर में भर दिया सागर को
आगे कहते हैं
अपना बचपन याद है
माँ के निवाले याद हैं

सुषमा मल्होत्रा शिक्षा क्षेत्र से जुडी हुई है, कविता पाठ के बाद भाषा की प्रगति के बारे में उन्होंने कई द्रष्टीकोण उजगार किये. हैरत हुई सुनकर कि अमरिका में पंजाबी भाषा का चलनअपना पांव रख चुका है. हिंदुस्तान की बहुभाषाएं यहां अब आम बोल चाल की भाषाएं होती जा रही है और यही हिंदी भाषा का असली प्रचार-प्रसार है.

नीना वाही एव् वी.के चौधरी ने भी रसमय रचना से निवाजा़

मत कहो कभी है अंधियारा
मैं साथ रहूंगी बन साया. यह थी मंजू राय जो आशावादी पैगाम ले आई हमारे लिये.चोली दामन का साथ होता है अंधेरे और उजाले का, पर नया भाव, नया अंदाज़ मन को बहुत भाया.

सीमा खुराना जी ने सुंदर प्रस्तुति से आगाज़ किय
तुम्हें न मिलूँगा कभी
ये फ़ैसला मेरा था. सीमा खुराना
अशोक व्यास जी की रचना बडी रोचक थी, एक समाँ बाँधने में सफल रही, जब वे पढ़ते रहे और श्रोता मुग्ध भाव से आँन्नद लेते रहे.
मेरी आँखों में वो सवेरा है
जिसको देखूं वो शख्स मेरा है.
कभी किरणों के झूले पर इठलाती है
तब पनिहारिन प्यास बुझाती है. अशोक व्यास

अनँत कौर ने अपने शायराने अंदाज, में अपनी हिंदी और पंजाबी भाषा में गझ़ल सुरों में पेश की. उनकी रचनाओं का विस्तार अनंत था. मेरी दाद उन्हें कबूल हो. आगे उनकी एक रचना का मुखड़ा सुनियेः
तेरे लिए तो इन्तिहान नहीं हूँ मैं
मैं जानती हूँ अब तेरी जाँ नहीं हूँ मैं. अनंत कौर

देवी नागरानी जो मूलतः सिंधी भाषी है अपनी एक सिंधी रचना का पाठ किया
बेरुखी बेसबब ब थींदी आ
प्यार में बेकसी ब थींदी आ.

साथ में हिंदी की एक गज़ल भी पेश की जिसके अल्फ़ाज़ हैं
“बचपन को छोड़ आए थे लेकिन हमारे पास
ता उम्र खेलती हुई अम्राइयां रहीं. ” देवी नागरानी

अंत की ओर बढते हुए बीना ओम ने मंत्र मुग्ध करने वाली अंग्रेजी में कविता सुनाई जिससे लिग चिंतन मनन के द्वार पर एक अलौकिक आनन्द लेते रहे. मन्दिर के नये प्रेसिडेंट श्री मुरलीधर ने सच की नई परिभाषा से परिचित कराते कहा “जब इंसान झूठ बोलना भूल जाता है तो वह अपने आप एक कवि बन जाता है.” उन्हें उनकी सेवाओं के लिये सन्मानित किया गया
सत्यनारायण मंदिर की तरफ से सन्मान करते हुए शास्त्री जगदीश त्रिपाठी जी ने डा॰ सरिता मेहता के इस काबिले- तारीफ कदम को एक आशावादी प्रयास मानते हुए कहा ” वे धन्यवाद की पात्र हैं और मैं उनकी आशावादिता पर मुग्ध हूं. जिस तरह चकोर पक्षी आसमाँ की तरफ उडता है चाँद को पाने की आकांक्षा लिये, बिना यह सोचे कि सफर कितना तवील है और पंखों में भी थके से हैं. बस लक्षय सामने रहता है उसके, उसी तरह सरिता जी ने ये नहीं सोचा कौन आयेगा, कितने साथ होंगे बस एक द्रढ संकल्प को आंजाम देने की कोशिश की. उनका यही प्रयास उन्हें मंजिल की तरफ ले जायेगा, यही मेरी शुभकामना है, यही मेरा आशीर्वाद है,” और इसके साथ ओर से उन्होंने स्वामी नारायण मंदिर की ओर से उन्हें सर्वोक्रष्ट विद्या रतन अलंकार से सन्मानित किया. फिर विध्या धाम की तरफ से शास्त्री जगदीश त्रिपाठी जी के कमल हस्त से सरिता जी की हाजिरी में जिन कविगण को सन्मान पत्त से शुशोभित किया गया वे हैं –

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1. शास्त्री जगदीश त्रिपाठी जी अध्यात्मिक ग्यान रतन
२. रघुनाथ डुबे संगीत रतन
3. सीमा खुराना हिंदी साहित्य रतन
4. पूर्णिमा देसाई साहित्य सर्जन रतन
5. ग़ुरुबंस कौर गिल पंजाबी काव्य रतन
6 देवी नागरानी काव्य रतन
7. बालदेव सिंग गेरेवाल पंजाबी साहित्य रतन
८ डा॰सारिता मेहता सर्वोक्रष्ट विध्या रतन

सरिता जी ने शास्त्री जगदीश त्रिपाठी जी को अध्यात्मिक ग्यान रतन की उपाधी से सन्मानित किया किसके वो हकदार हैं. उनका परिचय तो सूरज को उंगली दिखाने के बराबर होगा. मंदिर में शिक्षा पा रहे तीन होनहार बच्चों को “उज्वल भविष्य रतन” से सन्मानत किया गया वे थे नील शदादपुरी, ओम तलरेजा, और रोहित तलरेजा.
अंत के पहले एक अनोखी शुरुवात करते हुए शास्त्री जगदीश त्रिपाठी जी के अनुज रघुनाथ डुबे ने अब शब्दों की सरिता को सुरों से सजाकर अपनी मधुर आवाज़ की गूंज में सबको समेट लिया. एक पाकीज़गी का वातावरण जो एक यादगार बन कर दिलों में पनपते रहेगा.

माँ हंस वादिनी शारदे
माँ भव सागर से तार दे.

धरती धवल गगन गूंजता
कण कण स्वर उच्चार दे.”
सरिता जी ने मौजूद श्रोताओं को धन्यवाद देते हुए एक बहुमत के एकता के सूत्र में जो बाँधने का प्रयास किया उसके लिये आभार प्रकट किया और इसी के साथ बहु भाषी कवि सम्मेलन संपन्न हुआ.

प्रस्तुतकर्ताः
देवी नागरानी
न्यू जर्सी, यू एस ए
१८ नवंबर, २००७

“है यहाँ भी जल”

पुस्तक चर्चा
लेखकः विजय सिंह नाहटा
प्रकाशक : बोधि प्रकाशन, जयपुर
मूल्य : १००/
पन्नेः ९०
सम्पर्क : vijay_nahata@hotmail.com

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“है यहाँ भी जल”

विजय सिंह नाहटा , जयपुर के निवासी हैं और बहुत ही सधे हुए जाने माने कवि है जिनका शुमार देश के मान्यवर कवियों में होता है. राजस्थान पंशासनिक सेवा में वे निवर्त हैं. कल हमारा, सेतु, दूर कहीं आदि समवेत काव्य संग्रहों में उनकी रचनायें संकलित है. प्रसार भारती एवम् दूरदर्शन से निरंतर रचनाओं का अनुप्रसारण भी होता रहता है.
“है यहाँ भी जल” उनका पहला कविता संग्रह है.

vijaya.jpgविजय सिंह नाहटा जी का प्रथम कविता संग्रह मेरे हाथ जब आया तो कुछ पल के लिये मैं उस किताब को हाथों में लिए सोचती रही, जाने क्या? पर कुछ ऐसा उस कवर पेज के चित्र में संबोधित था, जिसे मेरी आँखें देख तो पा रही थी, पर पढ़ नहीं पा रही थी. स्याह स्याह श्यामल रंग, उस पर अंकित दो आंखें, ऐसा कहीं लगता भी था, कहीं भ्रम होने का इशारा भी मिलता था, अन्तर मन के अदृश्य कुछ अनदेखे दृश्य खुली आँखों के सामने न जाने किन तहों को बे-परदा करते रहे. और जैसे ही मेरे भ्रम की पहली तह खुली आसमानी अदृश्यता के इशारे, कुछ गहराइयों से झाँकती सच्चाइयों की झलकी सामने उस पन्ने पर नज़र आई जो मेरे सामने खुला-

” आत्मा-सा मंडराता हुआ”

‘शब्द जो दिखता प्रकट
शब्द का आवरण होता सशरीर, स्थूल
उसके भीतर गहरे होता एक शब्द
चेतना की तरह पसरा हुआ-
अदृश्य, निराकार!!

शब्द जो दिखता है
होती झिलमिलाहट भीतर के शब्द की
शब्द जो प्रकट ज्योति की तरह
उजास है उस शब्द की
नहीं आया जो कविता में
आत्मा-सा मंडराता हुआ, हे बार !” प.३०

पल दो पल के लिए खामोशी ने मेरी सोच के लब सी दिए, सुन्न निशब्द! ऐसा कभी कभार होता है, जब कोई साहित्य सिर्फ़ शब्द न होकर कुछ और होता है, जो अपने अंदर के सच के सामने अक्स बन कर खडा हो जाता है. ऐसी ही शिद्दत, सुन्दरता, संकल्प विजय जी की इस रचना में पाई इन अल्फाज़ों से जाँकती हुई. अंतर्मन के सच का साक्षात्कार, सच के शब्दों में लिखा हुआ यह एक प्रयास ही नहीं, एक सफल दृष्टिकोण भी है जो इंसान को इस सच के आगाज़ के दाइरे में लाकर खड़ा करता है. जीवन पथ पर लक्ष्य के इर्द गिर्द यह दृष्टिकोण नक्षत्र सा मंडराता हुआ नज़र आता है. एक ध्वनि गूंजित होती सुनायी पड़ रही है जैसे उनके अपने शब्दों में

” आत्मा से बाहर निकल कर ख़ुद को सज्जाता हूँ”

शब्द स्वरूप मोती मन को मोह के दाइरे में ला कर खड़ा कर देते हैं. गौतम बुद्ध की जीवन गति भी बेताश होकर उस सच को तलाशती हुई गाया पहुँची और उन्हें मोक्ष का साक्षात्कार हुआ. सेल्फ रीअलाइज़ेशन मकसद है, बाकी सब पड़ाव है उस अदृश्य निराकार दृश्य के.

विजय जी की कलम से सच की धारा बन कर बहत चला जा रहा है. उनकी सोच प्रगतिशील है और एक मार्गदर्शक भी. वो शब्दों का सहारा लेकर उस शब्द की ओर इशारा कर रहे हैं जो इस रचना का आधार है-इस शरीर में प्राण फूंकता है, जो अग्नि बनकर देह में ऊर्जा देता है. कविता रुपी देह के गर्भ से इस प्रकाश का जन्म होना एक अभिव्यक्ति है, जहाँ शब्द शब्द न रहकर एक ध्वनि बन जाए और आत्मा सा मंडराता रहे. बहूत मुबारक सोच है जो लक्ष को ध्येय मान कर शब्दों की उज्वलता को कविता में उज्गार कर रही है. यहाँ मैं विजय जी के शब्दों में एक संदेश ख़ुद को और सच की राह पर चलने वाले अध्यात्मिल उड़ान भरने वालों के आगे प्रस्तुत कर रही हूँ. यह संदेश गीता का सार है, और ज्ञान का निचोड़ भी.

“मैं कल सुबह
तुम्हारी याद को
इतिहास की तरह पढ़ूँगा. प३१

और आगे तो अनेक रहस्यों के द्वार खटखटाने का सिलसिला दिखाई पड़ रहा है, जहाँ नज़र पड़ती है, शब्द पढ़ कर आँख कुछ पल थम सी जाती है, सोच पर बल पड़ने लगते हैं कि कैसे यह रचनाकार अपनी रचना के ज़रिये हमें एक ऐसी स्रष्टी की सैर को ले चला है, जहाँ पाठक के सामने कुछ अनसुने, कुछ अनदेखे अन्तर के राज़ फाश होते जा रहे हैं. अब आगे देखें कुछ और शब्दों का ताल-मेल, उनकी स्वच्छता के साथ!!

” संभावनाओं की आहट से सुंदर
असम्भावनों की किसी मलिन-सी गली में
दिर्मूद से यकायक मिल बैठते हों बचपन के दोस्त! ” प१९

शब्द थपकी देकर जगा रहे हैं, संभावनाओं से दूर असम्भावानाओं के दायरे में एक संकरी गली से गुज़र कर जिस साक्षात्कार की कल्पना का मुझे अहसास दिला गई, तो अनायास ये शब्द मेरी कलम से बह निकले:

“अब रूह में उतरकर मोटी समेट देवी
दिल सीप बन गया है और सोच भी खुली है.” -स्वरचित

यह तो मैं नहीं जानती की पढ़ने से जो आभास मेरे अंदर उठ रहे है वो बेशक रूहानी सफर की ओर बखूबी संकेत कर रहे. आगे देखिये औए सुनिए शब्दों की आवाज़ को:

” जब तुम न थीं
तो प्रतीक्षा थी
अब तुम हो
मैं ढूंढता हूँ प्रतीक्षा को. प.२१

शब्द की गहराइयों में एक विरह भाव प्रतीत होता है, जैसे अपने आप से मिलने के लिए लेटा हो कोई, जीवित चिता पर मरने के इंतिज़ार में. अपने आपको जानने, पहचानने की, और उस सत्यता में विलीन होने की प्रतीक्षा ऐसी ही होती होगी जिसकी विजय जी को तलाश है. बड़ी ही मुबारक तलाश है यह , ज़हे नसीब!!

“फिसलती हुई रेत है जिंदगानी
तमाशा है ये भी मगर चार दिन का.” -स्वरचित

सफर का सिलसिला एक और पड़ाव पर आकर ठहरना चाहता है कुछ पल, सोच में डूबा कि शब्द भी इतनी खूबसूरती से अपने होने का ऐलान कर सकते हैं.

-“तुम्हारी स्मृति अब एक रड़कती मुझमें ?
राख के इस सोये ढेर में
ज्यों दिपदिपाता एक अंगारा मद्धम
सोये हुए चैतन्य में
लो तुम अचानक देवता सी
जग गई मुझमें
जगाती अलख निरंजन!” प २४

अंतःकरण से आती हुई कोई आलौकिक आवाज़, जैसे कोई गूँज भंवर गुफा की गहराइयों से बुला रही हो, अपने पास-निद्रा में अनिद्रा का पैग़ाम लिए:

छन छन छन छन
रुन झुन रुन झुन
पायल की झन्कार लिए !!

वाह!!! एक सुंदर चित्र सजीव सा खींचने का सफल प्रयास, मन की भावनाओं का सहारा लेकर कवि विजय की कलम इस सार्थक रवानी को लिये थिरकती है जिसके लिये मैं उन्हें तहे दिल से शुभकामनाएं देती हूँ. मन की आशा बहुत कुछ पाकर भी कुछ और पाने की लालसा में निराशाओं को अपने आलिंगन में भरने को तैयार है.

“घेरा है मस्तियों ने तन्हाइयों को मेरी
महसूस हो रहा है फ़िर भी कोई कमी है”-स्वरचित

यादों की सँकरी गली के घेराव में एक बवंडर उठ रहा है जहाँ साँस धधकती है जलती चिता पर जीते जी लेटे उस इन्तज़ार में, जहाँ मौत के नाम पर आत्मा के अधर जलने लगे है, उस पनाह को पाने के लिये.

“जिंदगी ‌एक आह होती है
मौत जिसकी पनाह होती है.” -स्वरचित

हर पन्ने पर शब्द निशब्द करते चले जा रहे हैं और झूठ का एक एक आवरण सच में तब्दील होता जा रहा है. जैसे:

” समृति गोया गिलहरी
काल के उजाड़ सन्नाटे तले
फुदकती
इस डाल से उस डाल!” प २२

एक खालीपन का अहसास अपने भरपूर आभास के साथ फुदकता हुआ नज़र आ रहा है. जो मैं महसूस कर रही हूँ, जो पदचाप शब्दों की मैं सुन रही हूँ, जो अक्स मैं इन शब्दों के आईने में देख रही हूँ, ज़रूरी नहीं कोई मुझसे शामिल राय हो. कवि जब लिखता है तो उस समय उसके मन की स्थिति, उसके भाव, उसके ह्रदय की वेदना, विरह का अवस्थिती, मिलने की आशा, निराशाओं की जकड़न उसके सामने सोच बनकर आ जाती है, और लिखते लिखते वो कहीं न कहीं उस छटपटाहट को छुपाने या दर्शाने में कामयाब हो जाता है, यही एक लिखने की सफल कोशिश है जो अनबुझी प्यास को लेकर सहरा में भटकते हुए एक कवि, एक शायर, एक लेखक, शिल्पकार, एवं एक कलाकार को अपनी रचना को सजीव करने का वरदान देती है.

“सुनसान जब हो बस्तियां, रहती वहाँ तन्हाइयां
अब मैं जहाँ पर हूँ बसी, संग में रहे परछाइयाँ” -स्वरचित

अरे ये क्या सामने ही लिखा है?

” क्षण वह लौट नहीं आएगा
मौन तोड़ता हुआ फुसफुसाएगा. ” प २३

लगता है तन्हाइयां बोल रही हैं. वक्त फिसलती हुई रेत की तरह जा रहा है और हमारी बेबसी उसे देखे जा रही है जिसका इशारा इस शेर में बखूबी झलक रहा है:

” नहीं बाँध पाया है कोई समय को
न देखा कभी हमने ऐसा करिश्मा.”-स्वरचित

विजय जी की हर पंक्ति अपने आप में एक जुबां है, मौन तोड़ती हुई, फुसफुसाती हुई. बस उन खामोशियों को सुनने वाले कानों की ज़रूरत है.

“गुफ्तगू हमसे वो करे ऐसे
खामोशी के लब खुले जैसे.”-स्वरचित

बस अहसास जिंदा हो, शब्द अपने आप बोलने लगते हैं, कभी तो शिद्दत के साथ चीखने भी लगते हैं. ऐसी ही इस सुंदर रचनात्मक अनुभूति के रचयिता श्री विजय जी ने बड़े अनोखे ढंग से अपने अँदर के लहलहाते भावों के सागर को, शब्दों का सहारा लेकर अलौकिक रूप से व्यक्त किया है. कभी किसी कड़वाहट को पीने की घुटन के बाद, कभी इंतज़ार के बाद थकी थकी सी आँखों की पथराहट की ज़ुबानी, कहीं आकुल तड़प की चट्टान बैठी उस विरहन की जुबानी, तो कहीं सहरा की तपती रेत पर चलते चलते पाँव के छालों की परवाह किए बिन ही पथिक जिस पथ पर अपने ही वजूद की तलाश में भटक रहा है -उस आत्मीय मिलन की प्यास लिए हुए-इन सभी अहसासों को शब्दों की सरिता स्वरूप पेश करने की सफल कोशिश की है. ज़िंदगी का एक सिरा अपनी अनंत यात्रा की ओर बढ़ते हुए दूसरे सिरे को टटोलने लगता है तो विजय जी के शब्दों में:

” मृत्य अलार्म घड़ी है,
पर जिसकी चाब्बी हम नहीं लगाते
हमें जगह कर पकडा देगी
दूसरी यात्रा की गाड़ी. ” प ७०

इस पुस्तक के हर शब्द को पढ़ते हुए, उसे समझने, समझकर पचाने की कोशिश में मेरी अपनी सोच लिखने के धारा को रोक नहीं पा रही है. इस प्रयास में कहीं एक और किताब ही न बन जाए इसी डर से अनुमति लेने के लिए सिमटाव की मेरी इस कोशिश में कुछ शेर मौत की ओर इशारा करते हुए पेश हैं.

” मौत का मौसम न कोई, न ही इसका वक्त है
ये चुराकर रूह को ले जाए है जाने कहाँ.”

गुज़ारी ज़िंदगी बेहोश होकर मैंने दुनियाँ में
मेरा विश्वास सदियों से न जाने किस गुमाँ पर था.?

कोई गया जहाँ से तो आ गया कोई
लेकर नया वो इक बदन या मेरे खुदा. “

देवी है दरिया आग का दिल में मेरे रवां
महसूस कर रही हूँ जलन या मेरे खुदा.”

बस इस अहसास भरे शब्दों के गुलदस्ते ने अपनी महक को मेरे अंतर्मन को निशब्द कर दिया है. बाकी बातें मौन में होती रहेंगी. एक बार विजय जी को इस अनोखे, अद्भुत अनुभूति काव्य संकलन को प्रस्तुत करने के लिए मुबारकबाद है.

देवी नागरानी
न्यू जर्सी, यू एस एक
१० , अक्टूबर २००७
dnangrani@gmail.com
URL://charagedil.wordpress.com

छवि २:. साथी‍‌

 

 

chavi-2.jpg

 

तन के साथी, मन के साथी
मिलकर बोझ उठाएँगे
मेहनत मजदूरी को दोनों
अपना ध्येय बनाएँगे.

 

पत्थर गारा जो भी होगा
हाथ से हाथ बटाएँगे
एक हंसे दूजा मुस्काये
मिलकर बोझ उठाएँगे.

 

वादा किया जो इक दूजे से
मिलकर उसे निभाएँगे
जीवन पथ पर कदम मिलाकर
दोनों बढ़ते जाएँगे.

उदासी में डूब जाता है

गज़लः२५

ख़्यालों ख़्वाब में ही महफिलें सजाता है.
और उसके बाद उदासी में डूब जाता है.

 

वो चाहता है के नज़्दीक रहूँ मैं उसके
क़रीब जाऊँ तो फिर फ़ासले बढ़ाता है.

 

कुछ ऐसे भाए हैं रस्तों के पचोख़म उसको
क़रीब जाके भी मंज़िल से लौट आता है.

 

किसी ज़ुबान के शब्दों से उसको नफ़रत है
किसी के धर्म पे उँगली भी वो उठाता है.

 

वो रूठ जाता है यूँ भी कभी कभी मुझसे
कभी कभी तो मिरे नाज़ भी उठाता है.

 

चराग़े-दिल/ ५१

छवि १. कण कण में

 

छवि १. कण कण में

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रेतीले कण कण में
इस वीरान दायरे के अंदर
खामोशी का दुशाला ओढे़
खड़ा है यकटक
पूरी आन बान के साथ
ऊपर आसमान की ओर देखता हुआ
द्रढ़ सा नागफनी
मानो कह रहा हो
” मैं अकेला नहीं हूँ
तन्हाई मेरे साथ है”

हम दिलों में निवास करते हैं

ग़ज़लः २४
दिल को हम कब उदास करते हैं
आज भी उनकी आस करते हैं.

हमको ढूँढो नही मकानों में
हम दिलों में निवास करते हैं.

पहले ख़ुद ही उदास रहते थे
अब वो सबको उदास करते हैं.

चढ़के काँधों पे हो गए ऊँचे
इस तरह भी विकास करते हैं.

इक्तिफा़कन निगाह उट्ठी थी
लोग क्या क्या क़यास करते हैं.

राग़े-दिल/ ५०

छवि १. कोई तो आएगा

छवि १. कोई तो आएगा

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सूनी सी पगडंडी पर,
इक आस
अभी भी साँस ले रही है
आँखो में निर्जीव सी आशा
बुझ कर फिर भी जल रही है
कोई तो आ॓एगा इस राह पर?
देखे हैं चिह्न मैंने जीवन के !
चिह्न कहो पदचिह्न कहो, या
साँसों की धीमी सी आहट
इंतजार में हवाओं के
सरसराहट सुन रही है
हाँ ! सुन रही है जिंदगी
“कोई तो आएगा”
ये सोच रही है.

***

चित्रावली 

छवि की आक्रतियाँ कलाकार की तूलिका से उतरकर लेखनी की नोक से स्याही में ढलकर एक अलग रूप धारण करती हैं, और सजीव होकर अपने भाव प्रकट करने की क्षमता रखती हैं. ऐसा एक सिसिला चला है हमारे चित्रकार कलाकार श्री विजेंद्र “विज” की इन अनुभूतियों का जिन में जिनके साथ उनमें जान फूंक कर पूरा इन्साफ किया है. अब कलम की नोक ने मेरे मन की भाननाओं को उजगार करते हुए कितना इन्साफ किया है यह आप पढ़े, परखें और…..


देवी नागरानी

ttp://photos.groups.yahoo.com/group/anubhuti-hindi/lst

 

तुझको अपना खुदा बनाया है

गजलः २३
तेरे क़दमों में मेरा सजदा है
तुझको अपना खुदा बनाया है.

जिसकीी ख़ातिर ख़ता हुई हमसे
वो ही इल्ज़ाम देने आया है.

ख़ुद की नज़रों से गिर गए हैं जो
हमने बढ़कर उन्हें उठाया है.

हौसला है बुलंद कुछ इतना
हमने तूफां में घर बनाया है.

हमको पूरा यकीन था जिसपर
तोड़कर उसने ही रुलाया है.

उसने धोका दिया हमें देवी
राज़े-दिल जिसको भी बताया है.
चराग़े-दिल/ ४९

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