चराग़ों ने अपने ही घर को जलाया

गजलः २१
चराग़ों ने अपने ही घर को जलाया
कि हैराँ है इस हादसे पर पराया.

किसी को भला कैसे हम आज़माते
मुक़द्दर ने हमको बहुत आज़माया.

दिया जो मेरे साथ जलता रहा है
अँधेरा उसी रौशनी का है साया.

ही राहतों की बड़ी मुंतज़िर मैं
मगर चैन दुनियाँ में हरगिज़ न पाया.

संभल जाओ अब भी समय है ऐ ‘देवी’
क़यामत का अब वक्त नज़दीक आया.

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2 टिप्पणियाँ

  1. prabhakar said,

    नवम्बर 4, 2007 at 5:41 पूर्वाह्न

    बहुत खूब!!

  2. नवम्बर 6, 2007 at 4:37 पूर्वाह्न

    Aadarniye Deviji
    bahut sundar ghazal…
    bahut khoob
    saadar
    hemjyotsana


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