चराग़ों ने अपने ही घर को जलाया

गजलः २१
चराग़ों ने अपने ही घर को जलाया
कि हैराँ है इस हादसे पर पराया.

किसी को भला कैसे हम आज़माते
मुक़द्दर ने हमको बहुत आज़माया.

दिया जो मेरे साथ जलता रहा है
अँधेरा उसी रौशनी का है साया.

ही राहतों की बड़ी मुंतज़िर मैं
मगर चैन दुनियाँ में हरगिज़ न पाया.

संभल जाओ अब भी समय है ऐ ‘देवी’
क़यामत का अब वक्त नज़दीक आया.

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