विश्व हिंदी न्यास अधिवेशन २००७

विश्व हिंदी न्यास अधिवेशन २००७

 

हिंदी-दर्शन और दिशा

एक नये क्षितिज को छूता हुआ “विश्व हिंदी न्यास” द्वारा आयोजित अक्टूबर ६ और ७ तारीख,२००७ को सातवाँ अधिवेशन, अपने सभी इन्द्रधनुषी रंगों का एक बेजोड़, बेमिसाल अनुभव रहा. अनेकता में एकता हमारे हिंदुस्तान की पहचान है, इसी सत्य को अमली जामा पहना कर आयोजित किया गया यह अद्भुत प्रयास हमारी आनेवाली युवा पीढ़ी के लिये मार्गदर्शक है.
स्वागत संदेश में G.Thomas Stella ने इस कार्य में समाई एकता की साराहना की और अपने विचार प्रकट करते हुए कहा कि “यही वह सभ्यता है जो यह पीढ़ी अपनी एक धरोहर के रूप में आने वाली पीढियों को दे सकती है.”

श्रीमती रीनत संधू, consul(Education) इस दिन की खास महमान रहीं. अपनी भावनाओं को प्रकट करते हुए यही कहा ” विश्व हिंदी न्यास” की तरफ से आयोजित किया गया अधिवेशन २००७ काबिले तारीफ़ है. यह योगदान हिंदी की सभ्यता व संस्क्रुति की प्रचार-प्रसार की ओर उठाया गया एक महत्वपूर्ण कदम है”.
कार्यक्रम का आरंभ हुआ अमरिका के राष्ट्रीय गीत से जिसे स्वर दिया अशनी व शिवानी दवे ने, और हिंदुस्तानी राष्ट्रीय गीत “जन गन मन” को बाँसुरी पर बजाया निष्ठा सोब्रिन ने और वहाँ मौजूद श्रोताओं ने सन्मान के साथ खडे होकर साथ दिया. दीप को उज्वलित करते हुए ” वंदे मारतम्” की ध्वनी मंच पर प्रतिध्वनित होती रही.

बाल साहित्य गोष्टी के अंतरगत हर उम्र के बच्चों ने भाग लिया, जिसका विस्तार कहानी, बाल गीत, विश्व गीत और नाटक के साथ साथ रोचक हकीकतों द्वारा देश की स्स्क्रुति को बखूबी अपने मूल्यों के साथ प्रसारित किया. भारत “विभन्नता में एकता” के एक सूत्र में पिरोया गया है, यह इस मंच पर झलकियों और झाँकियों की झिलमिलाहट में उज्वल और साफ़ नज़र आ रहा था. श्रीमती सीमा खुराना की आवाज़ में हकीकतों पर से परदे उठते चले गए. कलाकार एक के बाद एक शब्दों के परों पर सवार होकर मूक भाषा में अपने मन की भावनाओं की परिभाषा को व्यक्त करते रहे . बच्चे, बड़े विभिन्न पात्रों का रूप धारण करते हुए इस एकता का पैग़ाम पहुंचाने में सफल रहे, जिसके लिये उनकी जितनी तारीफ की जाये वह कम है.
उड़ीसा के न्रत्य, जगन्नाथ की रथ यात्रा का अद्भुत द्रश्य, राजस्थानी विवाह,जिसमें उनकी रस्में भी शामिल थीं, तामिलनाडू के तीज त्यौहार की झलकियाँ, पंजाब के परिवारों का संगठन और एकता उनके नाच-गाने, कढ़ाई-बुनाई और भाई चारे के द्रश्यों द्वारा मन को छूता चला गया. पंजाब का “गिद्धा” काबिले तारीफ़ था. एक मंच पर अनेक प्राँतों की शादियाँ, उनकी समानताओं और विपरीत रस्मों से वाकिफ़ कराती रही.

उड़ीसा की शादी के निबंध जो द्रश्य सामने आए, वो हकीकत से ही जुड़े हुए थे और उसीसे वाकिफ़ कराया गया कि शादी सिर्फ़ दूल्हा दुल्हन के बीच नहीं होती, बल्कि दो परिवारों के बिच एक नया रिश्ता जुडने की रस्म भी है, जो जुड़ता है, पनपता है और उसी की छत्र छाया में आज इतना महफूज़ है.
बंगला देश की शादी का द्रश्य बड़ा मन भावन था. शादी से बिदाई तक के द्रश्य किसी चलचित्र की झलकियों की तरह आँखों में समाते रहे.
देश की महान हस्तियाँ ज़िंदा हो उठी उन कलाकार बच्चों के रुप में, जो देश से परे रहकर भी वहाँ की आदर्श भरी झलकियों को अपनी प्रस्तुतियों द्वारा उजगार कर पाए.
“जलियनवाला बाग़” की अंधाधुंध गोलियों की बौछार का नमूना, भगतसिंह के “स्वतंत्रता संग्राम” के परिचय के साथ साथ उनका नारा ” इन्कलाब जिंदाबाद” एक गूंज बनकर इस बात का आश्वासन दे रहे थे कि श्रँखलाओं में जकडी भारतमाता को ये वीर आज़ादी का जामा पहनाने में समर्थ हैं.
एक के बाद एकसुंदर सलोने चहरे सामने आते रहे. १४० कलाकारों की सजी धजी रूप रेखाएं मन पर अंकित सी हो गई.
डाँडी मार्च के लिये तैयार गाँधीजी, सुभाषचंद्र बोस, श्री जवाहरलाल नेहरू…..!!

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बस यूँ समझ लें कि इन कलाकरों ने रंग बिरंगी वेश भूषाओं में जीवित होकर इतिहास को दोहराया है, और उनकी सफलता से आँखे नम हुए बिना न रह सकीं. सागर को गागर में समाने का यह अनूठा सफल प्रयास एवः अदभुत तजुर्बा रहा. कला प्रदर्शन देखकर लगता था जैसे यह एक संगठित परिवार है और उस मंच के कलाकार खुद भी उन रस्मों को निभाने के आदी हैं. एक बात का ज़िक्र मै यहाँ ज़रूर करना चाहूँगी, वो है उनकी महमान निवाज़ी, जिसका उदाहरण है श्री चंदर व उनकी श्रीमती पद्मिनी प्रसाद जिन्होंने सप्रेम चार अतिथि लेखक, लेखिकाओं को अपने घर में निवास दिया. मैं उनमें से एक थी और तहे दिल से उनका धन्यवाद करती हूं.

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इस सिलसिले में “विश्व हिंदी न्यास” के डाइरेक्टर श्री राम चौधरी, कवि सम्मेलन के सँचालक श्री कैलाश चंद्र शर्मा, और श्रीमती सीमा ख़ुराना और उनकी पूरी टीम दाद के पात्र हैं. उसी दिन शाम की चाय के बाद कहानी मंच आयोजित किया गया, जिसमें लेखक अपने पात्रों को अपनी आवाज़ में उजगारित करता रहा. पहली कहानी सियाराम शरन गुप्त की लिखी हुई “काकी” सरमिष्ठा बनर्जी द्वारा भावपूर्ण अर्थों को खुलासा करती रही. भगवती चरण द्वारा लिखी गई कहानी ” प्रायश्चित” अँचला सोब्रिन ने पढ़ते हुए अपने हाव भाव द्वारा बहुत ही जानदार पहलू रक्खा जब अंत का पैग़ाम सुनाया कि “माँजी बिल्ली तो उठकर भाग गई. ” अंत में सीमा खुराना ने अपनी कहानी “शक” बड़े ही नवनीतम अंदाज से प्रस्तुत की. उनके हर लहज़े , हाव भाव से उनके सभी पात्र जी उठे, जिससे यही आभास होता है कि सीमाजी एक अनुपम साहित्यकार, कहानीकार होने के साथ साथ एक माहिर कलाकार भी है.
दिन के अंतिम चरण में कवि सम्मेलन का संचालन किया श्री कैलाश चंद्र शर्मा ने और कवि गण जिन्होंने भाग लिया वह थे डा॰ सरिता महता, पूर्णिमा देसाई, रामबाबू गौतम, महेशकुमार शर्मा, अनुराधा चंदर, अनिल प्रभा कुमार, महेश कुमार शर्मा और मैं देवी नागरानी.
अधिवेशन का अंतिम चरण बड़ा ही मूल्यवान रहा, Teaching Workshop बडा ही कारगर सिद्ध हुआ. भाग लेते हुए एक बात का इल्म हुआ कि बहुत जानते हुए भी हम कितना कम जानते हैं और कितना बाकी कुछ एक दूसरे से सीख सकते हैं. श्री वेद प्रकाश जी व पूर्णिमा देसाई के सुझाव बच्चों की शिक्षण यात्रा के लिये बहुत अच्छे रहे. देखकर, सुनकर हैरत हुई कि अपनी राष्ट्र भाषा के लिये जितना प्रयास यहाँ पर किया जा रहा है, शायद यह उसका नतीजा रहा कि आठवें विश्व हिंदी सम्मेलन का आयोजन भी यहाँ न्यू यार्क में हुआ और एक उज्वल भविष्य की किरणें अब नये क्षितिज पर दिखाई दे रही हैं.
कार्यक्रम के अंतिम पड़ाव से पहले साहित्य गोष्टी का आयोजन संपन्न हुआ जिसमें चार रचनाकारों ने अपनी अपनी कहानियां पढ़ीं. एक सफल प्रयास के लिये सभी आयोजन कर्ता, सभी कलाकारों एवः विश्व हि्दी न्यास की पूरी समिति को मेरा नमन.

देवी नागरानी
न्यू जर्सी.
१० अक्तूबर, २००७

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