गर्दिशों ने बहुत सताया है

गज़लः १८
गर्दिशों ने बहुत सताया है
हर क़दम पर ही आज़माया है.
दफ़्न हैं राज़ कितने सीने में
हर्फ् लब पर कभी न आया है.
मुझको हंस हंस के मेरे साक़ी ने
उम्र भर ज़हर ही पिलाया है.
ज़ोर मौजों का खूब था लेकिन
कोई कश्ती निकाल लाया है.
मुस्कराया है इस अदा से वो
जैसे ख़त का जवाब आया है.
बनके अनजान उसने फिर मेरे
दिल के तारों को झन-झनाया है.
मुझको ठहरा दिया कहां ‘देवी’
सर पे छत है न कोई साया है.
चराग़े-दिल/ ४४

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5 टिप्पणियाँ

  1. अक्टूबर 13, 2007 at 1:29 पूर्वाह्न

    मुस्कराया है इस अदा से वो
    जैसे ख़त का जवाब आया है.

    –आय हाय!! गजब!!! बहुत खूब..दाद कबूलें इस अदा पर, मुआफी के साथ अगर अदब में कोई गुस्ताखी हुई हो. 🙂

  2. अक्टूबर 13, 2007 at 7:43 पूर्वाह्न

    आदरणीय देवीजी,

    दफ़्न हैं राज़ कितने सीने में
    हर्फ् लब पर कभी न आया है.
    मुझको हंस हंस के मेरे साक़ी ने
    उम्र भर ज़हर ही पिलाया है…. बहुत सुन्दर 🙂
    वाह वाह..

    सादर
    हेम

  3. ramadwivedi said,

    अक्टूबर 13, 2007 at 4:55 अपराह्न

    डा. रमा द्विवेदी said….

    देवी जी,

    बहुत खूबसूरत ग़ज़ल की पेशकश पर बधाई…निम्न पंक्तियां विशेष अच्छी लगीं….

    मुझको हंस हंस के मेरे साक़ी ने
    उम्र भर ज़हर ही पिलाया है.

  4. अक्टूबर 14, 2007 at 4:46 अपराह्न

    Sammeji
    Ramaji
    aapki pasand hamari bhi pasand hai.
    dhnaywaad ke saath
    Devi

  5. देवी said,

    नवम्बर 14, 2007 at 2:58 अपराह्न

    समीर जी
    आपको यह अहसास पसंद आया लाज़मी है छेड़ना और उस माहौल के अंतर्गत मुस्कराना दोनों माफ़ है

    देवी नागरानी


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