कोई और था फिर भी

गजलः१७
तू न था कोई और था फिर भी
याद का सिलसिला चला फिर भी.
शहर सारा है जानता फिर भी
राह इक बार पूछता फिर भी.
ख़ाली दिल का मकान था फिर भी
कुछ न किसको पता लगा फिर भी.
याद की कै़द में परिंदा था
कर दिया है उसे रिहा फिर भी.
ज़िंदगी को बहुत संभाला था
कुछ न कुछ टूटता रहा फिर भी.
गो परिंदा वो दिल का घायल था
सोच के पर लगा उड़ा फिर भी.
तोहमतें तू लगा मगर पहले
फितरतों को समझ ज़रा फिर भी.
कर दिया है ख़ुदी से घर खाली
क्यों न ‘देवी’, ख़ुदा रहा फिर भी.
चराग़े-दिल/ ४३

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2 टिप्पणियाँ

  1. अक्टूबर 9, 2007 at 4:21 अपराह्न

    तू न था कोई और था फिर भी
    याद का सिलसिला चला फिर भी.

    –वाह, क्या बात कही है!! बहुत खूब, देवी जी. वाह, वाह!!!

  2. अक्टूबर 10, 2007 at 4:10 अपराह्न

    Sameer
    mere protsahan ke liye yahi kafi hai..bus kalam mein rawani rahe.
    ssneh
    Devi


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