झूठ सच के बयान में रक्खा

गजलः१६
झूठ सच के बयान में रक्खा
बिक गया जो दुकान में रक्खा.

क्या निभाएगा प्यार वह जिसने
ख़ुदपरस्ती को ध्यान में रक्खा.

ढूंढते थे वजूद को अपने
भूले हम, किस मकान में रक्खा.

जिसने भी मस्लहत से काम लिया
उसने खुद को अमान में रक्खा.

जो भी जैसा है ठीक ही तो है
कुछ नहीं झूठी शान में रक्खा.

जिंदगी तो है बेवफा ‘देवी’
इसने मुझको गुमान में रक्खा.
चराग़े-दिल/ ४२

Advertisements

3 टिप्पणियाँ

  1. अक्टूबर 6, 2007 at 6:38 पूर्वाह्न

    जिंदगी तो है बेवफा ‘देवी’
    इसने मुझको गुमान में रक्खा
    वाह!

  2. Lahib said,

    नवम्बर 18, 2007 at 10:48 पूर्वाह्न

    Enlightened Siplicity of expression.
    Congrats..
    -Lahib.

  3. नवम्बर 18, 2007 at 8:47 अपराह्न

    lahib ji

    aapka saadar naman is housle bhari daad ke liye

    Devi


एक उत्तर दें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / बदले )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / बदले )

Connecting to %s

  • Blog Stats

  • मेटा

  • %d bloggers like this: