झूठ की बस्तियों में रहती हूँ

गजलः१५
कैसे दावा करूं मैं सच्ची हूँ
झूठ की बस्तियों में रहती हूँ.

मेरी तारीफ वो भी करते हैं
जिनकी नज़रों में रोज़ गिरती हूँ.

.दुश्मनों का मलाल क्या कीजे
दोस्तों के लिये तो अच्छी हूँ.

.दिल्लगी इससे बढ़के क्या होगी
दिलजलों की गली में रहती हूँ.

भर गया मेरा दिल ही अपनों से
सुख से ग़ैरों के बीच रहती हूँ.

गागरों में जो भर चुके सागर
प्यास उनके लबों की बनती हूँ.

जीस्त ‘देवी’ है खेल शतरँजी
बनके मोहरा मैं चाल चलती हूँ.१५

.चराग़े-दिल/ ४१

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7 टिप्पणियाँ

  1. अक्टूबर 3, 2007 at 12:22 पूर्वाह्न

    भर गया मेरा दिल ही अपनों से
    सुख से ग़ैरों के बीच रहती हूँ.

    –वाह देवी जी. सुन्दर और बेहतरीन गज़ल. बहुत बधाई.

  2. अक्टूबर 3, 2007 at 12:39 पूर्वाह्न

    बहुत खूब देवी जी,

    हमेशा की आपकी गज़ल पढ़कर अच्छा लगता है…बधाई

  3. वाणी said,

    अक्टूबर 3, 2007 at 2:18 पूर्वाह्न

    “जीस्त ‘देवी’ है खेल शतरँजी
    बनके मोहरा मैं चाल चलती हूँ.”

    वाह वाह! मजा आ गया. 🙂

  4. Meet said,

    अक्टूबर 3, 2007 at 5:16 पूर्वाह्न

    बहुत अच्छा है देवी. पहले भी पढ़ा है इसे लेकिन फिर पढ़ के भी बहुत अच्छा लगा.

    M

  5. ashutosh said,

    अक्टूबर 3, 2007 at 7:04 पूर्वाह्न

    pahle do sher vaqayee acchhe hain.

  6. अक्टूबर 3, 2007 at 10:07 अपराह्न

    मेरी तारीफ वो भी करते हैं
    जिनकी नज़रों में रोज़ गिरती हूँ.

    aage kya kahoon

    Meri kahmoshi bhi hans rahi hai.

    Devi

  7. सितम्बर 1, 2010 at 2:01 पूर्वाह्न

    .दुश्मनों का मलाल क्या कीजे
    दोस्तों के लिये तो अच्छी हूँ.

    अच्छी है …


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