चराग़ों ने अपने ही घर को जलाया

गजलः २१
चराग़ों ने अपने ही घर को जलाया
कि हैराँ है इस हादसे पर पराया.

किसी को भला कैसे हम आज़माते
मुक़द्दर ने हमको बहुत आज़माया.

दिया जो मेरे साथ जलता रहा है
अँधेरा उसी रौशनी का है साया.

ही राहतों की बड़ी मुंतज़िर मैं
मगर चैन दुनियाँ में हरगिज़ न पाया.

संभल जाओ अब भी समय है ऐ ‘देवी’
क़यामत का अब वक्त नज़दीक आया.

Advertisements

छीन ली मुझसे मौसम ने आज़ादियाँ

गजलः२०
छीन ली मुझसे मौसम ने आज़ादियाँ
रास फिर आ गईं मुझको तन्हाइयाँ.

बनके भंवरे चुराते रहे रँगो-बू
रँग है अपना कोई, न है आशियाँ.

दूसरा ताज कोई बनाएगा क्या
अब लहू मैं रही हैं कहां गर्मियाँ?

खुद से हारा हुआ आज इन्सान है
हौसलों में कहाँ अब हैं अंगड़ाइयाँ.

आज जो ज़हमतों का मिला है सिला
बावफा वो निभाती हैं दुशवारियाँ.

पहले अपने गरेबान में देख लो
फिर उठा ‘देवी’ औरों पे तू उँगलियाँ.

“वसीयत” के रचनाकार

 vasiyat.jpg

“वसीयत” के रचनाकार का छोटा सा परिचय

श्री महावीर शर्मा लंडन के निवासी, एक सुलझे हुए कहानीकार और गज़ल गो शायर भी है. परदेस हो या देश एक हिंदुस्तानी ह्रदय हर द्रष्टिकोण से अपने देश की सभ्यता और वहाँ की संस्क्रुति अपने आस पास के पात्रों में ढूँढता रहता है. शायद कहीं न कहीं उसे अपना वजूद बिखरता नज़र आता है जिसका सिमटाव करने की कोशिश यह कहानी एक आईना बनकर सामने पेश आई है. साहित्य की सैर को निकलें तो उनकी साईट पर ज़रूर अपना पड़ाव बनाएं.

कहानीः “वसीयत”

महावीर शर्मा द्वारा लिखी गई यह कहानी दिलों का हक़ीकी दस्तावेज़ है. एक चलते फिरते टाइमज़ोन में ज़िंदगी के माइनों के बदलते रंग का ज़ाइका हक़ीकत का जामा पहन कर सामने आया है.

“चलती चक्की देककर दिया कबीरा रोइ
दो पाटन के बीच में साबित बचा न कोइ.”

ज़िंदगी और मौत का फासला दर गुज़र करते करते, रिश्तों की बाज़ार से गुज़रना पड़ता है. यह एक आम इन्सान की ज़िंदगी का हिस्सा है जो एक कड़वे अहसास का ज़हरीला घूँट पीने के बाद ही तजुरबा बन जाता है. आजकल ये एक आम चलन हो रहा है, शायद मशिनों के दौर में रहते रहते इन्सान की सोच भी मशीनी पुरज़ों की तरह चलती रहती है, अपना काम करती रहती है , बिना यह जाने, बिना यह देखे कि उन पाटों के बीच कौन आया, कौन ज़ख्मी हुआ, कौन कराह उठा. इस शोर के दौर में चीख़ का कानों तक पहुंच पाना तो नामुमकिन है, जहाँ बहरों की बस्तियाँ गूँगों की भाषा अब भी समझने के प्रयास में लगी हुई हैं. देखा और समझा जाए तो यह बात आईना बन कर सामने आती है कि कोई भी बुज़ुर्ग पैदा नहीं होता. ‘आज का बालक कल का पिता’ यही चलन है और रहेगा भी. बस सोच की रफ़्तार ताल मेल नहीं रख पाती और वही टाइमज़ोन का जेनिरेशन गैप बन जाता है.

खा़मुशी को ही झेलिये साहब
मुँह से कुछ भी न बोलिये साहब. देवी

गुफ़्तगू की तरह ख़ामोशियाँ भी बोलती हैं, चीख़ती है पर बेसदा सी उनकी वो आवाज़ें घुटन बन कर दफ़्न हो जाती हैं उन दिलों की धड़कनों में, जहाँ साँसें अहसास बनकर धड़कती हैं. ख़ामुशी की घुटन का घेराव जहाँ घना हो जाता है, वहाँ उसे तोड़ कर एक ज़िंदा लाश को जीवन दान देना एक नेक कदम होता है. पल दो पल उस बुढ़ापे को सहारा देना, उसके पास बैठकर उस के मन की भावनाओं को टटोलना, या उन्हें कुरेदने की बजाय सहलाना किसी तीर्थ पर जाने से ज़्यादा माइने रखता है क्योंकि “पत्थरों में ख़ुदा बसा है” कहना और उस सत्य का दर्शन करना अलग अलग दिशाओं का प्रतीक है, धड़कते दिल में रब बसता है यह एक जाना माना सच है. पर सच से आँखें चुराना, कतराकर पास से होकर गुज़र जाना कितना आसान हो गया है. हाँ जब सच का सामना होता है तो ज़्यादा कुछ नहीं बदलता, इतिहास गवाह है हर बात दोहराई जाती है, सिर्फ नाम बदलते हैं, रिश्तों के माइने बदलते हैं, हालात वही के वही रहते हैं. शब्दों से टपकती हुई पीडा़ का अहसास देखें उनके ह्रदय की गहराइयों को टटोलें, पात्रों की विवशता, एकाकीपन के सूत्र में बंधती जा रही है.

‘एक रात जब मूसलाधार वर्षा हो रही थी। ऐथल के ऐसा तेज़ दर्द हुआ जो उस के लिए सहना कठिन था। मैंने एम्बुलैंस मंगाई और ऐथल की करहाटों व अपनी घबराहट के साथ अस्पताल पहुँच गया।
एक अनंत पीड़ा को जिन सजीव शब्दों में महावीर शर्मा ने पिरोया है लगता है जैसे यह सिर्फ कहानी के पात्रों की बात नहीं चल रही है, उन्होंने खुद इस दौर को जिया है. मेरी गज़ल का एक शेर इसी बात का जामिन हैः
ज़िंदगी को न मैं तो जी पाई
उसने ही मुझको है जिया जैसे.

” मैं जानता था …क्योंकि कोई सुनने वाला नहीं है, उस के अचेतन मन में पड़ी हुई पुरानी यादें चेतने पर आने के लिये जाने कब से सँघर्ष कर रही होगी, किंतु किसके पास इस बूढ़े की दास्तान सुनने के लिये समय नहीं है.” ( पढ़िये कहानी “वसीयत”)

मन का हर ज़र्रा इस सत्य को किसी भी तरह नकार नहीं पाता, पर हाँ, कड़वी दवा का घूँट समझकर सिर्फ निगलने की कोशिश कर सकता है. काल चक्र तो बिना आहट, बिना किसी को सूचित किये, स्वारंथ अस्वार्थ के दायरे के बाहर, दुख सुख की परंपरा को टोड़ता हुआ आगे बढता रहता है और ज़िंदगी के सफर में कहीं न कहीं कोई वक़्त जरूर दोहराया जाता है जहाँ तन्हाई का आलम इन्सान को घेर लेता है, जहाँ वह मकानों की भाँय भाँय करती दीवारों से पगलों की तरह बात करना उस आदमी की बेबसी बन जाती है. दुःख सुख का अहसास वहाँ कम होता है जहाँ उसको बाँटा जाता है, वर्ना उस कोहरे से बाहर निकलना बहुत मुशकिल हो जाता है. ऐसे हालात में बेबसी का सहारा बन जाते है आँसू. आँसुओं का भार जितना ज़्यादा दर्द उतना गहरा…….!! कहानी मन को छूकर उसके मर्म से पहचान करा जाती है जब याद की वादियों से तन्हा गुज़रना पड़ता है. एक वारदात दूसरी के साथ जुड़ती हुई सामने आ जा रही है.

“उस दिन मुझे माँ और ऐथल की बड़ी याद आई। मेरी आँख भर आई! पोते का नाम जॉर्ज वारन रखा.” कहानी का बहाव मन की रवानी के साथ ऊँचाइयों से बहता हुआ मानव ह्रदय की सतह में आकर थम जाता है. लावा बनकर बह रहा है पिघलता हुआ दर्द, जिसकी पीड़ा का इज़हार कितनी सुंदरता से किया है महावीर जी ने अपने पीड़ित मन के शब्द सुरा से “हंसते खेलते एक साल बीत गया, इतनी कशमकश भरे जीवन में अब आयु ने भी शरीर से खिलवाड़ करना शुरू कर दिया था.”

इस कहानी की तार में पिरोया गया हर एहसास निराला है, बखूबी अहसासों का इज़हार शब्दों में दर्शाया है. “वसीयत” का एक पहलू बड़े ही निराले मोड़ पर आ खड़ा है जहां “विलामा” नामक उस सफेद बिल्ली का जि़क्र आया है. इन्सान और जानवर के संतुलन का संगम, क्रत्घनता और क्रत्घय्ता का एक सँगम महावीर शर्मा जी के शब्दों में…!!
” मैं उसे कहानी सुनाता और वह म्याऊँ म्याऊँ की भाषा में हर बात का उत्तर देती, मुझे ऐसा लगता जैसे मैं नन्हें जार्ज से बात कर रहा हूँ” (जार्ज इस कहानी के पात्र के रूप में उनका पोता है ) मर्म का क्षितिज देखिये..!

‘एक दिन वह जब बाहर गई और रात को वापस नहीं लौटी तो मैं बहुत रोया, ठीक उसी तरह जैसे जॉर्ज, विलियम और जैनी को छोड़ने के बाद दिल की पीड़ा को मिटाने के लिए रोया था। मैं रात भर विलमा की राह देखता रहा। अगले दिन वह वापस आ गई। बस, यही अंतर था विलमा और विलियम में जो वापस नहीं लौटा।
अभिलाषा अंतरमन के कलम की ज़ुबानी अश्कों की कहानी सुना रही है. अपने बच्चों की आस, प्यास बनकर रूह की ज़ुबान से टपक रही है. लपकते शोले मोम को पिघलाने के बजाय दिल को पत्थर भी बना देते हैं. दिल के नाज़ुक जज़्बे बर्फ की तरह सर्द भी पड़ जाते हैं. यह बखूबी दर्शाया गया है इस कहानी में.. धन राषि को धूल की तरह तोल कर लुटाया गया, जिससे न किसी के वक्त का मोल चुकाया जा सकता है, और ना ही किसी के अरमानों को आश्रय देने की कीमत. हाँ आँका गया मूल्य तो उस एक अनकहे लफ़्ज़ का था, उस अनसुने शब्द का था जो कहीं न कहीं अंदर ही घुटकर दफन हो गया था, पर स्नेह के थपथपाहट से कुछ पल धड़क कर जी उठा.
जीवन की सार्थकता जब सिसकती है तो दिल की आह एक वसीयत बन जाती है. बस वसीयत ही रह जाती है. वसीयत के अर्थ की विशालता शायद इन्सानी समझ समझने में असमर्थ है. जो आँखें देखती है, धन, दौलत, घर परिवार, ईंट गारे से बने महल जो न जाने किस खोखली बुनियाद पर बने है, जहाँ इन्सान नाकाम हो जाता है अपनी आने वाली अवस्था को देखने में, टटोलने में, जिसे वह आज सहला रहा है, सजा रहा है. आज जब कल का रूप धारण करेगा तब इतिहास दोहराया जायेगा. जहाँ वसीयत करने वाला लाचारी की शिला पर खड़ा है, उसी राह का पथिक हर एक को बनना है, उस बनवास के दौर से गुज़रना है तन्हा तन्हा.
अपना भविष्य उज्वल रखने वालों की चाह को सार्थक बनने और बनाने का बस एक यही साधन है कि आज का आदम कुछ पल अपनी इस मशीनी जिंदगी से निकाल कर खुद अपने परिवार के एक भी एकाकी सदस्य के मन में एक सखा भाव से झाँक कर देखे और उसे यह अहसास दिलाये कि वह अकेला नहीं है. वह तो एक भरपूर पुख़्ते परिवार का सहारा व स्थंभ है, जो शासक होते हुए बहुत कुछ दे तो सकता है पर कुछ भी ले नहीं सकता, सिवाय कुछ क्षणों के जिनकी कीमत वह वसीयत के रूप में चुका सकता है. हाँ चुका सकता है.

प्रस्तुतकर्ताः
देवी नागरानी

http://www.sahityakunj.net/LEKHAK/M/MahavirSharma/vasiyat_kahani.htm)

http://www.sahityakunj.net/LEKHAK/D/DeviNangrani/vseeysy_sameeksha.htm

शिला

shilaa.jpg
हाँ वो शिला ही थी!! कैसे भूल कर सकती थी मैं पहचान ने में उसे, जिसे बरसों देखा, साथ गुजारा, पल पल उसके बारे में सोचा.

शिला थी ही ऐसी, जैसे किसी शिल्पकार की तराशी हुई एक सजीव आत्मा जो तन को ओढकर इस सँसार की सैर को निकली हो. जिस राह से वो गुजरती, गुजरने वाले थम जाते थे, जैसे जम से जाते थे. उनकी आँखे पत्थरा जाती, जैसे किसी नूर को सामने पाया हो. हाँ वही हूर शिला मेरी प्रिय सहेली आज मेरे सामने से गुजर रही है, खुद से होकर बेखबर.

बारह वर्ष कोई इतना लंबा अरसा तो नहीं होता, जहाँ इन्सान इस कदर बदल जाये, न फ़कत रँग रूप में, पर जिसके पूरे अस्तित्व की काया पलट हो जाए. वो कालेज के जमाने भी खूब हुआ करते थे, जब मैं और शिला साथ साथ रहा करते थे, एक कमरे में, एक ही क्लास में और लगभग पूरा वक्त साथ खाना, साथ पढना, साथ समय बिताना. क्या ओढना, क्या बिछाना ऐसी हर सोच से परे, आजाद पँछियों की तरह चहकते हुए, हर पल का लुत्फ लेते हुए, हर साल कालेज में टाप करते हुए अब हम दोनों फाइनल साल में पहूँचीं. चार साल का अरसा कोई कम तो नहीं होता, किसीको जानने के लिये, पहचानने के लिये.

“अरे शिला!” मैंने उसके करीब जाते ही अपनेपन से उसे पुकारा. अजनबी सी आँखे बिना भाव मेरी ओर उठी, उठकर फिर झुकी और वह कदम आगे बढाकर चल पड़ी, ऐसे जैसे मैं कोई अजनबी थी.

“शिला, मैं तुम्हारी सहेली सवी, कैसी हो?” जैसे सुना ही न हो, या चाहकर भी सुनना न चाहती हो, कुछ ऐसा अहसास मन में उठा. ऐसा क्या हो सकता है जो इस बदलाव का कारण बने?

इठलाती, बलखाती, हर कदम पर थिरकती हुई शिला, जैसे किसी शिल्पकार की तराशी कोई छवी, दिन भर गुनगुनाती अपने आस पास एक खुश्बू फैलाती, आज इतनी बेरँग, रूखी बिना अहसास क्यों? मेरी उत्सुकता बढी, मैंने आगे बढ़कर उसके साथ कदम मिलाकर चलते हुए धीरे से फिर उसका हाथ थाम लिया.
” शिला, मैं तो वही सवी, सविता हूँ, पर तुम शिला होकर भी शिला नहीं हो, यह मैं नहीं मानती. कैसा है समीर?”

इस सवाल से उसके चेहरे के रँग में जो बदलाव आया वो देखने जैसा था. चेहरे पर तनाव के बादल गहरे हो गये, आँखों में उदासी के साए ज्यादा घने और तन सिमटकर छुई मुई सा, जैसे वह सिमट कर अपना अस्तित्व छुपा लेना चाहती हो. मैंने उसकी कलाई पकड ली. जब उसने छुडाने की कोशिश की तो ज्यादा पुख्त़गी से पकडी, और हाँ उसने भी फिर छुडाने की कोशिश नहीं की. शायद अपनेपन की गर्मी से पत्थर पिघलने लगा था. उसी प्यार की आँच में पिघलकर ही तो वह समीर के साथ चली गई, दूर बहुत दूर किसी और दुनियाँ में. पीछे छोड़ गई अपनी प्यारी सहेली सविता को, अपने अँतिम वर्ष की पढ़ाई को, अपने आने वाले उज्वल भविष्य को. शायद उस प्यार की पनाह ने उससे वह रौशनी छीन ली थी, जिस कारण उसे सिर्फ समीर, उसकी चित्रकारी, और तूलिका पर निखरे रँग आस पास दिखाई पड़ रहे थे. जाने क्या था वह, कैसे खुमार था, प्यार का जुनून ही रहा होगा, जो उसने अपना भविष्य समीर के नाम लिख दिया. और एक दिन अचानक वह उसके साथ शादी अचानक मेरे सामने आ खडी हुई.
” सवी, मुझे और समीर को शादी की बधाई नहीं दोगी?”

” हाँ हाँ मुबारक हो”..पर अचानक…मेरे शब्द मेरे मुँह में ही रह गए.

” हाँ अचानक ही फैसला करना पड़ा, कल समीर वापस जा रहा है अपने घर शिमला, और में भी उसके साथ जा रही हूँ.” कहते हुए शिला मेरे गले लग गई.

“पर दो महीने के बाद फाइनल परीक्षा…” मैं कहना चाह रही थी पर कह ना पाई. शायद शिला जानकर अनजान बन रही थी, या वह अब किसी प्रकार की दख़ल अँदाजी नही चाहती थी, इसीलिये तो शादी का महत्व पूर्ण फैसला अकेले ही ले लिया, किसी की जरूरह ही उसे महसूस नहीं हुई. हाँ एक बात साफ थी, उसके ऊपर उस प्यार का, समीर की कला का जो इँद्रधनुषी खुमार था, उस बहाव में वो बहे जा रही थी. कोई बाँध वहाँ बाँधना बेकार था, यही सोच कर मैं भी अपनी पूरी सोच के साथ अधूरे शब्दों का सहारा लेने लगी.
“सवी, तुम ज्यादा मत सोचो, मैंने सोच समझ कर यह फैसला लिया है क्योंकि मैं समीर के सिवा नहीं रह सकती और न वो मेरे सिवा. अब मैं जीवन के रँगों को ओढ़ना चाहती हूं, उनमें अपनी आशाओं को रँगना चाहती हूँ, इससे ज्यादा कुछ नहीं..हाँ चलो साथ में बेठकर आखिरी बार खाना खाएँ, कल वैसे भी सुबह की गाडी पकडनी है, आओ चलें.” कहते हुए उसने मेरी कलाई ठीक उसी तरह पकडी थी, जैसे आज मैंने उसकी पकडी है.
खाना खाते खाते, बातों के दौरान मैं समीर की ओर देखती रही चोरी छुपे, जैसे उसे जानने की, पहचानने की कोशिश करती रही. ऐसा क्या था उसमें जो मेरी प्रिय सहेली की जिँदगी में तूफान बनकर आया और बवँडर की तरह बहा कर ले जा रहा है. दो महीने के लिये जो आर्ट का प्रजेक्ट उसे सौंपा गया था, उसके पूरा होने के पहले ही उसने शिला की जिँदगी पर अपना रँग चढा दिया और अब साथ ले जा रहा था मेरी जान से प्यारी सहेली को, जैसे जबरदस्ती कोई मेरे तन से रूह को जुदा कर रहा था. सोचों के दाइरे से खुद को बाहर निकालते हुए मैंने समीर की ओर रुख किया.

“समीर बुरा न मानना, पर एक बात तो बताओ, क्या दो महीने शिला की खातिर और नहीं रुक सकते ताकि शिला भी अपनी पढाई की जबाबदारी पूरी कर ले. जीवन भर साथ निभाने के लिये जरूरी नहीं है कि हम वक्त के साथ खिलवाड़ करें. पढाई तो रौशनी का एक अँग है, उसे इस तरह अधूरा….”
“सविता जी फैसला शिला का है मेरा नहीं, और उस फैसले से मैं ज्यादा खुश तो नहीं, पर नाराज़ भी नहीं. मेरी प्रेरणा मेरा मीत बनकर मेरे साथ साये की तरह रहे, यह मेरी खुशकिस्मती है.”
” पर…..” इतना भी न कह पाई और शिला ने आँखों के इशारे से मूक भाषा में मुझे कुछ न कहने के लिये कहकर चुप करा दिया.
बस वह चली गई, अपनी सुन्हरी दनियां में सुँदर सपनों को लेकर और फिर सब धुँधला धुँधला सा हो गया. दिन बीते, महीने बीते, और साल भी बीतते चले गये..एक नहीं, दो नहीं, पूरे बारह बरस. सोचों का सिलसिला साथ था, पकड़ में उसकी कलाई और हमकदम हमारी चाल. आखिर एक पेड़ के नीचे खींचकर मैंने उसे बिठाया और फिर मैं भी बैठ गई उसके पास सटक कर जैसा हम अक्सर बैठा करते थे.

” अब बता शिला, तू यहाँ इस शहर में शिमला से इतनी दूर? और समीर कहां है, साथ में क्यों नहीं आया?” मैंने अनजाने में कई सवाल एक साथ पूछ लिये और उसका मुँह तकने लगी जवाब के इँतजार में !

जवाब में उसकी म्रगनयनी आँखों से टपके सीप से कुछ मोती, जिन्हें चाहकर भी मैं अपने आँचल में समेट न पाई, ना ही शिला ने जतन किया उस फिसलती हुई धारा को रोकने का. बस कुछ कह न पाई और उठते हुए अपनेपन से कहा ” चलो कहीं बैठकर चाय पीते है सवी.”
चाय के उस दौर में उसने चाय के साथ न जाने कितने आँसुओं के साग़र पिये, अनबुझी किसी प्यास का होना जाहिर था, पर उस प्यास का रुख एक नया मोड़ ले रहा था. शिला की जुबानी उसकी आसुओं की तरह बिखरी हुई कहानी को समेटते हुए शिला ने कहा ” सवी मैं उसके लिये बस तूलिका पर बिखरे हुए रँगों का एक बिँदू थी..”

” थी…” मैंने उलझे हुए होंटों को खोलने की कोशिश की, पर शिला के मन का द्वंद्व शायद अभी बँद न हुआ था.

” हाँ थी. हूँ नहीं सवी ” अपनेपन की आँच से थमा हुआ दर्द का दरिया पिघल कर आँखों से बह जाना चाह रहा था और उसी बहाव में बहते हुए शिला कहती गई, ” सच मानो सवी जिस तरह उसने तूलिका पर रँग बिखेरकर मेरी तस्वीरों को सजाया, उन्हें सजीव बना दिया अपने हुनर की बारीकियों से, कई खरीदार उन पर फिदा होकर खरीदने लगे. दौलत का नशा दिन से ज्यादा समीर की रातें रँगीन करने लगा.दिन को मैं किसी पत्थर की मूर्ती की तरह उसकी प्रेरणा बनकर घँटों बैठी रहती और वह नपे तुले ढँग से मेरे हर कोण में रँग भरता रहा, बेचता रहा और खनखनाहट में खोता गया, और फिर बहाव इतना तेज़ आया उस बाढ़ में, जो वह मुझे भी बहा ले गया उसकी स्वार्थ की वेदी के उस पार जहाँ मैं तुम्हारी वह सहेली तो नहीं रही जो हर पल को तुम से बाँट लेती थी, पर हां बंटी सी, बिखरी बिखरी सी उस शिला का ज़र्रा ज़र्रा बिखरता गया. हाँ वह शिला जो अपनी आन बान के साथ जिया करती थी…वह…” और शिला फूट फूटकर रोने लगी.

बस अनकहे शब्दों ने हर खालीपन को भर दिया, आँसुओं की जुबाँ सब कह गई. मुझे यूँ लगने लगा कि शिला बिखर कर टूट चुकी है और जहां तक मेरी सोच पहुँच सकती थी, ऐसा आभास हूआ जैसे शिला मुझसे वही पुराना आश्रय माँग रही थी, उसी आँचल की नर्मी ढूँढ रही थी, वह निस्वार्थ स्पर्श माँग रही थी.

मैंने उसे आलिंगन में भरते हुए अपने साथ इस तरह जोड़ लिया जैसे वो कभी मुझ से अलग ही न हुई थी. उसका इस तरह सिमटना, बिखराव का अँत हो गया, सभी बिखरे रँग फिर से सिमट कर उस बेरँग शिला रूपी बिँदू में समाते चले गए, बूँद सागर में समा गई. आकाश के बादल छँट गए, विराटता नजर में भर गई सितारों भरा आसमान साफ दिखई दे रहा था.
कब दुपहर से शाम, शाम से साँझ हुई पता ही नहीं पडा, सफर ज़ारी है, मँजिल क्षितिज के उस पार शायद……!!!

दूर ध्वनी के साथ शब्द भी भीने भीने से मन को भिगोते रहे.

देवी नागरानी
२४ जून , २००६

http://www.sahityakunj.net/LEKHAK/D/DeviNangrani/shila_Kahani.htm

विश्व हिंदी न्यास अधिवेशन २००७

विश्व हिंदी न्यास अधिवेशन २००७

 

हिंदी-दर्शन और दिशा

एक नये क्षितिज को छूता हुआ “विश्व हिंदी न्यास” द्वारा आयोजित अक्टूबर ६ और ७ तारीख,२००७ को सातवाँ अधिवेशन, अपने सभी इन्द्रधनुषी रंगों का एक बेजोड़, बेमिसाल अनुभव रहा. अनेकता में एकता हमारे हिंदुस्तान की पहचान है, इसी सत्य को अमली जामा पहना कर आयोजित किया गया यह अद्भुत प्रयास हमारी आनेवाली युवा पीढ़ी के लिये मार्गदर्शक है.
स्वागत संदेश में G.Thomas Stella ने इस कार्य में समाई एकता की साराहना की और अपने विचार प्रकट करते हुए कहा कि “यही वह सभ्यता है जो यह पीढ़ी अपनी एक धरोहर के रूप में आने वाली पीढियों को दे सकती है.”

श्रीमती रीनत संधू, consul(Education) इस दिन की खास महमान रहीं. अपनी भावनाओं को प्रकट करते हुए यही कहा ” विश्व हिंदी न्यास” की तरफ से आयोजित किया गया अधिवेशन २००७ काबिले तारीफ़ है. यह योगदान हिंदी की सभ्यता व संस्क्रुति की प्रचार-प्रसार की ओर उठाया गया एक महत्वपूर्ण कदम है”.
कार्यक्रम का आरंभ हुआ अमरिका के राष्ट्रीय गीत से जिसे स्वर दिया अशनी व शिवानी दवे ने, और हिंदुस्तानी राष्ट्रीय गीत “जन गन मन” को बाँसुरी पर बजाया निष्ठा सोब्रिन ने और वहाँ मौजूद श्रोताओं ने सन्मान के साथ खडे होकर साथ दिया. दीप को उज्वलित करते हुए ” वंदे मारतम्” की ध्वनी मंच पर प्रतिध्वनित होती रही.

बाल साहित्य गोष्टी के अंतरगत हर उम्र के बच्चों ने भाग लिया, जिसका विस्तार कहानी, बाल गीत, विश्व गीत और नाटक के साथ साथ रोचक हकीकतों द्वारा देश की स्स्क्रुति को बखूबी अपने मूल्यों के साथ प्रसारित किया. भारत “विभन्नता में एकता” के एक सूत्र में पिरोया गया है, यह इस मंच पर झलकियों और झाँकियों की झिलमिलाहट में उज्वल और साफ़ नज़र आ रहा था. श्रीमती सीमा खुराना की आवाज़ में हकीकतों पर से परदे उठते चले गए. कलाकार एक के बाद एक शब्दों के परों पर सवार होकर मूक भाषा में अपने मन की भावनाओं की परिभाषा को व्यक्त करते रहे . बच्चे, बड़े विभिन्न पात्रों का रूप धारण करते हुए इस एकता का पैग़ाम पहुंचाने में सफल रहे, जिसके लिये उनकी जितनी तारीफ की जाये वह कम है.
उड़ीसा के न्रत्य, जगन्नाथ की रथ यात्रा का अद्भुत द्रश्य, राजस्थानी विवाह,जिसमें उनकी रस्में भी शामिल थीं, तामिलनाडू के तीज त्यौहार की झलकियाँ, पंजाब के परिवारों का संगठन और एकता उनके नाच-गाने, कढ़ाई-बुनाई और भाई चारे के द्रश्यों द्वारा मन को छूता चला गया. पंजाब का “गिद्धा” काबिले तारीफ़ था. एक मंच पर अनेक प्राँतों की शादियाँ, उनकी समानताओं और विपरीत रस्मों से वाकिफ़ कराती रही.

उड़ीसा की शादी के निबंध जो द्रश्य सामने आए, वो हकीकत से ही जुड़े हुए थे और उसीसे वाकिफ़ कराया गया कि शादी सिर्फ़ दूल्हा दुल्हन के बीच नहीं होती, बल्कि दो परिवारों के बिच एक नया रिश्ता जुडने की रस्म भी है, जो जुड़ता है, पनपता है और उसी की छत्र छाया में आज इतना महफूज़ है.
बंगला देश की शादी का द्रश्य बड़ा मन भावन था. शादी से बिदाई तक के द्रश्य किसी चलचित्र की झलकियों की तरह आँखों में समाते रहे.
देश की महान हस्तियाँ ज़िंदा हो उठी उन कलाकार बच्चों के रुप में, जो देश से परे रहकर भी वहाँ की आदर्श भरी झलकियों को अपनी प्रस्तुतियों द्वारा उजगार कर पाए.
“जलियनवाला बाग़” की अंधाधुंध गोलियों की बौछार का नमूना, भगतसिंह के “स्वतंत्रता संग्राम” के परिचय के साथ साथ उनका नारा ” इन्कलाब जिंदाबाद” एक गूंज बनकर इस बात का आश्वासन दे रहे थे कि श्रँखलाओं में जकडी भारतमाता को ये वीर आज़ादी का जामा पहनाने में समर्थ हैं.
एक के बाद एकसुंदर सलोने चहरे सामने आते रहे. १४० कलाकारों की सजी धजी रूप रेखाएं मन पर अंकित सी हो गई.
डाँडी मार्च के लिये तैयार गाँधीजी, सुभाषचंद्र बोस, श्री जवाहरलाल नेहरू…..!!

bharat-_p.jpg

बस यूँ समझ लें कि इन कलाकरों ने रंग बिरंगी वेश भूषाओं में जीवित होकर इतिहास को दोहराया है, और उनकी सफलता से आँखे नम हुए बिना न रह सकीं. सागर को गागर में समाने का यह अनूठा सफल प्रयास एवः अदभुत तजुर्बा रहा. कला प्रदर्शन देखकर लगता था जैसे यह एक संगठित परिवार है और उस मंच के कलाकार खुद भी उन रस्मों को निभाने के आदी हैं. एक बात का ज़िक्र मै यहाँ ज़रूर करना चाहूँगी, वो है उनकी महमान निवाज़ी, जिसका उदाहरण है श्री चंदर व उनकी श्रीमती पद्मिनी प्रसाद जिन्होंने सप्रेम चार अतिथि लेखक, लेखिकाओं को अपने घर में निवास दिया. मैं उनमें से एक थी और तहे दिल से उनका धन्यवाद करती हूं.

nyas-oct-2007.jpg

इस सिलसिले में “विश्व हिंदी न्यास” के डाइरेक्टर श्री राम चौधरी, कवि सम्मेलन के सँचालक श्री कैलाश चंद्र शर्मा, और श्रीमती सीमा ख़ुराना और उनकी पूरी टीम दाद के पात्र हैं. उसी दिन शाम की चाय के बाद कहानी मंच आयोजित किया गया, जिसमें लेखक अपने पात्रों को अपनी आवाज़ में उजगारित करता रहा. पहली कहानी सियाराम शरन गुप्त की लिखी हुई “काकी” सरमिष्ठा बनर्जी द्वारा भावपूर्ण अर्थों को खुलासा करती रही. भगवती चरण द्वारा लिखी गई कहानी ” प्रायश्चित” अँचला सोब्रिन ने पढ़ते हुए अपने हाव भाव द्वारा बहुत ही जानदार पहलू रक्खा जब अंत का पैग़ाम सुनाया कि “माँजी बिल्ली तो उठकर भाग गई. ” अंत में सीमा खुराना ने अपनी कहानी “शक” बड़े ही नवनीतम अंदाज से प्रस्तुत की. उनके हर लहज़े , हाव भाव से उनके सभी पात्र जी उठे, जिससे यही आभास होता है कि सीमाजी एक अनुपम साहित्यकार, कहानीकार होने के साथ साथ एक माहिर कलाकार भी है.
दिन के अंतिम चरण में कवि सम्मेलन का संचालन किया श्री कैलाश चंद्र शर्मा ने और कवि गण जिन्होंने भाग लिया वह थे डा॰ सरिता महता, पूर्णिमा देसाई, रामबाबू गौतम, महेशकुमार शर्मा, अनुराधा चंदर, अनिल प्रभा कुमार, महेश कुमार शर्मा और मैं देवी नागरानी.
अधिवेशन का अंतिम चरण बड़ा ही मूल्यवान रहा, Teaching Workshop बडा ही कारगर सिद्ध हुआ. भाग लेते हुए एक बात का इल्म हुआ कि बहुत जानते हुए भी हम कितना कम जानते हैं और कितना बाकी कुछ एक दूसरे से सीख सकते हैं. श्री वेद प्रकाश जी व पूर्णिमा देसाई के सुझाव बच्चों की शिक्षण यात्रा के लिये बहुत अच्छे रहे. देखकर, सुनकर हैरत हुई कि अपनी राष्ट्र भाषा के लिये जितना प्रयास यहाँ पर किया जा रहा है, शायद यह उसका नतीजा रहा कि आठवें विश्व हिंदी सम्मेलन का आयोजन भी यहाँ न्यू यार्क में हुआ और एक उज्वल भविष्य की किरणें अब नये क्षितिज पर दिखाई दे रही हैं.
कार्यक्रम के अंतिम पड़ाव से पहले साहित्य गोष्टी का आयोजन संपन्न हुआ जिसमें चार रचनाकारों ने अपनी अपनी कहानियां पढ़ीं. एक सफल प्रयास के लिये सभी आयोजन कर्ता, सभी कलाकारों एवः विश्व हि्दी न्यास की पूरी समिति को मेरा नमन.

देवी नागरानी
न्यू जर्सी.
१० अक्तूबर, २००७

दर्द बनकर समा गया दिल में

गज़लः १९

दर्द बनकर समा गया दिल में
कोई महमान आ गया दिल में.

 

चाहतें लेके कोई आया था
आग सी इक लगा गया दिल में.

 

झूठ में सच मिला गया कोई
एक तूफां उठा गया दिल में.

 

खुशबुओं से बदन महक उठ्ठा
फूल ऐसे खिला गया दिल में.

 

मैं अकेली थी और अंधेरा था
जोत कोई जला गया दिल में.

 

चराग़े-दिल/ ४५

गर्दिशों ने बहुत सताया है

गज़लः १८
गर्दिशों ने बहुत सताया है
हर क़दम पर ही आज़माया है.
दफ़्न हैं राज़ कितने सीने में
हर्फ् लब पर कभी न आया है.
मुझको हंस हंस के मेरे साक़ी ने
उम्र भर ज़हर ही पिलाया है.
ज़ोर मौजों का खूब था लेकिन
कोई कश्ती निकाल लाया है.
मुस्कराया है इस अदा से वो
जैसे ख़त का जवाब आया है.
बनके अनजान उसने फिर मेरे
दिल के तारों को झन-झनाया है.
मुझको ठहरा दिया कहां ‘देवी’
सर पे छत है न कोई साया है.
चराग़े-दिल/ ४४

कोई और था फिर भी

गजलः१७
तू न था कोई और था फिर भी
याद का सिलसिला चला फिर भी.
शहर सारा है जानता फिर भी
राह इक बार पूछता फिर भी.
ख़ाली दिल का मकान था फिर भी
कुछ न किसको पता लगा फिर भी.
याद की कै़द में परिंदा था
कर दिया है उसे रिहा फिर भी.
ज़िंदगी को बहुत संभाला था
कुछ न कुछ टूटता रहा फिर भी.
गो परिंदा वो दिल का घायल था
सोच के पर लगा उड़ा फिर भी.
तोहमतें तू लगा मगर पहले
फितरतों को समझ ज़रा फिर भी.
कर दिया है ख़ुदी से घर खाली
क्यों न ‘देवी’, ख़ुदा रहा फिर भी.
चराग़े-दिल/ ४३

झूठ सच के बयान में रक्खा

गजलः१६
झूठ सच के बयान में रक्खा
बिक गया जो दुकान में रक्खा.

क्या निभाएगा प्यार वह जिसने
ख़ुदपरस्ती को ध्यान में रक्खा.

ढूंढते थे वजूद को अपने
भूले हम, किस मकान में रक्खा.

जिसने भी मस्लहत से काम लिया
उसने खुद को अमान में रक्खा.

जो भी जैसा है ठीक ही तो है
कुछ नहीं झूठी शान में रक्खा.

जिंदगी तो है बेवफा ‘देवी’
इसने मुझको गुमान में रक्खा.
चराग़े-दिल/ ४२

झूठ की बस्तियों में रहती हूँ

गजलः१५
कैसे दावा करूं मैं सच्ची हूँ
झूठ की बस्तियों में रहती हूँ.

मेरी तारीफ वो भी करते हैं
जिनकी नज़रों में रोज़ गिरती हूँ.

.दुश्मनों का मलाल क्या कीजे
दोस्तों के लिये तो अच्छी हूँ.

.दिल्लगी इससे बढ़के क्या होगी
दिलजलों की गली में रहती हूँ.

भर गया मेरा दिल ही अपनों से
सुख से ग़ैरों के बीच रहती हूँ.

गागरों में जो भर चुके सागर
प्यास उनके लबों की बनती हूँ.

जीस्त ‘देवी’ है खेल शतरँजी
बनके मोहरा मैं चाल चलती हूँ.१५

.चराग़े-दिल/ ४१

  • Blog Stats

  • मेटा