मोती कभी पलकों से गिराए नहीं हमन

गजलः १४
सपने कभी आंखों मे बसाए नहीं हमने
बेकार के ये नाज़ उठाए नहीं हमने.

दौलत को तेरे दर्द की रक्खा सहेज कर
मोती कभी पलकों से गिराए नहीं हमने.

आई जो तेरी याद तो लिखने लगी गज़ल
रो रो के गीत औरों को सुनाए नहीं हमने.

है सूखा पड़ा आज तो, कल आयेगा सैलाब
ख़ेमे किसी भी जगह लगाए नहीं हमने.

इतने फ़रेब खाए हैं ‘देवी’ बहार में
जूड़े में गुलाब अब के लगाये नहीं हमने.

चराग़े-दिल/ ४०

Advertisements

4 टिप्पणियाँ

  1. सितम्बर 30, 2007 at 3:12 पूर्वाह्न

    वाह साहिबा, बहुत अच्छे. आपको अचानक ब्लाग्वानी पर देख कर मजा आया. कल गालिब के एक पोते मिले थे एक प्रोग्राम मे तो आपकी याद आयी थी.आज मुलाकात हो गयी.

  2. सितम्बर 30, 2007 at 3:12 अपराह्न

    दौलत को तेरे दर्द की रक्खा सहेज कर
    मोती कभी पलकों से गिराए नहीं हमने.

    -बहुत उम्दा, देवी जी. दाद कबूलें.

  3. अक्टूबर 2, 2007 at 5:21 अपराह्न

    Sameer
    Tumhari parkhi nazar bhi shabdon ke moti chun kar satah par lane mein bahut shilpi ban gayi hai. bahut acha laga.

    Devi

  4. mehek said,

    दिसम्बर 10, 2007 at 6:21 पूर्वाह्न

    shandar aab ye nazm kisi moti se kaam nahi.ese ankhon mein basaya humne.


एक उत्तर दें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / बदले )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / बदले )

Connecting to %s

  • Blog Stats

  • मेटा

  • %d bloggers like this: