बाकी न तेरी याद की परछाइयां रहीं

गजलः १३
बाकी न तेरी याद की परछाइयां रहीं
बस मेरी ज़िंदगी में ये तन्हाइयां रहीं.

डोली तो मेरे ख़्वाब की उठ्ठी नहीं, मगर
यादों में गूंजती हुई शहनाइयां रहीं.

बचपन तो छोड़ आए थे, लेकिन हमारे साथ
ता- उम्र खेलती हुई अमराइयां रहीं.

चाहत, ख़ुलूस, प्यार के रिश्ते बदल गए
जज़बात में न आज वो गहराइयां रहीं.

अच्छे थे जो भी लोग वो बाक़ी नहीं रहे
‘देवी’ जहां में अब कहां अच्छाइयां रहीं.
चराग़े-दिल/ ३९

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4 टिप्पणियाँ

  1. सितम्बर 26, 2007 at 12:03 पूर्वाह्न

    अच्छे थे जो भी लोग वो बाक़ी नहीं रहे
    ‘देवी’ जहां में अब कहां अच्छाइयां रहीं.

    –वाह, वाह!!! क्या बात कही है, देवी जी. आनन्द आ गया. दाद कबूलें.

  2. Pravin Kumar said,

    सितम्बर 26, 2007 at 6:18 पूर्वाह्न

    Itni shashakt rachana, kafi dino ke baad, parhne ko mili. Badhai. Shyad main bhi duniya ke mele me kho gaya tha. thora ttahar ke sochane ka mauka mila. tahe dil se dhanyad.

    pravin

  3. सितम्बर 26, 2007 at 10:29 अपराह्न

    समीर जी
    बहुत अच्छा लगी आपकी पारखी नजर की कद्रदानी. मुझे इन्तजार रहेगा जब आप मेरी दो चार गज़ल को सुर दे पायेंगे.
    देवी

  4. सितम्बर 26, 2007 at 10:37 अपराह्न

    Pravin ji
    abhari hoon aapke in prayass sanchaar karne vale shabdon ke liye.

    Duniya ke mele mein ab to insaan ki hasti tanha hai
    is Shor ki bheed mein kyon phir bhi tanhaayi meri tanha hai.

    thanks
    Wishes
    Devi


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