रब्बा, मेरे नसीब में ऐसी बहार दे.

गजलः१२
अपने जवान हुस्न का सदक़ा उतार दे
दर्शन दे एक बार मुकद्दर संवार दे.

जो खिल उठें गुलाब मेरे दिल के बाग़ में
रब्बा, मेरे नसीब में ऐसी बहार दे.

अच्छा तो मेरे क़त्ल में मेरा ही हाथ था
आ सारी तुहमतें तू मेरे सर पे मार दे.

इक जामे-‍बेख़ुदी की है दरकार आजकल
हर ग़म को भूल जाऊँ मैं, ऐसा ख़ुमार दे.

मोहलत ज़रा सी दे मुझे लौटूं अतीत में
दो चार पल के वास्ते दुनियां संवार दे.

चराग़े-दिल/ ३८

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5 टिप्पणियाँ

  1. सितम्बर 22, 2007 at 9:38 अपराह्न

    अच्छा तो मेरे क़त्ल में मेरा ही हाथ था
    आ सारी तुहमतें तू मेरे सर पे मार दे.

    उम्दा ,असर करने वाली एक परिपक्व गज़ल .अछा लगा पढकर.

  2. सितम्बर 24, 2007 at 1:38 पूर्वाह्न

    अरविंद जी
    आपकप गज़ल पड़कर आनंद आया, बहुत अच्छा लगा.
    धन्यवाद के साथ
    देवी

  3. Manoshi said,

    सितम्बर 25, 2007 at 2:42 पूर्वाह्न

    अच्छा तो मेरे क़त्ल में मेरा ही हाथ था
    आ सारी तुहमतें तू मेरे सर पे मार दे.

    ye sher vaqai bahut sundar hai.

    –Manoshi

  4. सितम्बर 25, 2007 at 10:58 अपराह्न

    Manoshi
    gazal ke is sher ko pasand karne ke liye bahut bahut dhanyavaad.
    ssneh

    Devi

  5. नवम्बर 18, 2009 at 5:04 पूर्वाह्न

    bahut sundar|| aapki ye rachanaa maine thodi awaaz pe kaam mein li hai!!


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