तारों का नूर लेकर ये रात ढल रही ह

गजलः 11

तारों का नूर लेकर ये रात ढल रही है
दम तोड़ती हुई इक शम्अ जल रही है.

नींदों की ख्वाहिशों में रातें गुज़ारती हूं
सपनों की आस अब तक दिल में ही पल रही है.

ऐसे न डूबते हम पहले जो थाम लेते
मौजों की गोद में अब कश्ती संभल रही है.

तुम जब जुदा हुए तो सब कुछ उजड़ गया था
तुम आ गए तो दुनियां करवट बदल रही है.

इस जिंदगी में रौनक कम तो नहीं है ‘देवी’
बस इक तेरी कमी ही दिन रात खल रही है.

चराग़े-दिल/ ३७

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11 टिप्पणियाँ

  1. सितम्बर 21, 2007 at 6:39 पूर्वाह्न

    काफ़ी सही अभिव्यक्ति दी है आपने।
    अच्छा है जो कश्ती सँभल रही है।

  2. Annapurna said,

    सितम्बर 21, 2007 at 8:01 पूर्वाह्न

    बहुत ख़ूब !

  3. mohinder said,

    सितम्बर 21, 2007 at 8:40 पूर्वाह्न

    आ तो गया हूं मैं इस घर में लेकिन
    है कौन घर का मालिक मुझे पता नही है ?

    बेहतरीन लफ़्जों व मायनों से सजी हुई गजल के लिये वधाई.

  4. सितम्बर 21, 2007 at 9:06 पूर्वाह्न

    “इस जिंदगी में रौनक कम तो नहीं है ‘देवी’
    बस इक तेरी कमी ही दिन रात खल रही है.”

    पढकर गुनगुनाने को दिल करता है. 🙂

  5. सितम्बर 21, 2007 at 10:26 पूर्वाह्न

    bhut sudar ghazal……….
    majja aaya pad ker kai baar padne ka dil kerta hai ise.
    sadar
    hem jyotsana

  6. सितम्बर 21, 2007 at 2:56 अपराह्न

    इस जिंदगी में रौनक कम तो नहीं है ‘देवी’
    बस इक तेरी कमी ही दिन रात खल रही है.

    –वाह वाह, बहुत खूब!! मजा आ गया.

  7. kabir2007 said,

    सितम्बर 21, 2007 at 6:20 अपराह्न

    tarif kya karoo aap to khud hi ek tarif hai
    tarif to unki ki jaati hai jinki kabhi koi tarif hi nahi hoti.
    aap to tarif ka ek anmol hira ho.

  8. सितम्बर 21, 2007 at 11:23 अपराह्न

    मोहिंदर जी
    खूब लिखा है
    आ तो गया हूं मैं इस घर में लेकिन
    है कौन घर का मालिक मुझे पता नही है ?

    राहों पे चल पड़े थे और आन पहुंची मँजिल
    कदमों की है ये साजिश मंजिल की खता नहीं है.
    देवी

  9. सितम्बर 21, 2007 at 11:25 अपराह्न

    प्रभाकरजी
    बहुत धन्यवाद गजल पसँद पडी़!!

    गहराइयों में दिल के दूबी थी दिल की कशती
    इन हौसलों से अब वो फिर से सँभल रही है.

    देवी

  10. सितम्बर 21, 2007 at 11:29 अपराह्न

    विकासजी
    समीर जी
    इस जिंदगी में रौनक कम तो नहीं है ‘देवी’
    बस इक तेरी कमी ही दिन रात खल रही है.
    –वाह वाह, बहुत खूब!! मजा आ गया.

    पढकर गुनगुनाने को दिल करता है. 🙂
    मुझे पता है समीर जी भी अक्सर गुनगुनाते हैं

    उस गुनगुनाहटों की आहट मैं सुन रही हूँ
    खुशबू वो बन हवा में संग संग ही चल रही है.
    धन्यवाद के साथ
    देवी

  11. सितम्बर 21, 2007 at 11:31 अपराह्न

    कबीर जी व ज्योत्सना जी

    तारीफ़ आपकी है चाहा जो इस गज़ल को
    अब दाद आपको भी बदले में मिल रही है.

    कबूल हो!!
    देवी


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